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Wednesday, November 1, 2017

જાદુઈ શાળા


મારી જાદુઈ શાળા.
ડૉ. અભય બંગ દ્વારા લખાયેલ આ પુસ્તકનો શ્રી અરવિંદભાઈ ગુપ્તા એ રજૂઆત કરી છે.આ પુસ્તકનો ગુજરાતી અનુવાદ દીપ્તિ રાજુએ કર્યું છે.
શ્રી અભય બેંગ દ્વારા પોતાના શાળા જીવનના અનુભવ રજૂ કરવામાં આવેલ છે.
જો બાળકો શાળાએ જતાં હોય તો રોકવા નહિ.જો બાળકો શાળાએ જતાં ન હોય તો તેમને ધકેલવા નહીં.આવા અનેક વિચારો અને વાતો માટે આ પુસ્તક ખૂબ જ મહત્વનું છે.શિશુ મિલાપ દ્વારા પ્રકાશિત આ પુસ્તક વાંચવું આપણે ગમશે.કારણ આ પુસ્તકમાં જાદુઈ શાળા,જાનવરો સાથે પરિચય,સંતોનો મેળો,વનસ્પતિ શાસ્ત્રનું શિક્ષણ,જીવાતા જીવનનું ગણિત અને સાથોસાથ રસોઈ દ્વારા શિક્ષણ જેવા કેટલાય મુદ્દાઓ અંગે આ પુસ્તકમાં સરળ શૈલીમાં રજૂઆત કરી છે.ખેતીના પ્રયોગો,જીવંત શિક્ષણ અને શિક્ષણમાં નવીનીકરણ અંગેય સરળ ભાષામાં લખાણ લખાયું છે.
નવરચિત સ્ટેટ રિસોર્સ ગ્રુપના સૌ સભ્યોને આ પુસ્તક આજે મળ્યું છે.આપ પણ આ પુસ્તકની વાંચવા માંગતા હોય તો સંપર્ક કરશો.
#શુભમસ્તુ...

Sunday, October 15, 2017

विचार कैसे खोजे...


आज हमारे पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम सर का जन्म दिबस हैं।हम आशा रखते हैं कि आप बच्चो के नवाचार इकठ्ठा करने में सहायक बनेंगे।बच्चो से नवाचार प्राप्त करने के लिए आप इस क्रम में बढ़े गए तो आसानी होगी।

आप से निवेदन हैं।आप के घरमें नवाचार की चर्चा करें।
हम ऐसा करते हैं।एक दो सवाल रखे।ये सवाल ऐसे हो कि आप स्थानिक समस्या से जुड़े हो।

ऐसे सवाल करें...

1.अगर रास्तेमें साइकल का पंक्चर हो जाये तो...

2.सायकल के साथ चलाने के अलावा और क्या क्या हो सकता हैं?

3.अगर कोई चीज गुमने से ऊर्जा पैदा होती हैं तो उसके अन्य अवकाश कोनसे हैं।

4.कैसा शौचालय बनाया जाए कि पानी की खपत कम करे?

5.दिव्यागों के लिए शौचालय की क्या डिजाइन हो सकती हैं।

6.अगर कोई बच्चा सुन नही सकता तो वो एड्रेस कैसे पूछेगा ओर बताएगा।

7.डिब्बेमें से तेल निकाल ते समय तेल बिगड़े नहीं इस के लिए क्या क्या हो सकता हैं?

8.विकलांग व्यक्ति को कार या मोटर साइकिल पर बिठाने के लिए विशेष यंत्र।

9.ICT के उपकरण के इस्तमाल करने में विकलांग व्यक्तियो को सहायक उपकरण।

10.शिखने के तरीके को रोचक बनाने हेतु सहपाठी क्रिया,प्रक्रिया।

ये सवाल सिर्फ दिशा निर्देश करते हैं।ऐसे सवाल के बाद दूसरे चरण में इस में क्या क्या उपलब्ध हैं उसके बारे में आप उनसे चर्चा करें।

ॐ शांति...

आप को सिर्फ चर्चा करनी हैं।कोई सोच या दिशा का निर्देश करना हैं।आप लोकसभा में स्पीकर की तरह  संचालन करें आपको कोई दिशा निर्देश नहीं देना हैं।

अब आप बच्चो को खुला छोड दीजिए।उनके आसपास भी कई समस्या होगी।उन्हें उनके सवाल के लिए जवाब या कोई रास्ता सोचने को कहिए।इस के लिए उन्हें 30 मिनिट का समय दीजिए।

बादमें सभी बच्चे ग्रूपमें अपना प्रेजेंटेशन करेंगे।जो भी अच्छे विचार आपको लगते हैं उसमें संम्भावना न दिखे फिरभी आप नए विचारको एकत्रित करें।

आप की सहाय से बच्चो के जो नवाचार मिलेंगे उनको srushti.org के मार्गदर्शन से उन्हें IGNIT एवॉर्ड के लिए NIF को भेजे जाएंगे।
आप सभी से ये अनुरोध हैं कि आप बच्चो के विचारों के नवाचार को इकट्ठा करने में सहयोग करें।

आज से छुट्टियां हैं।

आप आपके घर परिवार के,सोसायटी या पडोशी के या कोई भी बच्चो के नवाचार भेज सकते हैं।
आप से उम्मीदे हैं।
आप
7rangiskill@gmail.com पर अपने नए विचार भेजे।

भवदीय
डॉ भावेश पंड्या
को.कॉर्डिनेटर सृष्टि:
2017:18

09925044838

Saturday, October 14, 2017

हम बदलेंगे...

हम जो सोचते हैं।
वो सब अगर हो जाता तो किसी व्यक्ति या व्यवस्था का महत्व न रहता।आजकल देखा जाए तो लोग कही सुनी बातोपे यकीन करते हैं।आजकल मीडिया सक्रिय हैं।मीडिया से तुरंत जुड़ा दूसरा कोई शब्द हैं तो वो हैं,सोशियल मीडिया।क्या हम उस भीड़ का हिस्सा बनेंगे?क्या हम किसी की कही सुनी बातोपे यकीन करेंगे!मेरे एक दोस्तने मुजे कार्टून भेजा।एक हड्डी केबीपीछे पूरा मीडिया चलता हैं।आज भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के पास अपनी खुद की या खरीदी हुई मीडिया हैं।अब गुजरात के चुनाव में ये ज्यादा दिखाओ देगा।इस बात को किसी दूसरे तरीके से देखते हैं।
पति सदैव अपनी पत्नी के लिए काम करता है।कुछ बाते भूलता हैं।पत्नी को कभी कुछ नहीं दे पाता।पति को हैं कि उसे पसंद न आये।इस बीच बात बिगड़ती हैं।फिर भी वो दोनों एक दूसरे के सामने न होनेबपर भी उनकी चिंता करते हैं।सुबह झगड़ा होने के बाद फोन पे एक दूसरे से बात करते हुए दोनों रो लेते हैं।दोनों एक दूसरे के लिए जीते मरते हैं।मगर फिरभी प्यारी बात पे कुछ बोलभी लेते हैं।जगड़ा भी कर लेते हैं।रोते हुए भी अपनी गलती मानते हैं,गलती जताते हैं।
मेरा मानना हैं कि पत्रकारों को अपने कर्म के बारे में भी सोचना चाहिए।क्या ऐसा हो सकता हैं कि पत्रकार खरीखोटी सुनाता हो,लिखता हो फिरभी उसका ये काम हैं।पत्रकार जैसे प्रत्येक व्यक्तिको खुश नहीं रखपायेगा वैसे ही पति और पत्नी सदैव हर बातपे खुश नहीं हो सकते,नहीं कर सकते।पत्रकारों का ठीक हैं,मगर हमे तो हमारे परिवार के साथ बीबी ओर बच्चोबके लिए कुछ तो करना हैं।
जैसे बर्थ डे पर विष न करने वाले पति को पत्नी माफ करती हैं,वैसे ही पतियों को भी ये करना चाहिए। कुछ पत्रकारों की तरह हड्डी के पीछे,यानी पुरानी आदतों के पीछे न दौड़ते हुए हर बार गिफ्ट देके विष करना चाहिए।हमे ये तय करने में दिक्कत नही होनी चाहिए कि उन्हें क्या देना हैं,क्या गिफ्ट या स्मृति देनी हैं।
मीडिया के कुछ साथियों की हड्डी तय हैं।हमारे जीवन में जैसे साथ बढ़ता हैं हड्डियां बदल जाती हैं।आज हड्डी ओर कुछ पत्रकारों के लिए दियागया आए कार्टून हमे भी पुरानी भूलने की या दिन मेनेज न करने की आदत बदले।
गायत्री परिवार में कहा जाता हैं कि 'हम बदलेगे, युग बदलेगा।हम इस नए साल से पुरानी गलती न दोहराते हुए बदलाव लाएंगे,खुद बदलेंगे।
#Bnoवेशन

Wednesday, October 11, 2017

क्या करेंगे?

शिक्षा से जुड़े लोग इसे जल्द समजेंगे।इस के आधार से एक बात तय हैं कि शिक्षक जो पढ़ाता हैं।बच्चे से पहुंचने से पहले ही वो बात किसी बड़ी खाइमें जा गिरती हैं।अब इस बात को समझ ने वाले कितने हैं।सिर्फ वन वे प्रोसेस से शिक्षामें परिणाम प्राप्त नहीं होते।इस के लिए शिक्षामें सुधार करना जरूरी हैं।ये सुधार क्या हो सकते हैं,वो जान ने के लिए अध्यापन कार्य से जुड़े साथियो से ही बात करनी पड़ती हैं।
हा, एक बात हैं।बच्चे को जानकारी की नही,नए विचार की खोज सिखानी हैं।आप ओर हम आज ऐसी चीजें इस्तमाल करते हैं, जो हम पड़ते थे उस वख्त नहीं थे।आज हम उसका इस्तमाल कर लेते हैं।बस,आगे के समय मे बच्चे भी ऐसे समझदार बने की वो भी अपने जीवन में आगे बढ़े।एमजीआर उसके पहले हमें ये खाई को दूर करना पड़ेगा।

Sunday, October 8, 2017

हमारा साथ...

किसी को हम देखते हैं।कोई हमे देखता हैं।कोई व्यक्ति सफल होती हैं।कोई निष्फल होता हैं।सफलता कभी व्यक्तिगत नहीं हो सकती।सफल होने के लिए सहारा या सहयोग आवश्यक हैं।किसी ने खूब कहा हैं कि सफतला पाने वाली व्यक्ति कभी अकेली नहीं होती।या तो उनसे कोई जुड़ता हैं,या वो किसी से जुड़ते हैं।कई लोग ऐसे होते हैं जो सिर्फ सहकार चाहते हैं।उनकी चाहत इतनी होती हैं कि हम भूल के भी उसे नहीं भुला सकते।
अगर कोई बिना शर्त समर्थन करता है।उनका समर्थन कुछ दिनों बाद शार्टमें बदल जाता हैं।ऐसा सिर्फ पॉलिटिक्स में होता हैं।जीवनमें तो शर्तो के साथ कोई समर्थन नहीं देता।अगर कोई समर्थन देता हैं तो हमे उसके ऊपर सोचना चाहिए कि ऐसा क्यों हो रहा हैं।
में सिर्फ इतना कहूंगा कि अगर में किसी काम में सफल हुन तो इसका मतलब मेरे पीछे कई सारे लोगोकी दुआए हैं।अगर में सफल नहीं हूं तो इसका मतलब हैं कि अभी मेरे पीछे दुआ कम हैं।
में अकेला नहीं बढूंगा,में हाथ को साथ लेके चलूंगा।भले मेरी चलने की गति धीमी हो जाय।आप का स्नेह मिलता रहेगा,हम आगे बढ़ते रहेंगे।

Monday, September 11, 2017

शिक्षा मेरा शोख ....

आजकल किसी को कहे की आपका शोख क्या हैं?इस सवाल को सुनते ही हमे कुछ ऐसे जवाब मिलते है जो तय होते हैं!जैसे की खेलना,पढ़ना,गुमना,संगीत और ऐसे कई सरे जवाब मिलते हैं!अगर ऐसे व्यक्ति को उसने जो शोख दर्शाया हैं उसके आधार पे कुछ काम दिया जाय तो हमें मालुम पड़ता हैं की अपने शोख्में बताई कोई क्रिया ये व्यक्ति नहीं कर सकते हैं!आसपास देखा जाए तो की सरे लोग ऐसे हैं जो शोख न होने के बावजूद भी वो काम अच्छी तरह से करते हैं!
काम को दो तरीके से देखा जाता हैं!
एक काम ये हैं जो की हम अपना परिवार चलने के लिए करते हैं!दूसरा काम हम शोख से करते हैं!दोनों काम के नतीजे अलग अलग हैं! किसी से हमे खुशी मिलाती हैं तो किसीसे हमें पैसा!खुशी और पैसा दोनों हमारे लिए महत्त्वपूर्ण हैं!ऐसे महत्वपूर्ण बातों को हमें सिर्फ दिखाना नहीं उसे जीवनमें उतारनी होती हैं!ऐसी बातें जो सुननेमें अच्छी लगाती हैं मगर उसके ऊपर काम करने से हमें पता चलता हैं की शोख निभाना और उसे बनाये रखना भुत मुश्किल हैं!जो मुश्किल से बहार आता हैं वो सफल होता हैं!अगर थोड़े दिनोमें सफलता मिलती तो सिर्फ गुजरातमें कई सरे चित्रकार और संगीतकार होंते!सिर्फ कुछ दिन वर्कशॉप या प्रेक्टिस से महारत हांसिल होती तो शोख बनता!आजकल हमारे बच्चो के पेरेंट्स समर केम्पमें बच्चो को बजाते हैं!मगर वैसेही कुछ दिनोमें अगर कोई शोखीन स्किल प्राप्त कर ले तो वो लाखो बच्चोमें एकाद होता हैं!
सभीके लिए ऐ संभव नहीं हैं!मेरा शोख शिक्षा हैं!अगर मुझे मेरा शोख पाले रखना हैं तो उसमें क्या नया होता हैं वो मुझे जानना हैं!खेल का शोख रखने वाली व्यक्ति खेल के बारें में जानकारी प्राप्त नहीं करेगा तो...बस,एक सवाल के साथ में मेरी बात आज ख़त्म करता हूँ! 

Friday, September 8, 2017

No problame...

हम कुछ नया करना चाहते हैं।उस वख्त हमारी बात कोई समझने को तैयार नहीं होता।हम कुछ करें और इसके लिए हमे शाबाशी मीले तो हम खुश होते हैं।कई बार ऐसा होता हैं कि कोई हमारी बात सुननेको या आमजन को तैयार नहीं होता।
ग्रेहाम बेल।एक संशोधक ओर शोधक।उन्होंने टेलीफोन की शोध की।यहाँ सवाल ये हैं कि जिसने टेलीफोन की शोध कीथी वो सुन नहीं पाते थे।उनके घरमे उनके अलावा बीबी ओट बच्चे थे।बीबी सुन नहीं पाती थी,बच्चा पागल था।उनके इस मशीनके बारे में किसने माना होगा कि एक बहेरा आदमी टेलीफोन की शोध करेगा!एक तरफ दुनियामें सबसे अधिक सदस्य वाली भारतीय जनता पार्टी हैं।एक सोचने वाली बात ये हैं कि भाजपा या जनसंघ की स्थापना कितने लोगोने कीथी?
बस,अपने काम में लगे रहे।हमे को देखता या सुनता हैं वो महत्वपूर्ण बात नहीं हैं।लगन से नियत अनंत की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहें।
#आपका महत्व...

Saturday, August 19, 2017

नया वाला पुराना...

हमारे आसपास बहोत कुछ नया हम देखते हैं।जब कुछ अच्छा होता हैं तो हम उसकी सराहना करते हैं।जब कुछ नया करने की बात आती हैं तो हम अपने आप को इससे अलग कर लेते हैं।पीटर ड्रकर ने इसके लिए कहा हैं कि अगर आप नया चाहते हैं तो पुराना काम बंध करदो।नया सोचेंगे तो नया कर पाएंगे।
मेने मीडिया में कार्टूनिस्ट के तौर से काम किया था।उस वख्त मुजे संपादक ने कहा कि कुछ नया करो।कार्टून में क्या नया करूँ।मेरे लिए आए मुश्किल काम था।मेने मेरे कार्टून को पोलिटिकल कॉमेंट के बदले बच्चो से जुड़े कार्य को कार्टून स्वरूप में बनाना तय हुआ।मेने 4 कार्टून के एक ब्लॉक को 8 कॉलम 6 सेमी में बनाया।गुजरात मे बच्चो के कार्टून में ये नवाचार प्रथम हमने किया था।उस वख्त कार्टून आज के जैसे कॉम्प्यूटर से नहीं बनते थे।
जो बच्चे उस वख्त मेरे बच्चों से जुड़े कार्टून देखते थे,आज उनकी संतान के लिए में कार्टून बनाता हूँ। आज मे कार्टून बनाता हूँ।अब प्रकाशित नहीं करवाता।नहीं किसी दैनिक पत्रमें या साहित्य के लिए कार्टून बनाता हूँ।
मेरी आदत थी।रोज कार्टून बनाना।पहले ओर आज के मिला के मेरे 300 बच्चो के ओर उतने ही अन्य कार्टून हैं।मेरे सहयोगी उस की किताब बनाना चाहते हैं।उस किताब में रोज नया सोचा हैं।रोज पुराना भुला हूँ।मेरे साथी जो रोज पुराना याद रखके नया करना चाहते हैं उन्हें कहूंगा कि नया पाने के लिए पुराने तरीको को छोड़ो।
हमारे विचार नए हैं।
हमारे आचार नए हैं।
हमारे फैंसले नए हैं।
तो चलो... पुरानी गलतियों को भूल के नए जीवन की राह बनाएं।

Sunday, July 30, 2017

इच्छाशक्ति ओर नवाचार...

जब कुछ होता हैं, तब कुछ कुछ होता हैं!आप देखते है कि बैठने के टेबल को चलने के लिए उपयोगमें लिया जा रहा हैं!ये फोटोग्राफ पूर्वांचल भारत से हैं!बारिश में एक अगर रोड के ऊपर चलना है तो?हो सकता हैं कि यह कोई व्यापारी हो!रोड के दोनों तरफ उसकी दुकान हो!कुछ भी हो सकता हैं!अभी तो हम इस फोटो की मजा लेंगे!
साथ मे एक बात आज फिर से तय करले की कुछ भी हो सकता हैं!यह कुछ भी होने के लिए कुछ होना जरूरी हैं।जहाँ कोई अड़चन हैं।वहाँ समाधान मिलेगा।वहाँ रास्ता निकलेगा।
मेरे एक दोस्त थे!कॉम्प्यूटर ओर नेट के बारेमें जब इन्हें में समजता,वो सीखने को तैयार नहीं थी।आज वो अपना सब काम अपने आप सीखी हैं,ओर करती हैं!क्यो की उनके ऊपर ये आ पड़ी थी।मेरे पिताजी ने 62 साल की उम्रमें गाड़ी चलाना सीखा!वो चाहते तो ड्रायवर रखते,मगर उन्होंने ड्रायवर की सुविधा न लेते हुए अपने आप गाड़ी सीखे।अब ड्रायवर हैं वो सुविधा हैं,अगर गाड़ी नहीं आती होती तो ड्रायवर की आवश्यकता थी!सुविधा और आवश्यकता के बीच
जो हैं उसे हम इच्छा शक्ति कहते हैं!सवाल है,इच्छा शक्ति और विचार का।हम समस्या को देखते हैं।उसके सामने हम कुछ समाधान नहीं ढूंढते।टेबल वाले फोटोग्राफ से आप समझ गए होंगे,समस्या कितनी बड़ी क्यो न हो।छोटासा नया विचार समस्या को पराजित कर सकता हैं!
भगवान से ये न कहो समस्या कितनी बड़ी हैं।समस्या को कहो, भगवान कितना बड़ा हैं।कोई माने या न माने।हम मानते हैं की कोई समस्या स्थाई नहीं हैं।भले वो समस्या कोई भी क्यों न हो!हमे नए विचार से समस्याओंको पराजित करना हैं!

Thursday, July 27, 2017

अमृता प्रीतम की प्रीत...

कुछ दिन पहले!
मैने सबसे पहला और सबसे   अलग के बारें में मैने लिखा था!सबसे अलग के तौर पे हम जिन्हें देखते हैं,कई हमे पसंद आते हैं!कई हमे पसंद ना भी हो!ऐसा एक नाम हैं अमृता प्रीतम!समूचे भारतमें मानी हुई लेखिका हैं!गुजरात मे जैसे वर्षा अडालजा ओर विनोद भट्ट!जिन्होंने अपनी जिंदगी के बारे में अपने पाठकों से कुछ नहीं छुपाया!ऐसी ही एक बात आपके सामने रखने से पहले उसके बारे में कुछ जान ले!
बात हैं अमृता प्रीतम की!इमरोज से उनकी शादी हुई थी!शादी से पहले ओर बादमें भी वो अपना प्यार नहीं भूली!अमृता के प्यार का नाम शाहिर लुधियानवी !वो भी भारत के ख्यातनाम शायर थे!अमृता शाहिर से प्यार करती थी!बे तहाशा महोब्बत करती!उन्होंने ये बात कभी किसीसे नहीं छुपाई!अपने शौहर इमरोज से भी नहीं!
अब हमारी बात आगे...!
किसी ने अमृता जी से पूछा,इमरोज ओर शाहिल में क्या फर्क हैं?सवाल खतम होने से पहले अमृता जी ने बताया 'इमरोज मेरा छप्पर हैं,शाहिर मेरा आकाश!
में कुछ फर्क समजा नहीं पाऊंगा,छप्पर ओर आकाश का!मेने कई बार अमृता को पढ़ा हैं,उनकी हिम्मत और जिंदादिली को में सलाम करता हूँ!
कई लोग ऐसी हिम्मत जुटा पाते हैं!एक बार अटल बिहारी बाजपाई जी ने किसी बातमें कहा था 'में कंवारा जरूर हु,मगर भ्रह्मचारी नहीं हूं!'आज के जमाने में जाहेर जीवन जीने वाला ऐसी बात का स्वीकार कर सकता हैं!?
इसके लिए हिम्मत चाहिए,जो सब के पास नहीं होती!हिम्मत बढ़ती है,भरोसे से!भरोसा जिस के लिए हम विश्वास शब्द का भी इस्तमाल करते हैं!भरोसा ही हिम्मत बढ़ाता हैं!हिम्मत जीवन में क्रांति लाती हैं!
#Love अमृता
#Bn

Tuesday, July 18, 2017

हमारी खुशी

कई बार ऐसा होता हैं!
हम अपने जीवन से संतुष्ठ नहीं होते!विश्वमें कई लोग ऐसे हैं जो आपके जैसी जिंदगी जीना चाहते हैं!एक किसान का बच्चा आसमान में उड़ते विमान को देख के उसमे बैठनेके या उड़ानेका ख्वाब देखता हैं!उसी वख्त विमान चालक उपर से कई सारे घर या गाँव देखकर उसे घर की याद सताती हैं!यही सच्चाई हैं!यही जीवन हैं!
अगर पेसो से आदमी खुश होता तो अमीर लोग रोड पे डांस करते!अक्सर ऐसा गरीब एवं मध्यमवर्ग ही करता हैं!अगर सत्ता से सबकुछ हैं तो सत्ताधारी सिक्यॉरिटी को सिक्योरिटी क्यो !?जो सच्चाई से जीते हैं वो ही खुश हैं!अगर सुंदरता ओर प्रसिद्धि ही संतुष्टि वाला जीवन हैं तो सभी फिल्मस्टार की शादीशुदा जिंदगी सफल होनी चाहिए!
एक छोटीसी कहानी हैं!
एक युवक था!ट्रेन में मुसाफिर था!वो बेरोजगार था!उसने देखा तो उसकी बाई ओर जो महाशय बैठे थे उनके पैरों में महंगे शूज थे!युवान दुखी हुआ!उसने मनहिमन अपने आ आपको कोसा!अपनी गरीबीको कोसा!जब स्टेशन आया तो उसकी दाई ओर जो महाशय बेठेथे वो उतरने लगे!युवान ने देखा तो उनका एक पैर नहीं था!
क्यो हम अपने आपको कोसते हैं!जो हमारा नहीं हैं,वो हमारा था ही नहीं!अगर कल हो भी गया तो क्या हुआ!अगर नहिभी हुआ तो क्या!हमें अपने बुतेपर आगे बढ़ना हैं!आप भी ऐसी बाते सोचके दुखी न हो!मुजे कोई सहकार नहीं मिलता!सिर्फ एक ही जगह से सहकार मिलता हैं,वो है आपका फ़ेवरीट व्यक्ति!जो आप खुद हैं!आप से अजीज आपका ओर कोई नहीं हो सकता!दुसरो की जिंदगी क्यो देखे,चलो अपने रास्ते बनाते हैं!

Sunday, July 16, 2017

Trust & Love


दुनिया बढ़ती जाती हैं!जो पहले था वो आज पुराना हो चुका हैं!पहले था और आजभी हो ऐसा क्या हैं!अगर उसे खोज न सके तो हमे हमारे आसपास देखना पड़ेगा!समजना पड़ेगा!भले आज सबकुछ बदला हैं! दो शब्द ऐसे हैं जिन का महत्व आज भी नहीं बदला हैं!वो हैं विश्वास और प्रेम!ये शब्द हैं मगर उसे समजपाना ओर समजाना बहोत मुश्किल हैं!

सच्चा प्यार हो जाता है!विश्वास आहि जाता हैं!मगर विश्वास पैदा नहीं होता!विश्वासका निर्माण करना पड़ता हैं!प्यार हो जाता हैं मगर विश्वास पैदा करना पड़ता हैं!आप देखते हैं कि पिक्चरमें हाथी के पेरोमें जो व्यक्ति सो रहा हैं!उसे कोई फिकर नहीं हैं!नीचे सोने वाली व्यक्ति को विश्वास होगा!मगर हाथीभी अपने साथिको नहीं मारेगा क्यो की वोभी  इसे प्यार करता हैं!
हो सकता हैं कि हाथी को मालिक से प्यार हो,ओर मालिक को विश्वास!इसका उल्टा भी हो सकता हैं!यहाँ किसे विश्वास या प्यार है वो बात ही नहीं हैं!बात ये हैं कि दो जीव हैं, भले हाथी ओर मनुष्य हो!कोई और भी हो सकता हैं!महत्वपूर्ण हैं कि परस्पर प्यार और विश्वास हैं!
अगर देखा जाय तो इन शब्दोंका अर्थ देना मुश्किल हैं!इन शब्दों को सिर्फ निभाना होता हैं!

किसी तस्वीर को देखकर में हाथी या उसके नीचे सोने वाली व्यक्ति हु !किसी चित्रमें अपने भाव देखना और ऐसा सोचना मजा दे सकता हैं !मगर हो सकता हैं कि आपकी सोच गलत हो ओर आपको प्यार करने वाली व्यक्ति आपके पेरोमें जीवन पसार करती हो!

Monday, July 3, 2017

माँ

माँ...
एक ऐसा शब्द जो हर किसीने बोला होगा!मेरी माँ...आप की माँ!माँ का कोई विकल्प नहीं हैं!
मेरे एक दोस्त हैं!
कुछ महीनों पहले उनकी माँने मुझे बहोत डांटा!वो उनकी जगाह पे सही थी!उन्होंने जो देखा,सुना और महसूस किया होगा!वो अपनी जगह सही हो सकती हैं!आज तो कोई हालात नहीं हैं, कि में उन से बात करुं!मगर उन्हें में एक बार मिलूंगा! उन के सामने में मेरी बात रखूंगा!मुझे यकीन हैं कि मेरी बात सुनके वो शायद समज पाएं!हो सकता हैं उनका मेरी तरफ नजरिया बदल जाएँ!कुछ भी न हुआ तो मुझे संतोष होगा की मेने उनसे मेरी बात पहुंचाई!
आज आप से में बात करने वाला हूँ इस फोटोग्राफ के लिए!मेरे दोस्त की माँ!
समजो मेरी ही माँ !
इस चित्र में दिखाई पड़ने वाली माँ जैसी हालत उनकी हैं!उनके हाथ नहीं हैं! वैसे तो उनके हाथ हैं मगर छोटी उम्र में विधवा होनेकी बजह से आज कह सकते हैं उनके हाथ नहीं हैं!गोर से देखो,माँ के हाथ नहीं हैं!वो जो काम करती हैं उसमें हाथ के साथ उंगलीयां भी चाहिए!


बस, वैसे ही उनकी उंगलियां और हाथ उनके पति के छोटेभाई आजभी उनके सहयोगमें हैं!पारिवारिक मेलमिलाप अच्छा हैं!फिरभी जैसे इस चित्रमे स्पस्ट नहीँ होता की औरत आगे काम कैसे करती होगी!वैसे ही में समझता हूँ की में स्पस्ट नहीं हो सकता कि जब में उन्हें मिलूंगा तब  मुझसे कैसे पेश आएगी!

मुझे यकीन हैं!
Be The change...

मगर, वो सही हैं!उनकी जगह में भी होता, उनकी तरह में भी सही होता!वैसे भी बड़े कभी गलत नहीं होते।उन्हें सही बातका अंदाज नहीं होने पर हमें उन्हें बात समजानी या जतानी पड़ती हैं!

हा...
माँ तो सिर्फ माँ हैं!कोई विशेषण उसके आगे नहीं टिकता!आज से 22 साल पहले,में बिमार पड़ा था!दीमाग से जुडी बिमारी थी!मुझे याद हैं,मुझे मेरी माँ ने पढ़ाया!

बीमारी के कारण कक्षा एक से 10 का में भूल चुका था!PTC(अध्यापन कॉलेज)में 1 से 7 का पाठ्यक्रम था!वो सारा एक साथ दो सालमें मेने फिरसे मेरी माँ से सीखा हैं!जब में बीमार था तब से आज तक मेरी हर गलती को मेरी माँ ने स्वीकार किया हैं!आज में मेरी माँ को स्पस्ट करता हूँ की मेरी कोई गलती तुजे बेचेंन कर गई हो तो मुझे माफ़ करें!में उन्हें या किसी की भी माँ को शर्मिंदगी महसूस नहीं होने दूंगा!

जो में भूल चुका था मुझे एक साथ एक साल में मुझे  पढ़ाया!
आज जो भी हूँ!माँ से हूँ!मेरा जन्म लेना ही,मेरी माँ का मुझपे उपकार हैं!क्या आप से जुडी कोई आप की कहानी हो तो आप मुझे भेजे!

Thursday, June 22, 2017

ફરી ફરી યાદ કરજો





આપણા ગુજરાતી દૈનિક અખબારો જે વિસ્તારને સિયાચીન તરીકે ઓળખાવે છે એનું ખરું નામ સિયાચીન નથી પણ સિઆચેન છે. સિઆ એટલે ગુલાબ અને ચેન એટલે પ્રદેશ. એક જમાનામાં અહીં ગુલાબો થતાં એટલે આ વિસ્તારને સિઆચેન તરીકે ઓળખવામાં આવતો. મહારાજા હરિસિંહના કાશ્મીર પ્રદેશનો એ કારાકોરમ ઘાટમાં આવેલો ઉત્તરીય વિસ્તાર છે. આ પ્રદેશ લગભગ ત્રેવીસ-ચોવીસ હજાર ફૂટની ઊંચાઈ ઉપર આવેલો, બારેય મહિના હિમથી ઢંકાયેલો રહે છે. એનું ઉષ્ણતામાન બારેય મહિના ઓછામાં ઓછું માઈનસ દશ ડિગ્રી વધુમાં વધુ માઈનસ પચાસ ડિગ્રી થઈ જાય છે. આ પ્રદેશ  વિશ્વનું સહુથી વધુ ઊંચાઈવાળું યુદ્ધ ક્ષેત્ર છે. આ પ્રદેશમાં ભારતીય સૈનિકો પ્રત્યેક શિખરની ટોચ ઉપર ચોકી ધરાવે છે અને જ્યાં કોઈ પશુપંખી કે વનસ્પતિનો છોડ સુધ્ધાં નજરે નથી પડતો ત્યાં ચોવીસે કલાક તેઓ શસ્ત્રો તાકીને બેઠા છે. એમને નિયમિત ખોરાક નથી મળતો. જે મળે એનાથી ચલાવવું પડે છે. હાથપગના આંગળા હિમડંખથી સડી જાય છે અને પછી એને કાપી નાખવા પડે છે. જવાનોનો પરિવાર સાથેનો સંપર્ક ક્યારેક થાય છે, ક્યારેક નથી થતો. આ યુદ્ધ ક્ષેત્રની મુલાકાતે હેલિકોપ્ટર મારફતે કુતૂહલવશ પત્રકારો જાય છે ખરાં પણ પગપાળાં ચાલીને આ હિમપ્રદેશમાં અગિયાર દિવસ સુધી અમદાવાદના એક ગુજરાતી પત્રકાર ફરે છે. સૈનિકોને અને અફસરોને મળે છે. તેઓની સાથે બરફની દીવાલો ઉપર કુહાડીની મદદથી ચડીને મૃત્યુ સાથે સ્પર્ધા કરે છે. આવા એ પત્રકારનું નામ છે હર્ષલ પુષ્કર્ણા ઉં. વ. ૪૧. આ પત્રકારે પોતાની આ અગિયાર દિવસની યાત્રાનું વાંચતા વાંચતા આપણા રૂંવાડા ઊભા થઈ જાય એવું વર્ણન, શબ્દો કરતાંય અદકેરાં ચિત્રો અને નકશાઓ સાથે એક પુસ્તક આપણને આપ્યું છે. પુસ્તકનું નામ છે-‘આ છે સિઆચેન’. આ પુસ્તકની મૂળ કિંમત જે હોય તે, પણ એનું ખરું મૂલ્ય તો જાનનું જોખમ જ છે. 

આ એવો દુર્ગમ અને કપરો વિસ્તાર છે કે જ્યાં ભારત પાકિસ્તાનની કાશ્મીર વિસ્તારની અંકુશ રેખા ચોક્કસ રીતે આંકી શકાય નથી. વરસો સુધી આ માનવ પગરવ વિનાના વિસ્તારમાં આવેલાં શિખરો ઉપર આરોહણ કરવા માંગતા પર્વતારોહકોને પાકિસ્તાન રજા ચિઠ્ઠી આપતું હતું. પાકિસ્તાન, જાપાન અને ચીનના પર્વતારોહકોને નોતરતું હતું અને આ શિખરો ઉપર એ જાણે પોતાનો પ્રદેશ હોય એમ રજા ચિઠ્ઠી ફાડતું હતું. વરસો સુધી આ વાતની આપણને ખબર જ નહોતી. પાકિસ્તાને પર્વતારોહકોની આ યાત્રાની તસવીરો આંતરરાષ્ટ્રીય અખબારો અને સામયિકોમાં પ્રગટ પણ કરાવી એટલે સ્વાભાવિક રીતે પાકિસ્તાની પ્રદેશ તરીકે એની છાપ વિદેશી નકશાઓમાં પેદા થઈ. જ્યારે આપણને અચાનક આ વાતની જાણ થઈ ત્યારે આપણે આ પ્રદેશમાં વાપરી શકાય એવાં શસ્ત્રોની ખરીદી કરવા લંડન ગયા ત્યારે આ શસ્ત્રોના ઉત્પાદકોએ આપણા લશ્કરી વડાઓને માહિતી આપી કે એમની પાસેથી આવાં શસ્ત્રો પાકિસ્તાન અગાઉથી જ ખરીદી ચૂક્યું છે. 

હર્ષલ પુષ્કર્ણાએ એમના આ પુસ્તકમાં આવી રોમાંચક માહિતી એકઠી કરી છે. ચારેય બાજુ બરફ છવાયેલો હોય. ન જમીન દેખાય ન આકાશ, કશુંય નજરે જ ન પડે આવી પરિસ્થિતિને વાઈટ આઉટ કહેવાય. રોજ બેઝ કેમ્પથી શિખર ઉપરની ચોકીઓેને હેલિકોપ્ટર મારફતે ખોરાકથી માંડીને દવાઓ સુધી બધું પેકેટો ફેંકીને પહોંચાડવામાં આવે અને જ્યારે વાઈટ આઉટ થાય ત્યારે હેલિકોપ્ટર અટકી જાય અને કાગના ડોળે જોઈ રહેલા સૈનિકો મોં ફાડીને ઊભા રહે. કશું ન કરી શકે. 

રેલવે કંપાર્ટમેન્ટના ટોઈલેટ જેવડી બરફની દીવાલોવાળી કેબિનમાં બે જવાનો સતત ચોવીસ કલાક હાથમાં શસ્ત્રધારીને દુશ્મનની હિલચાલ ઉપર નજર નાખતા ઊભા રહે. એક ચોકીથી બીજી ચોકી હિમ નદી ઉપર ચાલતા જતા આ જવાનો પરસ્પરથી દોરડા વડે બંધાયેલા, આમાં એકાદ જવાનના પગ નીચેની હિમ નદી સરકી જાય ત્યારે એ આખોને આખો ઊંડી કોતરમાં ઊતરી જાય. એના સાથી સૈનિકો એને બહાર ખેંચી કાઢવા મથે તો ખરાં પણ મોટાભાગે સફળ ન થાય. ઊંડો ઊતરી ગયેલો સૈનિક એ નદીના તળિયે જ ક્યાંક અલોપ થઈ જાય. જ્યારે આપણે એરકંડિશન્ડ બેડરૂમમાં ઘસઘાટ ઊંઘતા હોઈએ અથવા હોળી, દિવાળી કે મકરસંક્રાંતિ જેવા પર્વો ઉજવતા હોઈએ ત્યારે આ સૈનિકો પોતાના જાનના જોખમે આપણી સુરક્ષા કરતા હોય છે. એનું જાણે આપણને સ્મરણ જ નથી આવતું.

ઓમપ્રકાશ નામનો એક સૈનિક એકલા હાથે ચોકીનું રક્ષણ કરવામાં સફળ તો થયો પણ પછી બરફના તોફાનોમાં ક્યાંક અદૃશ્ય થઈ ગયો. એનો મૃતદેહ પણ મળ્યો નહીં. વીસ હજાર ફૂટની ઊંચાઈએ એના સાથીઓએ આ ઓપીબાબાનું મંદિર બનાવ્યું. આ ઓપીબાબાને રોજ પ્રસાદ ધરાય, એની પૂજા થાય. આવતા જતા સૈનિકો એની માનતા માને. એટલું જ નહીં, લશ્કરના હાજરી પત્રકમાં એની હાજરી પણ પુરાય. એનો પગાર વધારો અને પ્રમોશનનાં નાણાં ચૂકતે ગણીને એના પરિવારને મોકલાય. સિઆચેનની કોઈ પણ ચોકી ઉપરના તમામ સૈનિકો આ ઓપીબાબાની આણનો સ્વીકાર કરે છે. 

આમ તો આ જવાનોને દહીં, પરોઠા, ડ્રાયફ્રૂટ, જ્યુસ, ચોકલેટ્સ આવો પૌષ્ટિક ખોરાક પૂરો પાડવામાં આવે છે, પણ વીસ હજાર ફૂટ કરતાં વધુ ઊંચાઈ પર ઓક્સિજનનો પુરવઠો ભારે મર્યાદિત હોય એટલે આ જવાનોની ભૂખ મરી જતી હોય છે. લેખકે આ અનુભવ લીધો. સ્વાદ કોષોની સંવેદનશીલતા ઘટી જતી હોવાથી મોંમાં મૂકેલા કોળિયાનો સ્વાદ ખાસ પરખાતો નથી. સ્વાદ વિના ખાવાની ઈચ્છા શી રીતે થાય?

‘ઐસી કોઈ ચીજ હૈ જીસે ખાને સે ટેસ્ટ કા અનુભવ હો?’ લેખકે જવાનોના જૂથને એક પ્રશ્ર્ન પૂછ્યો. 

‘હરી મિર્ચ’ બે ત્રણ જુવાનો એક સાથે બોલી ઊઠ્યા. ‘જીસ દિન હરી મિર્ચ ખાને કો મિલે, સમજો પાર્ટી હો ગઈ. ઈસકે અલાવા જબ ચોકી પે લડ્ડુ ઔર જલેબી આ જાતે હૈ તબ હમ ખુશી મનાતે હૈ.’ આટલું કહેતી વખતે આ જવાનો આ ઊંચા બર્ફિલા પહાડો વચ્ચે લાડુ, જલેબી અને લીલા મરચાં માટે કેવા તલસ્યા હશે તેમના ચહેરના અણસારની તો આપણને કલ્પના પણ નહીં આવે.’

આવી અંતરિયાળ અને અત્યંત દુર્ગમ પહાડીઓ વચ્ચે કપરું જીવન જીવતા હોવા છતાં આ જવાનોનું મનોબળ ભારે ઊંચું હોવાનું લેખકે નોંધ્યું છે. લેખકે એમને માટે હિમપ્રહરી જેવો સરસ શબ્દ પ્રયોજ્યો છે. આ હિમપ્રહરીઓ સાથે લેખકે અગિયાર દિવસ રાતવાસો કર્યો. રાત્રે સ્લિપિંગ બેગમાં ભરાઈને ઈજિપ્તના મમી જોવો પોઝ ધારણ કરી લેવાનો. પછી શારીરિક હલનચલનની કોઈ જોગવાઈ નહીં. રાતભર એક જ સ્થિતિમાં સૂઈ રહેવાનું. 

કમાન્ડો તાલીમ એ લશ્કરી દળોમાં સહુથી કપરી અને સહુથી મોંઘી તાલીમ ગણાય છે. ચોવીસ પચ્ચીસ વરસનો એક જુવાન આ તાલીમ સફળતાપૂર્વક પાર પાડીને સિઆચેનમાં આવ્યો. માઈનસ ત્રીસ, ચાળીસ ડિગ્રીના ઉષ્ણતામાન વચ્ચે એના હાથ પગના આંગળા હિમડંખથી પીડિત થયા. એને સારવાર માટે બેઝ કેમ્પ પર લાવવો પડે અને અહીં જરૂરી સારવાર થાય. હિમડંખ એવા જલદ હતા કે દિલ્હી સારવાર માટે લઈ ગયા વગર છૂટકો નહોતો. પણ હવામાન બગડ્યું. કેટલાય દિવસ સુધી બરફના તોફાનો વચ્ચે વિમાની અવરજવર અટકી ગઈ. આ દર્દીને જ્યારે દિલ્હીની હોસ્પિટલમાં પહોંચતો કરવામાં આવ્યો ત્યારે રોગ અત્યંત વકરી ગયો હતો. એના બંને હાથ અને બંને પગ કાપી નાખવા પડ્યા. આવી ભયાનક પરિસ્થિતિમાં આપણે શું કરીએ? હતાશ થઈને બેસી જઈએ, પણ આ કમાન્ડોએ એમ ન કર્યું. પુણે ખાતે આવેલી કમાન્ડોની તાલીમ શાળામાં એ વ્હીલચેરથી પહોંચ્યો. આજેય આ કમાન્ડો પુણેની આ તાલીમ શાળામાં નવા ભરતી થયેલા કમાન્ડોને તાલીમ આપે છે. 

ગુજરાતના યુવાનોમાં આવું લશ્કરી મનોબળ નથી. આ પુસ્તકમાં જે કથાનકો અને તસવીરો આપવામાં આવ્યાં છે એનો વિશેષ કાર્યક્રમ લેખક પોતે કરી રહ્યા હતા. આ કાર્યક્રમ જોયા પછી સહેજ પણ સંકોચ વિના અને આગ્રહપૂર્વક ગુજરાતી કોલેજોને એવું કહેવાનું મન થાય છે કે તમારા વિદ્યાર્થીઓ સમક્ષ એક વાર આ કાર્યક્રમ પ્રસ્તુત કરો. 

ફિલ્ડ માર્શલ સામ માણેકશા એક વાર અમદાવાદ આવ્યા ત્યારે શ્રોતાઓ સમક્ષ એમણે અંગ્રેજીમાં પોતાની વાત કહેવા માંડી. શ્રોતાઓએ ગુજરાતીમાં બોલવાનો એમને આગ્રહ કર્યો ત્યારે માણેકશાએ મર્માળુ, હસીને કહ્યું- ‘આપણા લશ્કરમાં પંજાબીઓ છે, મરાઠાઓ છે, તામિલો છે અને હિંદી ભાષીઓ પણ છે. આ બધાના સંપર્કને કારણે હું એમની ભાષા શીખી ગયો છું, પણ કોઈ ગુજરાતી નથી એટલે હું ગુજરાતી શીખ્યો નથી. હું આશા રાખું છું કે હવે પછી હું જ્યારે અમદાવાદ આવું ત્યારે તમારી સાથે ગુજરાતીમાં વાત કરી શકું પણ એ માટે તમારે આ પૂર્વ ભૂમિકા પૂરી પાડવી પડશે'.

આ કામ ક્યારે થાય? જ્યારે આ પુસ્તક બધા ગુજરાતીઓ વાંચે અને ગુજરાતના યુવા ધન સમક્ષ ભાઈ હર્ષલનો બે કલાકનો આ જીવંત કાર્યક્રમ એમના વડીલો પ્રસ્તુત કરે અને સહુ એ જુએ, સમજે અને માણે. 

વિશ્ર્વના આ સહુથી ઊંચા યુદ્ધ ક્ષેત્રમાં પગપાળા યાત્રા કરનારો આ ગુજરાતી પત્રકાર સહુથી પહેલો પત્રકાર છે. અમાનવીય સંજોગોમાં લેખક સતત સરહદોનું રક્ષણ કરનાર આ હિમપ્રહરીઓ ગમે એવા સંજોગોમાં જીવે છે, કોઈ ફરિયાદ કરતા નથી. ભાઈ હર્ષલ પુષ્કર્ણાએ આ જવાનો વતી આપણને જે સંદેશો આપ્યો છે એ આટલો જ છે-એમને કોઈ ફરિયાદ નથી. માત્ર આટલું જ યાદ રાખજો, અમને ફરી ફરી યાદ કરજો.

Wednesday, April 19, 2017

હું એકાંતનો માણસ...

એટલે કોઈને ગમતો નથી...
હું જાત ઘસી નાખતો માણસ,
એટલે કોઈને ગમતો નથી...!

અજાણ્યા પર વિશ્વાસ હું, પોતાનાં જાણી મુકી દઉં ;
હું સાચા બોલો માણસ- એટલે કોઈને ગમતો નથી.

ખુશ રાખી હરકોઈને,
દોસ્ત- રાત આખી હું રડતો,
હું લાગણીનો સાગર, એટલે કોઈને ગમતો નથી.

ઉદાસીના વાદળ ઓગાળી સ્મિત સૌને આપું છું,
હું રહું સદાય મોજીલો, એટલે કોઈને ગમતો નથી!

કોઈને સાથ સંગાથ આપવા,
સૌથી પહેલાં દોડું છું ;
હું છું ખુદનો સથવારો, એટલે કોઈને ગમતો નથી.

અરે, હરાવી પોતાને ,
હું બીજાને જીતાવું છું ;
છતાં મોઢે રાખું મુસ્કાન, એટલે કોઈને ગમતો નથી.

(મારા એક મિત્રએ મોકલેલ કવિતા...)

Monday, April 17, 2017

what इस innovatio

प्रत्येक वस्तु या क्रिया में परिवर्तन, प्रकृति का नियम है। परिवर्तन से ही विकास के चरण आगे बढ़ते हैं। परिवर्तन एक जीवन्त, गतिशील और आवश्यक क्रिया है, जो समाज को वर्तमान व्यवस्था के अनुकूल बनाती है। परिवर्तन जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में होते हैं। इन्ही परिवर्तनों से व्यक्ति और समाज को स्फूर्ति, चेतना, ऊर्जा एवं नवीनता की उपलब्धि होती है।

Innovation is the action or process of innovating.
"
Innovation is crucial to the continuing success of any Organization."

Innovation is a new idea, device or process. Innovation can be viewed as the application of better solutions that meet new requirements, inarticulated needs, or existing market needs.

कहा गया है-

"Change is variation from a previous state or mode of existence."

परिवर्तन अच्छा है या बुरा इस संबंध में शिक्षाविद किल पैट्रिक की स्पष्ट अवधारणा है-
“ परिवर्तन विचाराधीन बात का पूर्ण या आंशिक परिवर्तन है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि परिवर्तन अच्छी बात के लिए है या बुरी बात के लिए।”

इस प्रकार परिवर्तन की प्रक्रिया 
विकासवादी (Evolutionary) 
संतुलनात्मक (Horeostatic) 
एवं नवगत्यात्मक (Heomobilistice)  परिवर्तन से जुड़ी होती है।

परिवर्तन एवं नवाचार एक दूसरे के अन्योन्याश्रित (Inter dependent) है। परिवर्तन समाज की मॉंग की स्वाभाविक प्रक्रिया से जुड़ा तथ्य है। इसलिए परिवर्तन, नवाचार और शिक्षा का आपसी संबंध स्पष्ट है-

“ नवाचार कोई नया कार्य करना ही मात्र नहीं है, वरन् किसी भी कार्य को नये तरीके से करना भी नवाचार है।

नवाचार का शिक्षा पर प्रभाव


व्यक्ति एवं समाज में हो रहे परिवर्तनों का प्रभाव शिक्षा पर भी पड़ा है। शिक्षा को समयानुकुल बनाने के लिए शैक्षिक क्रियाकलापों में नूतन प्रवृत्तियों ने अपनी उपयोगिता स्वंयसिद्ध कर दी है।

ट्रायटेन के अनुसार-

“शैक्षिक नवाचारों का उद्भव स्वतः नहीं होता वरन् इन्हें खोजना पड़ता है तथा सुनियोजित ढंग से इन्हें प्रयोग में लाना होता है, ताकि शैक्षिक कार्यक्रमों को परिवर्तित परिवेश में गति मिल सके और परिवर्तन के साथ गहरा तारतम्य बनाये रख सकें।”

इस प्रकार “नवाचार एक विचार है, एक व्यवहार है अथवा वस्तु है, जो नवीन और वर्तमान का गुणात्मक स्वरूप है।”

Wednesday, December 28, 2016

प्यारकी कविता....


ऐ "सुख"  तू  कहाँ   मिलता   है,
क्या  तेरा   कोई   पक्का   पता  है!

क्यों   बन   बैठा   है    अन्जाना,
आखिर   क्या   है   तेरा   ठिकाना!

कहाँ   कहाँ     ढूंढा  मैने  तुझको, पर   तू  न   कहीं  मिला  मुझको!
ढूंढा मकानों में, बड़ी  से बड़ी दुकानों में! स्वादिष्ट से  पकवानों   में, 
चोटी   के   धनवानों   में!प्यार बाटते संतोमे,खड़े मंदिर के खंभों में।

वो तुझको ढूंढ रहे थे,मुझको ही पूछ रहे थे!क्या आपको कुछ पता है,
ये  सुख  आखिर  कहाँ  रहता   है? मेरे पास तो "दुःख"का पता  था,
जो  अक्सर   मिलता  था ! परेशान   होके   शिकायत     लिखवाई,
पर ये कोशिश भी काम  न  आई! उम्र   अब   मेरी ढलान    पे    है,
हौसला  अब  थकान  पे  है! हाँ   उसकी   तस्वीर   है   मेरे   पास,
अब   भी   बची   हुई   है  मेरी  आस!मैं   भी   हार    नही मानूंगा,

सुख   के   रहस्य   को  में    जानूंगा!
बचपन    में    मिला    करता    था,
मेरे    साथ   वो रहा   करता    था!
पर   जबसे    मैं    बड़ा   हो    गया,
मेरा   सुख   मुझसे   जुदा   हो  गया।
मैं   फिर   भी   नही   हुआ    हताश,
जारी   रखी    उसकी    मैने तलाश!
एक   दिन   जब   आवाज   ये आई,
क्या    मुझको    ढूंढ   रहा  है   भाई!
मैं   तेरे   अन्दर   छुपा    हुआ     हूँ,
तेरे   ही   घर   में   बसा    हुआ    हूँ!

मेरा  नहीं  है   कुछ   भी "मोल",सिक्कों  में  मुझको   न   तोल!
मैं  बच्चों   की    मुस्कानों में  हूँ,साथी के  साथ    चाय   पीने में!
"परिवार"    के  संग   जीने    में! माँ   बाप   के   आशीर्वाद    में,
रसोई   घर   के  पकवानों   में ! बच्चों   की   सफलता   में    हूँ,
माँ   की निश्छल  ममता  में  हूँ! हर पल   तेरे   संग    रहता   हूँ,
और   अक्सर   तुझसे  कहता हूँ ! मैं तो हूँ  बस एक "अहसास",
बंद कर  दे तू मेरी  तलाश !जो  मिला   उसी  में   कर   "संतोष"
आज को जी, कल  की न सोच! कल के लिए आज  न   खोना!

मेरे लिए   कभी   दुखी न होना, मेरे  लिए  कभी  दुखी न होना!

Thursday, June 9, 2016

રાવણ એક વિદ્વાન વૈજ્ઞાનિક

એ વાતમાં તો દિશાંત દોશી રાવણ છે.એટલે કે સંપૂર્ણ જાણકાર.
રાજા રાવણ.અભિમાન તો રાજા રાવણનુંય નહોતું રહ્યું.સામે પક્ષે રામ રાજ્ય ચર્ચાનો મુદ્દો છે.રામનું રાજ્ય. આ વાત આવે એટલે રાવણની વાત યાદ આવે.સુખ સમૃદ્ધિ અને વૈભવ એટલે લંકેશ.તપસ્વી બ્રાહ્મણ અને શિવનો ઉપાસક. આજે રાવણ વિશે લખવાનું મન થયું.આ રાવણને આપણે ‘ગમે તેવો’ માનીએ.રાવણ ‘ગમે તેવો’ ન હતો.આધુનિક સમયમાં લોકો જે વિચારે છે.અમલી બનાવવા મથે છે તેવું રાવણ પણ વિચારતો હતો.
થોડા દિવસો પહેલાં મારી કોલમમાં રાવણ અંગે લેખ લખ્યો હતો.કેટલાક મિત્રોએ ફોન કે મેઈલ ધ્વારા જાણ કરી.કેટલીક વિગતો વધુ મળી.'કહેવાય છે કે રાવણ લંકામાં સભા ભરતો અને તેના રાજ્યના લોકો સભામાં આવતા.આ સમયે લંકેશ રાજા રાવણ સભામાં આવનારનો ચહેરો જોઈ તેનો સવાલ કે ફરિયાદ સમજી જતો હોવાનું નોધવામાં આવ્યું છે.

રાવણ એટલો તો દમદાર ખરો કે એ જમાનામાં તેની પાસે જ વિમાન હતું.રામ ધ્વારા નિર્માણ પામેલ પૂલ આજે પણ હયાત છે.બ્રહ્માંડમાંથી ફોટોગ્રાફ લઇ તેની સાથે આ પૂલને દર્શાવવામાં આવેલ હોય તેવા ડીઝીટલ ફોટોગ્રાફ પણ એક મિત્રે મોકલાયા.

ભારતના કેટલાંક રાજ્યોમાં આજેય રાવણનું મંદિર છે.રાવણ પૂજાય છે.લોકો સારા પ્રસંગે રાવણને કંકોત્રી આપે છે. સીતાજીનું અપહરણ કરવા છતાં તેમનાથી દૂર રહેનાર રાવણ શિવનો ઉપાસક હતો.રામાયણમાં રાવણનો અભિનય કરનાર શ્રી અરવિંદ ત્રિવેદીને એક વખત મળવાનું થયું.અભિનય સમ્રાટની શિવ ભક્તિ અચરજ પમાડે તેવી. સહજ રીતે વાત કરતાં કરતાં તેમણે કહ્યું: ‘ભાઈ,બ્રાહ્મણનો દિકરો છું.શિવ ભક્ત જ હોઉં.’પાછા ખોખરો ખાઈ ને કહે: ‘રાવણનો અભિનય કર્યા પછી મારી શિવની પૂજા અને ઉપાસના વધી ગઈ છે.’અહીં એ નોધવું જરૂરી છે કે રાવણનો  અભિનય કર્યા પછી તેમણે કોઈ પાત્રનો અભિનય કર્યો નથી.

અરવિંદ ત્રિવેદીને એક સંસદસભ્ય તરીકે 'રાવણ ધ્વારા રચવામાં આવેલું શિવ તાંડવ સ્ત્રોત્રમ'ગાતા મેં સાંભળ્યા છે.રાજેશખન્ના ગુજરાતના ગાંધીનગર થી લોકસભાની ચૂંટણી લડતા હતા.લોકો તેમને એક બે સંવાદ બોલાવતા.'બાબુ મુશાય'રોટી સબ કુછ કરાવતી હૈ ...સૌ તાલી પાડે.આચાર સંહિતા ન લાગે.પણ અરવિંદ ત્રિવેદીએ શિવ તાંડવ ગાવાનું શરુ કર્યું અને બીજા દિવસે આચાર સંહિતાના ભંગ ની નોટીસનો જવાબ આપવા હિમતનગર ખ્હાતે મેં જોયા છે.

એક વૈજ્ઞાનિક તરીકે રાવણે કુદરત ઉપર કાબુ મેળવવા અનેક પ્રયત્નો કર્યા.આજે પણ વૈજ્ઞાનિકો કુદરતને નાથવા પ્રયત્ન કરે છે.એ વખતે વિમાન લઇ દરિયો ઓળંગનાર રાજા રાવણ ટેકનોલોજીનો ઉસ્તાદ હતો.આજે વિવિધ નામે વેચાતો દારુ.તે સમયે એક જ નામે વેચાય.તેનું નામ મદિરા. રાવણ સતત પ્રયત્ન કરતો કે મદિરામાંથી ગંધ દૂર કરી  શકાય.આજેય એ શક્ય બન્યું નથી.
પોતાના ઘરમાં જ શિવ મંદિર બનાવનાર અરવિંદ ત્રિવેદી.શિવ મંદિર માટે કહેવાય છે કે ‘શિવજી સ્વયં ભૂ દેવ હોઈ તેમણે ગર્ભ ગૃહમાંથી પ્રવેશ ન અપાય.ટોચ સુધીનું મંદિર બંને.ઉપરનો ભાગ ખૂલ્લો હોય.ત્યાં ઉપરથી લિંગને મંદિરના ગર્ભગૃહમાં સ્થાપિત કરવું પડે.પછી બાકીનું કામ પૂર્ણ થાય.એક મદિર બનાવવાના તમાય નિયમોનું પલાન કરી ઘરમાં જ બનાવેલું વિશાળ શિવ મંદિર જોવા જેવું છે.સાબરકાંઠા લોકસભા વિસ્તારના માજી સંસદસભ્ય.લંકેશ તરીકે અનોખી લોક ચાહના.એ વખતે ભારતની લોકસભામાં ભાજપ ધ્વારા ‘લંકેશ’ અરવિંદ ત્રિવેદી અને ‘સીતા’ દીપિકા ચિખલીયા સંસદમાં હતાં.છોડો હવે...!

તું શું મોટો રાવણનો દીકરો છે.
ભાઈ એ કામમાં તો  દિશાંત દોશી 'રાવણ 'છે.એટલેકે તેની નિપૂણતા છે.આવા રાવણની વાત કરીએ. ‘સોનામાં સુગંધ ભળે.’આ રાવણનું સ્વપ્ન હતું.રાવણે આખી લંકા સોનાથી મઢી હતી.તેને હતું કે સોનામાં જો સુગંધ હોય.આવું થાય તો આખી લંકા સુગંધિત બંને.સૌથી વધારે સોનું રાવણ પાસે હતું. તે સુગંધિત થાય તો સોનાનું મૂલ્ય વધે.આમ લંકેશનું  મૂલ્ય વધે.અરવિંદ ત્રિવેદી કહે: ‘રાવણ જ્યારે શિવ તાંડવ બોલે છે ત્યારે જ શિવની ધન્યતા અનુભવાય છે.અરવિંદ ત્રિવેદીને શિવતાંડવ બોલતાં સાંભળવા લાહવો છે.


Monday, June 6, 2016

બસ! આટલું જ યાદ રાખજો.


આજથી નવા શૈક્ષણિક સત્રની શરૂઆત થાય છે.આજથી કેટલાંક બાળકો બોર્ડની એક્ઝામ આપવાના ધોરણમાં હશે.કેટલાંક બાળકોએ બોર્ડની પરીક્ષા આપી દીધી હશે.ક્યાંક ઉત્સાહ હશે તો ક્યાંક ચિંતા હશે.આ બધા વચ્ચે આજે એક અનોખી વાત યાદ આવી.કશુક જોયું.કશુક વાંચ્યું.એક ભાઈ,તેમના બાળકને લઇ મને મળવા આવ્યા.મને કહે 'મારો છોકરો દસમાં ધોરણમાં નાપાસ થયો છે.હવે શું કરું?'મેં કહ્યું મને કેમ મળવા આવ્યા છો?મારી વાત સાંભળી તે કહે: 'આપ પુસ્તક લાખો છો,લેખક છો એટલે થયું આપણે મળું.મેં તેમને કહ્યું 'હુય આજથી ચોવીસ વર્ષ પહેલાં દસમાં ધોરણમાં નાપાસ થયો હતો.મારી વાત સાંભળી તે કહે તો સાહેબ હવે હું કોને મળવા જાઉં?મેં કહ્યું 'જે દસમામાં કે ક્યારેય કોઈ ધોરણમાં નાપાસ ન થયો હોય તેવી વ્યક્તિને માળો.'

પછીતો મેં તેમને વાત કરી.સમજણ આપી.તેમને સંતોષ થાય તે રીતે વ્યવહાર કરી તેમને વિદાય આપી.તેમના ગયા પછી આ લખવા બેઠો.પરીક્ષાઓનો સમયગાળો વીતી ગયો છે અને હવે તમે તમારા બાળકોના પરિણામને લઈને ચિંતાતુર હશો. દિવસો આંગળીના વેઠે ગણાવા માંડ્યા હશે.ભવિષ્યના અનેક વિચારોમાં આપ સૌ ગરકાવ થઈ ગયા હશો.પણ કૃપા કરીને એટલું યાદ રાખો કે જે વિદ્યાર્થીઓ પરીક્ષામાં સંમેલિત થયા હતા એમાં કેટલાયે કલાકાર પણ છે જેમને માટે ગણિત કે વિજ્ઞાનમાં પારંગત હોવું જરૂરી નથી. એમની કલાનો કસબ ગણિતના આંકડાઓ અને વિજ્ઞાનના પ્રયોગોમાં અટવાય ન જાય એ જોવાની જવાબદારી આપણી  છે.

આમાં અનેક એવા ઉદ્યમી વિદ્યાર્થીઓ પણ છે જેમને ઈતિહાસ કે અંગ્રેજી સાહિત્ય ઘણું અઘરું લાગતું હોય, પરંતુ તેઓ આગળ જતાં ઈતિહાસ બદલી નાખશે અથવા પોતાની આગવી તવારીખ આ દુનિયા સમક્ષ મૂકી શકશે.આમાં ઘણાયે મોટા સંગીતકાર પણ છે જેમને રસાયણશાસ્ત્રનાં ગુણોથી કોઈ જ લેવાદેવા નથી. તેમના આગવા સૂરો બીજાના મસ્તિષ્ક અને હૃદયમાં આગવા રસાયણો ઉત્પન્ન કરવા શક્તિમાન હોય જ છે. તેમના સૂરો આ શાસ્ત્રમાં ડૂબી જાય એ પહેલા એને બહાર લાવવા કોણ મથશે?

આમાં ઘણા બધા ટોચના ખેલાડીઓ પણ છે જેમના માટે ફિઝીકલ ફીટનેસનો ગ્રાફ ફિઝીક્સનાં અંકોથી વધારે મહત્વપૂર્ણ છે.જો આપનું બાળક સારા ગુણાંકથી પાસ થાય છે તો એ ઘણી સારી બાબત છે. પણ જો તેઓ એમ નથી કરી શકતા તો મહેરબાની કરીને એમનો આત્મવિશ્વાસ ન છીનવો. એને એ સમજાવો કે આ માત્ર ને માત્ર એક પરીક્ષા છે, એનાથી વધું કાંઈ જ નથી. અને આ પરીક્ષા એ કંઈ જીવનની અંતિમ પરીક્ષા તો નથી જ. એ જીવનમાં આનાથીયે મોટી સિદ્ધિઓ પ્રાપ્ત કરવા માટે બન્યો છે.

એ વાતથી કોઈ જ ફરક નથી પડતો કે એણે કેટલા ગુણાંક મેળવ્યાં છે. તે કઈ રીતે દુનિયામાં જીવે છે અને આગળ વધી સુખ અને સમૃદ્ધિ મેળવે છે એ મહત્વનું છે.એમને પ્રેમ અને હૂંફ આપો, ક્યારેય તમે તમારો ફેંસલો ન જણાવી દો. નિર્ણય સંભળાવવાનો અધિકાર ન્યાયાધીશને હોય છે અને મા-બાપ એ બાળકના સલાહકાર છે, આદર્શ છે. તેને જે દિશામાં જવું છે તે અંગેનું યોગ્ય માર્ગદર્શન આપી પ્રોત્સાહિત કરો. ખોટો રસ્તો હોય તો પ્રેમથી સમજાવી બાળકને પાછું વાળો પણ જબરજસ્તી કોઈ ક્ષેત્રમાં ન ધકેલો.

જો તમે એને ખુશમિજાજી બનાવશો તો એ જે કંઈ પણ બનશે તો એનું જીવન સફળ થશે. પણ જો એ ખુશ-મિજાજી નથી તો એ કંઈ પણ બનીતો જશે તો પણ સફળ ક્યારેય નઈ થઈ શકે.બસ! એક વાર એક જ વાર આટલું કરીને જુઓ, તમારું બાળક આખી દુનિયા જીતવા માટે સક્ષમ છે.એક પરીક્ષા જ કે એક 90% ની માર્કશીટ જ આપના બાળકનું ભવિષ્ય નથી. એ પરિણામપત્રકની બહાર પણ તેનું આગવું ભાવવિશ્વ ધબકતું હોય છે. A ગ્રેડ હોય કે E ગ્રેડ, માત્ર એક પરીક્ષા તમારા બાળકના ભવિષ્યનો આધારસ્તંભ નથી એ વાત સમજો અને તેને પણ સમજાવો.
બસ! આટલું જ યાદ રાખજો.

Friday, April 15, 2016

लिओनार्दो दा विंची Happy Birthday


इटलीवासी, महान चित्रकार, मूर्तिकार, वास्तुशिल्पी, संगीतज्ञ, कुशल यांत्रिक, इंजीनियर तथा वैज्ञानिक था।
लिओनार्दो दा विंची का जन्म इटली के फ्लोरेंस प्रदेश के विंचि नामक ग्राम में हुआ था। इस ग्राम के नाम पर इनके कुल का नाम पड़ा। ये अवैध पुत्र थे। शारीरिक सुंदरता तथा स्फूर्ति के साथ साथ इनमें स्वभाव की मोहकता, व्यवहारकुशलता तथा बौद्धिक विषयों में प्रवीणता के गुण थे।

लेओनार्डो ने छोटी उम्र से ही विविध विषयों का अनुशीलन प्रारंभ किया, किंतु इनमें से संगीत, चित्रकारी और मूर्तिरचना प्रधान थे। इनके पिता ने इन्हें प्रसिद्ध चित्रकार, मूर्तिकार तथा स्वर्णकार, आँद्रेआ देल वेरॉक्यो (Andrea del Verrochio), के पास काम सीखने की छत्रच्छाया में रहकर कार्य करते रहे और तत्पश्चात् मिलैन के रईस लुडोविको स्फॉत्र्सा (Ludovico Sforza) की सेवा में चले गए, जहाँ इनके विविध कार्यों में सैनिक इंजीनियरी तथा दरबार के भव्य समारोहों के संगठन भी सम्मिलित थे। यहाँ रहते हुए इन्होंने दो महान कलाकृतियाँ, लुडोविको के पिता की घुड़सवार मूर्ति तथा "अंतिम व्यालू" (Last Supper) शीर्षक चित्र, पूरी कीं। लुडोविको के पतन के पश्चात्, सन् 1499 में, लेआनार्डो मिलैन छोड़कर फ्लोरेंस वापस आ गए, जहाँ इन्होंने अन्य कृतियों के सिवाय मॉना लिसा (Mona Lisa) शीर्षक चित्र तैयार किया। यह चित्र तथा "अंतिम व्यालू" नामक चित्र, इनकी महत्तम कृतियाँ मानी जाती हैं। सन् 1508 में फिर मिलैन वापस आकर, वहाँ के फरासीसी शासक के अधीन ये चित्रकारी, इंजीनियरी तथा दरबारी समारोहों की सजावट और आयोजनों की देखभाल का अपना पुराना काम करते रहे। सन् 1513 से 1516 तक रोम में रहने के पश्चात् इन्हें फ्रांस के राजा, फ्रैंसिस प्रथम, अपने देश ले गए और अंब्वाज़ (Amboise) के कोट में इनके रहने का प्रबंध कर दिया। यहीं इनकी मृत्यु हुई।

कार्य...



लेओनार्डो तथा यूरोप के नवजागरणकाल के अन्य कलाकारों में यह अंतर है कि विंचि ने प्राचीन काल की कलाकृतियों की मुख्यत: नकल करने में समय नहीं बिताया। वे स्वभावत: प्रकृति के अनन्य अध्येता थे। जीवन के इनके चित्रों में अभिव्यंजक निरूपण की सूक्ष्म यथार्थता के सहित सजीव गति तथा रेखाओं के प्रवाह का ऐसा सम्मिलन पाया जाता है जैसा इसके पूर्व के किसी चित्रकार में नहीं मिलता। ये पहले चित्रकार थे, जिन्होंने इस बात का अनुभव किया कि संसार के दृश्यों में प्रकाश और छाया का विलास ही सबसे अधिक प्रभावशाली तथा सुंदर होता है। इसलिए इन्होंने रंग और रेखाओं के साथ साथ इसे भी उचित महत्व दिया। असाधारण दृश्यों और रूपों ने इन्हें सदैव आकर्षित किया और इनकी स्मृति में स्थान पाया। ये वस्तुओं के गूढ़ नियमों और करणों के अन्वेषण में लगे रहते थे। प्रकाश, छाया तथा संदर्श, प्रकाशिकी, नेत्र-क्रिया-विज्ञान, शरीररचना, पेशियों की गति, वनस्पतियों की संरचना तथा वृद्धि, पानी की शक्ति तथा व्यवहार, इन सबके नियमों तथा अन्य अनेक इसी प्रकार की बातों की खाज में इनका अतृप्त मन लगा रहता था।

लेओनार्डो डा विंचि के प्रामाणिक चित्रों में बहुत थोड़े बच पाए हैं। कई कृतियों की प्रामाणिकता के संबंध में संदेह है, किंतु ऊपर वर्णित दो चित्रों के सिवाय इनके अन्य चौदह चित्र प्रामाणिक माने जाते हैं, जो यूरोप के पृथक् पृथक् देशों की राष्ट्रीय संपत्ति समझे जाते हैं। धन में इनके वर्तमान चित्रों के मूल्य का अनुमान संभव नहीं है।

इनकी बनाई कोई मूर्ति अब पाई नहीं जाती, किंतु कहा जाता है कि फ्लोरेंस की बैप्टिस्टरी (गिरजाघर का एक भाग) के उत्तरी द्वार पर बनी तीन मूर्तियाँ, बुडापेस्ट के संग्रहालय में रखी काँसे की घुड़सवार मूर्ति तथा पहले बर्लिन के संग्रहालय में सुरक्षित, मोम से निर्मित, फ्लोरा की आवक्ष प्रतिमा लेओनार्डो के निर्देशन में निर्मित हुई थी। कुछ अन्य मूर्तियों के संबंध में भी ऐसा ही विचार है, पर निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता।

ऐसा जान पड़ता है कि लेओनार्डो चित्रकारी, वास्तुकला, शरीरसंरचना, ज्योतिष, प्रकाशिकी, जल-गति-विज्ञान तथा यांत्रिकी पर अलग अलग ग्रंथ लिखना चाहते थे, पर यह काम पूरा नहीं हुआ। इन विषयों पर इनके केवल अपूर्ण लेख या टिप्पणियाँ प्राप्य हैं। लेओनार्डों ने इतने अधिक वैज्ञानिक विषयों पर विचार किया था तथा इनमें से अनेक पर इनकी टिप्पणियाँ इतनी विस्तृत हैं कि उनका वर्णन यहाँ संभव नहीं है। ऊपर लिखे विषयों के अलावा वनस्पति विज्ञान, प्राणिविज्ञान, शरीरक्रिया विज्ञान, भौतिकी, भौमिकी, प्राकृतिक भूगोल, जलवायुविज्ञान, वैमानिकी आदि अनेक वैज्ञानिक विषयों पर इन्होंने मौलिक तथा अंत:प्रवेशी विचार प्रकट किए हैं। गणित, यांत्रिकी तथा सैनिक इंजीनियरी के तो ये विद्वान् थे ही, आप दक्ष संगीतज्ञ भी थे।

लेओनार्डों को अपूर्व ईश्वरीय वरदान प्राप्त था। इनकी दृष्टि भी वस्तुओं को असाधारण रीति से ग्रहण करती थी। वे उन बातों को देख और अवधृत कर लेते थे जिनका मंदगति फोटोग्राफी के प्रचलन के पूर्व किसी को ज्ञान नहीं था। प्रक्षिप्त छाया के रंगों के संबंधों में वे जो कुछ लिख गए हैं, उनका 19वीं सदी के पूर्व किस ने विकास नहीं किया। उनके धार्मिक तथा नैतिक विपर्ययों के संबंध में भी कुछ कहा जाता है, किंतु असाधारण प्रतिभावान मनुष्यों को साधारण मनुष्यों के प्रतिमानों से नापना ठीक नहीं है।