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Sunday, September 9, 2018

जिन्दजी के मोड़

जिन्दजी जिन्दजी है।
आशा और निराशा के साथ चलती हैं। कभी हमे लगता हैं, जो हम चाहेंगे वो होगा। ऐसा न होनेपर हम मायूस रहने लगते हैं।हमारी गलती ये हैं कि हम पहले सोच लेते हैं,बाद में ऐसा न होने पर या कुछ कम होता हैं,तब जाके हम मायूस होते हैं। अब ऐसा होता हैं तब हमें लगता हैं कि हमारी जिन्दगी जैसे अच्छे से बुरे मोडमें अचानक आ गई शायद इसी तरह, जिन्दगी  फिरसे अचानक मोड़ ले लेती हैं। इस के लिए हमे हमारी आशा जीवन्त रखनी चाहिए। कुछ ऐसा होता हैं। जिसनके लिए हम अधिक चिंतित होते हैं। जब उसको फिक्र बढ़ जाती हैं, ओर एक आसान से  तरीके से हमे कुछ ऐसा मिलता हैं तो हमारेके लिए अच्छा नहीं बहोत अच्छा हो जाता हैं।

आज कुछ ऐसी घटनाएं बनी जो मुजे फिरसे मजबूत कर गई।
मुजे जिस डॉक्यूमेंट की ज्यादा फिक्र थी वो जैसे आसान हो गए। जो सवाल की वो कहा हैं,उसका भी सटीक जवाब ओर कुछ आसार आते हैं तो फिर से जीवन में शांति का अनुभव होता हैं।


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जिन्दजी जिंदा रहने वालों की हैं।
मरने के बाद तो सारी दुनिया कुछ दिनों में भूल जाती हैं।
इस लिए जिंदा रहना हैं, उससे महत्व पूर्ण हैं की अच्छे से ओर शांति से जीवन पसार हो। व्यतीत होना और व्यवस्थित होना,इस दोनो में फर्क हैं। कुछ दिनों में उसके ऊपर हम लिखेंगे।


Monday, September 3, 2018

मोत की राह: उम्र 181

क्या ऐसा हो सकता हैं। आज से कुछ सालों पहले मेने लिखा था। एक व्यक्तिने 124 साल की उम्र का दावा करते हुए गिनिस बुक में दावा किया था। साथ में 104 की उम्र के साथी ने मेरेथोन में हिस्सा लेकर दौड़ पूरी की थी।
आज मेरे पास ऐसी न्यूज़ आई।हैदराबाद से ये खबर मिली। 181 साल की उम्र का दावा हैं। पेपर में लिखा हैं 'शायद मोत मेरा रास्ता भूल गई हैं.'वाराणसी में ये रहते हैं।उनका नाम महस्टा मुरासी हैं।1835 में बेंगलूर में पैदा हुए थे।वो 1903 में वाराणसी रहने को आये थे।अपनी 122 की उम्र तक उन्होंने काम किया। आज वो मोत का इंतजार कर रहे हैं।

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उनको मोत का इंतजार हैं।
अगर मेरा इंतजार खत्म नहीं हुआ तो मोत आएगी।

Sunday, September 2, 2018

धर्म और शीतला सातम

आज शीतला सातम हैं।
एक त्योहार के तौर पर हम उसे मनाते हैं। ठंडा खाना और घर में चुला न जलाने जैसे नियम हम सुनते हैं।ऐसे नियमो पर कार्य करते हैं।आज धर्म और विज्ञान को साथ देखने का भी दिन हैं। शीतला की रसी के शोधक एडवर्ड जेनर ने उसको खोजा। हमारे उलटे हाथ पर उस रसी यानी वेस्किन दी जाती थी। 1798 से 98 के बीच उस रोग को काबू करने के लिए उन्होंने इस को खोजा। आज पूरी दुनिया शीतला के रोग से मुक्त हैं।

धर्म उसकी जगह सही होगा। शायद घर में एक दिन 'भोजनोत्सव' का कुछ प्लानिग होगा। जो भी हो आज उन्हें याद किये बगैर हम ठंडा खाना भी नहीं खा सकते हैं। ऐसी कुछ खोज जिससे पहले लोग कुदरत या भगवान का प्रकोप मानते थे। आज भारत पोलियो मुक्त हैं। सारी क्रेडिट अमिताभ बच्चन ले गए। रविवार को घर घर और गाँव गाँव जाकर पोलियो की दो बूंद पिलाने वालो को कोई याद नहीं करता हैं।आज ठंडा खाना और ठंडा रहना आवश्यक हैं। 

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विज्ञान और धर्म...
जहाँ से धर्म खत्म होता हैं,विज्ञान शुरू होता हैं। जहाँ से विज्ञान का अंत होता हैं,शायद वही से धर्म पे आस्था बढ़ती हैं।

Sunday, August 5, 2018

તું છે...એટલે...



આજે મિત્રોનો દિવસ.
આજે કખાસ દિવસ જે મિત્રો છે.
મારેય ખૂબ મિત્રો છે.મારી ઈઓડે બે જ વિકલ્પ છે
એક કે મિત્ર છે.બીજો જે મિત્ર નથી.મિત્ર નથી એનો સીધો અર્થ એ કે તે મારા જીવનમાં નજીક કે ખાસ નથી.આવા જ અર્થની એક કવિતા આજના દિવસ માટે.મારા મિત્રો માટે.


તું છે એટલે...

તું મિત્ર છે એટલે જ તો તું ખાસ છે ,
આ હ્રદયની એટલે જ તો તું પાસ છે ,
એક એક પળે  સુદામા થઇને બેઠો છું ,
મારા માટે તો તું રાધા સાથે નો રાસ છે !

વાવી છે લાગણીઓને ખૂબ ખંતથી મેં ,
હર  જન્મે લણીશ બસ એવી આશ છે;
હા હું તારી જેટલો અમીર નથી કોઇ રીતે ,
 હ્રદયના હર ધબકારે તારો  નિવાસ છે !

એક એક પાંદડીઓને ગૂંથી છે ગજરામાં ,
લાખો જન્મારાની એ આજે સુવાસ  છે
કસોટીની એરણ પર ન ચડાવીશ મને હો ,
તું નથી તો પછી આ જીવન જ લાશ છે !

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મિત્રો માટે મારી વાત.
નથી જોઈ કોઇ જાત કે પાત.
બસ,ખબર પડે એટલે આજે કે,
મિત્રો મારી છે મારી ખાસ સૌગાત.

Tuesday, July 24, 2018

साम पित्रोडा


गुजरात के गौरव।
सुरेन्दनगर के रत्न जिन्होंने दुनिया में भारत को पहचान दिलाई हैं।हम आज जो संदेशा व्यवहार और बैंकिग में सुविधा भुगत रहे हैं,उसके पीछे साम पित्रोडा का हो हाथ हैं।उनका मानना हैं कि हम धर्म के माध्यम से देश को चलाना चाहते हैं।उनका मानना हैं कि हमारे युवान आज अपने विकास को भूलकर किसी ओर माध्यम से विकास को देख रहे हैं,ढूंढ रहे हैं।युवाओ की सोच को पोलिटिकल सोच और नजरिया दिया गया हैं।
उन्होंने गुजरात के एक कॉलेज में युवा एसेम्बली में बोलते हुए कहा कि हमारे देश को कोई मंदिर या राम मंदिर की जरूरत नाउं हैं,हमारे देश को रोजगार और स्किल केश हो पाए ऐसी आवश्यकता हैं।और उसे दूर से ही दूसरे चश्मे पहनाए जाते हैं।साम या सेम पित्रोडा कोंग्रेस के करीबी हैं।राजीव गांधी के वो विज्ञान सलाहकार रहे हैं।विश्व के कई सारे देशों के साथ टेक्निकली स्पोर्ट का वो काम कर रहे हैं।

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साम पित्रोडा गुजराती बोलते हैं।मगर उनकी गुजराती सुनने में खुशी होती हैं।में उन्हें 2 बार मिला हूं।मेने उन्हें बोलते हुए भी सुना हैं।वो गुजराती हैं,में गुजराती हु इसका मुजे गौरव हैं।

Sunday, July 15, 2018

सुंदरता और संस्कार



सुन्दर महिला ने विमान में प्रवेश किया और अपनी सीट की तलाश में नजरें घुमाईं। उसने देखा कि उसकी सीट ऐसे व्यक्ति के बगल में है, जिसके दोनों ही हाथ नहीं है। महिला को उस अपाहिज व्यक्ति के पास बैठने में झिझक हुई। 
उस महिला ने एयरहोस्टेस से बोला "मै इस सीट पर सुविधापूर्वक यात्रा नहीं कर पाऊँगी। क्योंकि साथ की सीट पर जो व्यक्ति बैठा हुआ है उसके दोनों हाथ नहीं हैं।" उस महिला ने एयरहोस्टेस से सीट बदलने हेतु आग्रह किया। 
असहज हुई एयरहोस्टेस ने पूछा, "मैम क्या मुझे कारण बता सकती है..?"
'सुंदर' महिला ने जवाब दिया "मैं ऐसे लोगों को पसंद नहीं करती। मैं ऐसे व्यक्ति के पास बैठकर यात्रा नहीं कर पाउंगी।"
दिखने में पढी लिखी और विनम्र प्रतीत होने वाली महिला की यह बात सुनकर एयरहोस्टेस अचंभित हो गई। महिला ने एक बार फिर एयरहोस्टेस से जोर देकर कहा कि "मैं उस सीट पर नहीं बैठ सकती। अतः मुझे कोई दूसरी सीट दे दी जाए।"
एयरहोस्टेस ने खाली सीट की तलाश में चारों ओर नजर घुमाई, पर कोई भी सीट खाली नहीं थी। 
एयरहोस्टेस ने महिला से कहा कि "मैडम इस इकोनोमी क्लास में कोई सीट खाली नहीं है, किन्तु यात्रियों की सुविधा का ध्यान रखना हमारा दायित्व है। अतः मैं विमान के कप्तान से बात करती हूँ। कृपया थोडा धैर्य रखें।" ऐसा कहकर होस्टेस कप्तान से बात करने चली गई। 
कुछ समय बाद लोटने के बाद उसने महिला को बताया, "मैडम! आपको जो असुविधा हुई, उसके लिए बहुत खेद है | इस पूरे विमान में, केवल एक सीट खाली है और वह प्रथम श्रेणी में है। मैंने हमारी टीम से बात की और हमने एक असाधारण निर्णय लिया। एक यात्री को इकोनॉमी क्लास से प्रथम श्रेणी में भेजने का कार्य हमारी कंपनी के इतिहास में पहली बार हो रहा है।"
'सुंदर' महिला अत्यंत प्रसन्न हो गई, किन्तु इसके पहले कि वह अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करती और एक शब्द भी बोल पाती... एयरहोस्टेस उस अपाहिज और दोनों हाथ विहीन व्यक्ति की ओर बढ़ गई और विनम्रता पूर्वक उनसे पूछा "सर, क्या आप प्रथम श्रेणी में जा सकेंगे..? क्योंकि हम नहीं चाहते कि आप एक अशिष्ट यात्री के साथ यात्रा कर के परेशान हों।
यह बात सुनकर सभी यात्रियों ने ताली बजाकर इस निर्णय का स्वागत किया। वह अति सुन्दर दिखने वाली महिला अब शर्म से नजरें ही नहीं उठा पा रही थी।
तब उस अपाहिज व्यक्ति ने खड़े होकर कहा, "मैं एक भूतपूर्व सैनिक हूँ। और मैंने एक ऑपरेशन के दौरान कश्मीर सीमा पर हुए बम विस्फोट में अपने दोनों हाथ खोये थे। 
'सुंदर' महिला पूरी तरह से शर्मिंदा होकर सर झुकाए सीट पर बैठ गई।

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व्यक्ति ला अपाहिज होना कुदरत के हाथमें हैं।मगर उसे नजर अंदाज करना हमारे हाथोंमें होता हैं।

Monday, July 9, 2018

शिक्षा में विचार


आप पोस्टर देखेंगे।

आईं स्टाइन ने कहा हैं।
आप उस भाव को तो समझ गए होंगे।मुजे कुछ कहना नहीं हैं।विचार के सर्जन के किए शिक्षा आवश्यक हैं।मगर इसे कहने में मजा हैं,सुन ने में मजा हैं मगर इसे इम्प्लीमेंट करते समय हम सिर्फ फेक्ट ओर फिगर के प्रति ही ध्यान देते हैं।सवाल उठने चाहिए।ऐसी थिंकिंग प्रोसेस आवश्यक हैं।इसको कक्षा एक से पाठ्यक्रम में लिया गया हैं।सभी कक्षा के सभी विषय में जहाँ जो भी स्किल का चांस मील उसे बच्चो के सामने रखने का अवकाश देती हैं।पाठ्यक्रम NCERT का हो या स्थानीय काउंसिल का मगर इन चीजों के बारे में कुछ सोचके रखा होता हैं।मगर न जाने क्यों सिर्फ फेक्ट ओर फिगर चलते हैं।

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शिक्षा याने बच्चो की दुनिया।
जजिस में सिर्फ बच्चो का अधिकार होता हैं।हम सिर्फ उन्हें सुविधा प्रदान करनी होती हैं।

Wednesday, July 4, 2018

नया विचार:नई कहानियां...

मेरी कहानियां।
मेरे नाम से कहानियां कहने का रिकॉर्ड। जहाँ भी जाना हुआ।कहानी कहानी पडती।संगीत के शोख ने मुजे ओर सहयोग दिया।star मेकर ऐप के सहयसे कहानियां कहने का नया तरीका सोचा।जो लोग उसे सुनते हैं,कोई न कोई सुजाव देते हैं।वैसे सुजावो को में रोज़ सुधारने को तैयार हूं।आप भी अपने सुजाव भेजे।
कहानियों को ओर बहेतर ओर बच्चों की पसंदीदा बनाने के लिए उसे स्टूडियो में बुक करवाने का आयोजन हैं।जो होगा,आप को अवगत किया जाएगा।
2236 संयुक्ताक्षर के बगैर जी कहानिया लिखने के लिए मेने 10000 से अधिक कहानियां पढ़ी होगी।आज मुजे कहानी कहने का शोख हुआ हैं।ये शोख बड़ी चीज हैं।आप का सहकार मिला तो ये कहानियां में कुछ न कुछ खास होगा।

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इस कहानियों को 'जीवंत वार्ता' के नाम से शुरू करने जा रहे हैं।आप का सहकार चाहिए उसे फैलाने में ओर सुधारने में।आशा हैं कि ये काम आप बखूबी निभाएंगे।

Friday, May 18, 2018

વિજ્ઞાન અને ધર્મ


આપણી આસપાસ અનેક બાબતો એવી છે,જે અંગે આપણે બધી જ બાબત જાણતા નથી.કેટલીક ધર્મ સાથે તો કેટલીક વિજ્ઞાન સાથે જોડાયેલ છે.કેટલીક બાબતો એવી છે કે આપણે તેને પરિવાર સાથે કે પરિવારના સિદ્ધાંત સાથે જોડી દઈએ છીએ. આવી કેટલીક બાબતો માટે આજનો આ લેખ જરૂર વાંચો.શક્ય છે કે આ પછી આપના અનેક વિચારો બદલાઈ જશે.

સાંજે કચરો ન કઢાય :

પહેલાના સમયમાં ઈલેક્ટ્રિસિટિ ન હતી. આજે સરકાર ગામડે વીજળી પહોંચાડી ને વિકાસ કર્યાનું કહે છે. તે સમયે સૂર્યાસ્ત બાદ દીવો કે ફાનસના અપૂરતા પ્રકાશમાં કામ ચલાવવાનું રહેતું.આ સમયે બનતું એવું કે દિવસ દરમિયાન કામમાં અજાણતા કોઈ ચીજ-વસ્તુ હાથમાંથી પડી ગઈ હોય ને સંધ્યા ટાણે કચરો કાઢવામાં આવે ત્યારે મંદ અંધકારની સ્થિતિમાં એ વસ્તુ કચરા સાથે ઘરની બહાર જતી રહે. આજ કારણથી એ સમયના વડીલો કહેતા કે સંધ્યાકાળે કચરો કાઢવાથી લક્ષ્મી ઘરમાંથી ચાલી જાય છે. આજે એ બાબત આપણે સ્વીકારેલી છે. લગભગ દરેક ઘરે આ વાત કહેવાય છે. આજે તો ઘર-ઘરમાં રાત્રે પૂરતો પ્રકાશ મળી રહે તેવી વ્યવસ્થા છે આ કારણે કોઈ વસ્તુ કચરા સાથે ઘર બહાર નિકળી જાય અને ધ્યાનમાં ન આવે એવું થતું નથી. છતાં દિવસ જેવો ઉજાસ તો આજેય ઉપલબ્ધ નથી જ. માટે રાત્રે કચરો વાળી શકાય પરંતુ ચોકસાઈ તો રાખવી જ પડે.

શનિવારે તેલ ન નખાય:

અંગ્રેજોના શાસનકાળ દરમિયાન જ  રવિવાર રજાનો દિવસ જાહેર થયો. કામ કાજ અને અન્ય રીતે જોવા જઈએ તો ત્યારે અને આજેય રવિવારે જ સમય મળતો. હવે માથામાં બહુ ચિકાશ ન હોય તો સરળતાથી માથાના વાળમાં રહેલો મેલ કાઢી શકાય. એ સમયે ચિકાશ કાઢવા માટે અદ્યતન સાબુ-શેમ્પૂ ઉપલબ્ધ ન હોઈ લોકો સમજીને શનિવારે માથુ કોરું રાખતા. જે આ વાત ન માને તેને  ધર્મનો ડર બતાવી કાબુમાં લેવાનું સરળ બનતું. આ માટે એવું કહેવાય છે  કે શનિવાર હનુમાનજીનો વાર હોવાથી માત્ર હનુમાનજીને તેલ ચઢે, આપણે માથામાંતેલ નાંખવાનું નહિ. આવું જ નખ કાપવા માટે, બુટ ખરીદવા માટે, દાઢી બનાવવા કે વાળ કપાવવા માટે રવિવારની રજા બહુ કામમાં આવતી. શનિવારે આ બધું ન થાય એની પાછળ કોઈ વિજ્ઞાન નથી. રવિવારની રજાના દિવસે મોટા ભાગના લોકો વાળ કપાવવાનું તેમજ દાઢી સાફ કરાવવાનું રાખતા હોવાથી એ દિવસે વાળંદ રજા તો ન જ રાખી શકે ઉલ્ટાનું એને રવિવારે ઓવરટાઈમ કરવો પડે. આથી આગલા દિવસે શનિવારે એ રજા ભોગવી લે તો રવિવારે પુરી સ્ફૂર્તિથી કામ કરી શકે. એક વ્યવસ્થા અને અન્ય સુવિધા ને માટે વાળંદ કે તેમના યુનિયન દ્વારા શનિવારે રજા નક્કી થઈ હોઈ શકે.

મુહૂર્ત જોવડાવવામાં આવે છે :

કૃષ્ણ મુહૂર્ત જોઈને દુર્યોધન સાથે વિષ્ટી (સંધિ) કરવા હસ્તિનાપુર ગયા હતા. છતાં એમણે કહ્યું હતું કે ‘હું જાઉં છું માટે જ વિષ્ટિ સફળ નહિ થાય. અલબત્ત મારા સઘન પ્રયાસો હશે જ વિષ્ટિને સફળ બનાવવા માટેના !’ ગૃહપ્રવેશ, રાજ્યાભિષેક ,લગ્ન વગેરે મુહૂર્ત જોવડાવીને થાય છે. એની પાછળનું રહસ્ય પ્રકૃતિનો સાથ લેવાનો આશય છે. આપણે ત્યાં વર્ષાઋતુમાં એક પણ લગ્નનું મુહૂર્ત હોતું નથી. કારણ શું ? વરસાદમાં બધાને અગવડ પડે છે. અરે, તીર્થયાત્રીઓ ચાર માસ સુધી પોતાની તીર્થયાત્રા અટકાવી દે છે. વસંતપંચમી તેમજ અખાત્રીજનું વણજોયું મુહૂર્ત ગણાય છે કારણ કે એ સમયે પ્રકૃતિ સદાય સોળ કળાએ ખીલેલી હોય છે.

કોઈ પણ વ્યક્તિ ધન અને કીર્તિ કમાય એટલે એ માનસિક રીતે એટલો બધો નબળો થઈ જાય છે કે શુકન-અપશુકનના રવાડે ચઢી જ જાય છે. રાજકારણીઓ, રમતવીરો, ફિલ્મસર્જકો ,  હીરો-હીરોઈનો બધાને આ વાત એક સરખી લાગુ પડે છે. અમુક જગ્યાની મુલાકાત લેનાર મુખ્યમંત્રી પોતાનું પદ ગુમાવે છે, ફિલ્મના નામના સ્પેલિંગમાં અમુક અક્ષર બેવડાવવાથી ફિલ્મ સફળ થશે, ચોક્કો કે છક્કો વાગે એટલે તાવીજ ચુમવું, સદી વાગે એટલે જમીન ચુમવી, પોતાનું બેટ ન બદલવું, નંગની વીંટીઓ, ગળામાં પેંડંટ વગેરે મનોરોગની નિશાનીઓ છે. એમાંથી કોણ બચ્યું છે ? જ્યોતિર્વૈદ્યૌ નિરંતરૌ. એટલે કે જ્યોતિષી અને વૈદ્ય સદાય કમાવાના જ ! એમના ધંધામાં ક્યારેય મંદિ આવવાની જ નહિ ! કારણ કે હંમેશા શારીરિક અને માનસિક રીતે નબળા માણસો સમાજમાં હોવાના જ !

આત્મવિશ્વાસથી ભરપૂર માણસ શુકન-અપશુકન પર આધારિત રહેતો નથી. પોતાના બાહુબળના આધારે એ અશક્યને શક્ય કરી શકે છે.

આત્મવિશ્વાસની સાથે-સાથે ઈશ્વર ઉપરનો વિશ્વાસ આવશ્યક છે. માનવ પ્રયત્ન અને ઈશકૃપાથી બધું જ સંભવ છે.આપ પણ વિજ્ઞાન સાથે ધર્મ અને ધર્મ જોડે વિજ્ઞાન ને અપનાવો.શાંતિ થી અને આત્મ વિશ્વાસ થકી જીવી શકશો.

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જીવનમાં જ્યાં વિકાસ છે ત્યાં વિજ્ઞાન છે.વિજ્ઞાન સાબિતી માંગે છે જ્યારે જીવન ટકાવવા માટે સહકાર અને સ્વાસ્થય જરૂરી છે.

Saturday, April 14, 2018

भारत रत्न...

अम्बेडकर।भारत रत्न भी कम हैं।आज उनके साथ गायकवाड़ को भी याद करना उतनाही जरूरी हैं।इस काम में कहीं न कहीं गायकवाड़ को याद करना जरूरी हैं।आज अम्बेडकर जी के जन्म जयंतिनदिवस पर उनसे जुड़ी कुछ जानकारी देखते हैं।
उनका मूल नाम भीमराव था। उनके पिताश्री रामजी वल्द मालोजी सकपाल महू में ही मेजर सूबेदार के पद पर एक सैनिक अधिकारी थे। अपनी सेवा के अंतिम वर्ष उन्‍होंने और उनकी धर्मपत्नी भीमाबाई ने काली पलटन स्थित जन्मस्थली स्मारक की जगह पर विद्यमान एक बैरेक में गुजारे। सन् 1891 में 14 अप्रैल के दिन जब रामजी सूबेदार अपनी ड्यूटी पर थे, 12 बजे यहीं भीमराव का जन्म हुआ। कबीर पंथी पिता और धर्मर्मपरायण माता की गोद में बालक का आरंभिक काल अनुशासित रहा।
शिक्षा:
Biography, Profile of Dr. Bhimrao Ambedkar in Hindi
शिक्षा
बालक भीमराव का प्राथमिक शिक्षण दापोली और सतारा में हुआ। बंबई के एलफिन्स्टोन स्कूल से वह 1907 में मैट्रिक की परीक्षा पास की। इस अवसर पर एक अभिनंदन समारोह आयोजित किया गया और उसमें भेंट स्वरुप उनके शिक्षक श्री कृष्णाजी अर्जुन केलुस्कर ने स्वलिखित पुस्तक 'बुद्ध चरित्र' उन्हें प्रदान की। बड़ौदा नरेश सयाजी राव गायकवाड की फेलोशिप पाकर भीमराव ने 1912 में मुबई विश्वविद्यालय से स्नातक परीक्षा पास की। संस्कृत पढने पर मनाही होने से वह फारसी लेकर उत्तीर्ण हुये।

अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय

बी.ए. के बाद एम.ए. के अध्ययन हेतु बड़ौदा नरेश सयाजी गायकवाड़ की पुनः फेलोशिप पाकर वह अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय में दाखिल हुये। सन 1915 में उन्होंने स्नातकोत्तर उपाधि की परीक्षा पास की। इस हेतु उन्होंने अपना शोध 'प्राचीन भारत का वाणिज्य' लिखा था। उसके बाद 1916 में कोलंबिया विश्वविद्यालय अमेरिका से ही उन्होंने पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की, उनके पीएच.डी. शोध का विषय था 'ब्रिटिश भारत में प्रातीय वित्त का विकेन्द्रीकरण'।

लंदन स्कूल ऑफ इकोनामिक्स एण्ड पोलिटिकल सांइस

फेलोशिप समाप्त होने पर उन्हें भारत लौटना था अतः वे ब्रिटेन होते हुये लौट रहे थे। उन्होंने वहां लंदन स्कूल ऑफ इकोनामिक्स एण्ड पोलिटिकल सांइस में एम.एससी. और डी. एस सी. और विधि संस्थान में बार-एट-लॉ की उपाधि हेतु स्वयं को पंजीकृत किया और भारत लौटे। सब से पहले छात्रवृत्ति की शर्त के अनुसार बडौदा नरेश के दरबार में सैनिक अधिकारी तथा वित्तीय सलाहकार का दायित्व स्वीकार किया। पूरे शहर में उनको किराये पर रखने को कोई तैयार नही होने की गंभीर समस्या से वह कुछ समय के बाद ही मुंबई वापस आये।

दलित प्रतिनिधित्व

वहां परेल में डबक चाल और श्रमिक कॉलोनी में रहकर अपनी अधूरी पढाई को पूरी करने हेतु पार्ट टाईम अध्यापकी और वकालत कर अपनी धर्मपत्नी रमाबाई के साथ जीवन निर्वाह किया। सन 1919 में डॉ. अम्बेडकर ने राजनीतिक सुधार हेतु गठित साउथबरो आयोग के समक्ष राजनीति में दलित प्रतिनिधित्व के पक्ष में साक्ष्य दी।

अशिक्षित और निर्धन लोगों को जागरुक बनाने के लिया काम

उन्‍होंने मूक और अशिक्षित और निर्धन लोगों को जागरुक बनाने के लिये मूकनायक और बहिष्कृत भारत साप्ताहिक पत्रिकायें संपादित कीं और अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी करने के लिये वह लंदन और जर्मनी जाकर वहां से एम. एस सी., डी. एस सी., और बैरिस्टर की उपाधियाँ प्राप्त की। उनके एम. एस सी. का शोध विषय साम्राज्यीय वित्त के प्राप्तीय विकेन्द्रीकरण का विश्लेषणात्मक अध्ययन और उनके डी.एससी उपाधि का विषय रूपये की समस्या उसका उद्भव और उपाय और भारतीय चलन और बैकिंग का इतिहास था।

डी. लिट्. की मानद उपाधियों से सम्मानित

बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर को कोलंबिया विश्वविद्यालय ने एल.एलडी और उस्मानिया विश्वविद्यालय ने डी. लिट्. की मानद उपाधियों से सम्मानित किया था। इस प्रकार डॉ. अम्बेडकर वैश्विक युवाओं के लिये प्रेरणा बन गये क्योंकि उनके नाम के साथ बीए, एमए, एमएससी, पीएचडी, बैरिस्टर, डीएससी, डी.लिट्. आदि कुल 26 उपाधियां जुडी है।

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आम्बेडकर जी से प्रेरणा लेने वाले कभी किसी बात को ना मुमकिन नहीं मानते।सतत संघर्षो से जूझकर हालात बदल देते हैं।


Friday, April 6, 2018

કૌશલ્ય અને બાળકો

બાળકોમાં વિશ્વાસ રાખવો.
બાળકોમાં અનેક કૌશલ્ય હોય છે.આ કૌશલ્ય શોધવા જવાની જરૂર નથી.બાળક ને એનું ગમતું કામ કરવા દેવાથી એના વિશેષ કૌશલ્ય અંગે જાણી શકાય છે.
આવી જનાએક વાત કેટલાક વર્ષો પહેલા લખાઈ હતી.આજે એને ટૂંકમાં જોઈ લઈએ.
વાત છે પાલનપુરની...
અહીં રેલવે સ્ટેશનમાં ફરજ બજાવતા એક કર્મચારીની દીકરી હંસા.કોઈ કારણસર તેના હાથની આંગળીઓ  રેલવે એન્જીન નીચે આવી ગઇ.હંસના હાથની આંગળી કપાઈ ગઇ.હંસા મોટી થતાં તે શાળામાં દાખલ થઈ.અહીં એણે પગેથી લખવાનું શરૂ કર્યું.સમય જતાં તેણે બે હાથના કાંડાની મદદથી લખવાનું શરૂ કર્યું.એના અક્ષર એટલા સરસ કે સૌને નવાઈ લાગે.એક દિવસ એવો આવ્યો કે હંસાને સુંદર અક્ષર માટે રાષ્ટ્રીય પુરસ્કાર રાપ્ત થયો.આજનું આ પોસ્ટર અને હંસાની વાત આપણે ગમી હોય તો શેર કરશો.

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જીવન એટલે સમસ્યા.
સમસ્યા સામે સાહસ એટલે સફળતા.

Saturday, March 3, 2018

मेरा इक्का


हमे अपनी ओर से जो अच्छा हो सके वैसा करना हैं।हम कभी कभी भूल जाते हैं कि हमे क्या करना हैं।हमारे आसपास कुछ लोग अपनी बात को अच्छे से समजा नहीं पाते हैं।
कुछ लोग कमसे कम शब्दमें अपनी बात रखते हैं,मुजे ऐसे लोग पसंद हैं।कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो हमारे लिए कुछ भी करते हैं तो हमे वो पसंद आता हैं।कहते हैं कि किसी का प्यार भिनपसन्द नहीं,ओर किसी की डांट भी प्यारी लगती हैं।मेरी एक दोस्त हैं।हमने साथ में काम किये हैं और आज भी कर रहे हैं।कुछ भी बात हो,हम जब तकरार करते हैं तब तक ठीक हैं।कभी कभी वो समजा नहीं पाती हैं तो अपने हाथ जोड़ती हैं।कहिए के जब में कुछ समझता नहीं हूं तब भी वो हाथ जोड़ती हैं।में उन्हें हाथ जोड़ने से मना करता हूँ।में कहता हूं कि आप हाथ जोड़ते हो तो मुजे शर्म आती हैं।यहाँ मेरे किए हुकुम का इक्का हैं कि में बात मानलू।सही गलत का कोई सवाल नही,इसे फिरसे देख सकते हैं,इसे फिरसे सुधार सकते हैं।मगर अभी तो इस बात को मानना ही सही फैंसला हैं।

मेरे एक दूसरे दोस्त हैं।
वो महाराष्ट्रमें रहते हैं।शिक्षकों के ओर बच्चो के लिए वो महक से जुड़े हैं।'महाराष्ट्र हनी बी क्लब' याने महक।उनका जब भी फोन आता हैं,अगर कमसे कम 20 मिनिट का समय नहीं हैं तो में उनका फोन रिसिब नहीं करता हूँ।मेरे लिए मेरी ओरसे सबसे अच्छा ये हैं कि अगर 20 मिनिट का समय हो तो ही बात करूँ।

मेरे साथ बहोत सारे लोग जुड़े हैं।मेने बहोतो से सीखा हैं।में रोज नया काम हाथ में लेता हूँ और उसे पूरा करना चाहता हूं।इस काम में कई सारे लोग अपने नजरिये से देखते हैं।मुजे किसी के नजरिये की फिक्र नहीं हैं।मुजे किसी से कोई शिकवा नहीं हैं।मुजे बस मेरी मस्ती में मस्त रहने दो।आपके पास पत्ते हैं।हो सकता हैं,आप के पास दो इक्के हो।मेरे पास एक तो हो ही सकता हैं।मुजे मेरे देश पे भरोसा ही नहीं गौरव भी हैं।में भारत का नागरिक हूँ।सभी भारतीयों में में भी शामिल हुन,ओर मुजे सभी अधिकार प्राप्त हैं।यही हमारा पत्ते का इक्का हैं।



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कुछ लोग कुछ नहीं कहते इसका मतकब ये नहीं हैं कि वो बोलनहीँ सकते हैं।

Tuesday, February 13, 2018

मेरे हिस्सेका आसमान...




आज दुनिया वेलेंटाइन डे मना रही होगी।इस कि तैयारी पिछले कुछ दिनों से शुरू होती हैं।
 श्री गणपत पटेल 'सौम्य' की एक कविता हैं।
 
किनारे..
एक किनारे पुरुष खड़ा हैं,
 एक किनारे नारी,
बड़ा फांसला कैसे मिटता?
काम बहुत हैं भारी।
मनमानी आज़ादी ले एक  पंछी उड़ता ऊपर,
कटे पैरो से दूजा पंछी तड़प रहा हैं भू पर।
कदम कदम पर पाबंदी के पहरे लगे हुए हैं।

सदीयां बीती लेकिन,उनके चेहरे ढके हुए हैं।


कैसे मुमकिन होगा दो पीढ़ियों को साथ चलाना?
खत्म दूरी कर, दो साहिल का फिरसे हाथ मिलाना?


एक जीवन शक्ति को कुचलना; लाश बनाकर रखना,
बड़ा पाप है हरे भरे पौधे को जलाकर रखना।

लड़कियों की नयी पीढ़ी अब पूछ रही हैं हमसे,
आनेवाले दिनों में क्या मुक्ति हैं उस गम से?

पीते है अपमान सदा;
पर अब नहीं यह हो सकता,
अलग बना व्यक्तित्व नारी का,
अब यह नहीं खो सकता।


काम हमारा इस दूरी को खत्म किये देना है,
सदियों के इस कुरिवाज का अंत किये देना है।

एक चुनोती इसे समझकर कुछ प्रण लेना होगा,
जन्म लिया हैं मानव का यह ऋण चुकाना होगा।

बस,
भ्रूण से शुरू हो ने वाली एक जिंदगी।क्या फर्क हैं।क्या कुछ बदलाव आया हैं ओरत की जिंदगी में?पिछले कुछ सालों से कुछ दिन विशेष को खास तरीको से मनाने का चलन बढ़ा हैं।

आज कल हम कुछ ऐसे दिनों के बातें में सुनते हैं जो आप ने भी सुने ही होंगे।

जैसे...
रोज डे...
प्रपोज डे...
चॉकलेट डे...
टेडीबियर डे....
प्रोमिस डे...
किस डे...

ओर अंतिम जीसे हम अंतिम मानते हैं ओर वो हैं...

वेलेंटाइन डे...

संशोधको ने उस के बाद वाली सीरीज को भी खोज निकाला हैं।

जिस में...
स्लेप डे...
किक डे...
परफ्यूम डे...
फ्लर्टिंग डे...
कॉंफिसन डे...
मिसिंग डे...
ओर अंतमें...
ब्रेकप डे

कुछ देने से छोड़ ने तक के वो दिन कोई नहीं चाहता।कोई आए नहीं चाहता कि कोई उसे छोड़े।मगर ओरत, एक खिलौना समझने वाले लोगो ने जैसे कुछ फालतू स्टेप तय कर लिए,ओर हमने उसे मनाने का संकल्प ले रखा हैं।

स्व.शफदर हाज़मी ओर माल्या श्री हाज़मी का नाटक 'औरत' अगर जो कोई देख लेगा तो कभी ऐसे फालतू डे नहीं मनाएगा।क्या भद्दा मजाक हैं औरत के साथ।दिन विशेष की में ब्रेकप हैं।कोई ब्रेकअप नहीं होता हैं।जो होता हैं कुछ दिनों या सालो के लिए होता हैं।कुछ दिन बीत गए और कुछ बीतेंगे।आज जो हैं उसे देखो,कल जो होगा देखा जाएगा। कुछ समय के लिए।इस समझ से ही हमे सुख और दुख को देखना ओर समझना हैं।

श्री 'सौम्य' की कविता आज भी इतनी ही ताजा हैं जैसे पद्मावती फिल्म    में थी।आशा हैं अगले वेलेंटाइन तक हम ये बात सोचेंगे,समजेंगे ओर जीवन को समझ ने के लिए नए तरीके खोजेगे।


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पदमावत फ़िल्म के रिलीज होने का विवाद चलता हैं।मगर ओरत के स्वमान का क्या हो सकता हैं।


लिखा:टेडीबियर डे...
Thanks @ सौम्य...

Saturday, February 10, 2018

राजू सोलंकी


એક છોકરો.
પાંચમા ધોરણમાં ભણે છે.
કદાચ એને શાળામાં જવાનું ગમતું નથી.
તે આજે શાળામાં ગયો નથી.અમે એને અંબાજી થી દાંતા વચ્ચે મળ્યા.એ વખતે એ છોકરો કેસૂડાના ફૂલ લઈ ઊભો હતો.અમારે એ ફૂલ જોઈતાં હતાં.એની સાથે વાત કરી.ખૂબ જ આત્મવિશ્વાસ સાથે એ વાત કરતો હતો.મેન એને કેસૂડાના ઉઓયોગ વિશે પૂછ્યું.એક શિક્ષક કરતા સરળ રીતે એણે આખી વાત સમજાવી. અમે ગાડીમાં ચાર વ્યક્તિ હતા. રાજુ અમને બધાંના સવાલ સાંભળી એક પછી એક જવાબ આપતો હતો.મેં એને કેસૂડાનું કોઈ ગીત ગાવા વિનંતી કરી. એણે ન ગાયું.મેં ગાયું 'કેસૂડાની કળીએ બેસી,ફાગણિયો લહેરાયો' મેં એટલુંજ ગાયું ને રાજુ કહે 'આ તો મને આવડે છે.'
મારા સાથી અને પર્યાવરણ વિષયના લેખક શ્રી પ્રવીણભાઈ પટેલે ચાલીસ રૂપિયાના કેસૂડાનાં ફૂલ છેવટે પચાસમાં લીધાં.
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Monday, October 2, 2017

प्यार की सरकार...

मेरे दोस्त हैं।
उनका नाम प्रदीपसिंह जाला।
भावनगर में काम करते हैं।जोयफूल लर्निग के लिए वैसेभी भावनगर आगे हैं।कहा जाता हैं कि गुजराती भाषा को सबसे अच्छी भावनगर वाले बोलते हैं।भावनगर शहर में बोले जानेवाली गुजराती में उच्चार के लिए भावनगर सबसे सच्ची गुजराती बोलने का गौरव रखते हैं।
प्रदीपसिंह ओरोकी तरह टाइमपास के लिए सोसियल मीडिया से जुड़े रहते हैं।उन्होंने एक पोस्टर भेजा था।जो की गुजराती में लिखा हैं।जिस में लिखा हैं कि 'पूरी शतरंज को मैने चेलेंज किया हैं।क्योंकि मयजे यकीन हैं कि तुम मेरे साथ हो।'
ऐसी कई सारी पंक्तिया,गीत और बाते भेजने वाले प्रदीपसिंह जाला को मेरा प्यार।
#प्यार वाली सरकार

Sunday, October 1, 2017

में रावण हूँ...

में राम नहीं,रावण बनाना पसंद करूँगा।एक विद्वान और शक्ति के उपासक थे रावण।जिन्हें हम आजभी जलाते हैं।एक राजा जिसने किसीके कहने पर आपनी बीबी को निकाल दिया।अरे,बीबी को पूछते की क्या सही हैं,क्या गलत।ऐसे राजा की हम पूजा करते हैं जो अपनी सगर्भा बीबी को छोड़ते हैं।आज तक चीर हरण करने वाले दुर्योधन को किसीने कहीं भी जलाया हैं?

435 दिन तक सीता रावण के पास थी।रावण ने उसे छुआभी नहीं।रावण पंडित था।अभिमानी हो सकता हैं।उसमें भक्ति थी तो हिमालय उखाड़ दिया।उसमें अभिमान आया तो वो अंगद का पेरभी न हिला पाया।में महापंडित रावण को पसंद करूँगा।मेने ऊनको आज से नही,बचपन से आदर्श माना है।

मेरे एक करीबी दोस्त हैं।आज हम एक दुसरे से बात नहीं करते या नहीं करना चाहते।कुछ साल ऐसेही गुजरेंगे।हा, एक सामाजिक तौर पे प्रतिष्ठित हैं।मुजे मालूम हैं वहाँ तक वो भी रावण के करीब हैं।वो भी रावण को सन्मान देते हैं।मगर उनके पास राम के भी गुण हैं।सिर्फ सुनी हुई बात पे यकीन करते हैं।करने के लिए कारण भी होंगे।आज बात ये हैं कि रावण इस लिए की उन्होंने कोई गलती दूसरी बार नहीं की,एक बार की गलती कोई भी माफ करता हैं।मगर गलती फिरसे न हो तो।रावण भी इस बात को मानते थे।एक समय की मेरी गलती से मैने कुछ छोटे विचारक को मेरी टीम से दूर होते देखा हैं।में उन बच्चों से फिरसे जुड़ना चाहूंगा जो आज मेरे साथ नहीं हैं।मेरे पास नहीं हैं।मेरे पास उन बच्चों के लिए आयोजन हैं मगर बच्चे नहीं हैं।मुजे भी विश्वास हैं कि मेने तय किये हैं वो बच्चे फिरसे मुझसे जुड़ेंगे।क्या कोई महत्वपूर्ण क्रिकेट मेचमें कोई एक खिलाड़ी एक गलती से रनआउट होता हैं तो क्या उसे दूसरी बार नहीं खिलाना सही हैं।
किसीने कहा हैं...

में राम नहीं तो सीता कहासे लाउ।


में गलती का स्वीकार करूँ,मगर में तो कभी गलत होही नहीं सकता।ऐसी सोच रखने वाले गलती करते हैं और अपने आप को राम के सांजेमें डाल के मर्यादा का नाम देते हैं।मर्यादा तो रावण ने भी निभाई थी।मगर,जो जीतेगा वोही इतिहासमे अमर होता हैं।में अमर होना नहीं चाहता,क्योकि में राम बनना नहीं चाहता।

मुजे यकीन हैं कि दुर्योधन,शकुनि को छोड़ने वाले ये लोग रावण को जला रहे हैं।ऐसे लोग ही एक दिन मुजे भूल जाएंगे।और मुजे कोई भूले वोभी मुजे पसंद नहीं सो में रावण बनके ही मरना चाहूंगा।में हर साल जलना चाहूंगा।में रावण बनना चाहुगा।में रावण बनूँगा।
रावण के पास सोना था।पूरी लंका सोनेकी थी।रावण सोने में सुगंध डालना चाहता था।रावण मंदिर में से दुर्गंध दूर करना चाहता था।आज भी सुगंधित सोना नहीं मिलता।नहीं बना हैं।शराब में से गंध भी नहीं दूर हो पाई।रावण अपनी गलती को समझता ओर सुधरता।में भी समझता हूं और सुधारने का प्रयत्न करूँगा।
में ब्राह्मण हूं।और ब्राह्मन जैसा बनुगा।में राम की पूजा करूँगा मगर रावण बनुगा।मेरे जीवन में एक गलती दूसरी बार नहीं करूंगा,में रावण बनुगा।रावण पंडित था।उसके पास पुष्पक था।वो विज्ञान और टेक्नोलॉजी के उपयकर्ता थे।वो 32 कलामें निपुण थे।में भी निपुण होना चाहूंगा,में रावण बनना चाहूंगा।

में राम की पूजा करूँगा,मगर रावण बनना चाहूंगा।





Thursday, September 28, 2017

अन्नपूर्णा....

क्या आप कभी भूखे सोये हैं।शायद ये सवाल ही गलत हैं।कोई भूखा नहीं सो सकता।भूख किसी को सोने नहीं देती।रोटी फ़िल्म में एक संवाद था इसमें रोटी के महत्व को राजेश खन्ना ने बहोत खूब पेश किया हैं।साउथ इंडियामें कुछ स्टेट ऐसे हैं जहाँ के लोगो को सरकार द्वारा भरपेट इडली मिलती हैं।
मेने वो इडली तमिलनाडु में खाई हैं।गुजरात के बनासकांठा में ऐसाही कुछ हैं।अन्नपूर्णा रथ के माध्यम से श्री केसर सेवा की तहत ये काम चालू हैं।बनासकांठा जिला पंचायत के पूर्व प्रमुख ओर राजकीय व्यक्तित्व के स्वामी राजेन्द्र जोशी(राजू जोशी)इसे क्रियान्वित किये हुए हैं।
केसर सेवा के नाम से एक रथ बनाया गया हैं।इस रथ के निर्माण में 6 से 8 लाख रुपया लगता हैं।ऐसे चार रथ आज पालनपुर ओर डीसा में चल रहे हैं।सबसे बड़ी बात ये हैं कि सिर्फ 2 रूपयो में भरपेट खिचड़ी मिलती हैं।एक बार दो रूपया देके आप भरपेट  खा सकते हैं।
मेरी जब श्री राजू जोशी से बात हुई तो उन्होंने कहा,मेरी माँ का नाम केसर हैं।उन्हों गरीबो को,भूखे लोगो को खिलाने का शोख था।अब सही वख्त पे पोषणयुक्त खाना नहीं मिलेगा तो लोग अशक्त बनेंगे।होटल में मिलने वाला नास्ता 20 से 25 रुपये में मिलता हैं।अब 20 रूपिया दे के बाजार के नाश्ते के सामने 2 रूपयो में भरपेट बादाम,काजू ओर पिस्ता वाली खिचड़ी कोंन नहीं लेगा।
ये पूरा काम राजू जोशी की ऑफिसमें श्रीमती सोनल मोढ देख रही हैं।उन्होंने बताया कि कई लोग तो अन्नपूर्णा रथ की राह देखते हैं।शहर में अस्पताल या ऐसे किसी कचेरी के काम से आये लोगो के लिए अन्नपूर्णा रथ आशीर्वाद समान हैं।
आप भी इस काम में सहयोग दे सकते हैं।किसी एक दिन के लिए आप 2100 रूपया दे सकते हैं।2100 रूपया ओर 2 रूपये में प्लेट की आमदनी से रथका एक दिनक  खर्च निकलता हैं।
मेने एक विधवा औरत को डीसा में अपने भानजे के लिए रोज ये खिचड़ी लेते देखा हैं।कई लोगो के लिए ऐ बचत हैं।जिस 20 रूपये में वो कचोरी समोसा खाके न पेट भर सकते हैं न स्वास्थ्य प्राप्त करते हैं।आज ये खिचड़ी रोजाना 18 रूपये बचाती हैं।ऐसे तो महीने में 540 कई बचत होती हैं।कुल मिलाके सालाना 6 हजार रुपया एक गरीब का बचता हैं।श्रो राजू जोशी ऐसे नए चार रथ के लिए आयोजन कर सकते हैं।
#Bनोवेशन
#GoG

Monday, September 25, 2017

कश्मीर में शिक्षा....


कश्मीर।
हमारा हैं।
हमारा स्वर्ग हैं।
कुछ दिनों पहले विश्वग्राम के फाउंडर श्री संजय कश्मीर गए हुए थे।संजय:तुला समग्र देशमें सन्मान जनक नाम हैं।गांधी विचार को फैलाने के लिए संजय:तुला काम कर रहे हैं।उनके साथ अन्य सभी थे।संजय अपने काम के लिए पहचाने जाते हैं।
वो कहते हैं 'हमारे सदस्यों को  एक ही काम करना था,कश्मीर के लोगो का प्यार पाना था।'सिर्फ कश्मीरियों का प्यार ही क्यो?इस सवाल के जवाब में वो कहते हैं 'कश्मीर के स्कूलमें बच्चो के हीरो अशरफ वानी हैं।प्रत्येक स्कूल के बेचमें वानी का नाम लिखा होता हैं।
वहां के लोगो के दिमाग से कश्मीर भारत का हिस्सा हैं वो याद करवाने की आवश्यकता हैं।श्री संजय के साथी सारा दिन पपेट्स ओर ऐरोगामी ओर अन्य खेल के माध्यमसे उन लोगो से जुड़ना चाहते थे।
गाँधीविचार ही देश और परदेश में शांति का प्रतीक बना हैं तब जाके श्री संजय:तुला गांधी विचार से समर्पित जीवन जी रहे हैं।पीछेले कई सालों से विश्वशांति के लिए विश्वग्राम से जुड़ के वो काम कर रहे हैं।
आपको ये पढ़के होता होगा कि में बार बार संजय:तुला क्यो लिख रहा हूँ।श्री संजय के साथ उनकी जीवनसाथी तुला जी भी ऐसे सेवा कार्यमें व्यस्त हैं।इस लिए उन दोनों के नाम को सभी साथमें लिखते हैं।एक अकेले संजय जी और तुला जी के नाम से उन्हें बहोत कम लोग पहचानते हैं।उनको उनकी सेवा के लिए 2016 में राष्ट्रपति भवन में सन्मान भी प्राप्त हुआ हैं।ऐसे संजय:तुला को वंदन।आशा रखते हैं कश्मीर में जल्द सब अच्छा होगा।

Wednesday, September 6, 2017

क्या कहते हैं...

हम रोज नई जिंदगी जीते हैं।
हम रोज नया काम करते हैं या नया दिन हमारा पुराने तरीको से खत्म होता हैं।कि सारे काम ऐसे होते हैं कि हम नहीं करते।कुछ नया करने में हमे डर होता है।लोग क्या कहेंगे।
कहने वाले तो कहेंगे।हमे कहने पर नहीं,देखनेपर जाना हैं।उन्होंने क्या किया हैं।कई लोग ऐसा करते नहीं हैं,सिर्फ दूसरो को दिखाते हैं,सुनाते है या अड़चन खड़ी करते हैं।
ज्यादातर ये होता हैं कि कुछ करते समय किसी गलती से कुछ काम अच्छा नहीं होता हैं।इस बात को लेकर बादमें हमे ताने सुनने पड़ते हैं।ताने सुनाने वाले का एक ही काम हैं।ताने मारना।भगत हमे तो ओर भी काम करने हैं।हम नए काम को लोगो के कहने से नहीं छोड़ सकते।
#काम

Tuesday, August 29, 2017

हमारा अंधेरा....

शिक्षा हमे राह दिखाती हैं।
शिक्षा हमे सरोकार शिखाती हैं।गुरु के लिए कहा जाता हैं कि जो अंधेरे से उजाले की ओर ले जानेवाली व्यक्ति हैं।हमारे आसपास कई सारे लोग अनपढ़ या कम पढ़े लिखे होने के बावजूद सफल लोगो की यादीमें उनका नाम होता हैं।
वो पढ़े नहीं होंगे मगर अपने फिल्डमें उन्हें स्वानुभव से शिक्षा मिली होती हैं।कहते हैं ना कि अनुभव से शिखी चीज कभी नहीं भूल सकते।शिखना और शिक्षा दोनों अलग वजूद के साथ खड़े होते हैं।
हमारे जीवन मे कई सारी चीज ऐसी होती हैं जो हम खुद सिखते हैं।अंधेरा दूर करने के लिए हमे सच्चे साथी या शिक्षा की जरूरत हैं।वो हमें अंधेरा दूर करके उजाले में ले जाएगा।