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Wednesday, October 17, 2018

मेरे रंग मेरे सपने...


मेरे सपने,मेरे अपने।
आज तक बहोत सपने देखे हैं।बहोत सारे सपने यरे हुए हैं। जो मिजे मिला हैं,उसे पाने को लोग तरसते हैं। आज भी में उसे महसूस करता हूँ। आज में आप को मेरे ऐसे ही एक ख्वाब की बात करूंगा। ये ख्वाब वैसे मेरा हैं मगर बहोत सारे साथियो ने उसे पूरा करने में सहयोग रहा हैं। बहोत सारे साथी आज भी जुड़े हुए हैं। कुछ छूट गए कुछ को छोड़ना पड़ा। कुछ लोगो ने मुजे भी रिजेक्ट किया।मगर वो ख्वाब के करीब में पहुंचा हूँ।18 साल के संपर्क ओर बच्चो से सरोकार के कारण आज हम ये कर पाए हैं।

7रंगी स्किल फाउंडेशन जो आज से सात साल से कार्यरत हैं।राज्य और देश के कई हिस्सों में इस फाउंडेशन ने शिक्षा के लिए काम किया हैं। आईआईएम के साथ मिलकर हमने नेपाल और बांग्लादेश के अध्यापको के साथ काम किया। हमे ओर उन्हें सीखने को मिला। 7 रंगी क्या हैं...?

जीवन हो विचार...
अच्छे होने चाहिए। सुख दुख,क्रोध, गम ओर खुशी।हर एक भाव के लिए एक रंग हैं।कहते हैं मूल तह 3 रंग हैं।
रेड
ब्लू
ओर
ग्रीन

इन तीन रंग में से कोई भी रंग बन सकता हैं। अब 7 रंगी तो मेघ धनुष में दिखाई देते हैं। उन सैट रंग को हम जा...नी...वा...ली...पी...ना...रा...के नाम से जानते हैं।हमने इस रंगों के पहले अक्षर को लेकर कुछ नए नाम दिए हैं। जैसे

जा: व्यक्तिगत रूप में करेगा(गुजराती में कहते हैं जाते करे)
नी: निखारेंगे
वा: वाद संवाद
ली: लीन रहेंगे(ध्यान मग्न रहेंगे)
पी: पिछाने गे...
ना:नाटक या अभिनय
रा: राग रागिनी संगीत


ऐसे स्किल में बच्चों को खोजना ओर उन्हें प्रस्थापित करने के लिए एक फाउंडेशन तैयार किया गया हैं।आज तक ये फाउंडेशन उन फॉर्मल था,उसे अब कुछ दिनों में एक रजिस्टर्ड फाउंडेशन के तौर पे तैयार करने जा रहे हैं। आज पूरे देश के प्रतिनिधि को होंगे और उन्हें उन के राज्य में को सपोर्ट करेगा उसका मामला तय होने के अंतिम पड़ाव में हैं।

आप भी जुड़िये ओर आगे सहयोग भी देते रहिए।छोटे बच्चे हमारी राष्ट्र की पहचान हैं।विश्व में हमारे देश की पहचान देने के लिए इस मिशन में आप अवश्य जुड़े।

सरकुम:
क्या होगा मालूम नहीं।
कैसे होगा,ओर क्यो  पता नहीं।
जो भी होगा, जैसे होगा,मेरा होगा अच्छा होगा।
आज को देखा हैं, कल को नहीं, सब जुठ हैं यही सही।
कल जो होगा ,देख लेंगे।जो होगा अच्छा होगा बुरा नहीं।

Saturday, October 6, 2018

विश्वास में ही श्वास हैं...


किसी भी व्यक्ति में आत्मविश्वास से अधिक जरूरी है उसके अंदर स्पष्टता का होना। यदि आप किसी भीड़ को पार कर कहीं पहुंचना चाहते हैं, आपकी दृष्टि सही जगह पर है और आप देख पा रहे हैं कि भीड़ कहां खड़ी है, तो आप बहुत आसानी से बिना किसी से टकराए अपना रास्ता बनाते हुए अपनी मंजिल तक पहुंच जाएंगे। लेकिन आपकी नजर अगर सही जगह पर नहीं है और महज विश्वास है, तो आप हर किसी से टकराते रहेंगे।

सच्चाई होती हो तो उसमें अकड़ आही जाती हैं।हम हमारे विचार में स्पष्टता लानी चाहिए।महज सुनने या कहने से ही किसी नतीजे पर पहुंचने में कभी खालीपन महसूस होता हैं। उस वख्त हम उन लोगो से फिर से जुड़ नहीं सकते या उन से आंखे नहीं मिला सकते हैं।

लोगों को लगता है कि महज उनका आत्मविश्वास ही उनके अंदर की स्पष्टता की कमी को पूरा कर देगा। लेकिन ऐसा कतई नहीं है।आप जिस चीज के ऊपर विश्वास रखकर निकले हो क्या मालूम वो चीज ही गलत न हो। समजीए आप के पॉकेट में 2 हजार का नोट हैं। आप बाजार में से कुछ खरीदना चाहते हैं। खरीद करने के बाद आप 2000 ना नॉट देते हैं। दुकानदार कहता हैं कि ये नॉट जाली हैं। अब क्या होगा, आप को तो उस नॉट पे भरोसा था।

कुछ लोग लक में मानते हैं। मेरे नसीब ऐसा या वैसा। वो मान लीजिए कि आप अपने जीवन के सभी बड़े फैसले सिक्का उछालकर करते हैं कि चित आए तो इधर, पट आए तो उधर और यदि ऐसा करने से 50 फीसदी बार भी आपको अपने सवालों के जवाब मिल जाते हों, तो फिर दुनिया में आपके लिए सिर्फ दो ही तरह के रोजगार बच जाते हैं- मौसम विभाग में भविष्यवाणी करने का या फिर ज्योतिष का। इसके अलावा और कोई व्यवसाय आपके लिए नहीं होगा।

जब कोई सवाल सामने आए हैं तो उस की जांच करो। उसे परखो सीधा कोई निर्णय न करो। कहते हैं जब खुश हो तो वचन न दे और गुस्सा हो तो निर्णय न करे।

सरकुम:
मुजे विश्वास हैं।
मुजे जिन पे विश्वास हैं वो मेरी सांस हैं।

आत्म विश्वास जैसा कुछ नहीं हैं मेरे पास।
मेरा आत्मा और मेरा सिर्फ श्वास वो ही हैं।

#गणेश जी की सरकार...

Wednesday, September 12, 2018

प्रकृति के नियम​



खाना जो हम खाते हैं, २४ घण्टे के अंदर शरीर से बाहर निकल जाना चाहिए, वरना हम बीमार हो जायेंगे।​​पानी जो हम पीते हैं, 0४ घण्टे के अंदर शरीर से बाहर निकल जाना चाहिए, वरना हम बीमार हो जायेंगे।​​हवा जो हम सांस लेते हैं, कुछ सेकंड में ही वापस बाहर निकल जानी चाहिए, वरना हम मर ही जायेंगे ।​
​लेकिन नकारात्मक बातें, जैसे कि घृणा, गुस्सा, ईर्षा, असुरक्षा आदि आदि, जिनको हम अपने अंदर दिन, महीने और सालों तक रखे रहते हैं ।​यदि इन नकारात्मक विचारों को समय-समय पर अपने अंदर से नहीं निकालेंगे तो एक दिन निश्चित ही हम मानसिक रोगी बन जायेंगे ।​ निर्णय आपका ​क्योंकि शरीर भी आपका है।​

@#@
सामने वाले जो तय करके पूछते हैं।
वो सहज हो सकते हैं। जो हमने कहा होगा बो भी गलत न होगा। मगर फिरभी मानसिक तौर पे देखा जाय तो सभी को समज कर ही मन में कुछ भरना या रखना चाहिए।






Monday, September 10, 2018

गणेश जी और 5 मुखी गणेश

वयार करते हैं हम तुम्हे इतना,
दो आंखे तो क्या,
दो जहां में समजाये इतना।

खूब सूरत गाना हैं।
मुजे पसंद हैं।कुछ बात श्रद्धा से जुड़ी हैं। मेरी आस्था गणेश जी हैं।उनकी करवा से आज तक मे जताता ओर बचता आया हु। मेरे कुछ काम मे उनके सीधे आशीर्वाद हैं। आज तो जो हु उनके पावन आशीर्वाद से हु। बहोत बार ऐसा हुआ कि मुजे जैसे गणेश जी ने रास्ता दिखाया। रास्ता किया। आज सुबह दर्शन करने का तय किया था। नहीं हो पाए एमजीआर श्याम को एथॉर के दर्शन किये।
मेरी श्रद्धा के प्रतीक हैं एथॉर।

शायद आप को गलत लगें...
में कई सालों से गणेश जिनको सदैव साथ रखता हूँ। मेरे किसी शुभ चिंतक ने मुजे पांच मुख वाले गणेश जी 'संकट चौथ' के दिन ग्राम भारती में दिए थे। तब से रोज ये गणेश जी मेरे साथ रखता हूँ। पहले एक गणेश यंत्र रखता था। अब मूर्ति रखता हूं। अमेरिकन पूर्वप्रमुख ओबामा हनुमानजी की मूर्ति रखते है। जब वो सत्ता में थे तब भी रखते हैं।कहिए की पहले से रखते हैं। मगर हुआ ये की रक्षा बंधन के दिन हमारे 'मातृछाया' के घर मंदिर में पूजा के साथ उस 5 मुखी गणेश जी को रखे थे। वहां से निकल ने में शायद गलती कर बैठा। ओर हुआ ये की, 5 मुखी गणेश जी आये। उनको छोड़ के जैसे मेरा जी गभर रहा था। उन के बिना जैसे बैचेनी लगती थी। मेरे थे,ओर मुजे रखने थे। महर रोज दिमाग ये सोचता कैसे मुझतक पहुंचे। नहर से चाची मा बीमार थे,मुजे याद किया गया। में वहां पहुंचा। उन्हें मिला, गणेश जी जैसे हाथ मे लिए मेने तय किया अब कोई दिक्कत नहीं हैं। अब जो होगा अच्छा होगा। शायद छ बजे होंगे और एक जगह से कॉल आया कि किराया आधा करेंगे। बस, तय हो गया कि गणेश जी ने अब मेरा सुनना शुरू किया हैं। और सब संभल ने लगा।
आज पूरा दिन उन के साथ जैसे सभी काम मे सहयोग मिला।मेरे बहोत से काम एकदम शुरू हुए,तेज हुए या आगे बढ़े। ऐसा कल रात से शुरू हो गया।मुजे संकेत मिले तो मैने पूरा दिन काम को जोडने में लगाया। सुबह से निकला तो बहोत अच्छा हुआ। मेरे निकल ने के बाद जो कुछ हुआ।अच्छा हुआ। दो दिन तीन रात जागने के बाद भी सुबह से गाड़ी चलाई। अच्छे से रुके हुए काम को जैसे मेरी फेवर में बुनता रहा ।एक तरफ जैसे सब सेटल होने के साथ बाते भी चलती रहती थी। नकन्द भी न आये काम भी निपटे। रास्ते में मोबाइल की बैटरी बन्ध। न गाड़ी का चार्जर काम करें न 10000 MAH का पावर सेवर भी खत्म हो गया था। एक दोस्त को कॉल किया। उनका नाम पंकज पटेल वो अपना पावर सेवर लेकर आये। मेरा खाली पावर सेवर लेकर आये।मेने फोन चालू किये। थोड़ी देर में काम आगे बढ़ा और आज रात तक तो जैसे सब कुछ साफ हो गया।आज काम भी बहोत किया। 15 नवम्बर को होने वाली कॉंफ़र्न्स के काम मे सारा दिन निकल गया।
जिस की उम्मीद थी। सारा दिन अच्छा और सही हुआ।क्योकी गणेश की फिर से मेरे साथ आगये थे। मेरी सरकार गणेशजी के सरोकार। बस... जैसे जैसे गणेश हुकुम देते थे,देते हैं,दिए हैं वो सब अमल हो पाए वैसा किया। मेरे कुछ डॉक्यूमेंट जो महत्वपूर्ण थे वो मेने खोजे ओर से उसके सही स्थान पर पहुंचाए।अब निश्चित हु। #थैंक्स चेतन भाई...(राजकोट)

अब...
एक नया काम भी शुरू हुआ।
जब भी हो संपर्क करे।जब भी गणेश जी को हाथ में पकड़कर पूछ लगे। जैसे हुकुम क्या होगा,हुकुम क्या होता, हुकुम कैसे करते सब मालूम पड़ने लगा। फीस से श्याम को गणेशजी ओर मेरे खास सहयोगी ड़ी. धवल राजकुम से आगे के काम को समज ने ओर फैलाने पे अच्छा काम और दिशा निर्देश हुआ।
ऐठोर गणेश जी,8.15pm9.9.18
क्यो...
शायद आज से गणेश जी का महीना हैं। शायद मेरे गणेश जी मेरे पास हैं।
ओर हा, आज एठोर भी गए। उनके शांति से दर्शन किये।मन शांत हुआ,कल से तय किया था कि ये लिखूंगा। 
कुछ बातों में मैने गणेश जी से माफी मांगी और फिरसे यहाँ तक चलने का संकल्प किया ।

@#@
गणेश गणेश गणेश।
5 मुखी गणेश मेरे गणेश।
में तो उन के सामने बांध काला हरा धागा भी नहीं कजोड़ सकता।उनके आदेश या हुकुम को कैसे न मानु....
@सभी को जय गणेश...

Thursday, September 6, 2018

बदलाव जरूरी हैं।


हम बदल सकते हैं।
हम बदलाव चाहते हैं।
हमे बदलने के लिए खुद काम करना हैं। हमारे विचार से कुछ बदलाव सम्भव नहीं हैं। उस के लिए हमे खुद करके दिखाना पड़ता हैं।

कुछ बाते ऐसी होती हैं जिस को समय जवाब देता हैं। दुनिया बदल ने का सबसे अच्छा और पहला काम ये हैं कि अपने आपको बदला जाए। हमे अपना बदलाव कहा करना हैं, वो खुद हम नहीं बता पाएंगे। अगर हम कोई कुछ कहेगा तो सबसे पहले हमें ये तय करना हैं कि हमे वो कहने वाला कोंन हैं। क्यो की हो सकता हैं, सामने वाली व्यक्ति सिर्फ ओपिनियन देती हो।

अगर कोई बदलाव लाना हैं तो अपने काम के लिए लाना आवश्यक हैं। में महाराष्ट्र में था। मेरे एक दोस्त के साथ हमने रात को एक बजे खाना खाया। अब वो दोस्त हैं कि मुजे रोज कहते हैं,चलो रात को खाना खाते हैं,गुमते हैं। मगर उन्हें कोन समजाये की वो गलती थी,अब नहीं दोहराई जाएगी। हा, ये सच हैं कि जब जब वो मुजे गुमने ओर खाने को कहते हैं,में उन्हें समजा नहीं पाता हु ओर मना भी नहीं कर पाता हूँ। क्यो...की उनके साथ मेने देर रात को गुमना ओर खाना खाया हैं। अब उस दोस्त के साथ मुजे मेरे में सुधार करना होगा कि मेरे विचार दर्शाने होंगे वो मुजे ही तय करना हैं। और तब ही बदलाव आएगा।

हम अपने आप से काम करके ही बदलाव ला सकते हैं।हमारे विचार या सोच उतनी महत्वपूर्ण नहीं हैं।क्यो की आप जो सोचते हैं,वही सामने वाला सोचे ये जरूरी नहीं हैं। में अगर आज रात को 12 बजे तक आप से बात करूंगा तो आप फिरसे किसी ओर दिन  ऐसे देर रात मुझसे बात करोगे। अब यहाँ मेरा ओपिनियन ये हैं कि मुजे जवाब तो देना ही पड़ेगा। जवाब देना भी चाहिए मगर समय देखे। जब कोई हमारा खास होता है तो ठीक हैं। वरना रात को मैसेज या कोल का जवाब देने से ओपिनियन ऐ बनता हैं कि वो आप के लिए महत्वपूर्ण हैं। शायद आप के लिए उनका इतना महत्व न हो, सामने वाला अब रोज ऐसा करेगा। दो दिन पहले एक जवाब देने से अब रोज का जमेला होता हैं। जैसे मुजे एक बार खाने के बाद अब रोज गुमने ओर खाने के न्योते मिलते हैं।
मेरे एक दोस्त कहती हैं।
में जो भी करू,मगर में मेरी जिम्मेदारी नहीं भूलूंगी। मेरी जिम्मेदारी से ही में जुडी रहूँगी। ठीक हैं,सही निर्णय हैं मगर मेरा मानना हैं कि अपने बारे में लोग क्या बात करें और क्या नहीं वो हमें हमारे से ही गोशित करना हैं। सिर्फ हमारे ओपिनियन से कुछ नहीं होगा।


@#@
में तुम से प्यार करता हु।
मेने इस बात के लिए अपने आपको बदल कर देखा हैं। में प्यार करता हु वो मेरा ओपिनियन नहीं,मगर मेरा प्यार  दूसरे प्यार करने वालो के लिए उदाहरण है। ओर तब ही अपने विचार और आचार का फर्क सामने आता हैं।

Sunday, August 12, 2018

सिकंदर कैसे मरा...


सिकंदर
सिर्फ नाम काफी हैं।
कहते हैं सिकंदर पूरी दुनिया जितने निकला था। वो आधे पहुंचा और कहीं पे उनका केम्प रुका था। यहाँ एक ज्योतिषी थे। बहोत मशहूर ज्योतिषी थे। वो हाथ देखकर सब कुछ ओर सच बता सकते थे।
सिकंदर ने उन्हें बुलाया। सन्मान के साथ उसे पूछा 'आप मुजे ये बताए कि मेरी मौत कब होगी।' उस ज्योतिषी ने देखा,सिकंदर का हाथ पकड़कर देखा। उसे सिकंदर कब और कैसे मरने वाले थे वो बता सकते थे। ज्योतिषी ने सोचा 'अगर मरने का समय और स्थान बताया तो सिकंदर उसे मार देता। ज्योतिषी ने उसे कहा ' आप की मोत तब होगी जब लोहे की धरती और सोने का आकाश होगा। ये सुनकर सिकंदर खुश हो गया। उस ने वजीर को कहा 'अब हम दुनिया जीत लेंगे। क्यो की धरती लोहे की ओर सूरज सूने का तो होगा नहीं।बस,क्या था सिकंदर ने अपने सैन्य को आगे बढ़ने के आदेश दिए। वो अपने काफिले के साथ फारस जा रहा था। उस वख्त के फारस को हम आज ईरान के नाम से पहचानते हैं। सिकंदर का काफल ईरान,अफगानिस्तान और बलोचिस्तान के रण को जोड़ने वाले विस्तार से आगे बढ़ रहे थे।रास्ते मे सिकंदर बीमार हुआ। उनके वैध भी उनके साथ थे। उनके वजीर भी सिकंदर की सेवा में थे। दिनबदिन सिकंदर की हालत बिगड़ती जा रही थी। सिकंदर को ठंडा बुखार याने मलेरिया हुआ था। अब सिकंदर घोड़े पे बैठ नहीं पाता था। वो अब पालखी में था। अब सिकंदर जैसे सिकुड़ गया था। उसने वजीर को कहा मुजे सीधा लेटना हैं। मुजे जमीन पे लेटाओ। वजीर के पास बिछाने के लिए कुछ नहीं था। उसने अपने सारे शस्त्र बिछाकर सिकंदर को लेटने के लिए जगा बनाई। सिकंदर उसपे लेता। कोई पेड़ तो था नहीं कि उनको छांव मिल पाए।बस,अब क्या था। सिकंदर के वजीर ने ढाल से उन के ऊपर सूरज की किरणें न आये वैसे पकड़ के रखा। सोने की ढाल को वजीर छाते की तरह पकड़ के रख था।
सिकंदर ने उनके वैध को कहा 'आप मुजे कुछ दिनों तक जिंदा रहने की औषध दिलवाए, में मेरी माँ के आंचल में मरना चाहता हु। वैध जी ने कहा 'में आप को एक भी सांस नहीं दे पाऊंगा। ये सुनकर वजीर रो रहा था। सिकंदर को वो आगाही याद आई जो ज्योतिषी ने कही थी। लोहे की जमीन और सोने का आकाश।सिकंदर को मालूम हो गया कि अब वो मरने वाला हैं। हमे ये तो मालूम हैं कि सिकंदर ने अपने हाथ खुल्ले रखने को कहा था। उन्हें दफनाते वख्त उनके हाथ खुल्ले छोड़े गए थे। सिकंदर ने कहा था कि मेरी दफन विधि में विश्व के सभी वैध ओर हकीमो को बुलाना जिससे सबको मालूम पड़े की सांस खरीदी नहीं जाती।
सिकंदर ने विश्व विजेता होने पर भी ऐसी हालत में मरता हैं, यही कुदरत का न्याय हैं।

@#@
जब आया था सिकंदर,
होन्सले तो आली थे।
जब गया था दुनिया से दोनों हाथ खाली थे।



जय हो...

Saturday, August 11, 2018

अपेक्षा ओर उपेक्षा



प्रसन्न रहने के लिए हम बहोत कुछ करते हैं। प्रसन्न रहना किसे पसंद नहीं हैं।मगर कुछ वख्त ऐसा होता हैं कि प्रसन्न ता के अवसर पर भी हम प्रसन्न नहीं रह पाते।
इस के लिए दो बातें ही तय हैं।
अपेक्षा ओर उपेक्षा।

खुशी के मौके पर अगर हम खुश नहीं रह पाते तो उसका मतलब हैं हमारी अपेक्षा अधिक हैं,या तो हमे उपेक्षित होने का अहसास हैं।जो भी हैं भगत इस से हमारी खुशी कम हो जाती हैं। खुशी और प्रसन्नता दो अलग बाते हैं।अगर कोई हमारी उपेक्षा नहीं कर रहा हैं और हमे ऐसा लगे तो इसका मतलब आप मानसिक रूप से थके हैं या आपको आराम की जरूरत हैं।कोई हमारी को उपेक्षा करे उसमें गलती हमारी हैं।सीधा मतलब ये हैं कि हो सकता हैं हमारी अपेक्षा ज्यादा हो।प्रसन्न रहने के लिए जब भी कोई सवाल या समस्या आये तो उसमें सही गलत क्या हैं वो नहीं मगर हम उस समस्या में होते तो क्या करते।बस,यही विचार आप को प्रसन्नता के करीब ले जाएगा।

@#@
मुजे खुश रहना हैं।
मेरी खुशी सिर्फ मेरे हाथों में हैं।
मुजे खुश रहना है,क्यो की मेरे पीछे बहोत जिम्मेदारी हैं।

Saturday, July 14, 2018

सबसे पहले मेरा देश



अगर आप के लिए देश का महत्व नहीं हैं तो आप की भी देश को जरूरत नहीं हैं।ऐसा कहा विश्वकप फुटबॉल की फाइनल में पहली बार पहुंची टीम के कोच ने।सबसे कम रेटिंग वाली इस टीम के कोचका नाम हैं। कोच का नाम हैं डोलिक।वो क्रेऐशिया नामक छोटे देश के कोच हैं। 40 लाख की जनसंख्या वाला ये देश हैं। आज तक फाइनल में पहुंचने वाली आए 13 वी टीम हैं। पहली बार ये टीम फुटबॉल की फाइनल में पहुंचने में सफल हुई हैं।बात ऐसी हैं कि जब फुटबॉल के लिए टीम का चयन करना थातब उनके सबसे महंगा प्लेयर देशकी ख्यातनाम क्लब से खेल रहा था।  जब टीम का चयन हो रहा था,उस वख्त केम्प में वो 5 दिन तक आया ही नहीं।उसे था कि उसको तो पसंद करेंगे ही।इस बात को समझ ने के लिए हम क्रिकेट का उदाहरण लेते हैं।भारत की क्रिकेट टीम में चयन प्रक्रियामें अगर धोनी 5 दिन न आये और उसे पसंद न किया जाय ऐसी बात वहां फुटबॉल में हुई। कोच डोलिक ने  कहा आप को देश के लिए समय नहीं हैं।तो आप की भी देश को जरूरत नहीं हैं। आज देश के लिए खेलते हुए सबसे कम रेटिंग वाली टीम फाइनल में हैं।राष्ट्रभावना ओर संघ भावना से ही आए ऐतिहासिक चमत्कार हुआ हैं।
@#@

देश से बढ़कर कोई नहीं होना चाहिए।वो भले नेता,अभिनेता या कोई उद्योगपति ही क्यो न हो।

Sunday, May 20, 2018

ધરમીબા 105 નોટ આઉટ


સો વર્ષના થાજો.
એવું કહેતા આપણે અનેકને સાંભળ્યા હશે.પણ,જેને ખરેખર સો વર્ષ થયાં હોય એવા લોકો કેટલા જોયા.અત્યારે શતાયુ ભોગવનાર ખૂબ ઓછા જોવા મળે છે.તારીખ 19 મે 2018ના રોજ એક પરિવારને મળવાનું થયું.હું જેમને મળવા ગયો એમના પિતાજી નિવૃત્ત થાય હતા.એમને નિવૃત્ત થયે લગભગ 20 વર્ષ થયાં હતાં. સહજ વાતમાં મેં કીધું આપની તંદુરસ્તી અને સ્વાસ્થય સારું છે.મારી વાત સાંભળી મને કહે 105 વર્ષના મારા બા હજુ હયાત છે.ધરમીબેન જોશી ને 105 વર્ષ થયાં છે.એ આજે કહે છે કે મહિને 2000 હજાર રૂપિયા મળે એવી નોકરી મળે એ સારું.ગરમી વધી છે એટલે બપોરે એ મૂંઝવણ અનુભવે છે.છતાંય સવારે અને સાંજે ગરમી ઓછી થાય એટલે એ સ્વસ્થતાતી વાતો કરે છે.એકસો પાંચ વર્ષની અનેક વાતો સાંભળવા ફરી ક્યારેક મળવું છે.

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બે હજાર રૂપિયાના પગારમાં સંતોષ માનનાર ધરમી બા ને વંદન.

Sunday, May 6, 2018

સફળતા...

કશુંક મેળવવું સૌને ગમે.
આ માટે આપણે અનેક કામ કરતા હોઈએ છીએ.આપણે જોઈએ છીએ કે મન ને સ્થિર કરવા માટે આપણે યોગ અને કસરત ને મહત્વ આપીએ છીએ.છેલ્લે એક દાયકાથી આ બાબતે જાગૃતિ કેળવાઈ હોવાનું લાગે છે.
આપણે સ્વાસ્થ્ય કે આર્થિક સદ્ધરતા માટે બધું જ કરીએ છીએ.આ માટે કેટલીક વખત બધા કે આખડી કરવામાં આવે છે.સફળ થવું સૌને ગમે.
આ વાત ને આગળ જોતા પહેલા આપણે એક શેર જોઈએ.કોઈએ લખ્યું છે કે...

'મજા ન પડે તો મિજાજ બદલું છું,
આવાઝ બદલું છું,ક્યાં આંખ બદલું છું.
મારી કસ્તી નથી ડરતી કોઈના ટકરાવવાથી.
દિશા નહીં હું જહાજ બદલું છું.

બસ...
આ જ વાત યાદ રાખવી જરૂરી છે.

સફળ થવા માટે જરૂરી છે.નવો વિચાર.સફળ થવાના મુખ્ય માર્ગ ને બદલી શકાય.હું વાર્તા લખતો હતો.એક દિવસ એવું થયું કે જોડાક્ષર વગરની વાર્તા લખું.પહેલી વાર્તા કામચારુ અંગે લખી.તે જાપાનના શિક્ષક હતા.જો મેં કામચારુ વાર્તા ન લખી હોય તો આજે વર્લ્ડ રેકોર્ડ ન  થયો હોત.
મારું એવું હતું કે મારો વર્લ્ડ રેકોર્ડ થાય.આ માટે લખવાનું જ પસંદ કર્યું.જો વાર્તાઓ લખી હોટ તો તે શક્ય ન હતું.મેં ઈરાદો નહિ,એ માટે આયોજન નવું કર્યું.

કોઈ વાત ન સમજી શકાય તો એ માટે રાહ જોવી.કોઈએ કહ્યું છે કે દુઃખનું ઓસડ દહાડા.દિવસ પસાર થાય અને જો ઈરાદો કે ધ્યેય નકકી હોય તો ચોક્કસ પરિણામ આપણી ફેવરમાં જ આવે.બીજો એક વિચાર એ કે  'नजरिया बदलो,नजारे बदल जाएंगे' આ માટે આપણે જાત સાથે સંવાદ કરવો જરૂરી થઈ પડે છે.ક્યારેક કોઈ કહે એ ન સમજાય પણ, જાત સાથે સંવાદ થાય ત્યારે જે નિર્ણય આવે એ ચોક્કસ શાંતિ આપે.

@#@
પોતાનો વિચાર અને તેનો અમલ.આ બન્નેમાં બદલાવ થાય જ.વિચારેલું અમલી કરવા ફેરફાર કરવો પડે તો તે જરૂરી છે.

Saturday, April 28, 2018

अगला कदम...


में एक एक करके कदम बढ़ा रहा हूँ।मुजे मेरी जिंदगी को खुशनुमा करना हैं।मेने ऐसे कई सारे कदम बढ़ाए हैं।जैसे एक व्यापारी को अपने बिजनेस में हर बार सोच सम्भल के काम लेना होता हैं।उसकी एक गलती उसे बर्बाद कर सकती हैं।कुछ बोली हुई बाते हमे हमारा भविष्य दिखाती हैं।हमारा भविष्य संवारती हैं।

ज्यादातर लोग 3 जगह अपनी बात रखते हैं।

1.भगवान के सामने...
2. साथी या मित्र के सामने...
3.अपने आप के ओर अपनो के सामने...

कोई जुठ बोले या सच।भगवान को ओर उस व्यक्तिको ही मालूम होता हैं कि वो क्या बोल रहे हैं।वो  क्या कहते हैं।

कृष्ण भगवान ने गीता में कहा हैं कि अगर अच्छा करने के लिए कुछ गलत करना हैं तो वो गलत भी अच्छा हैं।अगर कुछ अच्छा करने के लिए दाग लगते हैं तो दाग अच्छे हैं।अगर इन दोनों बातो को देख ओर समजा जगये तो मालूम होगा कि अच्छा करने के लिए कुछ हुआ हैं तो वो अच्छा हैं।

आज मेरे साथ कुछ ऐसा ही हो रहा हैं।कुछ कदम मेने ऐसे उठाये हैं जो मुजे बहोत करीब से जानने वालोंको ही मालूम हैं।ये कदम ऐसे हैं जिससे में अपनी जिंदगी को बहेतरीन बनाना चाहूंगा।मेरा जीवन सुखमय होगा।मगर सवाल ये भी होगा कि वो बहेतरीन पल कब आएगा।

मेने कुछ समय पहले एक कदम बढ़ाया था।वो बहेतरीन था।मैंने महसूस किया हैं।मेरे कदम लड़खड़ाए होंगे ,मगर में कभी गिरा नहीं हूं।

जिंदगी से हमारी एक ही ख्वाहिश होनी चाहिए कि मेरा अगला कदम मेरे पिछले कदम से बहेतरीन हो।मेरे आसपास जुड़े ऐसे कुछ चंद लोग हैं जो मुजे एक ऐसा व्यक्ति मानते हैं की में जो चाहूंगा,में जो कहूंगा उसे करने के लिए महेनत करूँगा ओर से पूरा करूँगा।आज तक मे ऐसा कर पाया हूँ।अब आगे भी करने की चाह में में एक नया कदम लेने जा रहा हु।

मुजे यकीन हैं कि वो में कर पाऊंगा।में मेरे साथी, मातापिता ओर भगवान को कहना चाहूंगा कि आप मेरे इस कदम में मेरा साथ दे।जब तक मे इस व्यसन के चुंगल से सम्पूर्ण नहीं निकल पाऊंगा तब तक में चेन नहीं लूंगा।मेरा अगला कदम ये हैं कि तम्बाकू चबाने की आदत को छोड़ ने के बाद मुजे कोई तकलीफ न हुई।हो सकता हैं में तपकिर या तम्बाकू का पाउडर मंजन में इस्तमाल करता था।सो शायद मुजे इसकी आदत या तम्बाकू चबाने की आवश्यकता नहीं आती थी।

हुआ ये की 25 से 27 तारीख के बीच मुजे कहि पे रहना था।में तपकिर लेना भूल गया था।आज से 20 साल पहले जब मुजे दिमाग से जुड़ी समस्या का सामना करना पड़ता था,तब से में तम्बाकू चबाना या तपकिर का मंजन दांतो पे करता था।हुआ ये की मेरी बीमारी के कारण में घर से निकल नहीं पाता था।मेरे परिवार के सदस्य और साथी जब मुजे मिलने आते तब मेरे लिए वो पान,मसाला या गुटखा लेकर आते थे।
घर बैठे कभी स्टॉक खत्म नहीं हुआ।उस वख्त से मैने गुटखा खाना शुरू किया।20 साल तक खाने के बाद मेने तम्बाकू चबाना छोड़ दिया।

अब फिर से...
25 से 27 के बीच तपकिर न होने के कारण में बेचैन था।मेरा पूरा शरीर जैसे टूट रहा था।में जिस काम में जुड़ा था वहाँ परेश दलसनिया भी थे।उन्हों ने मुजे बाहर बुलाया और कहा 'तुम आज अच्छा नहीं कर पा रहे हो।कोई समस्या हैं।हमारी बाते सुनकर मेरे एक दोस्त राकेश पटेल भी बाहर आये।उन्होंने भी मुजे ऐसी बात कहीं।मेने कहा यार  तपकिर नहीं होने की बजह से में अच्छा महसूस नहीं कर सकता हूँ।राकेश ने मुजे धीरेसे चैनी दी साथ में कहा 'आज जो काम हम कर रहे हैं,उसमें तुम्हारा जुड़ना आवश्यक हैं...।'
बस...
मेंने चैनी अपने मुहमें रखी और काम खत्म करने में जुड़ गया।काम भी हुआ मगर मुजे मेरी गलती का अहसास हूआ।मेने तपकिर न होने की बजह से ये किया वो गलत था।मेरी गलती के बातें में मुजे दुख हुआ।

काम खत्म करते हुए में घर की ओर जा रहा था।मुजे दुख था कि में कुछ गलत किया हैं।मुजे आज तक ये था कि अब में तम्बाकू नहीं चबाता हुन,मुजे उसकी आवश्यकता नहीं हैं।मगर आज भी मुजे निकोटिन चाहिए वो आज के दिन से तय हो गया था।में ग़ुस्सेमें था।मुजे इस चुंगल से निकलना हैं,में निकलना चाहता हूं।मुजे जिस काम के लिए आगे बढ़ना हैं,उसमें मुजे ये बाते परेशान कर रही हैं।

मेने रास्ते में से डॉ की एपोइंटमेन्ट ली।साथियो में मेरे जीवन में अगला कदम तय कर चुका हूं।मुजे आशा हैं कि मुजे आप सहयोग करेंगे। आज में तम्बाकू से हारा हूं।मुजे हारना पसंद नहीं हैं।अब में उसे जितने के लिए आगे बढ़ चुका हूं।और में प्रार्थना करता हूँ कि ....बस,मेरा अगला कदम पिछले से बहेतरीन हो।

@#@
आज तक में हारा नहीं।
आज तक में रुका नहीं।
आज तक में कहीं ठहरा नहीं।
क्यो की मेरे कदम चलते हैं,चलते रहेंगे।मुजे यकीन हैं मेरे अगला कदम बहेतरीन होगा।

Saturday, February 17, 2018

पाप नहीं पूण्य...

पाप और पुण्य।
दोनों एक दूसरे के विरोधमें हैं।जब जब पाप की बात आती है,साथ में पूण्य की बात भी होती ही हैं।किसी ने लिखा हैं कि पाप करना नहीं पड़ता हो जाता हैं,मगर तो पूण्य करना पड़ता हैं।
पाप यानी किसीको दुख पहुंचाना, अधिकार से या किसी का हैं उससे कहींभी लेना।मन,कर्म और वचन से जुड़ने के बाद अगर कुछ गलती होती हैं तो उसे पाप मानना नहीं चाहिए।मगर सीधे अगर कोई हमे धोका दे रहा हैं,या हमारा गलत यूज़ होता हैं तो उनके लिए पाप हैं,तो जानबूजकर उसका विरोध न करना भी पाप से कुछ कम नहीं हैं।तो चलो पूण्य करने के मौके तलाश ते हुए हम गमारी जिंदगी को सवार ते हैं।न कभी पाप करूँगा,न पाप के क्रम में हिसा लूंगा।यही जीवन मंत्र हैं,ओर से देखते ही आगे बढ़ना हैं।

# गणेश जी 
# सरकार से एकरार

We can मुमकिन हैं...!

Tuesday, October 10, 2017

बच्चो का काम...



बच्चे भगवान हैं।
बच्चे भगवान का स्वरूप हैं।
बच्चे मनके सच्चे होते हैं।ये ओर ऐसे कई सारे विधान हैं,जो हम सुनते ओर सुनाते हैं।ऐसे ही बच्चे कभी नकारात्मक सोच नहीं दिखाते।कई बार हमने देखा हैं।छोटे बच्चे हमसे अधिक काम कर सकते हैं।मोबाइल को ही देखलो।हमारे बच्चे हमसे अच्छी तरह से मोबाइल की भिन्नभिन्न एप्लिकेशन का यूज करते हैं।कहते हैं कि बच्चो को गलती करने से डर नहीं लगता।ओर जो गलती करता हैं वोही नया शिखता हैं।
जो ज्यादा गलती करता हैं,वो ही ज्यादा शिखता हैं।किसी बच्चे ने चश्मा बनाया हैं।आप देख सकते हैं।अगर किसी ज्ञानी को बताएंगे तो वो कहेगा कि चश्मा ऐसा नहीं होता हैं।मगर ये तो क्रिएटिविटी हैं।ऐसे ही बच्चे बड़े होके कुछ नया करते हैं।

Monday, August 28, 2017

Try & pass...

प्रयत्न करना हमारा कर्तव्य हैं।सफलता और असफलता।ये दोनों हमारे साथ जुड़े हैं।कोई व्यक्ति ऐसी नहीं होगी जो सदैव सफल हीं रही हो ।
विश्वके इतिहास को देखेंगे तो मालूम होगा कि,प्रत्येक व्यक्तिने असफलता के माध्यमसे ही सफ़लताको प्राप्त किया हैं।सफल होने के लिए अगर देखा जाए तो असफल होने वाले व्यक्ति की जानकारी और गलतिया हीं हमे सफलता की ओर ले जाती हैं।
हमे सफलता नहीं मिलेगी इस डर से अगर हम कुछ नया करेंगे हैं नही तो!?प्रयत्न करके फेल होना अच्छा हैं।मगर फेल होने से पहले प्रयत्न न करना गलत हैं।कुछ लोग नया करते समय पुरानी बातें याद करके डरते हैं।जो हैं सो हैं।जो तय किया हैं उसे पाना हैं।
#सरकार...

Friday, August 18, 2017

यह वख्त भी गुजर जाएगा...

जब हम परेशान होते हैं।तब हमारे पास उस परेशानी से लड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता हैं।कोई व्यक्ति ऐसी नहीं हैं जो सदैव खुश हो।ऐसी ही दूसरी बात भी ये हैं कि ऐसी कोई व्यक्ति नहीं जो सदैव दुखी हो।आप ओर हम,सदैव ख़ुशी ओर दुख की अवस्थामें जीते है।हमे हमारे जीवन में एक बात याद रखनी हैं।जीवन में कोई स्थिति कायम नहीं हैं।
एक कहानी हैं।
एक बार अकबर ने बीरबल से कहा 'कुछ ऐसा लिखो की जिसे पढ़कर जो खुश हैं वो दुखी हो जाय।जो दुखी हैं वो उसे पढ़कर खुश हो जाय।थोड़ी देर सोचने के बाद बीरबल ने लिखा कि 'यह वख्त भी  गुजर जाएगा।'आज जो हालात हैं, उसे सुधरना हीं होगा।हर किसी प्रकारका सुधार समय मांगता हैं।हम जब हमारी समस्या के प्रति जागृत होते हैं,हम संभावना की ओर नजदीक पहूंचते हैं।

Saturday, July 15, 2017

સંગીતકાર લાબું જીવે...

આધુનિક સમય.આજે વિશ્વમાં સંગીત અને કલાનો આજે સુવર્ણ કાળ હોય તેવું લાગે છે.આજકાલ સંગીત કે વાદ્યકલા કોમ્યુટર આધારીત થઈ ગયું છે.કોમ્પ્યુટર ને આધારે સંગીતની તર્જ બની જાય છે ત્યારે રિયાજ અને તેની ઉપાસનાનું મહત્વ ઓછું થયું છે.

એક સમયમાં સંગીતકાર,કલાકાર  અથવા ગાયક એમના કૌશલ્યને આધારે જ જીવન જીવતા હતા.આપણી આસપાસ સંગીતના ઉપાસકો કે નૃત્યકારોને 
હંમેશા લાંબુ આયુષ્ય ભોગવતા આપણે જોયા છે.આવું કેમ થાય છે તે અંગે અનેક મુદ્દાઓ છે જે અંગે આપણે ચર્ચા કરીશું.
સંગીતમાં વાદન દ્વારા શ્રેષ્ઠ એક્યુપ્રેશર થાય છે.
સંગીતમાં જ વ્યસ્ત અને મસ્ત રહેવાથી પોતાના કે આસપાસના તણાવથી સો ટકા છુટકારો મળેછે.

કલાકાર જ્યારે સંગીતમય હોય છે ત્યારે સંપૂર્ણ ધ્યાનસ્થ હોય છે.ગાયન દ્વારા શ્રેષ્ઠ પ્રાણાયામ સહજ રીતે થાય છે.
સારા તેમજ સુંદર ધ્વની થી આત્માને ઊર્જા મળે છે.કારણ કે સંગીત આત્મા નો ખોરાક છે.

સંગીત ના નાદથી આધિ,વ્યાધિ અને ઉપાધિ મટે છે. આખા વિશ્વમાં રહેલી બધા જ પ્રકારની એનર્જી, સંગીતના ધ્વની થી મળી રહે છે.અને એજ કારણે સંગીત જે નૃત્યની આરાધના કરનાર લાંબુ જીવન જીવેછે.

Sunday, July 2, 2017

શું વિચારશે?

એકવખત સંત.
એ વિચારવા લાગ્યા કે આ માણસ પણ કેવો કામાંધ છે.સવારના પહોરમાં દારુ પી ને સ્ત્રીના ખોળામાં માથુ મુકીને પ્રેમાલાપ કરે છે.થોડીવારમાં સમુદ્રમાંથી “બચાવો” “બચાવો” ની બુમો સંભળાઇ. સંते જોયુ કે એક માણસ દરિયામાં ડુબી રહ્યો છે. 

પણ પોતાને તો તરતા આવડતું નહોતું એટલે એ જોવા સિવાય બીજુ કંઇ જ કરી શકે તમે નહોતા. સ્ત્રીના ખોળામાં માથુ મુકીને સુતેલો પેલો પુરૂષ ઉભો થયો અને ડુબતા માણસને બચાવવા એ સમુદ્રમાં કુદી પડ્યો.

થોડીવારમાં તો એ પેલા માણસને બચાવીને સમુદ્રકિનારે લઇ આવ્યો.સંત વિચારમાં પડી ગયા કે આ માણસને સારો ગણવો કે ખરાબ? એ પેલા પુરૂષ પાસે ગયા અને પુછ્યુ: ભાઇ તું કોણ છે અને અહીંયા શું કરે છે?

પેલા પુરૂષે જવાબ આપ્યો કે હું એક ખારવો છુ અને માછીમારી નો ધંધો કરુ છુ. આજે ઘણા દિવસો પછી સમુદ્રની સફર કરીને વહેલી સવારે અહીંયા પહોંચ્યો છું.

મારી માં મને લેવા માટે સામે આવી હતી અને સાથે (ઘેર બીજુ કોઇ ખાસ વાસણ ન હોવાથી) આ દારુની બોટલમાં પાણી ભરીને લાવી 'તી.ઘણા દિવસની મુસાફરીનો ખુબ થાક હતો અને સવારનું આ સુંદર વાતાવરણ હતું એટલે પાણી પી ને મારી માં ના ખોળામાં માથું રાખીને થાક ઉતારવા અહિંયા જ સુઇ ગયો.

(એક વોટ્સ એપ મેસેજ ને આધારે)

હવે સંત શું વિચારશે?

શું વિચારશે?

એકવખત સંત વહેલી સવારે દરિયાકાંઠે ફરવા માટે નિકળ્યા.દરિયા કિનારે એણે એક પુરૂષને એક સ્ત્રીના ખોળામાં માથું નાખીને સુતેલો જોયો. બાજુમાં જ એક દારુની ખાલી બોટલ પણ પડી હતી. સંત ખુબ દુ:ખી થયા.એ વિચારવા લાગ્યા કે આ માણસ પણ કેવો કામાંધ છે.

સવારના પહોરમાં દારુ પી ને સ્ત્રીના ખોળામાં માથુ મુકીને પ્રેમાલાપ કરે છે.થોડીવારમાં સમુદ્રમાંથી “બચાવો” “બચાવો” ની બુમો સંભળાઇ. સંते જોયુ કે એક માણસ દરિયામાં ડુબી રહ્યો છે.

પણ પોતાને તો તરતા આવડતું નહોતું એટલે એ જોવા સિવાય બીજુ કંઇ જ કરી શકે તમે નહોતા.
સ્ત્રીના ખોળામાં માથુ મુકીને સુતેલો પેલો પુરૂષ ઉભો થયો અને ડુબતા માણસને બચાવવા એ સમુદ્રમાં કુદી પડ્યો.

થોડીવારમાં તો એ પેલા માણસને બચાવીને સમુદ્રકિનારે લઇ આવ્યો.સંત વિચારમાં પડી ગયા કે આ માણસને સારો ગણવો કે ખરાબ? એ પેલા પુરૂષ પાસે ગયા અને પુછ્યુ: ભાઇ તું કોણ છે અને અહીંયા શું કરે છે?

પેલા પુરૂષે જવાબ આપ્યો કે હું એક ખારવો છુ અને માછીમારી નો ધંધો કરુ છુ. આજે ઘણા દિવસો પછી સમુદ્રની સફર કરીને વહેલી સવારે અહીંયા પહોંચ્યો છું.

મારી માં મને લેવા માટે સામે આવી હતી અને સાથે (ઘેર બીજુ કોઇ ખાસ વાસણ ન હોવાથી) આ દારુની બોટલમાં પાણી ભરીને લાવી 'તી.

ઘણા દિવસની મુસાફરીનો ખુબ થાક હતો અને સવારનું આ સુંદર વાતાવરણ હતું એટલે પાણી પી ને મારી માં ના ખોળામાં માથું રાખીને થાક ઉતારવા અહિંયા જ સુઇ ગયો.

હવે સંત શું વિચારશે?

Saturday, July 1, 2017

Earlier Career of Charlie Chaplin





In 1897 Armed with his mother's love of the stage, Chaplin was determined to make it in show business himself, using his mother's contacts, landed with a clog-dancing troupe named “The Eight Lancashire Lads”. It was a short stint, and not a terribly profitable one, forcing the go-getter Chaplin to make ends meet any way he could.

"I (was) newsvendor, printer, toymaker, doctor's boy, etc. But during these occupational digressions, I never lost sight of my ultimate aim to become an actor," Chaplin later recounted. "So, between jobs I would polish my shoes, brush my clothes, put on a clean collar and make periodic calls at a theatrical agency."

Eventually other stage work did come his way. Chaplin made his acting debut as a pageboy in a production of Sherlock Holmes. From there he toured with a vaudeville outfit named Casey's Court Circus and in 1908 teamed up with the Fred Karno pantomime troupe, where Chaplin became one of its stars as the Drunk in the comedic sketch A Night in an English Music Hall.

With the Karno troupe, Chaplin got his first taste of the United States, where he caught the eye of film producer Mack Sennett, who signed Chaplin to a contract for a $150 a week.

#Thanks @nishu...

Thursday, March 23, 2017

हम और हमारे बच्चे...

हम ये जानते हैं!
हम वो भी जानते हैं!
क्या हम ये जानते हैं की अच्छे ,अत पिता केसे होने चाहिए?इस के लिए एक नया विचार किसी ने अमली किया हैं! दादा जी के नाम से वो सवाल के जवाब देते हैं!बहोत अच्छी लिंक मुझे मेरे साथी ने भेजी!मेने उसको देखा!मुझे लगा उसे और भी फेलाना चाहिए!आज में आप को शेर कर रहा हौं!आप भी यहाँ क्लिक करके देख सकते हैं!आप कोई भी सवाल करो!दादा जी आपको जवाब देंगे!यहाँ आप को एक सेम्पल भी देखने के लिए भेज रहा हूँ!

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प्रश्नकर्ता: यहाँ अमरीका में पैसा है, लेकिन संस्कार नहीं हैं और यहाँ आसपास का वातावरण ही ऐसा है, तो इसके लिए क्या करें?
दादाश्रीपहले तो माता-पिता को संस्कारी बनना चाहिए। फिर बच्चे बाहर जाएँगे ही नहीं। माता-पिता ऐसे हों कि उनका प्रेम देखकर बच्चे वहाँ से दूर जाएँ ही नहीं। माता-पिता को ऐसा प्रेममय बनना चाहिए। बच्चों को अगर सुधारना हो तो आप ज़िम्मेदार हो। बच्चों के साथ आप फज़र् से बँधे हुए हो। आपको समझ में नहीं आया?
अपने लोगों के बच्चों को बहुत उच्च स्तर के संस्कार देने चाहिए। अमरीका में कईं लोग कहते हैं कि ‘हमारे बच्चे मांसाहार करते हैं और ऐसा बहुत कुछ करते हैं।’ तब मैंने उनसे पूछा, ‘आप मांसाहार करते हो?’ तो बोले, ‘हाँ, हम करते हैं।’ तब मैंने कहा, ‘फिर तो बच्चे भी करेंगे ही।’ आपके ही संस्कार! और अगर आप नहीं करते तो भी वे कर सकते हैं, लेकिन दूसरी जगह। लेकिन आपका फज़र् इतना है कि अगर आपको उन्हें संस्कारी बनाना हो तो आपको अपना फज़र् नहीं चूकना चाहिए।
अब बच्चों का आपको ध्यान रखना चाहिए कि ऐसा-वैसा, यहाँ का खाना न खाएँ। और यदि आप खाते हों तो अब यह ज्ञान प्राप्त होने के बाद आपको सब बंद कर देना चाहिए। अत: जैसे वे आपके संस्कार देखेंगे वैसा ही करेंगे। पहले हमारे माता-पिता संस्कारी क्यों कहलाते थे? वे बहुत नियमवाले थे और तब उनमें संयम था। और ये तो संयमरहित हैं।
प्रश्नकर्ता: जब बच्चे बड़े हो जाएँ, तब हमें उन्हें धर्म का ज्ञान किस तरह देना चाहिए?
दादाश्री: आप धर्म स्वरूप हो जाओ, तो वे भी हो जाएँगे। जैसे आपके गुण होंगे, बच्चे वैसा ही सीखेंगे। इसलिए आप ही धर्मिष्ठ हो जाना। आपको देख-देखकर सीखेंगे। यदि आप सिगारेट पीते होंगे, तो वे भी सिगारेट पीना सीखेंगे। आप शराब पीते होंगे तो वे भी शराब पीना सीखेंगे। माँस खाते होंगे तो माँस खाना सीखेंगे। जो आप करते होंगे वैसा ही वे सीखेंगे। वे सोचेंगे कि हम इनसे भी बढ़कर करें।
प्रश्नकर्ता: अच्छे स्कूल में पढ़ाने से अच्छे संस्कार नहीं आते?
दादाश्री: लेकिन, वे सब संस्कार नहीं हैं। माता-पिता के सिवा बच्चे अन्य किसी से संस्कार प्राप्त नहीं करते। संस्कार माता-पिता और गुरु के, और थोड़ा-बहुत उसका जो सर्कल होता है, फ्रेन्ड सर्कल उसके, उसके संयोग। संस्कार मित्रों तथा आसपास के लोगों से मिलते हैं। सबसे अधिक संस्कार माता-पिता से मिलते हैं। माता-पिता संस्कारी हों, तो बच्चे भी संस्कारी बनते हैं वर्ना संस्कारी होंगे ही नहीं।

ગંદો માણસ