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Monday, October 2, 2017

प्यार की सरकार...

मेरे दोस्त हैं।
उनका नाम प्रदीपसिंह जाला।
भावनगर में काम करते हैं।जोयफूल लर्निग के लिए वैसेभी भावनगर आगे हैं।कहा जाता हैं कि गुजराती भाषा को सबसे अच्छी भावनगर वाले बोलते हैं।भावनगर शहर में बोले जानेवाली गुजराती में उच्चार के लिए भावनगर सबसे सच्ची गुजराती बोलने का गौरव रखते हैं।
प्रदीपसिंह ओरोकी तरह टाइमपास के लिए सोसियल मीडिया से जुड़े रहते हैं।उन्होंने एक पोस्टर भेजा था।जो की गुजराती में लिखा हैं।जिस में लिखा हैं कि 'पूरी शतरंज को मैने चेलेंज किया हैं।क्योंकि मयजे यकीन हैं कि तुम मेरे साथ हो।'
ऐसी कई सारी पंक्तिया,गीत और बाते भेजने वाले प्रदीपसिंह जाला को मेरा प्यार।
#प्यार वाली सरकार

Sunday, October 1, 2017

में रावण हूँ...

में राम नहीं,रावण बनाना पसंद करूँगा।एक विद्वान और शक्ति के उपासक थे रावण।जिन्हें हम आजभी जलाते हैं।एक राजा जिसने किसीके कहने पर आपनी बीबी को निकाल दिया।अरे,बीबी को पूछते की क्या सही हैं,क्या गलत।ऐसे राजा की हम पूजा करते हैं जो अपनी सगर्भा बीबी को छोड़ते हैं।आज तक चीर हरण करने वाले दुर्योधन को किसीने कहीं भी जलाया हैं?

435 दिन तक सीता रावण के पास थी।रावण ने उसे छुआभी नहीं।रावण पंडित था।अभिमानी हो सकता हैं।उसमें भक्ति थी तो हिमालय उखाड़ दिया।उसमें अभिमान आया तो वो अंगद का पेरभी न हिला पाया।में महापंडित रावण को पसंद करूँगा।मेने ऊनको आज से नही,बचपन से आदर्श माना है।

मेरे एक करीबी दोस्त हैं।आज हम एक दुसरे से बात नहीं करते या नहीं करना चाहते।कुछ साल ऐसेही गुजरेंगे।हा, एक सामाजिक तौर पे प्रतिष्ठित हैं।मुजे मालूम हैं वहाँ तक वो भी रावण के करीब हैं।वो भी रावण को सन्मान देते हैं।मगर उनके पास राम के भी गुण हैं।सिर्फ सुनी हुई बात पे यकीन करते हैं।करने के लिए कारण भी होंगे।आज बात ये हैं कि रावण इस लिए की उन्होंने कोई गलती दूसरी बार नहीं की,एक बार की गलती कोई भी माफ करता हैं।मगर गलती फिरसे न हो तो।रावण भी इस बात को मानते थे।एक समय की मेरी गलती से मैने कुछ छोटे विचारक को मेरी टीम से दूर होते देखा हैं।में उन बच्चों से फिरसे जुड़ना चाहूंगा जो आज मेरे साथ नहीं हैं।मेरे पास नहीं हैं।मेरे पास उन बच्चों के लिए आयोजन हैं मगर बच्चे नहीं हैं।मुजे भी विश्वास हैं कि मेने तय किये हैं वो बच्चे फिरसे मुझसे जुड़ेंगे।क्या कोई महत्वपूर्ण क्रिकेट मेचमें कोई एक खिलाड़ी एक गलती से रनआउट होता हैं तो क्या उसे दूसरी बार नहीं खिलाना सही हैं।
किसीने कहा हैं...

में राम नहीं तो सीता कहासे लाउ।


में गलती का स्वीकार करूँ,मगर में तो कभी गलत होही नहीं सकता।ऐसी सोच रखने वाले गलती करते हैं और अपने आप को राम के सांजेमें डाल के मर्यादा का नाम देते हैं।मर्यादा तो रावण ने भी निभाई थी।मगर,जो जीतेगा वोही इतिहासमे अमर होता हैं।में अमर होना नहीं चाहता,क्योकि में राम बनना नहीं चाहता।

मुजे यकीन हैं कि दुर्योधन,शकुनि को छोड़ने वाले ये लोग रावण को जला रहे हैं।ऐसे लोग ही एक दिन मुजे भूल जाएंगे।और मुजे कोई भूले वोभी मुजे पसंद नहीं सो में रावण बनके ही मरना चाहूंगा।में हर साल जलना चाहूंगा।में रावण बनना चाहुगा।में रावण बनूँगा।
रावण के पास सोना था।पूरी लंका सोनेकी थी।रावण सोने में सुगंध डालना चाहता था।रावण मंदिर में से दुर्गंध दूर करना चाहता था।आज भी सुगंधित सोना नहीं मिलता।नहीं बना हैं।शराब में से गंध भी नहीं दूर हो पाई।रावण अपनी गलती को समझता ओर सुधरता।में भी समझता हूं और सुधारने का प्रयत्न करूँगा।
में ब्राह्मण हूं।और ब्राह्मन जैसा बनुगा।में राम की पूजा करूँगा मगर रावण बनुगा।मेरे जीवन में एक गलती दूसरी बार नहीं करूंगा,में रावण बनुगा।रावण पंडित था।उसके पास पुष्पक था।वो विज्ञान और टेक्नोलॉजी के उपयकर्ता थे।वो 32 कलामें निपुण थे।में भी निपुण होना चाहूंगा,में रावण बनना चाहूंगा।

में राम की पूजा करूँगा,मगर रावण बनना चाहूंगा।





Thursday, September 28, 2017

अन्नपूर्णा....

क्या आप कभी भूखे सोये हैं।शायद ये सवाल ही गलत हैं।कोई भूखा नहीं सो सकता।भूख किसी को सोने नहीं देती।रोटी फ़िल्म में एक संवाद था इसमें रोटी के महत्व को राजेश खन्ना ने बहोत खूब पेश किया हैं।साउथ इंडियामें कुछ स्टेट ऐसे हैं जहाँ के लोगो को सरकार द्वारा भरपेट इडली मिलती हैं।
मेने वो इडली तमिलनाडु में खाई हैं।गुजरात के बनासकांठा में ऐसाही कुछ हैं।अन्नपूर्णा रथ के माध्यम से श्री केसर सेवा की तहत ये काम चालू हैं।बनासकांठा जिला पंचायत के पूर्व प्रमुख ओर राजकीय व्यक्तित्व के स्वामी राजेन्द्र जोशी(राजू जोशी)इसे क्रियान्वित किये हुए हैं।
केसर सेवा के नाम से एक रथ बनाया गया हैं।इस रथ के निर्माण में 6 से 8 लाख रुपया लगता हैं।ऐसे चार रथ आज पालनपुर ओर डीसा में चल रहे हैं।सबसे बड़ी बात ये हैं कि सिर्फ 2 रूपयो में भरपेट खिचड़ी मिलती हैं।एक बार दो रूपया देके आप भरपेट  खा सकते हैं।
मेरी जब श्री राजू जोशी से बात हुई तो उन्होंने कहा,मेरी माँ का नाम केसर हैं।उन्हों गरीबो को,भूखे लोगो को खिलाने का शोख था।अब सही वख्त पे पोषणयुक्त खाना नहीं मिलेगा तो लोग अशक्त बनेंगे।होटल में मिलने वाला नास्ता 20 से 25 रुपये में मिलता हैं।अब 20 रूपिया दे के बाजार के नाश्ते के सामने 2 रूपयो में भरपेट बादाम,काजू ओर पिस्ता वाली खिचड़ी कोंन नहीं लेगा।
ये पूरा काम राजू जोशी की ऑफिसमें श्रीमती सोनल मोढ देख रही हैं।उन्होंने बताया कि कई लोग तो अन्नपूर्णा रथ की राह देखते हैं।शहर में अस्पताल या ऐसे किसी कचेरी के काम से आये लोगो के लिए अन्नपूर्णा रथ आशीर्वाद समान हैं।
आप भी इस काम में सहयोग दे सकते हैं।किसी एक दिन के लिए आप 2100 रूपया दे सकते हैं।2100 रूपया ओर 2 रूपये में प्लेट की आमदनी से रथका एक दिनक  खर्च निकलता हैं।
मेने एक विधवा औरत को डीसा में अपने भानजे के लिए रोज ये खिचड़ी लेते देखा हैं।कई लोगो के लिए ऐ बचत हैं।जिस 20 रूपये में वो कचोरी समोसा खाके न पेट भर सकते हैं न स्वास्थ्य प्राप्त करते हैं।आज ये खिचड़ी रोजाना 18 रूपये बचाती हैं।ऐसे तो महीने में 540 कई बचत होती हैं।कुल मिलाके सालाना 6 हजार रुपया एक गरीब का बचता हैं।श्रो राजू जोशी ऐसे नए चार रथ के लिए आयोजन कर सकते हैं।
#Bनोवेशन
#GoG

Monday, September 25, 2017

कश्मीर में शिक्षा....


कश्मीर।
हमारा हैं।
हमारा स्वर्ग हैं।
कुछ दिनों पहले विश्वग्राम के फाउंडर श्री संजय कश्मीर गए हुए थे।संजय:तुला समग्र देशमें सन्मान जनक नाम हैं।गांधी विचार को फैलाने के लिए संजय:तुला काम कर रहे हैं।उनके साथ अन्य सभी थे।संजय अपने काम के लिए पहचाने जाते हैं।
वो कहते हैं 'हमारे सदस्यों को  एक ही काम करना था,कश्मीर के लोगो का प्यार पाना था।'सिर्फ कश्मीरियों का प्यार ही क्यो?इस सवाल के जवाब में वो कहते हैं 'कश्मीर के स्कूलमें बच्चो के हीरो अशरफ वानी हैं।प्रत्येक स्कूल के बेचमें वानी का नाम लिखा होता हैं।
वहां के लोगो के दिमाग से कश्मीर भारत का हिस्सा हैं वो याद करवाने की आवश्यकता हैं।श्री संजय के साथी सारा दिन पपेट्स ओर ऐरोगामी ओर अन्य खेल के माध्यमसे उन लोगो से जुड़ना चाहते थे।
गाँधीविचार ही देश और परदेश में शांति का प्रतीक बना हैं तब जाके श्री संजय:तुला गांधी विचार से समर्पित जीवन जी रहे हैं।पीछेले कई सालों से विश्वशांति के लिए विश्वग्राम से जुड़ के वो काम कर रहे हैं।
आपको ये पढ़के होता होगा कि में बार बार संजय:तुला क्यो लिख रहा हूँ।श्री संजय के साथ उनकी जीवनसाथी तुला जी भी ऐसे सेवा कार्यमें व्यस्त हैं।इस लिए उन दोनों के नाम को सभी साथमें लिखते हैं।एक अकेले संजय जी और तुला जी के नाम से उन्हें बहोत कम लोग पहचानते हैं।उनको उनकी सेवा के लिए 2016 में राष्ट्रपति भवन में सन्मान भी प्राप्त हुआ हैं।ऐसे संजय:तुला को वंदन।आशा रखते हैं कश्मीर में जल्द सब अच्छा होगा।

Wednesday, September 6, 2017

क्या कहते हैं...

हम रोज नई जिंदगी जीते हैं।
हम रोज नया काम करते हैं या नया दिन हमारा पुराने तरीको से खत्म होता हैं।कि सारे काम ऐसे होते हैं कि हम नहीं करते।कुछ नया करने में हमे डर होता है।लोग क्या कहेंगे।
कहने वाले तो कहेंगे।हमे कहने पर नहीं,देखनेपर जाना हैं।उन्होंने क्या किया हैं।कई लोग ऐसा करते नहीं हैं,सिर्फ दूसरो को दिखाते हैं,सुनाते है या अड़चन खड़ी करते हैं।
ज्यादातर ये होता हैं कि कुछ करते समय किसी गलती से कुछ काम अच्छा नहीं होता हैं।इस बात को लेकर बादमें हमे ताने सुनने पड़ते हैं।ताने सुनाने वाले का एक ही काम हैं।ताने मारना।भगत हमे तो ओर भी काम करने हैं।हम नए काम को लोगो के कहने से नहीं छोड़ सकते।
#काम

Tuesday, August 29, 2017

हमारा अंधेरा....

शिक्षा हमे राह दिखाती हैं।
शिक्षा हमे सरोकार शिखाती हैं।गुरु के लिए कहा जाता हैं कि जो अंधेरे से उजाले की ओर ले जानेवाली व्यक्ति हैं।हमारे आसपास कई सारे लोग अनपढ़ या कम पढ़े लिखे होने के बावजूद सफल लोगो की यादीमें उनका नाम होता हैं।
वो पढ़े नहीं होंगे मगर अपने फिल्डमें उन्हें स्वानुभव से शिक्षा मिली होती हैं।कहते हैं ना कि अनुभव से शिखी चीज कभी नहीं भूल सकते।शिखना और शिक्षा दोनों अलग वजूद के साथ खड़े होते हैं।
हमारे जीवन मे कई सारी चीज ऐसी होती हैं जो हम खुद सिखते हैं।अंधेरा दूर करने के लिए हमे सच्चे साथी या शिक्षा की जरूरत हैं।वो हमें अंधेरा दूर करके उजाले में ले जाएगा।

Tuesday, August 1, 2017

जीवन के रंग...

जीवन में कई तरह के रंग हैं।सुख,दुःख और अनेक रंग जीवनमें आते हैं।कोई भी हो,सदैव सुख या दुःख जीवनमें नहीं रहते हैं।जीवन की कल्पना विविध रंगी हैं।क्रोध,स्वार्थ ओर परमार्थ के रंग जो हम सीधे नहीं देख पाते हैं।संशोधन के आधार पर ब्रिटिश यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जोम किलिम ने कहा हैं कि सिर्फ बच्चे ही एक दिनमें एक से अधिक वर्कर के मूड से गजरते है।शायद इसी लिए वो रात को चेन से सोते है।
जहाँ तक मेरा सवाल हैं।में दिनभर आसमानी रंग से ज्यादा जुड़ा होता हूँ।वो गहराई का रंग हैं।सोचते रहना मुजे पसंद है।सोच दर्शाने के लिए ,गहराई दर्शाने के लिए आसमानी रंग हैं।
में क्रोधित होक तब लाल रंग में आ जाता हूँ जब में कुछ समझ नहीं पाता हूँ।मेरी एक छोटी सी दोस्त हैं।धारा उसका नाम।वो जब प्री स्कूलमें पढ़ती थी।मेने उसे 1 से 5 का काउंटिंग करवाया।ऊसने किया।साथमें मेने उसे 6 लिखने को कहा।उसने 6 सुनते मुजे कहा 'उलटा दो बनाउ!'गुजराती लिपि में 2 को दर्पनमे देखो तो 6 दिखता हैं।
यहाँ उसकी समझ थी।जब वो 1 से 10 काउंट करती थी।तब मैंने उसे पास बुल्के कहा 1...2...3...4...5..उलटा दो...7...8...तब मुजे कहा नहीं 6 बोलो।तो मैने कहा लिखते समय उलटा 2 से याद रखा है तो लिखने में रखो।
ऐसा जीवन के रंग में नहीं होता।दुःख की अनुभूति के समय कोई सांजे ने के बजाय ऐसा सवाल करे तो व्यक्ति हंस लेता हैं।उसका अर्थ ए होता हैं कि वो दुःखी हैं,मगर ये बात समजने में असमर्थ व्यक्ति हंसता हैं।किसी घरमें मृत्यु के समय कोई व्यक्ति रो नहीं पाती!दु:ख के काले रंग के साथ वो हंस लेता हैं।भले हंसी का रंग गुलाबी हो।दु:ख के समय काला रंग ही दिखता हैं।
हम जिन से खुशी की अपेक्षा करते हैं।वो असमर्थ नहीं हैं।उनकी समझ में उस वख्त उन्हें भी हमारी सहायता या सहयोग की आवश्यकता होगी।खेर,जो भी हैं।जीवन में हर रंग का महत्व हैं।किसी एक रंग से बना चित्र सुंदर हो सकता हैं,अति सुंदर तो भिन्न रंगों से सजे चित्र ही होते हैं।अपने जीवन को संवारने वाले सभी रंग स्वीकृत होने चाहिए।आशा हैं,हर रंग के साथ जीवन पसर हो।हा,गुलाबी रंग सदैव जीवन मे सबसे अधिक दिखे ऐसी भावना।
#हाय जिंदगी...

Saturday, July 29, 2017

फोटो कॉपी,नहीं चलेगी...

आज छोटे बच्चों को
चांद सितारे छूने दो,
दो चार किताबे पढ़ के
वो भी हम जैसे हो जाएंगे!

किसी अध्यापक का हमारे जीवन में प्रभाव होना भी चाहिए।महात्मा गांधी जी भी ऐसे प्रभाव से बच नहीं पाए थे।अरे,बापू ही क्यों।ज्यादातर सभी लोगो के जीवन में कोई न कोई आदर्श होता हैं।होना भींचहिऐ।मेरे एक दोस्त।प्रदीप सिंह(भावनगर) 'बापु'।जॉय फूल लर्निग के साथ कई तरकीब के साथ कार्यरत हैं।ऐसे न्यूज़,वीडियो और फोटो भेजते हैं।आज जो उन्होंने भेजा हैं,वो हमारी शिक्षा व्यवस्था के लोगो को कुछ कहता हैं।अरे!बहोत कुछ कहता हैं!
जीवन में शिक्षक का प्रभाव हो सकता हैं!एक साथ पढ़े सभी बच्चों पे भिन्न भिन्न व्यक्तिओ की छाप होती हैं!यहाँ सवाल हैं,अध्यापक के दिमाग में जो हैं, उसे ही बच्चों की समझ बनती हैं।अगर ऐसा हुआ तो?क्या हम क्लास रूम में हमारी कार्बन कॉपी निकल ने के लिए जाते हैं?अगर हाँ, तो सोचिए सारा भारत हमारे जैसा होगा तो क्या होगा?
हमे सिर्फ मार्गदर्शक बनना है,हमारी सोच या समज की फोटोकॉपी नहीं करनी हैं।
#सप्तरंगी फाउंडेशन,गुजरात.

Wednesday, July 19, 2017

महीनों की महेनत...पलको में...

हमारे देशमें आज भी कई लोग भूखा सोने हैं!दुख के साथ कहे तो अपने देशमें दो रुपयोंमें इडली बेचने वाली सरकार लोकप्रिय बन जाती हैं!
आज भी सरकार BPL कार्ड वाले को पशु भी न खाए ऐसा अनाज देके अपनी जिम्मेदारी निभनेका प्रचार करती हैं!यहाँ केंद्र सरकार,राज्य सरकार या किसी प्रदेशकी बात नही हैं!यह पूरे देशकी कहानी हैं!सवाल ये नहीं कि सरकार क्या देगी!व्यक्ति पैदा हुआ हैं तो कुछ न कुछ खानेको मिलेगा ही!
औ में बात कर रहा हूँ!थाली में जुठा छोड़ने का निर्णय हम दो सेकंड में करते हैं!उस अन्न को पकने में कितने दिन ओर श्रम लगा होगा!विश्वमें एक चावल ऐसा हैं जिसके उत्पादन में हम अभी कुछ ज्यादा नही कर पाए!विश्वमें सभी देशों में चावल की खेती होती हैं!हम एक निवाला छोडेंगे!वो चावल का एक निवाला तैयार होनेमें 130 से अधिक दिन लेता हैं!कितने लोग ओर आयोजन पूर्वक श्रम तब जाके हमारे हाथमें एक निवाला आता हैं!

ये पोस्टर मेरे मित्र और सहयोगी डॉ.मनोज अमीन ने भेजा था!कहते हैं कि किसी एक चित्रको देखने के बाद अगर समजाना न पड़े तो वो काफी हैं!व्यावसायिक तबीब डॉ. अमीन कई सारी संस्थाओ से जुड़े हैं!

क्या आपने निवाले को छोड़ने से पहले ऐसा कभी सोचा हैं!अगर हाँ,तो छोड़ो!आप सचमे अच्छे हैं!अगर आज से पहले आपने ऐसा कभी नही सोचा तो छोड़ो'आज आप के पास एक तक हैं!'गलती सुधार लो!
जय हिंद

#thanks@मनोज अमीन

Tuesday, July 18, 2017

Roll no. 56


A few years ago, the film had come in! Nana Patekar acted! It was a unique movie!

The name of that movie was, Ab 56. Today the name of the film that is going to be talked about is 'Role number 56', the film is for children who leave studies!

There are many lakhs of children who leave studies! These are the studies that are discarded!

It was selected at many international film festivals! Many of these honors have been received by the film and its character! There are no established artists! Even then this story will keep us!
You are requested to ...
Whose children read!
That is directly related to education or in any way!
Please ... you see a movie!

ट्रांसलेशन:मित्तल मुसारिया(मोडासा)

Friday, July 14, 2017

વાંચો પછી ખાવ...


આજકાલ સ્વાસ્થ્ય અંગે જાગૃતિ વધી છે.શું ખવાય કે ન ખવાયની સાથે કેટલું ખવાય અને કઈ રીતે ખવાય તે અંગેય આજ કાલ ચર્ચા લાગે છે.મારા એક મિત્રએ મને એક વૈદ્ય દંપતીની વાત કરી.
વૈદ્ય જોબન મોઢા અને વૈદ્ય નેહા ટાંક મોઢા દંપત્તિ.આ દંપતી 
વિશ્વની સૌથી પ્રતિષ્ઠિત ગુજરાત આયુર્વેદ યુનીવર્સીટી, જામનગરમાં વર્ષોથી સમગ્ર દુનિયાના વિદ્યાર્થીઓને 
આયુર્વેદમાં તૈયાર કરે છે.
વિશ્વભરના દર્દીઓની આયુર્વેદ તથા પંચકર્મથી સારવાર કરે છે. તેમના દ્વારા આયુર્વેદના ગ્રંથોના આધારે તૈયાર કરાયેલી 
થોડી ટીપ્સ પણ આપવામાં આવે છે.આ બાબતો સૌને ઉપયોગી હોઈ અહીં  નોંધુ છું.

આપણાં પરિવારમાં જે ખોરાક બનાવવામાં આવે છે.એ જ ખોરાક આપણે ખાઈએ છીએ.સ્થાનિક અને ભૌગોલિક રીતે ગુજરાતી થાળી આપણાં માટે ઉત્તમ ખોરાક છે.
કહેવાય છે કે દુનિયાની કોઈ જ વસ્તુ અમૃત કે ઝેર નથી. આ માટે આ વૈદ્ય દંપતી કહે છે.કોઈ પણ નો 
અતિરેક એને ઝેર બનાવે છે. 
સમજણ પૂર્વકનો ઉપયોગ અમૃત હંમેશ માટે હોય જ છે.

જમવામાં હમેશા તાજો ગરમ ખોરાક જ મહત્વનો છે.ભલે વાસી ન હોય પરંતુ ઠંડો ખોરાક જોઈએ એટલો લાભ આપી ન શકે.

ફાસ્ટ ફૂડ રેસ્ટોરાંમાં જે ટાઢાબોલ સલાડ પીરસે છે.
એ ઓવરલોડ છે. 
એ શરીરમાં આમ નામનું ઝેર પેદા કરે છે. 
જેને લીધે તમારી શરીરની સીસ્ટમ હેંગ થઇ શકે.

હંમેશા સ્થાનિક કુદરતી રીતે પાકેલા ફળનું જ સેવન કરવુ. 
કેરી ગીર કે વલસાડની છે 
જયારે સફરજન કાશ્મીરના.
તો તમારા માટે કુદરતી રીતે પકાવેલી કેરી વધુ લાભદાયક છે. કૃત્રિમ ગેસ કે કાર્બાઈડથી પકાવેલા ફળોથી ચેતવું.આ રીતે પકવેલ ફળ ન ખાવા.

ડાયાબીટીસ હોઈ તો સફેદ ખાંડ ના ખવાય.પણ આખું ફળ ખાઈ શકાય. સુપર માર્કેટમાં મળતા પેક્ડ ફ્રુટ જ્યુસ નહિ.એ શરીરને ખૂબ નુકશાન કરે છે.

બધા પ્રકારના તેલમાં તલનું તેલ શ્રેષ્ઠ છે. ડબલ રીફાઇન્ડ તેલ કરતા ઘાણીએ મળતું તાજું તેલ વધુ સ્વાસ્થ્યકર છે....!

દૂધમાંથી દહીં, 
દહીં વલોવીને નીતારેલું માખણ 
અને એ માખણમાંથી ગરમ કરીને બનેલું ગીર ગાયનું ઘી 
ક્યારેય કોલેસ્ટેરોલ વધારે નહિ.હા,ભેંસના દૂધની મલાઈનું ઘી કોલસ્ટ્રોલ વધારે.

કહેવાય છે કે ભાવે, ફાવે અને પચાવી શકીએ એટલું ખાવાથી શરીરની બેટરી રીચાર્જ રહે છે.અહીં જમવાની વાત કરી.એટલું જ મહત્વ નાસ્તાનું છે.
કંટાળા જનક,સ્વાદ વગરના કહેવાતા હેલ્થી ફૂડનાં નાસ્તા કરવાનું ટાળવું.ઘરે બનાવેલી વઘારેલ રોટલી પણ વધુ સ્વાસ્થ્યપ્રદ છે.ઈડલી, પૌંઆ, ચા ને ભાખરી, રોટલો ને માખણ વધુ સારા નાસ્તા છે.

ઉપવાસ કે એકટાણું કરતી વખતે ફરાળી પિત્ઝા, સાબુદાણા ખીચડીટને ઓવરલોડ કરવાથી વધુ પાપમાં પડાય.

ઉપવાસના દિવસે ગરમ પાણી પીઓ અને જરૂર પડે તો પહેલા પ્રવાહી ખોરાક જ લો.વધુ ભૂખ લાગે તો જ કોઈ ફ્રુટનું સેવન ઉપવાસના દિવસે કરવું.બટેટાની ખીચડી તમારું પેટ અને તબિયત બેય બગાડવાની શક્યતા વધી જાય છે.

જ્યાં સુધી દાંત સલામત હોય ત્યાં સુધી કોઈ તૈયાર ફ્રુટ જ્યુસ પીવાનું જ નહિ. સીઝનલ ફ્રુટ ચાવીને ખાવાથી ઉત્તમ બીજું કશું ન હોઈ શકે.કોઈ વખત 

બે કે ત્રણ મહીને એક દિવસ ખાલી મગ નાં પાણી પર રહો. આખા બોડીની સર્વિસ થઇ જશે. 

સપ્ટેમ્બર ઓકટોબર મહિનાઓ શરીરની "વિરેચનકર્મ" નામની સર્વીસ માટે શ્રેષ્ઠ મહિનાઓ છે.નજીકના ક્વોલીફાઈડ અને અનુભવી પંચકર્મ વિશેષજ્ઞ પાસે હમણાં જ પહોચી ને પ્લાન બનાવવો આજે જરૂરી છે.

બ્રેડ, બિસ્કિટ, કેક, પિત્ઝા, પાસ્તા એ ગુજરાતિઓ માટેનો ખોરાક નથી.આમેય ગુજરાતી વ્યક્તિ જ્યારે બહાર જમવા જાય તો ચાઈનીઝ, પંજાબી કે સાઉથ ઇન્ડિયન ડીશ મંગાવે.જ્યારે બેંગ્લોર નોકરી લાગે તો જાય અને બે મહિનામાં પાછો આવે.કારણ,ત્યાં રોજ સાઉથ ઇન્ડિયન ખાવાનું ન ફાવે.નોનવેજ ન ફાવે.ગુજરાતી વ્યક્તિ ને તોજમી ને સો ડગલા ચાલવાનું ન ફાવે.કહેવાતી આયુર્વેદિક કોસ્મેટીક પ્રોડક્ટ ના લેબલ ધ્યાન પૂર્વક વાંચો. ઘણીવાર એમાં ૯૯.૯૯% ભાગ હાનીકારક રસાયણો જ હોય છે.

દાંત ને મજબુત રાખવા દાંત ને પેઢા પર તલના તેલ નું માલીશ કરવી.દાંત સલામત તો સબ સલામત.સુર્યનમસ્કાર અને ઓમ પ્રાણાયામ તમારા શરીર અને મનને હેલ્થી રાખવામાં મદદ કરે છે.

આ વિગતમાં એવું કશું નથી કે આપણે ન કરી શકીએ.વાત છે મક્કમ રહીને એ અંગે વિચાર કરવાની.કારણ આપ ભલા,તો જગ ભલા.

Thursday, July 6, 2017

જવાબદાર કોણ?


હું પ્રાથમિક શિક્ષણ સાથે જોડાયેલ છું.હમણાં એવું વધારે સંભળવા મળે છે કે શિક્ષણનું સ્તર બગડ્યું છે.આ ચર્ચા બધાં કરે છે.શિક્ષણ સાથે જોડાયેલ ફરિયાદ કરે છે.વાલીઓ એક ઉપભોક્તા તરીકે વિચાર વ્યક્ત કરતાંગુસ્સો આચારે છે.અરે!ચોરે ને ચૌટે આવું જ સાંભળવામળે છે.
 પરંતુ આ માટે મોટા ભાગના લોકો શિક્ષકને દોષિત ગણે છે. જે ખોટું છે. શિક્ષણનું સ્તર નીચું જવા પાછળ કોઈ એક વ્યક્તિ કે કોઈ એક પાસું જવાબદાર નથી. તેના ઘણાં કારણો છે, પરંતુ દોષનો ટોપલો માત્ર શિક્ષક પર જ ઢોળવામાં આવે છે. ચારે બાજુથી ક્યારેક શિક્ષકને ધમકાવવામાં આવે છે તો ક્યારેક તેને સલાહ પણ આપવામાં આવે છે. વર્ષભર યોજાતી તાલીમો તેનું ઉદાહરણ છે. હમણાં જ ગાંધીનગરમાં એક દિવસીય ચિંતન શિબિર શિક્ષકો માટે યોજાઈ ગઈ. શિબિર કે તાલીમ પછી સાચા અભિપ્રાય ક્યારેય મેળવ્યા નથી. શિક્ષકોને શું જોઈએ છે ? તેમને શેની જરૂર છે તે જાણવાના પ્રયત્ન સિવાય જ તાલીમો કે શિબિરો ગોઠવાય છે. કેટલાક લોકો કહે છે કે એમાં શિક્ષકોને પૂછવામાં આવતું નથી.અરે...શિક્ષકોના સુચનથી જ આ તાલીમનું આયોજન,મોડ્યુલ અને અન્ય વિગતો તૈયાર થાય છે.અમલી બને છે.


સરકારી આંકડા બતાવે છે અને આપણે જાણીએ જ છીએ કે છેલ્લા કેટલાંક વર્ષોથી શાળાઓમાં પ્રવેશીકરણ વધ્યું છે, અપવ્યય અને સ્થગિતતામાં ઘટાડો થયો છે. તો શું આમ બનવા પાછળ શિક્ષકોનો ફાળો નથી ? જો સારું થાય તો પોતે જશ લે અને ખરાબ થાય ત્યાં શિક્ષકોનો દોષ. આ ક્યાંનો ન્યાય કે તારણ ? આપણે સૌ જાણીએ છીએ કે સરકાર દ્વારા શિક્ષકોને શિક્ષણ સિવાયના ઘણાં કામ સોંપવામાં આવે છે, કારણ કે સરકારને શિક્ષક પર વિશ્વાસ છે કે, તે કામ કરશે અને ખોટું નહીં જ કરે. ત્યારે પ્રશ્ન થાય કે, જો શિક્ષક શિક્ષણ સિવાયના બહારના કામ પૂરી નિષ્ઠાથી કરતો હોય તો શું તે વર્ગખંડમાં ભણાવવાનું કામ ના કરે ? શા માટે તેની પર દોષ ઢોળીએ છીએ ?

જે કારણો શિક્ષણની ગુણવત્તા માટે અવરોધક છે તેવા કારણો દૂર કરવા માટે જરૂરી તમામ મદદ કરવી જોઈએ. આપણે તો એનાથી ઊંધું કરીએ છીએ. નબળી શાળાને જરૂર છે તેટલું આપતાં નથી, ઉપરથી શિક્ષા કરીએ છીએ. જ્યારે સારી શાળા કે જેને જરૂર નથી તેને ના માગે તો પણ આપે જઈએ છીએ. ભાઈ, જરૂર નબળાને હોય, સબળાને નહીં, પણ શિક્ષામાં માનનારા આપણે આપણી જાતને ખરા અર્થમાં સુધારાવાદી માની બેઠા છીએ.

ગુણોત્સવ પૂર્વે કેટલાક શિક્ષકો સાથે ચર્ચા થયેલ. જાણવા મળેલું કે કેટલાક શિક્ષકો રાત દિવસ એક કરીને પોતાના ગજવામાંથી પૈસા કાઢીને કામ કરતા હતા ! ગુણોત્સવ વાસી ઉત્તરાયણના બીજા દિવસે હતો. એ દિવસોમાં વિદ્યાર્થીઓની હાજરી ઓછી જોવા મળે તે સ્વાભાવિક છે. ત્યારે શિક્ષકોએ પોતાના પૈસે પતંગ-દોરી લાવીને વિદ્યાર્થીઓને વાસી ઉત્તરાયણ શાળામાં જ કરવી હતી. જેથી બીજા દિવસે હાજરી પૂરેપૂરી રહે ! પણ આવી અપેક્ષા બારે માસ શિક્ષકો પાસે રાખવી યોગ્ય નથી અને જો રાખવી જ હોય તો સરકાર અને સમાજે શિક્ષકોને સગવડતા અને પ્રોત્સાહન પૂરા પાડવા જોઈએ.

હા, સમાજમાં વ્યાપેલી બદીઓની અસર કેટલાક શિક્ષકોને થઈ છે, પણ એના માટે શિક્ષક આલમને દોષિત ગણવી યોગ્ય નથી. રાજકારણમાં કોઈ ભ્રષ્ટાચાર કે ગુંડાગર્દી કરે તેનો અર્થ એવો નથી કે બધા જ રાજકારણી ખરાબ છે. કોઈ ડોક્ટર દર્દીને છેતરીને પૈસા કમાય તો તેનો અર્થ એવો નથી કે બધા ડોક્ટર ખરાબ છે. પોલીસ સ્ટેશનમાં બળાત્કાર થાય તો તેનો અર્થ એવો નથી કે બધા જ પોલીસ સ્ટેશનમાં એવું થાય છે. તો શિક્ષકોમાં પણ અપવાદરૂપ ઘટનાને કારણે તમામ શિક્ષકોને દોષિત ગણીને કાર્યક્રમો કે પગલાં લેવા તે પણ યોગ્ય નથી.

શિક્ષણનું સ્તર નીચું જવા પાછળ શિક્ષકો ઉપરાંત સરકાર, સમાજ, વાલી, અધિકારીઓ, સંચાલકો કે કેળવણી મંડળો વગેરે પણ એટલા જ જવાબદાર છે. કોઈ એક પાસાંને ટાર્ગેટ કરીને શિક્ષણ સુધારણાના કાર્યક્રમો કરીશું તો તે થીગડાં માર્યા બરાબર થશે. જેમાં અંતે નિષ્ફળતા જ મળશે. સરકાર અને સમાજના સહિયારા પુરુષાર્થની જરૂર છે. જેમાં શિક્ષકોને સહભાગી બનાવી તેમના સલાહ-સૂચનો લઈને જ આગળ વધવું પડે. બાકી ઓફિસોમાં બેસીને નિર્ણયો લેવાથી સમય, સત્તા અને સંપત્તિનો બગાડ જ થશે.ગુજરાતમાં અનેક એવા શિક્ષકો છે.જેમણે પોતાની હાલાકી કે સમસ્યા સામે સફળતા પૂર્વક કામ પાર પાડ્યું અને પરિણામ મેળવ્યું છે.ખાનગી શાળાઓને હંફાવનાર શિક્ષકોની શાળામાં શું ચૂંટણીની કામગીરી નહિ આવતી હોય?કેટલીય શાળામાં,અરે!સરકારી શાળામાં બાળકો કક્ષા મુજબ વાંચે છે.શું એમને કોઈ પ્રશ્નો નહિ હોય?વૈશ્વિક કે રાષ્ટ્રીય એવી અનિયમિતતા માટેય સફળ ઇનોવેશન થયાં છે.સવાલ છે કાર્ય કરવાનો.જવાબદારી નક્કી કરનાર પહેલાં જાણકાર હોય તે જરૂરી છે.બાકી...જય શિક્ષણ...

Sunday, July 2, 2017

GST की कहानी....

नरेंद्र मोदी
हमारे प्रधान मंत्री!
समग्र भारत आज GST की बात कर रहा हैं!इस बात से मोदी विश्वमें आज चर्चित हैं!GST को पहले कोंग्रेस सरकार ने रखा था!श्री राजीव गांधी के समय से शुरू हुई ऐ व्यवस्था आज से लागू हुई हौं!राजीव गांधी,विश्वनाथ प्रताप सिंह,चंद्रशेखर,देव गौड़ा,पी वी नरसिंह राव,मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी!
कोई पेड़ ऐसे ही फल नहीं देता!उसके लिए इन्तजार करना पड़ता हैं!मेरे एक दोस्त हैं!उन्होंने GST के लिए एक कहानी भेजी थी!

कहानी में लिखा था...
एक गाँव था!
उसमें एक लड़का था!
लड़का कुंवारा था!कभी कभी रात को वो घर देर से आता उसे जवाब देने पड़ते!
माँ...बाबूजी...बड़ेभाई...भाभी...दीदी...सभी उसे सवाल करते और उसे सबको जवाब देना पड़ता था!

समय बीतता गया!
उसकी शादी हो चुकी हैं!इसे किसीको जवाब नहीं देना पड़ता!अब् वो सिर्फ उसकी बीबीको ही जवाब देता हैं!

दूसरी बात ऐ के माँ...बाबूजी...बड़ेभाई...भाभी...दीदी... से सेटलमेंट हो सकता था!बीबी से सेटलमेंट नहीं हो सकता!

GST समझने के लिए इससे सरल कोई बात नहीं हैं!इस चर्चा में एक नई बात किसी न्यूज़ पेपरमे पढ़ने को मिली!इस अख़बार में लिखा था 'चश्मे बदलने को कहोगे चलेगा,आँखे बंध करना कहोगे तो गलत होगा!'
GST के लिए केंद्रसरकार का ये बयान GST से जुड़े लोगोंको बहोत कुछ सीखा जाता हैं!

Monday, June 26, 2017

आहार...








मांसाहारी और शाकाहारी!एक बड़ी चर्चाका विषय हैं।मेने पहले भी इसके बारे में लिखा हैं!मेने पहले लिखाथा क्या खाया नही,खाया की नहीं ये सवाल महत्वपूर्ण हैं!दोनों में अंतर हैं!क्या खाया?क्यों खाया!

मोज शोख ठीक हैं!आप ऐ बतावो की क्या इतना अनाज हम पैदा कर पाएंगे कि सभी शाकाहारी हो जाय!

आहार को सिर्फ आहार के रूपमें देखा जाना चाहिए!शाकाहार,मांसाहार,त्रुनाहार और समुद्री फल !कई बातें हैं!कई लहजे हैं!सवाल हैं कि क्या होना चाहिए!एक फेमिली रेस्टोरॉन्टमे पार्टी करती हैं तो साऊथ,पंजाबी,चायनीज या कुछ और मंजवाएंगे!उसी परिवार का जिसने उसदिन होटल में इडली मंगवाईथी उसे अगर बैंगलोर जॉब लगेगी तो वो नहीं जायेगा!
कहेगा...खाना ठीक नहीं!तो क्या महाशय आपने खाने के लिए पढ़ाई की थी?

अरे...खाना जिन्दा रहने के लिए हैं!आज मांसाहार से बात शुरू हुई तो शाकाहारी और मांसाहारी की शरीर रचनामें क्या भेद हैं वो भी देखते हैं !

ध्यान रहे,परमपिता परमात्मा ने प्राणियों के आहार का निर्धारण उनके शरीर की विशेष संरचना बनाकर किया है।


मांसाहारी और शाकाहारी प्राणियों के शरीर की रचना में परमात्मा ने किस प्रकार भेद किया है!

शाकाहारी–प्राणियों के मुख म़े दाढ़े होती हैं जिसे वे अन्न को चबा कर पीस देते हैं। दांतों में अंतर नहीं होता।
मांसाहारी:प्राणियों के मुख के अग्र भाग में तीक्ष्ण नुकीले दो दांत किल्ले रुप में होते हैं उनके दाढ़े नहीं होने से यह मांस रुपी भोजन को सीधा सटकते हैं,पीसकर नहीं खाते तथा दांतों में भी अन्तर होता है।

शाकाहारी: प्राणी होंठ से पानी पीते हैं।
मांसाहारी:जीभ से चाट-चाट कर(चप चप करके) पानी पीते हैं।

शाकाहारी:इनकी संतान की आंखें पैदा होते ही खुलती हैं,बंद नहीं रहती।
मांसाहारी:इनके बच्चों की आंखें पैदा होने पर बंद रहती हैं,जो 2-3-4 दिनों बाद खुलती हैं।

शाकाहारी:तीक्ष्ण नाखून नहीं होते
मांसाहारी:पंजों पर नाखून तीक्ष्ण व नुकीले होते हैं

शाकाहारी:आंतों की लम्बाई उनके शरीर से 8 से 10 गुना बड़ी होती है।
मांसाहारी:आंतों की लम्बाई कम होती है,कारण? मांस आंतों में ज्यादा समय न रहे।

शाकाहारी:लीवर व पित्ताशय छोटा होता है।
मांसाहारी:लीवर व पित्ताशय शरीर के परिमाण से बड़ा रहता है।

शाकाहारी:अंधेरे में पूर्णतः नहीं देख सकते।
मांसाहारी:अंधेरे में स्पष्ट दिखायी पड़ता है।

शाकाहारी:पसीना पूरे शरीर से आता है।
मांसाहारी: पसीना सिर्फ जीभ से आता है

शाकाहारी:इनका रक्त क्षारयुक्त होता है।
मांसाहारी:इनका रक्त अम्लयुक्त होता है।


परमात्मा ने सर्वश्रेष्ठ मानव प्राणी को शाकाहारी ही बनाया है

मनुष्य स्वभावतः शाकाहारी है,मांसाहार एक गलत आदत है
प्रकृति के नियमो के विरुद्ध कार्य न् करे , मनुष्य की प्रकृति शाकाहार है अतः शाकाहारी बने!जरूरत न होने से पहले मांसाहार न करे!

आजकल मेडिकल में भी मांसाहार हैं!आप के शरीर को अगर आवश्यकता हैं तो आप को मांसाहार करनाही चाहिए!में यह नही कहता की जीव हत्या हो।मेरा कहनेका मतलब हैं कि जो मृत्यु प्राप्त कर चुके हैं उनके बारेमें ही सोचे!अगर मेरा उपरोक्त पेरेग्राफ पढके जिन्होंने अपने मुख की सुंदरता को छोड़ा हैं वो यह अवश्य पढ़ें!

में डीसा से हूँ!
यहाँ आलू का उत्पादन हैं।
मेने सुना हैं कि आलू को काट गए तो ही दूसरा आलू उत्पन होगा!काटने के बाद भी आलू जिन्दा हैं।फिरभी शाकाहार!जीव हत्या के बारे में भाषण करने वाले आलू,गाजर,मूली को जीव नहीं मानते हैं!

आलू काटने के बाद भी जिन्दा हैं!वो चिल्लाता नही इस लिए जिव नही?मांसाहार के बारे में बोलने वाले अब ये बोलेंगे की जो नहीं चिल्लाते ऐसे जीवोंकी ही हम रक्षा करेंगे!अगर आप आलू को सजीव मानते हैं तो ही बकरे को सजीव मानो।गुजरात में ही हमने सुना हैं कि 56 के काल में माँ  आने मरे हुए बेटेकी लाश से मांस खाती थी!
फिर से कहूंगा जिन्दा रहने के लिए ही खाने की आवश्यकता हैं!आप अपनी राय मुझे अवश्य भेजे...!

Saturday, June 24, 2017

कूड़ा कचरा...











एक दिन एक व्यक्ति ऑटो से रेलवे स्टेशन जा रहा था। ऑटो वाला बड़े आराम से ऑटो चला रहा था। एक कार अचानक ही पार्किंग से निकलकर रोड पर आ गयी। ऑटो चालक ने तेजी से ब्रेक लगाया और कार, ऑटो से टकराते टकराते बची। कार चालक गुस्से में ऑटो वाले को ही भला-बुरा कहने लगा जबकि गलती कार- चालक की थी। ऑटो चालक एक सत्संगी (सकारात्मक विचार सुनने-सुनाने वाला) था। उसने कार वाले की बातों पर गुस्सा नहीं किया और क्षमा माँगते  हुए आगे बढ़ गया। ऑटो में बैठे व्यक्ति को कार वाले की हरकत पर गुस्सा आ रहा था और उसने ऑटो वाले से पूछा तुमने उस कार वाले को बिना कुछ कहे ऐसे ही क्यों जाने दिया। उसने तुम्हें भला-बुरा कहा जबकि गलती तो उसकी थी। हमारी किस्मत अच्छी है, नहीं तो उसकी वजह से हम अभी अस्पताल में होते। ऑटो वाले ने कहा साहब बहुत से लोग गार्बेज ट्रक (कूड़े का ट्रक) की तरह होते हैं। वे बहुत सारा कूड़ा अपने दिमाग में भरे हुए चलते हैं।

जिन चीजों की जीवन में कोई ज़रूरत नहीं होती उनको मेहनत करके जोड़ते रहते हैं जैसे क्रोध, घृणा, चिंता, निराशा आदि। जब उनके दिमाग में इनका कूड़ा बहुत अधिक हो जाता है तो वे अपना बोझ हल्का करने के लिए इसे दूसरों पर फेंकने का मौका ढूँढ़ने लगते हैं। 

इसलिए मैं ऐसे लोगों से दूरी बनाए रखता हूँ और उन्हें दूर से ही मुस्कराकर अलविदा कह देता हूँ। क्योंकि अगर उन जैसे लोगों द्वारा गिराया हुआ कूड़ा मैंने स्वीकार कर लिया तो मैं भी एक कूड़े का ट्रक बन जाऊँगा और अपने साथ साथ आसपास के लोगों पर भी वह कूड़ा गिराता रहूँगा। 
मैं सोचता हूँ जिंदगी बहुत ख़ूबसूरत है इसलिए जो हमसे अच्छा व्यवहार करते हैं उन्हें धन्यवाद कहो और जो हमसे अच्छा व्यवहार नहीं करते उन्हें मुस्कुराकर माफ़ कर दो। हमें यह याद रखना चाहिए कि सभी मानसिक रोगी केवल अस्पताल में ही नहीं रहते हैं। कुछ हमारे आस-पास खुले में भी घूमते रहते हैं ।                                                                                                       प्रकृति के नियम: यदि खेत में बीज न डाले जाएँ तो कुदरत उसे घास-फूस से भर देती है। 
उसी तरह से यदि दिमाग में सकारात्मक विचार न भरें जाएँ तो नकारात्मक विचार अपनी जगह बना ही लेते हैं।                                            
दूसरा नियम है कि जिसके पास जो होता है वह वही बाँटता है। "सुखी" सुख बाँटता है, "दु:खी" दुःख बाँटता है, "ज्ञानी" ज्ञान बाँटता है, भ्रमित भ्रम बाँटता है, और "भयभीत" भय बाँटता है। जो खुद डरा हुआ है वह औरों को डराता है।

Wednesday, June 7, 2017

पतंजलि:कनैया कुमार

नागपुर। जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष छात्र नेता कन्हैया कुमार ने आज बीजेपी, आरएसएस और पीएम नरेंद्र मोदी पर बड़ा हमला बोला। राष्ट्रवाद के मुद्दे पर कन्हैया कुमार  ने कहा कि समाज के कई तबके भय के माहौल में रह रहे हैं और मौजूदा परिदृश्य में पतंजलि ब्रांड का फेस वॉश नहीं लगाने के लिए भी किसी को राष्ट्रविरोधी ठहराया जा सकता है।

डॉ. बी आर अंबेडकर की जयंती के एक दिन पहले अपनी हिंदी किताब के मराठी संस्करण बिहार ते तिहाड़ का विमोचन करने पहुंचे कन्हैया कुमार ने कहा, देश में अभी भय का ऐसा माहौल है कि अगर आप पतंजलि का फेस वाश इस्तेमाल नहीं करते तो आप राष्ट्रविरोधी कहे जाएंगे। उल्लेखनीय है कि पतंजलि आयुर्वेद कंपनी योगगुरू बाबा रामदेव द्वारा शुरू की गयी एफएमसीजी कंपनी है।

कन्हैया कुमार ने कहा कि बाबासाहब ने ऐसा संविधान तैयार किया कि इसमें समाज के हर सदस्य को कई प्रकार से आजादी मुहैया करायी गयी है। लेकिन संविधान में निहित आजादी समाज के एक बड़े हिस्से को नहीं मिल सकी है।

उन्होंने दावा किया कि मौजूदा परिदृश्य में, गरीब, दलित, महिलाएं, आदिवासी, पिछडे वर्ग, अल्पसंख्यक और यहां तक कि बुद्धिजीवी सहित समाज के विभिन्न तबके भय में रहते हैं।

कुमार ने कहा कि हाल ही में फीस में वृद्धि का विरोध करने पर पंजाब विश्वविद्यालय के 68 छात्रों के खिलाफ राजद्रोह का मामला दर्ज किया गया। उन्होंने कहा, देश का मौजूदा परिदृश्य ऐसा है कि अगर आप फीस में कमी किए जाने की मांग करते हैं तो आपको राष्ट्रविरोधी ठहरा दिया जाएगा।