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Friday, June 15, 2018

हमारी चाह....


हम क्या चाहते हैं।
सबसे फके उसे तय करो।
जो तय करते हैं इस के लिए आप कर ही पाएंगे ऐसे खयाल रखो।ऐसा खयाल ओर ऐसी जानकारी और इस के पीछे किया गया काम आप उसे कर पाएंगे ऐसा विश्वास दिलाता हैं।

ऐसा विश्वास और ऐसी हिम्मत ही हमे सफल बनाने के लिए काफी हैं।सवाल ये हैं कि जो भी तय किया हैं उसे हम हांसिल करना क्यों चाहते हैं।इसका जवाब अलग अलग हो सकता हैं।हम ऐसे सवाल ओर उस के जवाब भी खोजने चाहिए।

मन चंगा तो कथरोट में गंगा। मन बनाना हैं।गुजरात के सीनियर केबिनेट मंत्री और राजकीय अग्रणी एवं शिक्षा मंत्री श्री भुपेंद्रसिंहजी चुडासमा जी का ये तकिया कलाम हैं 'मन बनालो' यही आजका संदेश हैं,जरूरत हैं।एक प्रज्ञा चक्षु याह्या सपाटवाला अगर दो बार यूनिवर्सिटी में गोल्ड मेडल प्राप्त कर पाते हैं,phd के लिए दो बार नीट पास कर सकरे हैं तो हम देखने वाले क्यो बड़ा करने का न सोचें?


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आज सोचो ओर आज से अमल करो।जो होगा अच्छा होगा या हो पायेगा।यही सफ़लताकी निशानी बन सकती हैं।

Thursday, June 7, 2018

अनोखी टोपी....

नवतर विचार हमेशा सुकून देते हैं।गर्मी के मौसम में अगर कोई कहे कि आप के सर को 5 डिग्री ठंड का अहसास होगा तो कोन खुश नहीं होगा? मेरे एक मित्र हैं।श्री अरविंदभाई जो पालीताना में रहते हैं।उन्हों ने कही से ऐसी टोपी  देखी और मुजे भेजा।ठंडक के साथ खुश्बू देने वाली आए टोपी अभीतक मेने देखी नहीं हैं।इसका एक वीडियो भी भेजा था।आप सिर्फ फोटो देखके खुश होइए।

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गरमी कम करने के लिए सबसे पहली बात हैं पेड़ो की सुरक्षा करें और नए पेड़ लगाए।

Saturday, September 23, 2017

मेरी टीम...मेरा दिमाग

क्रिएशन...
क्या क्रिएशन हैं।
सिर्फ चित्र ही सबकुछ कहता हैं।किसी भी सफलता के लिए इसे समझना जरूरी हैं।सफलता व्यक्तिगत होती हैं मगर उसके पीछे कई लोग जुड़े होते हैं।किसी भी गेम इवेंट में मेडल या ट्रॉफी कैप्टन के हाथमें दी जाती हैं।मगर उसके पीछे सभी का योगदान होता हैं।हमे हमारे साथी कोंन हैं ये स्पस्ट करलेना चाहिए।

में ओर मेरी टीम...
मेरी टीम मेरा दिमाग...
7रंगी से जुड़े सभी के लिए....

Sunday, August 13, 2017

खुश कैसे रहें...

आजकल लोगो को बहोत समस्या हैं।सबसे बड़ी समस्या हैं,जीवन में खुशी का अभाव।हम ज्यादातर ऐसी खुशी के लिए इंतजार करते हैं जो लंबे अरसे के बाद आती हैं।
खुशी को समझने के लिए शक्कर के दाने को समझना होगा।शक्कर का एक दाना या कई दाने स्वाद में समान मीठे होते हैं।बस वैसा ही खुशी के लिए हैं।हम खुशी को ढूंढते हैं।हमे स्थाई खुशी चाहिए।जो सम्भव नहीं हैं।
कुछ दिन पहले एक रोचन जानकारी मिली।बात हैं भारतमें पैदा हुए एक व्यक्ति की।जो कि अभी केनेडा में रहते हैं।उनका नाम नील पसरिया हैं।नील के जीवन में कई सारे दुःखद प्रसंग आएं।एक बार वो ऐसी दुख भरी बातोंसे बोर हो गए।उन्होंने उस दिन से रोजाना छोटी खिशियों की नोंध करना शुरू किया।उन्होंने अपनी छोटी छोटी खुशियों को शेर करना शुरू किया।आज छ करोड़ से ज्यादा लोगोने इसे पढ़ा हैं।आप भी उनके ब्लॉग को 1000 ओसामा थिंग से सर्च कर सकते हैं।
ख़ुशी कहीं मिलती नही,खुशी कभी टिकती नहीं।उसकी यादो को संम्भाल के जीना पड़ता हैं।जब कुछ दिन बुराई वाले आ जाय उस वख्त उन खुशियो को याद करना चाहिए।

Friday, February 24, 2017

बोली सही...भाषा नहीं...

जहा सिर्फ बोलना हैं!वहा भाषा नहीं बोली का प्रयोग होता हैं!एक छोटा बच्चा,डॉ साल का बच्चा !सब कुछ बोलता हैं!समाज ता हैं!भविष्य,वर्तमान और भूतकाल के बारे में बोलता और समजता हैं!उस वख्त हम खुश होते हैं!मगर धीरे धीरे हम उसे इस प्रकार से भाषा सिखाते हैं की जिस की बजह से वो भाषा शिक्षा से दूर होते हैं!
देखिये...
सार्वजनिक शौचालयों के पीछे टाट के कपड़े बांध 'घर' बना कर रहते लोग, सार्वजनिक कूड़ेदानों, होटलों के बाहर और रेलगाड़ियों से जूठन और खाद्यकण बटोरते बच्चे और स्त्रियां, रिक्शा-ठेला चलाकर भरी दुपहरी या घनघोर वर्षा में भी काम करते मजदूर। ये सब भारतीय ही तो हैं। कभी रांची या बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों से पंजाब, हरियाणा, जम्मू जाने वाली रेलगाड़ियां देखी हैं आपने? गठरियों में सामान बांधे ये लोग डिब्बों में ठूंसे हुए और छत पर चढ़े हुए बेहतर जीवन की आस में घर परिवार छोड़कर जाने पर क्यों विवश होते हैं? ये अपमान, तिरस्कार, कम पगार और संवेदनहीन प्रशासन युक्त वातावरण में काम करने पर राजी हो जाते हैं। क्या इस बेबसी का कोई आकलन कर सकता है? इन राज्यों में जब से मध्यमवर्ग समृद्ध हुआ है वहां के सामान्य व छोटे कहे जाने वाले कार्यों के लिए स्थानीय मजदूर नहीं मिलते।तभी जाके हम कही बाहर से मजदरी करने लोग लेट हैं!
ऐसे परिवार जो दूर दूर मजदूरी के लिए जाते हैं उनके संतान कई साडी भाषा ओ का एक्सपोजर रखते हैं!हम ऐ प्रयत्न करते हैं की भाषा शिक्षा के लिए अगर कुछ आवश्यक है तो वो हैं एक्सपोजर!कोई भी प्रान्त या प्रदेशा से आने वाले मजदूर अपने काम के लिए नई भाषा सिखाते हैं!अगर इतनी जल्दी ही व् भाषा शिख ते तो पधैमे अच्छे होते!ऐसा मानने से पहले में ये कहूँगा की मजदूरी करने वाला व्याकरण की परीक्षा नहीं देता हैं!उसे कोई व्याकरण के बारे में नहीं पुछता हैं!जहा व्याकरण हैं वहा भाषा हैं!

Monday, September 5, 2016

में शिक्षक हुँ...


नेता नहीं, एक्टर नहीं, रिश्वत खोर नहीं,
शुक्र है शिक्षक हूँ , कुछ और नही...

न मैं स्पाइसजेट में घूमने वाला गरीब हूँ,
न मैं किसी पार्टी के करीब हूँ...
कभी राष्ट्रीयता की बहस में मैं पड़ता नहीं...
मैं जन धन का लूटेरा या टैक्स चोर नहीं,
शुक्र है शिक्षक हूँ कुछ और नहीं...

न मेरे पास मंच पर चिल्लाने का वक्त है ,
न मेरा कोई दोस्त अफज़ल , याकूब का भक्त है...
न मुझे देश में देश से आज़ादी का अरमान है,
न मुझे 2 - 4 पोथे पढ़ लेने का गुमान है..
मेरी मौत पर गन्दी राजनीति नहीं, कोई शोर नही,
शुक्र है शिक्षक हूँ, कुछ और नही ...

मेरे पास मैडल नही वापस लौटाने को,
नक़ली आँसू भी नही बेवजह बहाने को...
न झूठे वादे हैं, न वादा खिलाफी है,
कुछ देर चैन से सो लूँ इतना ही काफी है...
बेशक खामोश हूँ, मगर कमज़ोर नही,
शुक्र है शिक्षक हूँ कुछ और नही..

मैं और सड़क एक जैसे कहलाते हैं
क्योंकि हम दोनों वहीं रहते है
लेकिन सबको मंजिल तक पहुँचाते हैं,
रोज़ वही कक्षा, वही बच्चे, पर होता मैं कभी बोर नहीं,
शुक्र है शिक्षक हूँ ... कुछ और नहीं.