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Sunday, October 1, 2017

गांधीजी...


आज गांधी जयंती हैं।
विश्व विभूति गांधी जी।
सारे विश्वमें अहिंसा के विचार को फैलाया।उनकी विचारधारा को पूरी दुनियामे स्वीकार किया गया हैं।दुनियामें कोई ऐसा देश नहीं जहाँ मोहनदास गांधी की प्रतिमा या रास्ता न हो।शांति के नोबल पुरस्कार विजेता ऐसे हैं जिन्होंने गांधी जी के विचार को अपनाया।सफल हुए और शांति का नोबल पुरस्कार मिला हो।मगर शांति और अहिंसा का संदेश सिखाने वाले बापू को आजतक नोबल पुरस्कार नहीं मिला हैं।और एक बात जो आपको बतानी आवश्यक हैं कि आजतक नोबल पुरस्कार के लिए गांधीजी का नाम चार बार कमिटी के सामने आया हैं।मगर अबतक गांधीजी को ये सन्मान नहीं मिला या,नहीं दिया गया हैं।
आजकल गांधी जी को मजाक बनाया जाता हैं।आप इस पोस्टरमें देख सकते हैं।मजाक ठीक हैं।बापू भी मजाक करते थे।उनका सेंस ऑफ ह्यूमर बहोत अच्छा था।सबसे ज़्यादा पत्र लिखने का रिकॉर्ड भी बापुके नाम हैं।
आज तो बापू नहीं हैं,उनके विचार और बाते आज भी हमारे आसपास देखने,सुनने को मिलती हैं।
आज के इस पावन दिवसपर बापू को वंदन।
#राम राज।

Tuesday, September 26, 2017

कोंन लिखेगा...?



एक फोटोग्राफ मिला।
किसी दोस्त ने भेजा हैं।
श्री रविन्द्र अँधारिया ने इसके बारे में फोटो के साथ कुछ लिखा था।अब मेरी बात।में भी लिखता हूं।139 से अधिक पुस्तक लिखे हैं।बच्चो का साहित्य तो यहाँ किलो के भाव से बिकते हैं।
में तो खुश हूं कि इस तरीके से भी तो ये बेचते हैं।और हा, किताबो का इस तरीके से बिकना कोई नई बात नहीं हैं।मगर में खुश हूं कि बच्चो की किताब बेची जा रही हैं।

Saturday, September 16, 2017

समानता और न्याय

हम लोकशाही देशमें हैं।
हमारी लोकशाही विश्वमें सबसे बड़ी लोक शाही हैं।हमारे बंधारण में सभी को समान बताया गया हैं।सभी को समान अधिकार मिले हैं।आप ने देखा होगा कि समानता से सभीको एक सी सुविधा मिलती हैं।कई समस्याएं ऐसी आती हैं कि जिसमें न्याय की आवश्यकता पड़ती हैं।
धर्म,जाती,आर्थिक और लिंग के साथ भाषामें भी भिन्नताएं देखनेको मिलती हैं।
आज अनामत के नाम से बार बार बंधारण को कटघरे में रखा जाता हैं।समानता से एक सी सुविधा प्रदान होती हैं।सवाल ये हैं कि क्या समानता से विकास होगा।अनामत का उद्देश्य समानता देना हैं।मगर इस चित्र को अनामत के संदर्भ में देखे तो हमे मालूम पड़ेगा कि अब समानता की नहीं न्याय की आवश्यकता हैं।
#Bनोवेट सरकार

Sunday, August 13, 2017

ચોટલી હોય તો કપાય...



આજ કાલ ચોટલીની ચર્ચા છે.આ અગાઉ પણ ચોટલી ચર્ચામાં રહી છે.ચોટલી બાંધીને.ચોટલીએ ગાંઠ વાળીને.આ અને આવા અનેક શબ્દો કે શબ્દ પ્રયોગ આપણે સાંભળીએ છીએ.

રાજ્યસભાનો વાતનો ગરમાવો ગયો 'ને ચોટલીની ચર્ચા શરૂ થઈ છે.ઉત્તરપ્રદેશથી શરૂ થયેલ આ ચોટલી કાપવાની ઘટના આજકાલ વધી છે.

હરિયાણા,રાજસ્થાનથી આવી હવે આ ઘટના ગુજરાતમાં બની છે.કહેવાય છે કે જેની ચોટલી કપાય તેની તબિયત બગડી જાય છે.આવા બનાવો વધતા સૌ દહેશત અનુભવે છે.ટી.વી.ચેનલોને મજા છે.મહાત્મા થી મહામાનવ કહી શકાય તેવા સૌ બાઈટ આપવા તૈયાર થાય છે.ચેનલ ને સમાચાર મળી રહે છે.કોઈને જાણે ચોટલી સિવાય બીજા કશામાં રસ નથી. આ બધું ખરું.છેવટે ગૃહ મંત્રાલય દ્વારા એની તપાસ આપવામાં આવી.ક્રાઈમ બ્રાન્ચ જ્યાં ચોટલી કપાય ત્યાં પહોંચે છે.સુરતમાં સવારે જેની ચોટલી કપાઈ એણે ક્રાઈમ બ્રાન્ચને કીધું કે મેં દાંત વડે વાળ કાપી સૌને ચોટલી કપાયાની વાત કરી હતી.અત્યાર સુધીમાં આખા ગુજરાતમાંથી અનેક વિસ્તારમાંથી આવી ઘટનાઓ બને છે.

વિજ્ઞાન જાથાના શ્રી જ્યંત પંડ્યાના TRP વધ્યા છે.ભલે...આવું ન જ હોય. દરેક જગ્યાએ જ્યાં ચોટલી કપાઇ ત્યાં તપાસમાં પોલીસને માનસિક તાણ ના દર્દી કે જાતે કાપવું કે કોઈ વ્યક્તિ દ્વારા કાપવાની વાત જ બહાર આવી છે.કોઈ જગ્યાએ અગોચર શક્તિએ ચોટલી કાપાયાનું મારી જાણમાં નથી .

આવી વાતો માનસિક નબળાઈની વાત છે.જુઓ...ગણેશ જી દૂધ પીએ એજ આવી એક ઘટના.મારા ચિત્રકાર મિત્ર પ્રો.રાવ મને કહે'चोटी है तो कटेगी...!क्या आपने किसी पुरुष की चोटी कटने के सुना..?'રાવ ની વાત પણ સાચી છે.ચોટલી એની જ કપાય છે જે માનસિક નબળા હોય,બીમાર હોય કે એવું જ કશુંક હોય.

આપણ ને તો ચાણક્ય જેવી ચોટલી ગમે.વધેય ખરી ને કપાય પણ નહીં.ચોટલી એ ગૌરવની નિશાની છે.એટલે જ કદાચ સ્ત્રી વિધવા થતાં તેના વાળ ઉતારી લેવામાં આવતા હશે.મે મારાં મોટાં બા દિવાળી બા ને વાળ વગર જોયેલાં છે.આજે એ રિવાજ નથી.જરૂર નથી જ પણ આજે જેમની ચોટલી સામાજિક,માનસિક કે અન્ય કારણ થી કપાય છે ત્યારે મારે મન એ ગૌરવ કપાય છે.આધુનિક જીવન શૈલીમાં સૌને સમયસર સેવા આપનાર આપણાં પરિવારની મહિલા વિંગ સલામત ન હોવાનું આ ચોટલી કાંડ એક ઉદાહરણ છે.માનસિક રીતે પરિવારમાં હંમેશા મહિલાએ જ જતું કરવું પડે છે.હું અનેક તબક્કે એનો સાક્ષી છું.આ ચોટલી એ ગૌરવ હોવું હોઈએ .ગૌરવ અને અહમમાં થોડો ભેદ તો હોયજ.આપણે આપણી મહિલા વીંગને સાંભળીએ અને સહયોગ કરીએ.માનસિક તાણ એ ઝડપી ઘટાડવો આપના જીવન સથી સાથી ઉપર નિર્ભર હોય છે.સરકારની ભાષામાં પરિવાર એટલે માં બાપ અને પતિ પત્ની કે બાળકો.મા બાપ એટલે એમાં પાછા મહિલાના માં બાપ ખરાકે નહિ તે મારી જાણમાં નથી.

છતાં મારા કે મારા વાંચકના પરિવારમાં કોઈની ચોટલી ન કપાય તેવી શુભકામના.આ લખાય છે ત્યાં સુધી મારા કોઈ પરીચિતની ચોટલી કપાઈ હોવાનું મારી જાણમાં નથી.એવું નહીં જ બને તેનીય મને ખાતરી છે.મારા માટે હું એટલું કહીશ કે ' મારી જોડે જોડાઈ રહેવું એટલે દરેક તબક્કે પરીક્ષા.હા,દરેક પરીક્ષામાં નપાસ થવાની છૂટ.કારણ હું પ્રયત્ન ને મહત્વ આપું છું,સફળતા મારે મન મહત્વની નથી.આપ આપની ચોટલી એટલે આપનું સન્માન,આપનું કામ,આપનો પરિવાર અને આપના સૌ કામ પતાવી છેવટે જે કામ કરો તે સરકાર માટે નહીં.સહકાર માટે કરીએ.આજે આ લખાય છે તે દિવસે પ્રમુખસ્વામી મહારાજ ના દિવ્ય આત્માને આજે એક વર્ષ થયું છે.આશા રાખીએ કે આજથી કોઈની ચોટલી ન કપાય.કોઈની ચોટલી પકડાય.હા,કાપવી નહિ.

#सरकार:મારી ચોટલી...

Saturday, August 12, 2017

मनो मावजत


आज से 16 साल पहले की बात हैं।गुजरातमें भूकंप आया था।26 जनवरी 2001 के दिन की बात हैं।सुबह सुबह भूकंप के जटके आए।जटको के साथ कच्छ के सामने अनेक समस्याए थी।साथ साथ बनासकांठा,सुरेंद्रनगर ओर अन्य कई विस्तारमें अधिक समस्याएं थी।
इसके बाद जो हुआ।सारे विश्वने देखा।गुजरात को इस के बाद भौगोलिक,सामाजिक ओर राजकीय स्वरूपमें देखा जाने लगा।आज ऐसे ही कुछ हालात बनासकांठा ओर पाटन में था।वरसात ओर अतिवृष्टि के कारण जो नुकशान हुआ।कभी उसे भरपाई नही कर पायेगा।
सबसे पहले जान माल के नुकशान को सरकार और संस्थाओ ने भरपाई करने का प्रयत्न किया।कुछ संस्थाए ऐसी थी कि जिन्होंने जैसी जरूरत वैसी सुविधा भी प्राप्त करी ओर करवाई।
एक शिक्षक चाहे वो कर सकता हैं।जैसेही विराट आपदा के बारेमें प्रारंभिक जानकारी प्राप्त करने के बाद श्री जयेश पटेल(राज विद्यानगर,कांकरेज)ने sristi इनोवेशन ओर 
युवाग्रीन फाउंडेशन खरसदा के संपर्क किया।उन्होंने क्या सहाय चाहिए,उस गाँव में सहाय कैसे पहुंचाए ओर इसके लिए क्या क्या आयोजन करना हैं।युवाग्रीन फाउंडेशन के श्री के.वी.पटेल ने इस कार्यको जैसे नीव से पकड़ा।जरूरत के आधार पर चीजे बनाई गई।किट तैयार करने के बाद उसे पहुँचानेका आयोजन करवाया गया।
श्री जयेश पटेल और श्री के.वी.पटेल के साथ मेनेभी कई सारे प्रकल्पमें काम किया हैं।सृस्टि के श्री चेतन पटेल ने भी इस महा अभियानमे सहाईग किया और सुविधा प्रदान करवाई।
यहाँ आप जो फोटोग्राफ देख रहे हैं,उसमें एक बच्चे के स्कूल बैग दिखता हैं।सहाय केम्पके दौरान कही दूर से बेग पानीमें आई होगी।इन बच्चों के मानसिक स्थिति को कोंन समझेगा।इन के लिए GCERT ने मनो सामाजिक मावजत का काम शुरू किया हैं।
इन बच्चों को अब कुछ नही,सिर्फ हमारा प्यार और दुलार चाहिए।

Monday, July 31, 2017

कुछ नहीं चाहिए...

हमारा देश कृषि प्रधान देश हैं।कृषि के लिए बरसात की आवश्यकता हैं।आज भी भारत में कई सारे हिस्सो में खेती के लिए सालाना बारिश पर ही भरोसा रखना पड़ता हैं।जहाँ सिचाइ की व्यवस्था हैं,वहां भी बारिश की आवश्यकता हैं।कोई भी चीज अगर जरूरत से अधिक हो तो वो खराब हैं। बारिश का भी ऐसा ही हैं।2015 को भुला देने वाली बारिश 2017 में हमने देखी।2015 से अधिक नुकसान हुआ था।
इस बार अलग अलग विस्तारमें जाके पहले आवश्यकता क्या हैं उसे ढूंढा ओर उसको सुलजा ने का प्रयत्न किया।कई दिल दुखाने वाले किस्सो के बीच एक घटना आपसे शेर करूँगा।में नवाचार के कर्यो से जुड़ा हूँ।अध्यापक या विद्यार्थियो के इनोवेशन से जुड़े काम करते ये तय हुआ की,नई जानकारी बच्चो से ही मिलती हैं।
हम सब एक ग्रुप में थे।ग्रुप में हम चार सदस्य थे।हम पहेली बार दांतीवाड़ा गए।वहां जाके मालूम पड़ा कि 'वावधरा' में मदद की आवश्यकता है।हो सके तो वहाँ मदद पहुंचाने का आयोजन किया।हम साथमें वहाँ गए।रास्ते टूटे हुए मगर तैयार थे।उस के उपर गाड़ी चल सकती थी।टूटे हुए रास्तो को दुरुस्त किया गया था।आसपास के लोग आने जाने वाली गाडियो को जैसे  महसूस कर रहे थे।रास्ते में दो तीन छोटे गाँव पड़ते थे।वहाँ भी कम से लेके अधिक मात्रामें नुकशान हुआ था।ऐसे कुदरती आपत्ति के समय कुछ नुकशान ऐसे होते हैं जिसे कभी भरपाई नहीं किया जाता।
रास्ते तो दुरुस्त होंगे।जिनके जीवन की राह टूटी हैं वो कहा जाएंगे।फिरभी...खेर... हम वावधरा पहुंचे।तीनो तरफ राजस्थान और डूंगर के कारण पानी आया, ओर निकलभी गया।मगर उस बहाव में जो भी  गया,उसका कोई हिसाब नहीं।किसी बुढ़िया का सहारा एक भैंस थी।अब भैंस भी नहीं रही,बुढ़िया भी नहीं रहेगी।मगर जिंदगी से लड़ने का जो जज्बा यहाँ दिखा।वाह...गाड़ी को छोड़ के कुछ चलना था।हम चल रहे थे।सामने से एक बच्चा आया।हमे देखके बोलने लगा।અહીં કોઈ નુકશાન નથી.પાણી આવ્યું,પાણી ગયું.(यहाँ कोई नुकशान नहीं हैं।पानी आया और गया)हमारे साथी ने पूछा तुम्हे क्या चाहिए?उस बच्चे ने कहा,पानी पिलाओ साहब।बाकी सब कुछ हैं।
ભાવેશ પંડ્યાભાવેશપંડ્યાટીચર...ઇનોવેશન...iim... લેખન...વર્ડ રેકોર્ડ...કઈંક રેકોર્ડ...લેખક...જોડાક્ષર...drkalamdrbhaveshdranilkgupta...In...Bhavesh teacher...Innovation.... शुभमस्तु...डॉ भावेश पंड्या।इनोवेशन।नवाचार।blogspot
यहाँ के अध्यापक के संपर्क से भारत विकास परिषद,पालनपुर तक ऐ जानकारी पहुंची।गाँव मे आवश्यकता किसे हैं।गाव की या व्यक्ति विशेष की आवश्यकता क्या हैं।उस आधार पर 30 से अधिक किट का वितरण किया गया।#भारत विकास परिषद के सभी सहयोगीयो को धन्यवाद देता हूँ।उन्होंने नीड़ परखी ओर सहाय की।
सवाल ये भी हैं कि सब पहुंचा तो पानी क्यो नहीं पहुंचा।सवाल सही हैं।मगर उस इलाके में आज कल जिसके पास स्वच्छ पानी हैं वो सबसे सुखी हैं।बाकी सब एक सा अन्न खाते हैं।पानी भी पहुंचता हैं।हा, वो पानी सरकार या NGO देते हैं तो उसमें लिमिट तय होती हैं।बच्चे क्या लिमिट में रहेंगे।
ભાવેશ પંડ્યાભાવેશપંડ્યાટીચર...ઇનોવેશન...iim... લેખન...વર્ડ રેકોર્ડ...કઈંક રેકોર્ડ...લેખક...જોડાક્ષર...drkalamdrbhaveshdranilkgupta...In...Bhavesh teacher...Innovation.... शुभमस्तु...डॉ भावेश पंड्या।इनोवेशन।नवाचार।blogspot

जब उसके पास पानी था।उसने कभी ऐसा सोचाभी न था।आज आगे पीछे पानी ही पानी हैं।मगर वो इसे पी नहीं सकता।हमारा जीवन उस बच्चे की तरह हैं।जो हमारे आसपास हैं।वो हमारे पास नहीं हैं।जैसे हमने उसे पीने लायक पानी दिया।वैसी ही कोई,किसी वख्त जीने लायक जिंदगी देगा।
शुभमस्तु:31 जुलाई...

Wednesday, March 15, 2017

बच्चों के बारे में मान्यतायें और....

शिक्षक का बच्चों के प्रति स्नेह एंव शिक्षण कार्य के प्रति समर्पण प्रत्यक्ष रूप से बच्चों एवं जन समुदाय पर सकारात्मक प्रभाव डालता है इसके विपरीत, तम्बाकू खाने, शिक्षण के समय अखबार पढ़ने, बुनाई करने आदि कार्यों का अप्रत्यक्ष बुरा प्रभाव पड़ता है।




शिक्षक की अपने बच्चों के बारे में क्या मान्यतायें और विश्वास है, यह सिखाने के तरीकों तथा अपने छात्रों से अपेक्षाओं को बहुत ज्यादा प्रभावित करते हैं। बच्चों में जिज्ञासा पैदा कर हम उनका सीखना आसान कर सकते हैं। उनके अनुभव के आधार पर, रुचियों का ध्यान रखते हुए नवीन जानकारियों एवं अनुभवों को सहज रूप में जोड़ सकते हैं। उन्हें अभिव्यक्ति का पर्याप्त अवसर देकर उनकी कल्पनाशीलता एवं सृजनशीलता को सकारात्मक दिशा दे सकते हैं। तब हम पायेंगे कि हमारा काम आसान होता जा रहा है।

शिक्षक के लिये यह संभव है कि वह पता कर सके कि बच्चे ने गलती क्यों की। शिक्षक को बच्चे एवं समस्या को अलग-अलग करके समझना चाहिये जिससे कि समस्या को चोट पहुंचे, बच्चे को नहीं। अक्सर हमारा संबंध अपने बच्चों के साथ सुगमकर्ता और दोस्त का नहीं होता है। इसीलिये हम बच्चों के साथ गतिविधियां करने में हिचकते हैं । हमारे समाज का परिवेश भी हमारी इस हिचक को तोड़ने में सहायक नहीं होता है। 

गतिविधियों के बारे में उपयुक्त समझ न होने के कारण अक्सर हम पाठों को पूरा कराने में लग जाते हैं और गतिविधियों को निरर्थक एवं समय की बरबादी मानते हैं । जबकि सच्चाई यह है कि गतिविधियों से विभिन्न दक्षताओं का विकास होता है। यह जरूरी है कि करायी गयी गतिविधि उपयुक्त व संतुलित हो।

Wednesday, February 8, 2017

शिक्षा के लिए...

संदर्भ में देखें तो विगत 5-10  वर्षों में वैश्विक बाजार की ताकतों के हौसले सब हदों को तोड़ रहे हैं। इसलिए शिक्षा के अधिकार और समान स्कूल प्रणाली पर हो रहे हमलों को पहचानना और तदनुरूप उनका उपचार जरूरी हो गया है।  शिक्षा के अधिकार का आज का स्वरूप आने के पहले और बाद में  जो बहस चली है उसमें समान स्कूल प्रणाली और पड़ोसी स्कूल की अवधारणा को हाशिए पर धकेलने के लिए एक नया शगूफा छोड़ा गया या ये कहें कि टोटका आजमाया गया है। वह है "निजी स्कूलों में पड़ोस के कमजोर तबके के लिए 25 प्रतिशत आरक्षण का।" अक्सर समाचार की सुर्खियां इसी से प्रेरित हो लिख देती हैं कि - "अब पढ़ेंगे कृष्ण और सुदामा साथ - साथ"। लेकिन क्या वास्तव में यह इस हद तक संभव और आसान है?  इसी की पड़ताल करता यह आलेख। 

अब यह  मुद्दा गौण हो गया कि यदि इस प्रावधान के अनुसार 25 प्रतिशत गरीब बच्चे पड़ोस से आएंगे तो जाहिर है कि 75 प्रतिशत फीस देने वाले संपन्न बच्चे पड़ोस से नहीं आएंगे, तो फिर यह बराबरी हुई अथवा खैरात?  इससे भी बड़ा सवाल तो यह है कि इस प्रावधान से कितने गरीब बच्चों को लाभ मिलने की उम्मीद हैं? जाहिर है कि विधेयक में 25 प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान का न तो शिक्षा के अधिकार से कोई संबंध है, न समान स्कूल प्रणाली से और न ही 86वें संशोधन के अनुरूप शिक्षा प्रणाली के पुनःनिर्माण से। तब भी विचार यह है कि मौलिक अधिकार का सारा दारोमदार इसी 25 प्रतिशत आरक्षण में है, शायद इसीलिए क्योंकि इसके चलते शिक्षा के निजीकरण व बाजारीकरण की रफ्तार और तेज हो जाएगी।

जून 2006 में योजना आयोग ने 11वीं पंचवर्षीय योजना का जो दृष्टिपत्रा जारी किया। इसमें अचानक बगैर किसी शिक्षा विमर्श के स्कूल वाउचर प्रणाली  का प्रस्ताव रखा गया। वाउचर प्रणाली क्या है? इसके अनुसार, कमजोर तबके के बच्चों को  बाउचर दे दिये जाएंगे जिसको लेकर ये बच्चे जिस भी निजी स्कूल में प्रवेश पा लें, उसकी फीस प्रतिपूर्ति सरकार अदा कर देगी। मुझे तो ये सभी गतिविधियां भी निजीकरण की नीति को ही प्रोत्साहित करने के ही टोटके समझ आते हैं। वाउचर प्रणाली निजी स्कूलों को पिछले दरवाजे से सरकारी धन उपलब्ध कराने और वैश्विक बाजार को संतुष्ट करने का नायाब तरीका से ज्यादा कुछ नहीं लगती है।

11वीं पंचवर्षीय योजना में स्कूली शिक्षा के क्षेत्रा में पब्लिक-प्राईवेट पार्टनरशिप यानी PPP की जमकर वकालत की गई है। मॉडल स्कूल, नवोदय या सेंट्रल स्कूल या प्रदेश स्तर पर अभिनव विद्यालयों की स्थापनाएं।  यह सब केवल मुट्ठी भर बच्चों के लिए किया जाएगा लेकिन लगभग 13 लाख स्कूलों में करोड़ों बच्चों को उम्दा शिक्षा देने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जाएंगे।  शिक्षा के अधिकार विधेयक में भी इस निजीकरण को रोकने का कोई प्रावधान नहीं है, वरन ऐसा करने की एक प्रकार से इजाजत ही है।  वैश्वीकरण के तहत सरकारी स्कूल प्रणाली को ध्वस्त करने की नीति लागू की गयी। इसमें जब काफी सलता मिल गयी तो विश्व बैंक और बाजार की अन्य ताकतें विभिन्न गैर सरकारी एजेंसियों (NGO) के जरिए तथाकथित शोध अध्ययन आयोजित करके ऐसे आंकड़े पैदा करवा रही हैं कि किसी तरह सिद्ध हो जाये (यानि भ्रम फैल जाए) कि सरकारी स्कूल एकदम बेकार हो चुके हैं और इनको बंद करना ही देश के हित में होगा।

Wednesday, November 18, 2015

अरे ! ओह नो !!!

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एक साथी!
परसोत्तमभाई!
अब वो हमारे साथ नहीं हैं!
गुजरात में  दहोद,एक अनोखा डिस्ट्रिक!देवगढ़ बारिया तहसील!
छोटा गाँव आंकली!परषोत्तम यहाँ पढ़े!प्राथमिक शिक्षा उन्होंने यहाँ प्राप्त की !
शिक्षा प्राप्त करने हेतु उन्होंने प्रयत्न किया!अपनी जिज्ञासा एवं जानकारी के लिए वो सदैव तत्पर रहे!उन्हें इसी बजहसे डॉ.अनिल गुप्ता जी के साथ जुड़नेका मौका मिला!उन्होंने sristi.sristi.orgके साथ काम शुरूं किया!अपनी कार्य के प्रति लगन,विश्वास और नया देखनेकी सोचने उन्हें sristi.org का अभिन्न अंग बना दिया!पिछले दिनों उन्हें कुछ बीमारी लगी!प्रारंभिक जांच के दौरान उन्हें अन्न नलिका कैंसर होनेकी बात सामने आई!अपने काम से "विश्वमित्र"परषोत्तमभाई के साथी शोकमग्न हुए!अपने साथी दुःखी न हो,इस चिन्तामे वो जैसे जी रहेथे!अस्पतालमेंभी वो दुःखी न होते न होने देते!सदैव खुश रहनेवाल एक साथी हमें 29-अक्टूबर-15 को हमें छोडके चले गए!'सृस्टी परिवार' के परसोत्तम पटेल हमारी सृस्टि को छोड़ गए!वो भलेही हमारे साथ अभी नहीं हैं!
फिल्ड ऑफिसर के रूपमे उनके द्वारा किये गए कार्योके द्वारा वो सदैव हमारे साथ हैं! उनके परिवारमे उनकी  धर्मपत्नी,दो बेटियाँ और एक बेटा हैं! एक बड़े और छोटे भाई परिवारमें मौजूद हैं!आपभी देख सकते हैं!अपने आखरी दौरे के दरमियाँ एम्ब्युलन्स में भी वो अखबार पढ़ते हैं!किसीने क्या खूब लिखा हैं,"तू जिन्दा हैं तो जिंदगी की जीत पर यकीन कर,अगर कहीं है स्वर्ग तो उतरला जमीन पर!"शायद ऐसे ही लोगो के लिएही ऐसा लिखा गया हो!

स्व.श्री परषोत्तम पटेल को Sristi.family ने अपने भाव व्यक्त किये हैं!

sristi.org की भावांजलि!

ॐ शांति...शांति...शांति...