Friday, May 17, 2019

शिक्षा के ग्राहक

शिक्षा के मामले में हमारी भूमिका सामान खरीदने वाले ग्राहक की तरह हो गई है” शिक्षा के बारे में ख्याल आते ही कई सारी चीज़ें ज़हन में आने लगती हैं। विद्यालय भवन, शिक्षक, बच्चे और किताबों के बारे में हम सोचने लगते हैं। ये छवि वर्तमान की तुलना में भविष्य का सुंदर चित्र उकेरती है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि शिक्षा हमारे सुरक्षित भविष्य को सुनिश्चित करने वाला साधन है। इसका प्रमाण आप ‘बड़े आदमी’ के मिथक के रूप में देख सकते हैं जिसके लिए शिक्षित होना एक ज़रूरी शर्त है।

वर्तमान समय में इसी सुरक्षित भविष्य की उम्मीद में हम शिक्षा के लिए हर संकट उठाने को तैयार रहते हैं। क्या आपने कभी शिक्षा के भविष्य के बारे में सोचा है? बदलते समय में शिक्षा की परिकल्पना और बदलावों को समझना आवश्यक है। शिक्षा के भविष्य पर बात करने से पहले इसके अतीत और वर्तमान का उल्लेख करना भी ज़रूरी है। यहां शिक्षा का मकसद व्यक्ति को जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के कौशल सीखाना था। धीरे-धीरे शिक्षा सामाजिकता के विकास का माध्यम बन गई। मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ नागरिकता के गुणों के विकास को भी शिक्षा के लक्ष्यों से जोड़ दिया गया।

औद्योगिक क्रांति के बाद तो शिक्षा की भूमिका में आमूलचूल परिवर्तन देखने को मिली। यह मानव संसाधन तैयार करने वाले साधन के रूप में स्वीकार की जाने लगी। लिखने, पढ़ने और गिनने की दक्षताएं, उत्पादन की कुशलताएं और प्रभावपूर्ण तरीके से मानसिक और शारीरिक श्रम की आदत का विकास हमारे शिक्षा व्यवस्था का एकमात्र लक्ष्य बन गया। शिक्षा के व्यापक प्रसार, शिक्षित होने की लालसा और शिक्षितों के समाज में इसी लक्ष्य का साकार रूप देखा जा सकता है।

पिछले कुछ दशकों में हमारे समाज और संस्कृति में महत्वपूर्ण बदलाव आ चुके हैं। एक दौर में शिक्षा के कंधों पर विकास की ज़िम्मेदारी थी लेकिन आजकल यही शिक्षा विकास और वैश्वीकरण के पीछे चल रही है। शिक्षा की तीनों संकल्पनाओं जैसे, सत्य की खोज, मानव की दशाओं में सुधार और बौद्धिक व शारीरिक श्रम के उत्पादन में से हमारी शिक्षा व्यवस्था बाद के दो उद्देश्यों को ढो रही है। विडंबना देखिए हम अपने व्यवहार, विश्वास और रिश्तों में व्यक्तिनिष्ठ होते जा रहे हैं। इसका प्रभाव केवल बाहरी स्तर तक नहीं है, बल्कि हमारी चेतना की सांस्कृतिक जड़े कमज़ोर हो रही हैं। शिक्षा जैसी व्यवस्था भी इसकी जड़ को नहीं संभाल पा रही हैं।

#Bno...

में शिक्षा से जुड़ा हु।
मगर में ग्राहक पैदा करने के खिलाफ हु।
मुजे कुछ ऐसा करना हैं कि जिससे ग्राहक न बढ़े और न बने।

વિચારજો...


મા મને નવી નિશાળ દે ગોતી,
બેન મારી મારે છે તમતમતી સોટી. આવી નવી શાળાઓ કે શહેરની કેટલીય ખાનગી શાળાઓ હવે નવું કરશે. માર્ચ માસથી શહેરોના હોર્ડિંગ્સ ઉપર “ખાનગી શાળા”ની જાહેરાતોની વસંત ખીલશે.

”હનીમૂન” અને “હનુમાન” શબ્દ વચ્ચેનો ભેદ ન પારખી શકનારા સંચાલકો જાહેરખબરો માટે નાણાં કોથળી છૂટી મૂકી દેશે. પ્રોફેશનલ્સ કેમેરામેન્સ પાસે સ્ટુડિયોમાં બાળકોને ગોઠવી 'નાઈસ નાઈસ ઈમેજીસ'  બનાવી છટકાં ગોઠવશે. તેઓ જાહેરાતમાં બધું જ લખશે, સિવાય કે  વિદ્યાર્થી ને ભણાવવા માટેની “ફીની વિગત”.

મગજને લીલુંછમ કરી,
હ્રદયને ઉજ્જડ બનાવી દેતી કેટલીક સ્કૂલો છે ! 

વેદના તો જુઓ...

બાળકની છાતીએ આઈકાર્ડ લટકે છે પણ તેની પોતાની 
“ઓળખ” ગુમાવી ચૂક્યો છે. તે સ્ટુડન્ટ નથી રહ્યો,
રનર બની ગયો છે, રનર.  “લીટલ યુસેન બોલ્ટ” ઓફ એજ્યુકેશન સિસ્ટમ્સ. 15 કી.મી.નું અપડાઉન કરીને થાકી જતાં વડીલો  બાળકને ઘરથી 20 કી.મી. દૂરની શાળામાં ભણવા મોકલે છે ! 

મને મારા મિત્ર...
પોતાનો રાચરચિલા વાળો ફ્લેટ છોડી, ચિલોડા ભાડે રહેવા ગયા ?, જવાબ : મારી પૌત્રી અડાલજની સ્કુલમાં ભણે છે, તે માટે. 'આને પૃથ્વી પરનું સૌથી મોટું આશ્ચર્ય કહેવાય !'

વળી, પેલા જાહેરાતના બોર્ડ પર પણ ક્યાં લખે છે કે 'દફતરનું વજન કેટલાં કિલો હશે' ગુજરાતનો એક સર્વે કહે છે કે,  શહેરમાં છેલ્લાં ૧૦ વર્ષમાં પ્રતિ બાળક ભણાવવાના ખર્ચમાં ૧૫૦% નો વધારો થયો છે. દેશના મધ્યમ વર્ગમાં “નસબંધી” કરતાં “શિક્ષણખર્ચ”નાં કારણે વસ્તી વધારાનો દર ઘટ્યો છે !!! 

ગુજરાતની કહેવાતી ઈન્ટરનેશનલ શાળામાં'રિબોક'ના 'શૂઝ' 'કમ્પલસરી' છે. કિંમત માત્ર 3500 રૂ. (આપણી સરકારી શાળાઓમાં દાતાશ્રીએ બાળકોને ચંપલો આપ્યાના ન્યૂઝ ન્યુઝપેપર્સમાં આવે છે ! નાસ્તામાં રોજ શું લાવવું તેનું 'મેન્યુુ' શાળા નક્કી કરે છે.

અઠવાડિયાના અમુક દિવસ માટે જુદાં-જુદાં રંગ કે ડીઝાઈનના યુનિફોર્મ નક્કી કર્યા છે. વિદ્યાર્થીઓની પરીક્ષા લઈને જ એડમિશન આપવામાં આવે છે. ઈન શોર્ટ એટલું જ કે “આર્થિક રીતે નબળા” અને  “માનસિક રીતે નબળા” માટે આ શાળાઓ નથી.ખાનગી શાળામાં ભણતા બાળકોની માતાશ્રીઓ બાળકને મળતા હોમવર્કના "પ્રમાણમાપને આધારે, આજે રસોઈમાં ફલાણી વસ્તુ જ બનશે” એમ જાહેર કરે છે.  લેશન વધારે હોય તો “એક ડીશ બટાકાપૌંઆ” અને લેશન ઓછું હોય તો
“દાળ-ભાત, શાક, રોટલી અનલિમિટેડ” મળે છે !! 

આખા ઘરના સંચાલનનું કેંદ્ર બિંદુ આજે સ્કૂલ બની ગઈ છે.

એ દિવસ પણ દૂર નથી કે
પ્રાથમિક શિક્ષણની ફી ભરવા માટે  વાલીઓએ પ્રો.ફંડ ઉપાડવા પડશે.  હાલ માત્ર ઉચ્ચ શિક્ષણ માટે લોન આપતી બેંકો પ્રાથમિક શિક્ષણ માટેની ફી ભરવાય લોનો આપશે.
પેલી જાહેરાતોમાં પાછું લખશે કે  અમારે ફલાણી-ઢીંકણી બેંક સાથે ટાઈ-અપ છે, લોન પેપર ઉપલબ્ધ છે.બાળકના દફતર પર લખેલું જોવા મળશે 
“ 'ફલાણી'બેંકના સહયોગથી”..

બીજી એક ખોડ છે, તેઓની શિક્ષણ પધ્ધતિ. 
એક “છત્રપતિ શિવાજી” નો પાઠ હોય અને બીજો “અમેરિકા ખંડ” નામનો પાઠ હોય.  જે પાઠમાંથી પરીક્ષામાં વધારે ગુણનું પૂછાવાનું હોય તેના આધારે જે-તે પાઠને મહત્ત્વ આપવામાં આવે છે.  “છત્રપતિ શિવાજી”ના કોઈ ગુણ બાળકમાં ન આવે તો ચાલશે, વાર્ષિક પરીક્ષામાં ગુણ આવવા જોઈએ. 

ચાલો, 
છેલ્લે છેલ્લે 
'ઈન્ટરનેશનલ લેવલ'એ  આપણી શિક્ષણની ગરીબાઈ પણ જોઈ લઈએ. પાંચ-છ આંકડામાં ફી લઈને ઉચ્ચ ક્વોલિટીના શિક્ષણની વાતો કરનાર ભારતની એક પણ સ્કૂલ આંતરરાષ્ટ્રીય કક્ષાએ પ્રથમ 500માં પણ નથી.  માત્ર 13/14 વર્ષની કાચી ઉંમરે આત્મહત્યા કરતા બાળકો  સમાજને દેખાય છે ? આ આત્મહત્યા પાછળની તેની વેદના સમજાય છે ?

મારી વાત સાથે કોઈ સંમત થાય કે ન થાય એ અલગ વાત છે પણ હું...

“પ્રામાણિક અભણ મજૂર” અને “અપ્રામાણિક સાક્ષર અધિકારી” માંથી પ્રથમ વિકલ્પને પસંદ કરીશ.  જો નજરમાં દમ હશે તો થાંભલા અને પેન્સિલ વચ્ચેનો આ તફાવત સમજાઈ જશે. આ કોઈ નકારાત્મકતા નથી. ઘણી સારી શાળાઓ છે જ. આ તો એવી શાળાઓની વાત હતી જે 
સરસ્વતી માતાની છબી ઓથે “વ્યાપાર” કરે છે !!! તેના શિક્ષકોની લાયકાત તથા ચૂકવતા પગારની તો હજુ વાત બાકી છે .. !!

#Bno...

શિક્ષણ માટે ખર્ચ કરનાર સૌ વાલી જે ન બની શક્યા તે એમના બાળકને બનાવવા માટે જ આટલો ખર્ચ અને તણાવ ભોગવે છે.

तुम तुम ओर में में रहूँगा...


एक व्यक्ति ने एक नया मकान खरीदा ! उसमे एक फलों का बगीचा भी था , उसके पडौस का घर पुराना था और उसमे कई लोग भी रहते थे !

कुछ दिन बाद उसने देखा कि पडौस के घर से किसी ने बाल्टी भर कूड़ा , उसके घर के दरवाजे के सामने डाल दिया है ! शाम को उस व्यक्ति ने एक बाल्टी ली., उसमे अपने बगीचे के ताजे फल रखे और फिर पड़ौसी के दरवाजे की घंटी बजाई ! उस घर के लोगों ने जब झांककर देखा तो बेचैन हो गये और वो सोचने लगे कि ...वह शायद उनसे सुबह की घटना के लिये लड़ने आया है ! अतः वे पहले से ही तैयार हो गये और बुरा - भला , सोचने लगे !

मगर जैसे ही उन्होने दरवाजा खोला , उन्होंने देखा - रसीले ताजे फलों की भरी बाल्टी के साथ चेहरे पर मुस्कान लिए नया पडोसी सामने खडा था...! अब सब हैरान - परेशान थे !
उसने अंदर आने की इजाजत मांग घुसते ही कहा - " जो मेरे पास था , वही मैं आपके लिये ला सका ! "

यह सच भी है, इस जीवन में ... जिसके पास जो है, वही तो वह दूसरे को दे सकता है...!

#Bno...

हो सकती हैं कोई दिक्कत।
आ सकती हैं सामने समस्या।
मगर अपनो को अपना माने तो उन से ऐसा व्यवहार न करे जो वो कर रहे हैं। माफ करने में सबसे बड़ी दौलत का आस्वाद मिलता हैं। 


Thursday, May 16, 2019

Whats aep जैसा...


कुछ बाते सरल होती हैं।
उसे समज़ाना ओर समझना तब आसान होता हैं, जब इस के योग्य कोई सटीक उदाहरण हो। मेरे एक दोस्त ने मुझसे पूछा मुजे तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, मेने कहा whats aep के जैसा। मेरी बात सुनकर वो बोले ' whats aep जैसा याने कैसा?' मेने कहा ' whats aep के फीचर्स में प्राइवसी के लिए एक सेटिंग आता हैं। अगर आप किसी को लास्ट सिन नहीं दिखाना चाहते तो आप किसी का लास्ट सीन नहीं देख सकोगे।भले ही सामने वाले के whats aep में लास्ट सिन कोई भी देख सकता हो वैसा प्रायवेसी में सेटिंग किया हो।

जीवन whats aep के जैसा हैं।जैसा खुदका सेटिंग रखोगे, सामने वाले से उतनी ही जानकारी पाओगे। 

सिकंदर ओर पोरस का एक संवाद हैं। पोरस जब हार गए तब सिकन्दर के सामने खड़े कर दिए गए। सिकंदर ने उन्हें पूछा 'में तुमसे कैसा बर्ताव करू?' सवाल सिकंदर का था। सिकंदर सरकार थे,जो सिकंदर चाहते वोही होता। जो सिकंदर कहता वह हुकुम बन जाता, पोरस ने कहा 'एक राजा दूसरे राजा से करें, वैसा व्यवहार आप मेरे साथ करो। सिकंदर ने उसे गले लगा दिया। आज आप सिकंदर हैं। कल में भी सिकंदर बनुगा। कुदरत ने हमे सिखाया हैं,जैसा सामने वाला करे,उस के सामने प्रतिगोश भी वैसा ही देना चाहिए।' कोई तुम्हे छल रहा हैं, कोई तुमसे नफरत कर रहा हैं तो छल वाले से छलिया ओर नफरत वालो से 'नफरतीया' बनना ही सही होता हैं। आज जैसा आप कर रहे हैं,कल शायद कोई ऐसा कर सकता हैं।

#Bno...

नीम डालोगे तो कड़वा होगा,
हल्दी डालोगे तो तूरा लगेगा।
गुड़ डालोगे मीठा ही बन जायेगा,
जो बोयेंगा,वापस वही फसल पाएंगा।

शुक्रिया...


कुछ दिनों पहले मेरा जन्म दिवस था। मेरे बहोत सारे दोस्तोने मुजे मेल, फेसबुक और बहोत से माध्यम से मुजे शुभकामना दी। बहोत सी शुभकामना के बीच सोलापुर के सर फाउंडेशन के साथियों ने मुजे विशेष सन्मान दिया।

सर फाउंडेशन से में उसकी स्थापना से जुड़ा हूं। बालासाहब बाघ, सिद्धराम जी मशाले ओर अन्य साथियो संयोजकों से नियमित रूपसे मिलना और बातचीत करनी होती हैं। किसी दोस्त ने सोलापुर कोंफ़र्न्स के दौरान खींची हुई तसवीर को आप के साथ शेर करते हुए खुशी व्यक्त करता हु।किसी एक राज्य के अधिकतम शिक्षक हमे पहचानते हो वो बात हमारे लिए काफी हैं। में उन के प्यार और विश्वास को सदैव संभाल के रखूंगा।

जिन्होंने जो दिया हैं, में उन्हें वापस वैसा ही दूंगा। सर फाउंडेशन का में शुक्रिया अदा करता हु। उन्होंने मुजे प्यार दिया हैं, में भी उन्हें प्यार देनेका प्रयत्न करूँगा। मुजे आजतक महाराष्ट्र में काम करते समय ऐसा कभी नही लगा कि में यहाँ नया हु। मुजे खुशी हैं कि में सर फाउंडेशन का हिस्सा हु।


#Bno...

मेरे उन सभी दोस्तों का शुक्रिया, जिन्होंने मुजे शुभकामना दी। अब कोई खुशी या गम के पीछे भागना नहीं चाहता हूं। अब तो शांति से काम को देखना और स्किल को खोजना चाहता हु। अकेला करूँगा,भले देर लगे।वैसे भी कोई जल्दी या जल्दबाजी नहीं हैं। 

Wednesday, May 15, 2019

भ्रम ओर श्रद्धा

एक छोटा गाँव।
यहाँ पे बारिश नहीं हो रही थी। लोग परेशान थे।आसपास के गाँव की भी बारिश न होने के कारण बुरा हाल था। सभी ने तय किया कि बारिश के लिए हम प्रभु से प्रार्थना करेंगे। गाँव के सभी लोग एक मैदान में एकत्र होने वाले थे। आसपास के गाँव के लोग भी आये थे। एक छोटी सी बच्ची भी आई थी। मगर उस के हाथमें छाता था।
इसे कहते हैं,यकीन। यकीन ओर विश्वास समान हैं।कुछ लोग यकीन के साथ जिंदा रहते हैं।कुछ लोग भ्रम के साथ, भ्रम फैलाने के लिए भ्रम के लिए ही जिंदा होते हैं।

#Bno...
कुछ लोग आगे का देख लेते हैं।
कुछ लोग नींद में सुन पाते होते हैं।
जो आगे का देख लेते हैं, वो परेशान होते हैं।
मगर,विश्वास और भ्रम में जो फर्क हैं,वो समज ने की सबकी ताकत नहीं होती।

अपनी स्किल को फैलाए...


सर्जनात्मकता किसीबकी जागीर नहीं हैं।हम देखने का नजरिया बदलना हैं।ऐसा करने से हम नया सर्जन कर पाएंगे।हमारे आसपास ऐसी बहोत सी चीजें ऐसी होती हैं,  जिससे हम अच्छे से नई चीज बना सकते हैं।
महाराष्ट्र सोलापुर से कई दोस्तो से में जुड़ा हूं।एक शिक्षक हैं जो रोजाना नई चीजें बना लेते हैं। कुछ लोग जो ऐसी चीजें बना लेते हैं, वो अपने घर का सुशोभन कर सकता हैं। जो चीज हमारे काम की नहीं हैं उस के सामने ऐसी फिजूल की सामग्री से सब जैसे नया बना सकते हैं।ऐसे सर्जकों को हम स्थान देना चाहते हैं।अगर आप के पास कोई ऐसी स्किल हैं तो आप हमारा संपर्क करें।

#Bno...

किसी टूटी हुई चीज से कुछ नया बनाना।
किसी भी टूटे हुए व्यक्ति को खड़ा करना।
किसी को टूटते हुए बचाने के लिए खुद टूट जाना।

ये तीनो कला हैं। कुछ लोग तोड़ने में तो कुछ लोग टूटने में कौशल्य रखते हैं।

सनथ