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Wednesday, August 2, 2017

मा का दूध...

कल से स्तनपान सप्ताह शुरू हो गया।पिछले कई
सालों से इस सप्ताह को विशेष तौर पे मनाया जाता हैं।माता के दूध के अनेक लाभ हैं।विश्व के वैज्ञानिक भी इसे मान चुके हैं।
आज में कुछ कहूंगा।आप को समझ लेना हैं।
ज्यादातर देखा गया हैं कि गाँव के लोग या अनपढ़ व्यक्ति जागृत हो सके इसके लिए कई सारे दिन मनाये जाते हैं।कई दिन ऐसे हैं कि जिसका महत्व समजाया जाता हैं।
शहरी महिलाए,व्यावसायिक महिलाएं कभी कभी महत्व जानते हुए भी अपने बच्चे को स्तनपान नहीं करवाती।गाँव की महिलाएं बच्चे को स्तनपान करवाती हैं।मानसिक,शारीरिक और बौद्धिक स्वरूपमें सर्वांगी विकास माँ के दूध से फैलता हैं।इस सप्ताह को विश्वमें मनाया जाएगा।आपभी इस के प्रचार में सहयोग करें।डॉ. आई.के.विजलिवाला कहते हैं।सिर्फ माँका दूध ही संपूर्ण आहार हैं।बाकी के दूध संपूर्ण आहार नही कहे जा सकते।ठीक हैं,सायन्स अपनी जगह कुछ सर्च करले।ठीक हैं,मगर माँ के दूध का कोई विकल्प नहीं हैं।

Friday, July 28, 2017

अमृता प्रीतम

अमृता प्रीतम का नाम याद आते ही हम सबको याद आती हैं प्रेम में डूबी हुई कविताएँ।काल उनके बारें में एक बात लिखी!एक मित्रने कहा,सिर्फ यही बात तो कुछ गलत संदेश भी जाएगा!इनके बारेमें संपूर्ण जानकारी के साथ लिखो।थोड़ी जानकारी थी!थोड़ी प्राप्त की!अब आप उनके बारेंमे ज्यादा जानकारी प्राप्त करेंगे!
फिरसे अमृता के बारेंमे आगे बढ़ते हैं!वो कविताएँ जो कच्ची उम्र में अच्छी तो लगें पर समझ न आएं।सच में कुछ जादू ही था अमृता और उनकी कविताओं में।आप पसंद करें तो अच्छा और न करें तो भी उन्हें नकार नहीं सकते। अमृता 20वीं सदी की बेहतरीन साहित्यकार थीं। उन्हें पंजाबी की पहली और सर्वश्रेष्ठ कवयित्री माना जाता है। उनकी लोकप्रियता सिर्फ भारत में नहीं, सीमा पार पाकिस्तान में भी उतनी ही है। पंजाबी के साथ-साथ अमृता ने हिन्दी में भी लेखन किया। उनकी रचनाओं को पूरी दुनिया में पढ़ा जाता है और उनकी किताबें पंजाबी, हिन्दी, उर्दू,इंग्लिश, स्पेनिश, रशियन, इटालियन जैसी कई भाषाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने कुल मिलाकर लगभग 100 पुस्तकें लिखीं। अमृता ने अपनी रचनाओं में भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के दर्द, दंगो, किस्सों और कहानियों को बख़ूबी उतारा।कविताएँ तो कवि के अंतरमन की उधेड़बुन होती हैं, उनकी सोच और दिल का आइना होती हैं, यह बात अमृता की हर रचना में देखी जा सकती है। ऐसा लगता था मानो वह उम्र भर खुद से ही उलझती रहीं। बेबाक, बिना डरे अपनी बात कह देना उनकी खासियत थी, उनकी चर्चित आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ में उन्होंने मशहूर गीतकार-शायर साहिर लुधियानवी से अपनी बेपनाह मोहब्बत के किस्से भी बिना किसी झिझक के कह दिये।

अमृता प्रीतम का जन्म 31 अगस्त 1929 में गुंजरावाला,पंजाब में हुआ था, जो बंटवारे के बाद पाकिस्तान की जागीर हो गया। बंटवारे में लाखों लोगों को अपनी जन्मभूमि छोड़ पलायन करना पड़ा था, उनमें से एक अमृता भी थीं। उनका परिवार भी हिन्दुस्तान आ गया था मगर उनका दिल अक़्सर लाहौर की गलियों में भटकता रहता था। विभाजन के वक़्त वह ट्रेन में बैठ कर दिल्ली आ रही थीं, तब उन्होंने एक कविता ‘आज अख्खां वारिस शाह नुं’ (आज कहुं मैं वारिस शाह से) लिखी जो सालों बाद तक उनकी पहचान के रूप में जानी गई। 11 साल की उम्र में ही उनकी मां गुज़र गईं। तन्हाई के मौसमों में कागज़ और कलम ने अमृता को सहारा दिया और वह अपने मन की बातें कविताओं के ज़रिए बयां करने लगीं। महज़ सोलह साल की उम्र में उनका पहला कविता संग्रह ‘अमृत लहरें’ (1936) प्रकाशित हुआ। सोलह साल की उम्र में ही उनका विवाह ‘प्रीतम सिंह’ से हो गया और ‘अमृता कौर’ अमृता प्रीतम बनीं मगर इस रिश्ते में लगातार दरारें आती रही और अंततः 1960 में उनका तलाक हो गया। 1945 के दौर तक उनकी दर्जनों कविताएं प्रकाशित हुईं।

आज कहूँ मैं ‘वारिस शाह’ से, कहीं कब्रों से तू बोल,

वो राज़ किताबी इश्क़ का, कोई अगला पन्ना खोल,

इक रोई थी बेटी पंजाब की, तूने लिख-लिख विलाप किया,

आज रोएं लाखों बेटियां, कहें तुझे ओ वारिस शाह,

हे दर्दमंदो के हमदर्द, उठ देख अपना पंजाब,

बिछी हुई हैं लाशें खेतो में, और लहू से भरी है चेनाब,

टप-टप टपके कब्रों से, लहू बसा है धरती में,

प्यार की शहजादियां, रोएं आज मज़ारों पे,

आज सभी फरेबी बन गए, हुस्न इश्क़ के चोर,

आज कहां से लाएं ढूंढ कर, वारिस शाह एक और!

एक उपन्यासकार के रूप में उनकी पहचान ‘पिंजर’ नामक उपन्यास से कायम हुई। जिसमें उनके महिला केंद्रित किरदार को बहुत तारीफें मिली और इस पर एक पुरस्कृत फिल्म भी बनीं। उन्होंने तक़रीबन 6 उपन्यास, 6 कहानी संग्रह, 2 संस्मरण, 15 से अधिक कविता संग्रह, ‘अक्षरों के साये’ और ‘रसीदी टिकट’ नामक 2 आत्मकथा लिखीं। रसीदी टिकट में वह लिखती हैं-“एक सपना था कि एक बहुत बड़ा किला है और लोग मुझे उसमें बंद कर देते हैं। बाहर पहरा होता है। भीतर कोई दरवाजा नहीं मिलता। मैं किले की दीवारो को उंगलियों से टटोलती रहती हूं, पर पत्थर की दीवारों का कोई हिस्सा भी नहीं पिघलता। सारा किला टटोल-टटोल कर जब कोई दरवाजा नहीं मिलता, तो मैं सारा जोर लगाकर उड़ने की कोशिश करने लगती हूं। मेरी बांहों का इतना जोर लगता है कि मेरी सांस चढ़ जाती है। फिर मैं देखती हूं कि मेरे पैर धरती से ऊपर उठने लगते हैं। मैं ऊपर होती जाती हूं, और ऊपर, और फिर किले की दीवार से भी ऊपर हो जाती हूं। सामने आसमान आ जाता है। ऊपर से मैं नीचे निगाह डालती हूं। किले का पहरा देने वाले घबराए हुए हैं, गुस्से में बांहें फैलाए हुए, पर मुझ तक किसी का हाथ नहीं पहुंचता।”

अमृता के व्यक्तित्व में जो साहस था, सामाजिक रूढ़िवादियों के विरुद्ध जो विद्रोही भावना थी, वह बचपन के दिनों से ही उपजने लगी थीं और बंटवारे ने उस आग में और घी डाल दिया। प्रेम और संवेदना की कविताएं कुछ वर्षों तक लिखने के बाद उन्होंने अपना रूख बदला और समाज को दर्पण दिखाने का कार्य अपनी रचनाओं से शुरू किया। अमृता ने कई सामाजिक मंचों और सम्मेलनों में खुलकर एक धर्म मुक्त समाज बनाने की बातें कहीं। विश्व के कई देशों और सभ्यताओं के साहित्यकारों के बीच, अपनी विद्रोही रचनाएं पढ़ी और प्रशंसा बटोरी। उन्होंने दूसरे विद्रोही कवियों-लेखकों को भी भरपूर सुना और समझा। वे पहली महिला साहित्यकार थीं जिन्हें ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ से नवाज़ा गया। साहित्य में उनके योगदान के लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ भी प्राप्त हुआ।


यह कैसे हो सकता है कि अमृता का नाम लिया जाए और साहिर लुधियानवी को याद न किया जाए। अमृता को साहिर से बेपनाह मोहब्बत थी और साहिर भी उन्हें चाहते थे मगर उन्होंने कभी इस रिश्ते को आगे बढ़ाने कि बात नहीं की। दोनों अंदर-ही-अंदर एक दूसरे के प्यार में ताउम्र सुलगते रहे पर कभी एक न हो पाए। साहिर लाहौर में उनके घर आया करते थे, कुछ नहीं कहते, बस एक के बाद एक सिगरेट पिया करते थे। उनके जाने के बाद अमृता उनकी सिगरेट की बटों को उनके होंठों के निशान के हिसाब से दोबारा पिया करती थीं। इसी तरह उन्हें सिगरेट पीने की लत लग गई। दोनों एक दूसरे को प्यार भरे खत लिखते थे मगर साहिर के लाहौर से मुंबई चले आने और अमृता के दिल्ली आ बसने के कारण दोनों में दूरी पनपने लगी। गायिका सुधा मल्होत्रा की तरफ साहिर के झुकाव ने भी इस दूरी को और बढ़ाया। पर जब दिल के तार जुड़े हों तो दूरियां क्या कर सकतीं हैं। दोनों एक साथ तो रहे नहीं पर साहिर के गीतों-नज़्मों में और अमृता की रचनाओं में एक-दूसरे के लिए प्यार और उस प्यार का दर्द आसानी से देखा जा सकता है।

1958 में साहिर के बाद उन्हें ‘इमरोज़’ से इश्क़ हुआ। या यूं कहें कि इमरोज़ को उनसे इश्क़ हुआ। दोनों एक ही छत के नीचे वर्षों तक साथ रहे मगर दोनों के कमरे अलग हुआ करते थे। इमरोज़ को साहिर और अमृता की दास्तां की ख़बर थी मगर वह इस बात से बिल्कुल सहज थे। दोनों का रिश्ता बहुत अनूठा था, उन्होंने कभी एक-दूसरे से नहीं कहा कि वो उनसे प्यार करते हैं। अमृता रात के समय लिखना पसंद करती थीं। जब न कोई आवाज़ होती, हो न टेलीफ़ोन की घंटी बजती हो और न कोई आता-जाता हो। इमरोज़ लगातार चालीस-पचास बरस तक रात के एक बजे उठ कर उनके लिए चाय बना कर चुपचाप उनके आगे रख देते और फिर सो जाया करते थे। अमृता को इस बात की ख़बर तक नहीं होती थी। इमरोज़ उनके ड्रायवर भी थे। वे हर जगह अमृता को अपने स्कुटर पर छोड़ने जाया करते थे। इसी तरह दोनों का ‘खामोश-इश्क़’ उम्र भर चलता रहा।

अमृता का आखिरी समय बहुत तकलीफों और दर्द में बीता। बाथरूम में गिर जाने की वजह से उनकी हड्डी टूट गई थी, जो कभी ठीक नहीं हुई और इस दर्द ने उनका दामन कभी नहीं छोड़ा। इमरोज़ ने अंतिम दिनों में उनका बहुत ख़्याल रखा। उन्होंने अमृता की बीमारी को भी अपने प्यार से खूबसूरत बना दिया था। 31 अक्टूबर 2005 में उन्होंने आख़िरी सांसे ली और इस दुनिया से अपना रिश्ता ख़त्म कर लिया। एक पंक्ति याद आती है जो उन्होंने साहिर की मृत्यु पर लिखी थी-

“सोच रही हूं, हवा कोई भी फ़ासला तय कर सकती है, वह आगे भी शहरों का फ़ासला  तय किया करती थी। अब इस दुनिया और उस दुनिया का फ़ासला भी जरूर तय कर लेगी”। एक औरत, औरतों के प्रति समाज का नजरिया, एक लेखिका और एक प्रेमिका के बीच ही अमृता ताउम्र उलझती रहीं और इन  उलझनों के दस्तावेजों के दौर पर उनकी सैकड़ों रचनाएं हमारे बीच मौजूद हैं। जो हर दम अनकी जीवनगाथा बयान करती रहेंगी। बुधवार 31 अगस्त अमृता का जन्मदिन है।अमृता की यादें कभी जाती नहीं पर जन्मदिन में याद करना भी एक रस्म है।

Thursday, July 20, 2017

निर्दलीय राष्ट्रपति

कल हमारे नए राष्ट्रपति तय हो गए!कोविंद जी अब हमारे राष्ट्रपति हैं!NDA के उम्मीदवार जीत गए हैं!आज से वो हमारे 14 राष्ट्रपति होंगे!इस से पहले राष्ट्रपति के चुनाव के बारेमें मेने लिखा था!आज तक के सभी राष्ट्रपति किसी पोलोटिकल पार्टी या पार्टी समूह से जुड़े थे!जैसे कोविंद जी NDA से जुड़े थे!राष्ट्रपति या उप राष्ट्रपति बनने के बाद व्यक्ति किसी राजकीय पार्टीका सदस्य नहीं बन सकता हैं!
आज में ऐसे राष्ट्रपति के बारे में कहूंगा जो निर्दलीय उमीदवार थे!जिन्होंने भारत के इतिहासमें पहलीबार निर्दलीय उमेदवार बनके जीत हांसिल की थी!हा, जी वो इंदिरा गांधी की राजकीय चल थी कि पार्टी का उमेदवार हारा ओर इंदिरा जी ने अपना निर्दलीय उमेदवार जिताया!तब से इंदिरा याने इंडिया बन गया!जैसे आज मोदी यानी भारत हैं!
वो आयरलेण्ड के स्वतंत्रता आंदोलन में जुड़े थे।उस वख्त वो वहां पढाई करते थे!
वी.वी.गिरि भारत आये!अपना देश गुलाम था!अंग्रेजो का शाशन था!रेल सेवा नई थी!यहाँ कर्मचारी ओर अन्यका शोषण करने वाले अंग्रेजो से वो भिड़े!
स्वतंत्र भारत के वो पहले श्रम मंत्री थे!केरल ओर कर्नाटक में वो  गवर्नर थे!राष्ट्रपति बनने से पहले उन्होंने 1967 से उपराष्ट्रपति के तौर पे काम किया था!भारत के इतिहासमें एक मात्र निर्दलीय चुनेगये राष्ट्रपति वी.वी. गिरी का नाम वरहगिरी वेंकट गिरी था!1894 के दिन जोगियाह पंतुल के घर पैदा हुए!उनके पिताजी वी.वी.जोगियाह पंतुल ओडिसा के ख्यातनाम वकील थे!
अभी तो नए राष्ट्रपति आये हैं!में उन्हें समग्र भारत वर्ष की ओर से शुभकामना देता हूं!

Sunday, June 18, 2017

રાષ્ટ્રપતિ ચૂંટણી: મતનું મૂલ્ય

વિશ્વના સૌથી મોટા લોકશાહી દેશના સર્વોચ્ચ બંધારણીય પદ એટલે કે રાષ્ટ્રપતિ પદની ચૂંટણી માટેનું જાહેરનામું બહાર પડી ચૂક્યુ છે. આપણા વર્તમાન રાષ્ટ્રપતિ મહામહિમ પ્રણવ મુખરજીએ 25 જુલાઇ 2012થી પદ સંભાળ્યુ હતુ એટલે 24 જુલાઇ 2017ના રોજ એમનો કાર્યકાળ પુરો થાય છે. આપણા દેશમાં રાષ્ટ્રપતિની ચૂંટણી કેવી રીતે કરવામાં આવે છે એ ભારતના નાગરીક તરીકે આપણે જાણી-સમજી શકીએ એ માટે અટપટ્ટી પ્રક્રિયાને સરળ ભાષામાં આપ સૌ મિત્રો સાથે શેર કરુ છું.

રાષ્ટ્રપતિની ચૂંટણીમાં લોકોએ ચૂંટેલા ધારાસભ્યો અને સંસદસભ્યો લોકોના પ્રતિનિધી તરીકે ભાગ લે છે અને મતદાન કરે છે. આ ચૂંટણીમાં સૌ પ્રથમ ધારાસભ્યના મતોનું મૂલ્ય નક્કી કરવામાં આવે છે. આ માટે જે તે રાજ્યની કૂલ વસ્તીને તે રાજ્યના ધારાસભ્યોની સંખ્યા વડે ભાગવામાં આવે છે અને ત્યાર બાદ ફરીથી તેને 1000 વડે ભાગવામાં આવે છે. (આ ગણતરી માટે 1971ની વસ્તીગણતરી મુજબની વસ્તી ધ્યાનમાં લેવાય છે. 2026 સુધી એ મુજબ જ ગણતરી થશે) 

જો આપણે ગુજરાતની વાત કરીએ તો 1971માં ગુજરાતની કુલ વસ્તી 2,66,97.488 હતી એને ગુજરાતના ધારાસભ્યોની સંખ્યા 182 વડે ભાગતા 1,46,690 આવે. આ સંખ્યાને ફરીથી 1000 વડે ભાગતા 147 આવે. આમ ગુજરાતના દરેક ધારાસભ્યના મતનું મૂલ્ય 147 થાય. ગુજરાતના કૂલ ધારાસભ્યોના મતોનું મૂલ્ય 182 * 147 એટલે 26,754 થાય. આવી રીતે દેશના તમામ રાજ્યોના ધારાસભ્યોના મતોનું મૂલ્ય તે રાજયની 1971ની વસ્તી અને ધારાસભ્યોની સંખ્યાના આધારે નક્કી થાય. વર્તમાન સમયે દેશના કૂલ 4120 ધારાસભ્યોના મતોનું મૂલ્ય 5,49,490 થાય છે.

ધારાસભ્યોના મતોના મૂલ્યના આધારે સંસદસભ્યોના મતોનું મૂલ્ય નક્કી કરવામાં આવે છે. લોકસભાના કુલ 545 સભ્યો છે એ પૈકી 543 ચૂંટાયેલા સભ્યો છે અને 2 એંગ્લો ઇન્ડીયન સભ્યોને રાષ્ટ્રપતિએ નોમીનેટ કરેલા હોય છે. રાજ્યસભાના સભ્યોની કૂલ સંખ્યા 245 છે જેમાં 233 સભ્યો ચૂંટાયેલા હોય છે અને 12 સભ્યોની નિમણૂંક રાષ્ટ્રપતિએ કરેલી હોય છે. રાષ્ટ્રપતિની ચૂંટણીમાં મતદાનનો અધિકાર માત્ર ચૂંટાયેલા સભ્યોને જ મળે એટલે લોકસભાના 543 અને રાજ્યસભાના 233 મળીને કૂલ 776 સંસદસભ્યો મતદાન કરી શકે. એમના મતોનું મૂલ્ય નક્કી કરવા માટે આખાદેશના કૂલ 4120 ધારાસભ્યોના 5,49,490 મતોને સંસદસભ્યોની સંખ્યા એટલે કે 776 વડે ભાગવામાં આવે છે. આમ કરવાથી પ્રત્યેક સંસદસભ્યના મતનું મૂલ્ય 708 થાય છે. દેશના કૂલ 776 સંસદસભ્યોના મતોનું મૂલ્ય 776 * 708 એટલે કે 5,49,408 થાય છે.

ધારાસભ્યોના મતોનુ કૂલ મૂલ્ય અને સંસદસભ્યોના મતોનું કૂલ મૂલ્ય લગભગ સરખુ જ થાય છે. જે થોડો તફાવત આવે છે એ ભાગાકાર વખતે અપૂર્ણાંકને પૂર્ણાંકમાં ફેરવવાને કારણે આવે છે. આગામી ચૂંટણીમાં ધારાસભ્યો અને સંસદસભ્યોના મતોનું કૂલ મૂલ્ય 10,98,898 (5,49,490 + 5,49,408) છે. ભાજપ અને સાથી પક્ષો પાસે અત્યારે કૂલ 5,34,058 મતો છે અને કોંગ્રેસ તથા સાથી પક્ષો પાસે 2,54,651 મતો છે જ્યારે બાકીના મતો અન્ય પક્ષો પાસે છે. જીતવા માટે કૂલ મત પૈકી 50%થી વધુ મતો મળવા જોઇએ.

રાષ્ટ્રપતિની ચૂંટણી, આપણી સામાન્ય ચૂંટણી કરતા બીજી એક રીતે પણ જુદી પડે છે જેની બહુ ઓછા લોકોને ખબર છે. આપણી સામાન્ય ચૂંટણીમાં જેને સૌથી વધુ મત મળે એ ઉમેદવાર વિજેતા થાય જ્યારે રાષ્ટ્રપતિની ચૂંટણીમાં વિજેતા થવા માટે 50% કરતા વધુ મત મળવા જોઇએ. આ ગણતરી કેવી રીતે થાય છે એ ખુબ રસપ્રદ છે. 

રાષ્ટ્રપતિની ચૂંટણીમાં ધારાસભ્ય અને સંસદસભ્ય કોઇ એક ઉમેદવારને જ પોતાનો મત આપે એવુ ના હોય. રાષ્ટ્રપતિની ચૂંટણીમાં જેટલા ઉમેદવાર ઉભા હોય એ તમામ ઉમેદવારને મત આપવાનો હોય છે. તમને થશે કે એ કેવી રીતે શક્ય બને ? મત આપનાર ધારાસભ્ય કે સંસદસભ્ય રાષ્ટ્રપતિ પદના તમામ ઉમેદવારને પસંદગી ક્રમ આપે છે. જેમ કે ત્રણ વ્યક્તિ  A, B અને C ચૂંટણીમાં ઉભા હોય તો તમારે ત્રણેને ક્રમ આપવાના હોય જેમ કે મારે B ને મત આપવો હોય તો એને પ્રથમ ક્રમ આપુ પછી બાકીના બે ઉમેદવારો A અને Cને મારી મરજી મુજબ બીજો અને ત્રીજો ક્રમ આપુ.
  
આ રીતે મતદાન થયા પછી માની લો કે કુલ મતોમાંથી A ને 40%  B ને 35% અને Cને 25% મત મળ્યા તો Aને સૌથી વધુ મત મળેલા હોવા છતા  વિજેતા ન ગણાય કારણકે એને 50%થી વધુ મત નથી મળ્યા. આવુ બને એટલે જેને સૌથી ઓછા મત મળ્યા હોય એનું નામ રદ કરી દેવામાં આવે અને એ ઉમેદવારના તમામ મત મતદાન કરનારાઓએ જે ઉમેદવારને બીજો ક્રમ આપ્યો હોય તે ઉમેદવારને જતા રહે. અહીંયા C ને મળેલા 25% મત હવે A અને B વચ્ચે વહેંચાય જાય.  માની લો કે આ 25% મત પૈકી A ને 7% મળે અને B ને 18% મળે તો Aના કુલ મત 40 + 7 = 47% થયા અને Bના કુલ મત 35 + 18 = 53% થયા એટલે B વિજેતા ગણાશે કારણકે એને 50%થી વધુ મતો મળી ગયા. પ્રથમ ગણતરી વખતે A ને સૌથી વધુ મત મળેલા હતા આમ છતા એ હારી ગયા કારણકે એ 50%થી વધુ મત પ્રાપ્ત ન કરી શક્યા. 

ખરેખર આપણા બંધારણમાં રાષ્ટ્રપતિને ચૂંટવા માટેની નક્કી કરેલી આ ચૂંટણી પ્રક્રિયા અદભૂત અને અનોખી છે.