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Wednesday, March 25, 2020

ब्राह्मण और जनेउ


पिछले दिनों मैं हनुमान जी के मंदिर में गया था जहाँ पर मैंने एक ब्राह्मण को देखा, जो एक जनेऊ हनुमान जी के लिए ले आये थे | संयोग से मैं उनके ठीक पीछे लाइन में खड़ा था, मेंने सुना वो पुजारी से कह रहे थे कि वह स्वयं का काता (बनाया) हुआ जनेऊ हनुमान जी को पहनाना चाहते हैं, पुजारी ने जनेऊ तो ले लिया पर पहनाया नहीं | जब ब्राह्मण ने पुन: आग्रह किया तो पुजारी बोले यह तो हनुमान जी का श्रृंगार है इसके लिए बड़े पुजारी (महन्थ) जी से अनुमति लेनी होगी, आप थोड़ी देर प्रतीक्षा करें वो आते ही होगें | मैं उन लोगों की बातें गौर से सुन रहा था, जिज्ञासा वश मैं भी महन्थ जी के आगमन की प्रतीक्षा करने लगा।

थोड़ी देर बाद जब महन्थ जी आए तो पुजारी ने उस ब्राह्मण के आग्रह के बारे में बताया तो महन्थ जी ने ब्राह्मण की ओर देख कर कहा कि देखिए हनुमान जी ने जनेऊ तो पहले से ही पहना हुआ है और यह फूलमाला तो है नहीं कि एक साथ कई पहना दी जाए | आप चाहें तो यह जनेऊ हनुमान जी को चढ़ाकर प्रसाद रूप में ले लीजिए |

 इस पर उस ब्राह्मण ने बड़ी ही विनम्रता से कहा कि मैं देख रहा हूँ कि भगवान ने पहले से ही जनेऊ धारण कर रखा है परन्तु कल रात्रि में चन्द्रग्रहण लगा था और वैदिक नियमानुसार प्रत्येक जनेऊ धारण करने वाले को ग्रहणकाल के उपरांत पुराना बदलकर नया जनेऊ धारण कर लेना चाहिए बस यही सोच कर सुबह सुबह मैं हनुमान जी की सेवा में यह ले आया था प्रभु को यह प्रिय भी बहुत है | हनुमान चालीसा में भी लिखा है कि - "हाथ बज्र और ध्वजा विराजे, कांधे मूज जनेऊ साजे"।

 अब महन्थ जी थोड़ी सोचनीय मुद्रा में बोले कि हम लोग बाजार का जनेऊ नहीं लेते हनुमान जी के लिए शुद्ध जनेऊ बनवाते हैं, आपके जनेऊ की क्या शुद्धता है | इस पर वह ब्राह्मण बोले कि प्रथम तो यह कि ये कच्चे सूत से बना है, इसकी लम्बाई 96 चउवा (अंगुल) है, पहले तीन धागे को तकली पर चढ़ाने के बाद तकली की सहायता से नौ धागे तेहरे गये हैं, इस प्रकार 27 धागे का एक त्रिसुत है जो कि पूरा एक ही धागा है कहीं से भी खंडित नहीं है, इसमें प्रवर तथा गोत्रानुसार प्रवर बन्धन है तथा अन्त में ब्रह्मगांठ लगा कर इसे पूर्ण रूप से शुद्ध बनाकर हल्दी से रंगा गया है और यह सब मेंने स्वयं अपने हाथ से गायत्री मंत्र जपते हुए किया है |

ब्राह्मण देव की जनेऊ निर्माण की इस व्याख्या से मैं तो स्तब्ध रह गया मन ही मन उन्हें प्रणाम किया, मेंने देखा कि अब महन्त जी ने उनसे संस्कृत भाषा में कुछ पूछने लगे, उन लोगों का सवाल - जबाब तो मेरे समझ में नहीं आया पर महन्त जी को देख कर लग रहा था कि वे ब्राह्मण के जबाब से पूर्णतया सन्तुष्ट हैं अब वे उन्हें अपने साथ लेकर हनुमान जी के पास पहुँचे जहाँ मन्त्रोच्चारण कर महन्त व अन्य 3 पुजारियों के सहयोग से हनुमान जी को ब्राह्मण देव ने जनेऊ पहनाया तत्पश्चात पुराना जनेऊ उतार कर उन्होंने बहते जल में विसर्जन करने के लिए अपने पास रख लिया |

 मंदिर तो मैं अक्सर आता हूँ पर आज की इस घटना ने मन पर गहरी छाप छोड़ दी, मेंने सोचा कि मैं भी तो ब्राह्मण हूं और नियमानुसार मुझे भी जनेऊ बदलना चाहिए, उस ब्राह्मण के पीछे-पीछे मैं भी मंदिर से बाहर आया उन्हें रोककर प्रणाम करने के बाद अपना परिचय दिया और कहा कि मुझे भी एक जोड़ी शुद्ध जनेऊ की आवश्यकता है, तो उन्होंने असमर्थता व्यक्त करते हुए कहा कि इस तो वह बस हनुमान जी के लिए ही ले आये थे हां यदि आप चाहें तो मेरे घर कभी भी आ जाइएगा घर पर जनेऊ बनाकर मैं रखता हूँ जो लोग जानते हैं वो आकर ले जाते हैं | मेंने उनसे उनके घर का पता लिया और प्रणाम कर वहां से चला आया।

शाम को उनके घर पहुंचा तो देखा कि वह अपने दरवाजे पर तखत पर बैठे एक व्यक्ति से बात कर रहे हैं , गाड़ी से उतरकर मैं उनके पास पहुंचा मुझे देखते ही वो खड़े हो गए, और मुझसे बैठने का आग्रह किया अभिवादन के बाद मैं बैठ गया, बातों बातों में पता चला कि वह अन्य व्यक्ति भी पास का रहने वाला ब्राह्मण है तथा उनसे जनेऊ लेने आया है | ब्राह्मण अपने घर के अन्दर गए इसी बीच उनकी दो बेटियाँ जो क्रमश: 12 वर्ष व 8 वर्ष की रही होंगी एक के हाथ में एक लोटा पानी तथा दूसरी के हाथ में एक कटोरी में गुड़ तथा दो गिलास था, हम लोगों के सामने गुड़ व पानी रखा गया, मेरे पास बैठे व्यक्ति ने दोनों गिलास में पानी डाला फिर गुड़ का एक टुकड़ा उठा कर खाया और पानी पी लिया तथा गुड़ की कटोरी मेरी ओर खिसका दी, पर मेंने पानी नहीं पिया

इतनी देर में ब्राह्मण अपने घर से बाहर आए और एक जोड़ी जनेऊ उस व्यक्ति को दिए, जो पहले से बैठा था उसने जनेऊ लिया और 21 रुपए ब्राह्मण को देकर चला गया | मैं अभी वहीं रुका रहा इस ब्राह्मण के बारे में और अधिक जानने का कौतुहल मेरे मन में था, उनसे बात-चीत में पता चला कि वह संस्कृत से स्नातक हैं नौकरी मिली नहीं और पूँजी ना होने के कारण कोई व्यवसाय भी नहीं कर पाए, घर में बृद्ध मां पत्नी दो बेटियाँ तथा एक छोटा बेटा है, एक गाय भी है | वे बृद्ध मां और गौ-सेवा करते हैं दूध से थोड़ी सी आय हो जाती है और जनेऊ बनाना उन्होंने अपने पिता व दादा जी से सीखा है यह भी उनके गुजर-बसर में सहायक है |

इसी बीच उनकी बड़ी बेटी पानी का लोटा वापस ले जाने के लिए आई किन्तु अभी भी मेरी गिलास में पानी भरा था उसने मेरी ओर देखा लगा कि उसकी आँखें मुझसे पूछ रही हों कि मेंने पानी क्यों नहीं पिया, मेंने अपनी नजरें उधर से हटा लीं, वह पानी का लोटा गिलास वहीं छोड़ कर चली गयी शायद उसे उम्मीद थी की मैं बाद में पानी पी लूंगा |

अब तक मैं इस परिवार के बारे में काफी है तक जान चुका था और मेरे मन में दया के भाव भी आ रहे थे | खैर ब्राह्मण ने मुझे एक जोड़ी जनेऊ दिया, तथा कागज पर एक मंत्र लिख कर दिया और कहा कि जनेऊ पहनते समय इस मंत्र का उच्चारण अवश्य करूं -- |

मैंने सोच समझ कर 500 रुपए का नोट ब्राह्मण की ओर बढ़ाया तथा जेब और पर्स में एक का सिक्का तलाशने लगा, मैं जानता था कि 500 रुपए एक जोड़ी जनेऊ के लिए बहुत अधिक है पर मैंने सोचा कि इसी बहाने इनकी थोड़ी मदद हो जाएगी | ब्राह्मण हाथ जोड़ कर मुझसे बोले कि सर 500 सौ का फुटकर तो मेरे पास नहीं है, मेंने कहा अरे फुटकर की आवश्यकता नहीं है आप पूरा ही रख लीजिए तो उन्हें कहा नहीं बस मुझे मेरी मेहनत भर का 21 रूपए दे दीजिए, मुझे उनकी यह बात अच्छी लगी कि गरीब होने के बावजूद वो लालची नहीं हैं, पर मेंने भी पांच सौ ही देने के लिए सोच लिया था इसलिए मैंने कहा कि फुटकर तो मेरे पास भी नहीं है, आप संकोच मत करिए पूरा रख लीजिए आपके काम आएगा | उन्होंने कहा अरे नहीं मैं संकोच नहीं कर रहा आप इसे वापस रखिए जब कभी आपसे दुबारा मुलाकात होगी तब 21रू. दे दीजिएगा |

इस ब्राह्मण ने तो मेरी आँखें नम कर दीं उन्होंने कहा कि शुद्ध जनेऊ की एक जोड़ी पर 13-14 रुपए की लागत आती है 7-8 रुपए अपनी मेहनत का जोड़कर वह 21 रू. लेते हैं कोई-कोई एक का सिक्का न होने की बात कह कर बीस रुपए ही देता है | मेरे साथ भी यही समस्या थी मेरे पास 21रू. फुटकर नहीं थे, मेंने पांच सौ का नोट वापस रखा और सौ रुपए का एक नोट उन्हें पकड़ाते हुए बड़ी ही विनम्रता से उनसे रख लेने को कहा तो इस बार वह मेरा आग्रह नहीं टाल पाए और 100 रूपए रख लिए और मुझसे एक मिनट रुकने को कहकर घर के अन्दर गए, बाहर आकर और चार जोड़ी जनेऊ मुझे देते हुए बोले मेंने आपकी बात मानकर सौ रू. रख लिए अब मेरी बात मान कर यह चार जोड़ी जनेऊ और रख लीजिए ताकी मेरे मन पर भी कोई भार ना रहे |

मेंने मन ही मन उनके स्वाभिमान को प्रणाम किया साथ ही उनसे पूछा कि इतना जनेऊ लेकर मैं क्या करूंगा तो वो बोले कि मकर संक्रांति, पितृ विसर्जन, चन्द्र और सूर्य ग्रहण, घर पर किसी हवन पूजन संकल्प परिवार में शिशु जन्म के सूतक आदि अवसरों पर जनेऊ बदलने का विधान है, इसके अलावा आप अपने सगे सम्बन्धियों रिस्तेदारों व अपने ब्राह्मण मित्रों को उपहार भी दे सकते हैं जिससे हमारी ब्राह्मण संस्कृति व परम्परा मजबूत हो साथ ही साथ जब आप मंदिर जांए तो विशेष रूप से गणेश जी, शंकर जी व हनूमान जी को जनेऊ जरूर चढ़ाएं...

उनकी बातें सुनकर वह पांच जोड़ी जनेऊ मेंने अपने पास रख लिया और खड़ा हुआ तथा वापसी के लिए बिदा मांगी, तो उन्होंने कहा कि आप हमारे अतिथि हैं पहली बार घर आए हैं हम आपको खाली हाथ कैसे जाने दो सकते हैं इतना कह कर उनहोंने अपनी बिटिया को आवाज लगाई वह बाहर निकाली तो ब्राह्मण देव ने उससे इशारे में कुछ कहा तो वह उनका इशारा समझकर जल्दी से अन्दर गयी और एक बड़ा सा डंडा लेकर बाहर निकली, डंडा देखकर मेरे समझ में नहीं आया कि मेरी कैसी बिदायी होने वाली है |

अब डंडा उसके हाथ से ब्राह्मण देव ने अपने हाथों में ले लिया और मेरी ओर देख कर मुस्कराए जबाब में मेंने भी मुस्कराने का प्रयास किया | वह डंडा लेकर आगे बढ़े तो मैं थोड़ा पीछे हट गया उनकी बिटिया उनके पीछे पीछे चल रह थी मेंने देखा कि दरवाजे की दूसरी तरफ दो पपीते के पेड़ लगे थे डंडे की सहायता से उन्होंने एक पका हुआ पपीता तोड़ा उनकी बिटिया वह पपीता उठा कर अन्दर ले गयी और पानी से धोकर एक कागज में लपेट कर मेरे पास ले आयी और अपने नन्हें नन्हा हाथों से मेरी ओर बढ़ा दिया उसका निश्छल अपनापन देख मेरी आँखें भर आईं।

मैं अपनी भीग चुकी आंखों को उससे छिपाता हुआ दूसरी ओर देखने लगा तभी मेरी नजर पानी के उस लोटे और गिलास पर पड़ी जो अब भी वहीं रखा था इस छोटी सी बच्ची का अपनापन देख मुझे अपने पानी न पीने पर ग्लानि होने लगी, मैंने झट से एक टुकड़ा गुड़ उठाकर मुँह में रखा और पूरी गिलास का पानी एक ही साँस में पी गया, बिटिया से पूछा कि क्या एक गिलास पानी और मिलेगा वह नन्ही परी फुदकता हुई लोटा उठाकर ले गयी और पानी भर लाई, फिर उस पानी को मेरी गिलास में डालने लगी और उसके होंठों पर तैर रही मुस्कराहट जैसे मेरा धन्यवाद कर रही हो , मैं अपनी नजरें उससे छुपा रहा था पानी का गिलास उठाया और गर्दन ऊंची कर के वह अमृत पीने लगा पर अपराधबोध से दबा जा रहा था।

अब बिना किसी से कुछ बोले पपीता गाड़ी की दूसरी सीट पर रखा, और घर के लिए चल पड़ा, घर पहुंचने पर हाथ में पपीता देख कर मेरी पत्नी ने पूछा कि यह कहां से ले आए तो बस मैं उससे इतना ही कह पाया कि एक ब्राह्मण के घर गया था तो उन्होंने खाली हाथ आने ही नहीं दिया

Monday, March 23, 2020

કોરોના: હાલ અને પછી...

कोरोना के बाद दिखेंगे ऐसे फोटोग्राफ


સમગ્ર દુનિયાની સાથે સાથે ભારત પણ કોરોના સામે જંગ લડી રહ્યુ છે. જેને ધ્યાને રાખી આજે સમગ્ર દેશમાં સ્વંભૂ જનતા કર્ફ્યુનું પાલન કરવામાં આવી રહ્યું છે. રસ્તાઓ વેરાન બન્યા છે. ત્યારે આ જંગમાં મદદ માટે એક માત્ર ભારતીય ઉદ્યોગપતિ બહાર આવ્યા છે. દેશમાં કોરોનાના વધતા કેસને ધ્યાને રાખી આનંદ મહિન્દ્રાએ મદદ કરવાની જાહેરાત કરી છે. મહિન્દ્રાએ દર્દીઓ અને સંદિગ્ધોને મદદ કરવા માટે પોતાના રિઝોટર્સ તથા સાથે સાથે પોતાની આખી સેલેરી આપી મોનિટરીની મદદ કરવાની જાહેરાત કરી છે.

સમગ્ર દેશમાં જનતા કર્ફ્યુ. દેશમાં વધતા કોરોનાના કહેરને ધ્યાને રાખી વડાપ્રધાન મોદીએ જનતા કર્ફ્યુનું પાલન કરવા અપીલ કરી હતી, જેને દેશની જનતાએ અમલમાં ઉતારી છે. દેશમાં હાલ કોરોના પોઝિટીવની સંખ્યા 340 થઈ ગઈ છે. ત્યારે આવા સમયે લોકોને ખાસ સલાહ છે કે, તેઓ ઘરમાંથી બહાર ન નિકળે.


મદદ માટે ભારતના ઉદ્યોગપતિ આગળ આવ્યા જેમાં મહિન્દ્ર ગ્રુપના ચેરમેન આનંદ મહિન્દ્રાએ રવિવારના રોજ જાહેરાત કરી છે કે, તેમની કંપની આ સંભાવનાઓ પર કામ કરવાનું શરૂ કરી રહી છે. તેઓ આ માટે વેંટિલેટર પણ તૈયાર કરી રહ્યા છે. સાથે જ તેમણે જાહેરાત કરી છે કે, તેમની ક્લબો મહિન્દ્રા રિઝોર્ટ્સ દર્દીઓની સારસંભાળ માટે ટેંપરરી ફેસિલિટી તરીકે ઉપયોગમાં લઈ શકાશે. સાથે જ તેમની કંપની અન્ય સુવિધા માટે તૈયાર છે જે સરકાર અને ભારતીય સેનાને સંપૂર્ણ મદદ કરશે.

ટ્વીટર પર સતત લોકોને જાગૃત કરતા મહિન્દ્રાએ આ બિમારીથી બચવા લોકોને સાવધાની રાખવા જણાવી રહ્યા છે. તેમણે જણાવ્યું છે કે, અનેક રિપોર્ટ વાંચ્યા બાદ જાણવા મળ્યું છે કે, ભારતમાં હાલ કોરોના સ્ટેજ 3 પણ આવી રહ્યું છે. આનંદ મહિન્દ્રાએ એવું પણ જણાવ્યું છે કે, ફંડ માટે અમે લોકો પ્રેરિત કરી રહ્યા છે. તેથી લોકોએ આગળ આવી ફંડ આપવું. મહિન્દ્રા ખુદ પોતાની 100 ટકા સેલેરી આપી રહ્યા છે. આગામી દિવસોમાં વધુ મદદની પણ ખાતરી આપી છે.

Sunday, March 15, 2020

गांधी विचार: नारनभाई देसाई





महात्मा गांधी के निजी सचिव और जीवनी लेखक रहे महादेव भाई देसाई के पुत्र और सर्वोदयी नेता नारायण भाई देसाई को श्रद्धासुमन।

नारायणभाई को साहित्य अकादमी अवार्ड, जमनालाल बजाज अवार्ड, रामजीत राम स्वर्ण पदक व मूर्ति देवी अवार्ड से सम्मनित किया जा चुका है। देसाईजी ने गांधी जी पर 'मेरा जीवन ही मेरी वाणी' नाम से चार खंड पुस्तकें लिखी हैं। स्वतंत्रता सेनानी नवकृष्ण चौधरी और मालती देवी चौधरी की पुत्री उत्तारा चौधरी से नारायणभाई का विवाह हुआ।

पत्नी के साथ नारायण सूरत से 60 किलोमीटर दूर वेडछी गांव में आदिवासियों के बच्चों को पढ़ाने के लिए 'नई तालीम' स्कूल की स्थापना की।

नारायणभाई देसाई बचपन में खादी आंदोलन, विनोबा भावे के भूदान आंदोलन से भी जुड़े रहे। सन 1959 में नारायणभाई ने भूमिपुत्र पत्रिका का संपादन भी किया। नारायण देसाई का जन्म 24 दिसंबर 1924 को गुजरात के बलसर में हुआ। नारायण महात्मा गांधी के साबरमति आश्रम अपने पिता के साथ रहकर पले। इसके साथ ही नारायण वर्धा के निकट सेवाग्राम स्थित गांधी आश्रम में भी रहे। नारायण ने बचपन में ही स्कूल जाना छोड़ दिया था। उन्होंने अपने पिता से आश्रम में ही शिक्षा प्राप्त की और अपने ज्ञान की काबेलयत से गुजरात विद्यापीठ के कुलपति बने।

महात्मा गांधी के जीवन और जीवन संदेश को कथामय रूप में सुनाने के लिए उन्होंने ‘गांधीकथा’ शरू की और जीवन भर सर्वव्यापी,सर्वकालिक और समदर्शी गाँधी विचार को ‘गांधीकथा’ कथा के माध्यम से जीवंत रखने योगदान देते रहे थे।

अपना तन, मन, धन और पूरा जीवन समाज के लिये समर्पित करने वाले प्रेरणादायी व्यक्तित्व नारायणभाई की आत्मा को सादर प्रणाम के साथ भाव पूर्ण श्रधांजलि।

Monday, March 9, 2020

પપ્પા તો છે જ ને...





હતા મારા જન્મ પર
બધા ઉત્સાહી ને ,
એક ખુણામાં ચુપચાપ
ઉભા હતા એ ,
અદબ વાળીને,

બધાએ માત્ર વહાલ કર્યું
ને જે દવાખાનાના બીલ
બાકી હતા તેમાં ,
પપ્પા તો છે જ ને...

પેટ ઘસીને ભાંખોડીયા
ભરતા થયો હું,
અથડાયો ઘડાયો,
કેટકેટલી વાર હું ઘરમાં,
પા પા પગલી ભરતાં
ડર લાગે, પણ...
પડીશ તો ચિંતા નહોતી,
કેમ કે...
પપ્પા તો છે જ ને...

યાદ છે નિશાળનો
પહેલો દિવસ...
જ્યારે  રડયો હતો હું,
પોક મુકીને...
શાળાના દરવાજે,
ડરી ગયો હું ,
આ ચોપડીઓના
જંગલમાં,
પણ ખબર હતી કે,
હાથ પકડનાર...
પપ્પા તો છે જ ને...

સ્લેટ માં લખતો હતો હું
જિંદગીના પાઠ રોજ,
ને ભુંસતો  સુધારતો
હું ભુલો,
જો નહીં સુધરે ભુલો,
ને નહીં ઉકલે આંટીઘૂંટી
તો એ બધું ઉકેલવા,
પપ્પા તો છે જ ને..

પહેલી સાઇકલ, સ્કૂટર
ને પહેલી ગાડીમાં
સ્ટીયરિંગ પકડીને
જોડે દોડ્યા હતા એ,
જો લપસી જઈશ હું
આ જિંદગીના રસ્તાઓ
પર ક્યાંક તો
હાથ પકડવા
પપ્પા તો છે જ ને...

તું ભણ ને બાકી હું ફોડી લઈશ.
આ ડાયલોગ પર જ આખું ભણતર પુરું કર્યું,
 ચોપડા, કપડાં ને પોકેટ મની ટાઈમસર આવતા
ને ફી ભરવા માટે
પપ્પા તો છે જ ને...

કોઈ કરકસર કે કચાશ
ના કરી મને સારો માણસ
બનાવવામાં જેમણે,
હારી જઉં તો હાથ
પકડીને ઉભો કરી
ફરી તૈયાર કરવામાં
પપ્પા તો છે જ ને...

નોકરી પછી લગ્ન ને
પછી મારું ઘર કરવામાં
જેમણે કદી પાછું વળીને
ના જોયું,
કંઈ ખુટી પડશે તો
હું લઈ આવીશ એવી
હૈયાધારણ આપવાવાળા
પપ્પા તો છે જ ને.

જેમણે મને મોટો કર્યો
કોઈ પણ ક્ષોભ વિના,
 ને વિતાવ્યું આખું
આયખું એમનું,
તો પણ હજી કંઈ થાય,
તો આવીને મને કહેતા ,
 તું મુંજાતો નહીં ,
તારા પપ્પા તો છે જ ને.

હાર્યો કેટલીય વાર
જિંદગીના દાવ પેચમાં,
ને રમ્યો બમણું હું,
જુગારી કેટલાય ખેલમાં,
તોય સતત મને જીતાડવા
મથતા ને,
થાય કંઈ પણ...,
મને તો એક જ નિરાંત

કે.....,
પપ્પા  તો છે જ ને...



 આ પપ્પાએટલે ?

પપ્પા એટલે ખાલી એક નામ ?
પપ્પા એટલે ખાલી એક દેખાવ જ ?
પપ્પા એટલે ખાલી એક પદ ?
પપ્પા એટલે ખાલી બાયોડેટામાં
નામની પાછળ લાગતુ અસ્તિત્વ ?

ના ….

પપ્પા એટલે પરમેશ્વરના પુરાણો કરતા પણ વધુ પ્રેકટિકલ પ્રેરણાદાઇ પુસ્તક.

આપણી સૌથી મોટી તકલીફ એ છે કે આપણા માંથી ઘણા પુરાણો વાંચવાની અને સમજવાની વાતો કરે છે પણ ઘરમાં બેઠેલા પપ્પાને નથી વાંચી શકતા...

આ પપ્પા નામે પ્રોફાઇલને ક્રેડિટ સાથે બહુ લેવાદેવા નહી.. મા ને ઇશ્વર માની લેનાર સમાજ પપ્પાને પપ્પા જ સમજે..

કારણકે આ પપ્પાએ કોઇ દિવસ પોતાની જાતને ઇશ્વરની કેટેગરી માટે નોમીનેટ
કર્યો જ નથી.

ખબરદાર જો આમ કર્યુ છે તો.
આવવા દે તારા પપ્પાને.
બધ્ધું જ કહી દઇશ"

આવા વાક્યો

દરેક મા એ કયારેક ને કયારેક પોતાના બાળકને નાનપણમાં કહ્યાં જ હશે.
અને ન છૂટકે પણ પેલો ઓફિસમાં ફેમીલી માટે કમાતો બાપ બાળકનો અજાણ્યો દુશ્મન બની જાય છે. અને અજાણતા જ સંતાનો સાથેનું આ છેટુ ઘણું લાંબુ ચાલે છે.

ઘણા કિસ્સાઓમાં તો બાપની ખરી કિંમત સમજાય છે ત્યા સુધીમાં...

બાપ ખીલ્લી પર ટાંગેલ ફોટો બની ગયો હોય છે.

બાકી પપ્પા તો એવા પરમેશ્વરછે જેને પામવા વ્રત, ઉપવાસ કે અઘરા શ્લોકના ગાન કરવા નથી પડતા.આપણી તકલીફમાં આપણા ખભાને ટેકો દેવા એ જીવતો દેવ હાજરા હજૂર જ હોય છે.

ડૉ.નિમિત્ત ઓઝાએ લખેલ એક
સરસ વાત યાદ આવે છે કે ઘરની બહાર નીકળતા ખાડો આવે ને પડી જવાય તો "ઓ મા" બોલાય છે પણ અજાણ્યા જ રસ્તો ક્રોસ કરતા ટ્રક છેક પાસે આવી જાય ત્યારે તો મ્હોં માથી "ઓ બાપ રે" જ સરી પડે છે..

 જે એ વાતની સાબિતી છે કે નાની નાની તકલીફો માં મા યાદ આવે ... પણ જીવનની અઘરી અને મોટી તકલીફોમાં તો બાપ જ યાદ આવે છે.

પપ્પા નામના પરમ મિત્રને ઓળખવાની કળા મોટા ભાગે યુવાનીમાં કેળવાતી જ નથી બાકી એ વાત ખરી કે આ ઉંમરમાં પપ્પા ભણાવા કરતા ગણાવે છે વધુ.

કોઇ બાપ પાર્ટ ટાઇમ નોકરી કરતો હશે પણ પિતૃત્વતો ફુલ ટાઇમ જ કરતો હશે.. કારણકે ખેતરમાં હળ ચલાવતો કે પછી ઓફિસમાં ઓવર ટાઇમ કરતો બાપ આખરે તો દિકરા કે દિકરીને સઘળી સવલતો આપવા જ સજ્જ થતો હોય છે.

આપણી યુવાનીમાં કરેલી ભૂલોથી ટાયર્ડ થઇ જતો બાપ ચીડાઇ ને પિતૃત્વથી રીટાયર્ડ નથી થઇ જતો.. એને પળે પળ આપણને કશું એટલા માટે શીખવાડવું છે કારણકે જીવનમાં જયાં જયાં એણે પીછે હટ ભરી છે ત્યાં ત્યાં આપણે ન ભરી દઇએ.

બુદ્ધિનું બજેટ ખોરવ્યા વિના આપણી બાહોશતા અકબંધ રહે તેવા પ્રયત્નો એ સતત કરતો રહે છે.આ કારણોસર એ મોટા ભાગે કડક વલણ અપનાવે અને એટલેજ એ છપ્પનની છાતીમાં રહેલું લીસ્સુ માખણ આપણને મોટાભાગે ઓળખાતું નથી.

આ પપ્પા એટલે નવ વાગે ટીવી બંધ કરીને જબરજસ્તી ભણવા બેસવાનો ઓર્ડર નહી પણ ભણતરની કિંમત સમજાવતુ એક
સુવાક્ય.

આ પપ્પા એટલે રાત્રે જયાં સુધી ઘરે ન આવીયે ત્યાં સુધી સતત ચાલતો હિંચકાનો કિચુડ કિચુડ અવાજ.

આ પપ્પા એટલે મમ્મી કરતાં પણ વધુ વ્હાલની ઉપર પહેરેલૂં કડકાઇનું મ્હોરુ.

આ પપ્પા એટલે એકવાર ખાઇ લીધા પછી મમ્મીથી સંતાડીને બીજી વાર અપાતી ચોકલેટ.

આ પપ્પા એટલે એવી પર્સનાલીટી જે ફેશન ન કરતી હોવા છતાં ય આપણા સ્ટાઇલ આઇકોન બની જાય.

આ પપ્પા એટલે આપણને કદિ યે પડી ન જવા દેતો સાઇકલની સીટની પાછળથી પકડેલો મજબુત હાથ.

આખરે પપ્પા ઍટલે પપ્પા…બસ આમ જુવો તો કશું જ નહી અને આમ જુવો તો બધ્ધુ જ.

હજીયે સમય છે.

જો પપ્પા નામનું લાગણી નું સરનામું જીવંત બનીને ઘરમાં પોતાની મીઠાશ ફેલાવતું હોય તો આ લેખ પુરો કરીને એને જઇને એક વાર કોઇજ કારણ વગર ભેટી પડજો.

 એ પપ્પા નામના પુસ્તકમાં એવુ સરસ મઝાનું પાનુ જોડાશે જે જીવનભર વાંચવું ગમશે..

હોળી 9.3.2020

Thursday, February 27, 2020

स्कुल कैसे हो...



आज कल अब रॉड पे बड़े पोस्टर लगेंगे। हमारी स्कुल में इतना बड़ा केम्पस हैं। हम इंटर नॅशनल स्कुल हैं। हम ये करते है, वो करते हैं। कुछ लोग अपनी स्कुल को अलग दिखाते हैं। परमिशन गुजरात सरकार के नियमो से लेते है और पाठ्यक्रम हर सत्र के बाद बदलते हुए अपने आप को, अपनी स्कुल को अभिनव दिखाने का प्रयत्न करते हैं।

जैसे CBSC:

सेन्ट्रल बोर्ड ऑफ सेकंडरी एज्युकेशन। इसका मतलब है कि सेकंडरी स्कूल ही CBSC हो सकती हैं।अगर ऐसा है तो कक्षा 1 से 5 को कोण CBSC कह सकता हैं। मगर पेरेंट्स कुछ नहीं देखते।

जैसे इंटरनॅशनल:

इंटर नॅशनल का सीधा मतलब है आंतर राष्ट्रीय। जो स्कुल अपने आप को इंटर नॅशनल स्कुल कहते है उन की अपने देश को छोड़ियो अपने शहर में भी दूसरी ब्रांच नहीं होती। मगर पेरेंट्स कुछ नहीं देखते।

जैसे जॉय फूल:

एप्रिल फूल जैसा ये शब्द पैरंट्स के लिए शायद यही अर्थ लेकर आता हैं। जहाँ बच्चो को उन की उम्र के अनुसार आनंद मिले ऐसा होना चाहिए। आनंद के साथ वो कुछ जानकारी से अवगत हो। मगर ऐसी स्कुल हो तो कोई बात नहीं, सिर्फ ऐसा नाम लिखकर पैसा लेते हैं। मगर पैरंट्स कुछ नहीं देखते।

जैसे ड्युअल लेंग्वेज:

बच्चा पचपन से दूसरी भाषा से अवगत हैं। उसे लिखने की जरूरत नहीं हैं। जिन बच्चों की मातृभाषा अलग हैं उन्हें भी इस स्कुल में एडमिशन लेते समय ड्युअल लेंग्वेज को प्रचारित किया जाता हैं।गुजरात में एक तरफ जहाँ अंग्रेजी माद्य्यम भी सफल नहीं हुए वहाँ ड्युअल लेगबेज याने दो भाषा में सीखना, ऐसा किसी ने देखा हैं? मगर हम उसे जाहेरात में देखते हैं। मगर पेरन्ट्स कुछ नहीं देखते।

जैसे अभिनव स्कुल:

नवतर आयोजन...
नवतर शैली या प्रकार...
नवतर शब्द या विचार...

इनोवेशन... स्किल...इवेल्यूएशन...एक्सीलेटर लर्निग, पीअर लर्निग के नाम से स्कुल चलते हैं। अगर कोई कहे की हमारे बच्चे इनोबेशन करेंगे या कर पाएंगे। पेरेंट्स खुश।अगर NIF की फिगर को देखा जाय तो 60 से 70000 बच्चो को मिलने के बाद 30 इनोबेटर्स मिलते हैं। क्या कोई ऐसी प्रचार या नाम लिखने वाली स्कुल में इतने बच्चे पढ़ते है? अगर हा, तो फिर से सवाल तो ये है कि 30 बच्चे पसंद होते हैं।NIF की स्थापना और उस के चयन के ख़ास टूल्स हैं। तो ऐसे नाम से स्कुल क्यों चलाये हैं। क्या गरीब बच्चों में इनोबेशन के विचार या स्किल नहीं होते? मेने आज तक 500 से अधिक वर्कशॉप बच्चो के साथ किए हैं। अगर हर वर्क शॉप में 50 बचसहे है तो उन 2500 से आज तक 3 बच्चे अपने इनोबेशन दे पाए हैं। ऐसे बच्चे होते है जिन्हें हम वातावरण दे सकते हैं । इस के लिए स्कुल की आवश्यकता नहीं हैं। स्किल याने समजीए की गाना। क्या हर व्यक्ति अच्छा गा पाती हैं? अगर नहीं तो स्किल स्कुल में पढ़ने वाला हर बच्चा गीत गाने में माहिर होना चाहिए।

ऐसी मानसिकता ही हमे खर्च करने पर मजबूर करती हैं। सुनिए ऐसी प्राइवेट स्कूल के सामने सरकारी स्कूल भी हैं।

जैसे NVND:

पंचमहाल में नवा नदिसर प्रायमरी स्कुल। जहाँ स्किल डेवलोपमेन्ट की सुविधा प्रदान होती हैं। भारत में एक अनोखा स्कुल हैं।यहाँ के बच्चे ड्रोन और रॉबर्ट बनाते हैं।

जैसे जूनागढ़ कन्या विद्यालय:

प्राइवेट स्कूल के सामने ये स्कुल आज खड़ा हैं।जो बस की ट्रांसपोर्ट की सुविधा देती हैं। यहाँ बच्चे रियल में जॉय फूल पढ़ते हैं। शिक्षा से जुडी क्वॉलिटी कें लिए उसे गुजरात में जाना जाता हैं।


शांति निकेतन,मोरबी:

एक बात देखो।
स्किल
इनोबेशन
एक्सीलेटर लर्निग


सब एक साथ देखने को मिलेगा। कोई दम्भ या आडंबर नहीं। बीएस, बच्चो की स्कुल और मनोरम्य नजारा। जहाँ प्राइवेट स्कूल को छोड़कर लोग यहाँ एडमिशन लेते हैं।

गमती निशाल:

जहाँ बच्चे सिर्फ अखबार से पढ़ते हैं। स्कुल के सभी बच्चों को पढ़ना लिखना आता है और वो सब news paper से होता हैं। चित्र,मूर्ती निर्माण, पपेट शो,कार्टून, संगीत में सभी बच्चे निपुण हैं। यहां का MR एक बच्चा अमित भांडवा भी ढोलक बजा सकता हैं। स्कुल में बच्चो से ज्यादा पेड़ हैं। रन में 100 से अधिक पेड़ हैं। जो स्किल बच्चो में है उस बजह से ये सम्भव हुआ हैं।

आज सरकारी स्कूल सभी सुविधा से सज्ज हैं। आप भी गलत प्रचार में न आकर नजदीकी सरकारी स्कूल में अपना प्रवेश प्राप्त करने की व्यवस्था करें। क्योंकि...


अधिक मेरिट वाले
अधिक अधिकार के साथ
अधिक सुविधा और सुश्रुषा के लिए सरकारी स्कुल में प्रवेश प्राप्त करें।


(कोई खानगी स्कुल वाले इस ब्लॉग पोस्ट के लिए, डराने या धमाका ने की कोशिश न करे ...)

Tuesday, February 25, 2020

अमेरिका में रूमा देवी का सन्मान...



न्यूयाॅर्क में भारतीय वाणिज्यिक दूतावास ने ग्रामीण विकास एवं चेतना संस्थान की अध्यक्ष रूमा देवी जी को आमंत्रित कर सम्मानित किया जहां उन्होंने एक कार्यक्रम में अमेरिकन प्रतिनिधियों को संबोधित कर राजस्थान की शिल्प कलाओं के विकास पर वार्ता की। कौंसल जनरल आॅफ इंडिया के प्रमुख संदीप चक्रवर्ती ने इस दौरान उम्मीद जताई कि अमेरिका के हाई स्कुल व कालेज विद्यार्थी भारत में बाङमेर जाकर हमारे आर्ट ओर क्राफ्ट का अध्ययन करेंगे। जिसके फलस्वरूप अमेरिका के हाई स्कुल व कालेज अपने पाठ्यक्रमों में इसे शामिल कर पढा सकेंगे। कार्यक्रम में पर्यटन व शिक्षा के क्षेत्र से संबंधित प्रतिनिधि मंडल को संस्थान के सचिव विक्रम सिंह ने पावर प्रजेंटशन के माध्यम से बाङमेर व राजस्थान की विभिन्न सांस्कृतिक धरोहरों पर प्रस्तुतिकरण दिया गया।इस वख्त 7स्किल कीबोर्ड से मुझे जुड़ने का मौका मिला। वहीं मैंसाचुसेट्स स्टेट के नीमध शहर की पब्लिक लाइब्रेरी में राजस्थान की शिल्प कलाओं पर आयोजित कार्यशाला में जीवंत प्रदर्शन व नई पीढ़ी को सांस्कृतिक विरासत से जोङने पर रूमा देवी का उदबोधन हुआ ।

न्यूयार्क में हुआ अभिनंदन समारोह

प्रवासी भारतीयों ने रूमा देवी के अमेरिका आगमन पर अभिनंदन व प्रीति भोज का आयोजन रखा जिसमें न्यूयाॅर्क व न्युजर्सी शहर से बङी संख्या में प्रवासीयों ने भाग लिया। इससे पूर्व वांशीगटन डीसी व वर्जीनिया में रूमा देवी का भव्य स्वागत हुआ। ज्ञातव्य है कि विश्व के विख्यात विश्व विद्यालय हार्वर्ड में स्पीकर के तौर पर आमंत्रित हो वहां अपना लेक्चर देने के उपरांत रूमा देवी अमेरिका प्रवास
के दौरान वहां विभिन्न प्रान्तो में आयोजित कार्यक्रमों में शिरकत कर 26 फरवरी को बाङमेर पहुंच रही हैं जहाँ स्थानीय लोगों द्वारा रखे सम्मान समारोह में अपने अनुभवों को स्थानीय हस्तशिल्पीयों के सम्मुख रखेंगी।

Friday, November 8, 2019

ઍક સાચી વાત....


પ્રિય મિત્રો!

  આજે ઍક ડૉક્ટર દ્રારા કિધેલી વાત કરવાની છે.તેમનું નામ છે ડૉ. ભાવના.  તેઓ   પેડિયાટ્રિક  સર્જરી (પીજીઆઈ)  ના  કાઉન્સિલર  તરીકે  કામ  કરે છે.
તેં નાની વિનંતિ કર્તા કહે છે. આ વાત કરતાં પહેલાં ઍક વાત સમજવી જરૂરી છે. 
તેં કહે છે. 'હું  તમારી  સાથે  માહિતીનો  એક  નાનો  ભાગ  શેર  કરવા  માંગુ  છું.'
તમારામાંથી ઘણા લોકોએ આજના અખબારો વાંચ્યા હશે. પહેલાં MRI અને હવે  EMRI. આના પરિણામો કહે છે....

હાર્ટ  એટેક  ધરાવતા મોટા  ભાગના લોકો  50  વર્ષથી  ઓછા  ઉંમરના  હોય  છે.


જાણીને આશ્ચર્ય થશે કે  આ માટે ગુનેગાર  પામ  ઓઇલ  છે.

આ પામ તેલ ઍક તરફ  અલકો્હોલ  અને  ધૂમ્રપાનને  એકસાથે મૂકવા  કરતાં વધુ  જોખમી  છે. 
       
ભારત  આ  વિશ્વમાં  પામ  તેલ માટે  સૌથી  વધુ  આયાત  કરનાર  છે. પામ ઓઇલ માફિયા ખૂબ મોટી સંસ્થા માફક તેમાં અનેક લોકો કામ કરે છે.

આ બધુ જોખમ આવનાર આ બાળકો સામે આવશે. આજે એ નાનાં છે. મોટા છે એ મરી  જશે. જીવશે આજના આ નાના બાળકો.તેમનાં ભવિષ્યને મોટું જોખમ  છે,આ બધું એમનાં જોખમે જ છે. 

પામ  ઓઇલ  વિના  કોઈ ફાસ્ટ  ફૂડ  ઉપલબ્ધ  નથી. જો તમે  અમારી કરિયાણાની દુકાન પર જાઓ છો, તો પામ તેલ વગર બાળકોનો  ખાદ્ય  ખોરાક  લેવાનો  પ્રયાસ  કરો - તમે  સફળ  થશો  નહીં. તમને તે જાણવાનું રસ હશે કે  મોટી કંપનીઓના  બીસ્કીટ  પણ  તેમાંથી  બનાવવામાં  આવે  છે, અને તે જ રીતે બધા ચોકલેટ્સ . લાખો ને ખર્ચે, કરોડોના આયોજન પછી ખરીદનાર ને સમજાવવામાં અને  માનવવામાં આવ્યું  છે  કે  તેઓ  સ્વસ્થ  છે. પરંતુ આપણે  વિનાશક  પામ  તેલ  અથવા  પેમિટિક  એસિડ   વિશે  ક્યારેય  જાણતા  નહોતા. લેઝ  જેવી  મોટી  કંપનીઓ  પશ્ચિમના  દેશોમાં  જુદા  જુદા  તેલનો ઉપયોગ કરે છે.  ભારતમાં  પામ  તેલનો જ  ઉપયોગ  થાય છે. કારણ તે  સસ્તું  છે. 
દર વખતે  બાળક  પામ તેલ  સાથેનું  ઉત્પાદન  ખાય છે, ત્યારે લાંબા સમયે તેની આડઅસર થાય છે. વ્યક્તિનું મગજ અયોગ્ય વર્તન કરે છે અને હૃદયની આજુબાજુ અને હૃદયમાં ચરબીનું સંક્રમણ કરે છે આ કારણે સૌને આવુ તેલ ખૂબ  જ  નાની  ઉંમરે  ડાયાબિટીઝ  તરફ  દોરી  જાય છે. 
 વર્લ્ડ ઇકોનોમિક ફોર્મ  એ અનુમાન લગાવ્યું છે કે  50 % ટકા  યંગ  લોકો  જે નાની  ઉંમરે  મરે  છે  ડાયાબિટીઝ અને  હાર્ટ ડિસીઝથી  મરી જશે.

પામ  ઓઇલ  માફિયાએ  આપણા  બાળકોને  જંક  ફૂડના  વ્યસની  બનાવી  દીધા છે, ફળો અને શાકભાજીઓને એક બાજુ મૂકી દીધા છે, જે હાર્ટ રક્ષણાત્મક છે.આગલી વખતે જ્યારે તમે તમારા બાળક માટે કંઈક ખરીદો, ત્યારે ઉત્પાદનનું લેબલ જુઓ. જો તેમાં પામ તેલ અથવા પામોલિઅનિક તેલ અથવા પામિટિક એસિડ છે, તો તેને ખરીદવાનું ટાળો!
તેમણે,  માનનીય વડા પ્રધાનને પત્ર લખ્યો છે  અને  આપણી  ભાવિ   પેઠીઓને  સુરક્ષિત  રાખવા માટે કેટલાક પગલાં લેવા ભારતભરના 1 લાખ ડોકટરો દ્વારા સમાન પત્ર લખવાની પ્રક્રિયામાં પણ વિચારાધીન  છે.
ફરી એકવાર  બાળકો માટે, તેમનાં સ્વાસ્થ્ય અને તંદુરસ્તી માટે અને આ તેલ ને લીધે ઉભા થતાં જોખમ  પર  ભાર  મૂકવામાં તેઓ માને છે.

Bnoવેશન: કોઈ ને દાન આપવું સારું. અન્ન દાન સૌથી સારું. પણ, આવી આડઅસરો થાય એવા જહેંર ને શું દેખાડો કરવા જાહેરમા આપવા દઈએ?


પણ... મફત હોય તો સૌને લેવું ગમેજ.

Monday, October 14, 2019

सनथ


समय कभी रुकता नहीं।
आज भी समय चलित हैं।

क्योकि...
11.10.2019 के दिन से में
 सणथ प्राथमिक स्कूल में हाजिर हुआ हूं।

आज से मेरा हेड क्वाटर:

डॉ. भावेश पंड्या
मु.शिक्षक, सणथ प्राथमिक स्कूल।
पगार केंद्र लोरवाड़ा
ब्लॉक: डीसा जिल्ला: बनासकांठा।


फिर ये स्कुल *गमती निशाल* बनेगी। श्री संजय पटेल और श्रीमती हंसा बेन के साथ मिलकर सणथ को मॉडल स्कुल बनाएंगे।

2006 में ब्रिटिश काउंसिल आये थे। उस से भी अच्छा करने का मन हैं।

काम बच्चे करे,
अनुभव प्रात करे और इसी तरीके से बच्चे सीखेंगे। मेने सिखाया है और में सीखा पाऊंगा।अनुभव का आदान प्रदान होगा।

2004 से सणथ सीधा 15 साल बाद आया हु। मेने जो काम किया था वो दिखता हैं। उसे संवारना है। बच्चो की सबख़्या बढ़े और फिर से गमती निशाल क्रियान्वित बने ऐसी आशा रखता हूं।


भवदीय

भावेश पंड्या

मुझे यकीन हैं


सब कुछ मुमकिन हैं।


अब सनथ के साथ...

Saturday, October 5, 2019

एक खोज



सभी किसान भाइयों को नमस्ते इनोवेशन सिल्वर जुबली भाई सरदार   दविंदर सिंह जी  जर्नलिस्ट पंजाबी ट्रिब्यून यमुनानगर हरियाणा मैं काफी समय से काम कर रहे हैं आज मुझे यह अखबार की कटिंग भेजी 25 साल पुरानी जिसमें झाड़ू लगाने वाली मशीन वाह कैमरे की बैटरी से चलने वाला सपरे पंप पुरानी याद आ गई जब गांव वालों ने वह घर वालों ने मुझे पागल घोषित कर दिया था तब गांव में औरतें घुंघट किया करती थी और श्रीमती श्यामू देवी जीने सरदार देवेंद्र सिंह जर्नलिस्ट से पूछा की इसका कुछ बनेगा भी कि या लोग ऐसे ही मजाक उड़ाते रहेंगे सरदार जी ने कहा धीरज रखो कोशिश करो कामयाबी जरूर मिलेगी श्रीमती जी का पूरा सहयोग मिला  कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती मुझे पता नहीं था हनी बी नेटवर्क सृष्टि ज्ञान एन आई एफ का साथ मिलेगा और मुझे राष्ट्रपति सम्मान मिलेगा विदेशों में मेरी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की जाएगी देश के बड़े संस्थान आई आई एम आईआईटी के विद्यार्थी भी मुझे पहचानेंगे और पहचान बनेगी अति धन्यवाद

Saturday, September 28, 2019

तब वो जेलर थे...




दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति बनने के बाद ऐक बार नेल्सन मांडेला अपने सुरक्षा कर्मियों के साथ एक रेस्तरां में खाना खाने गए। सबने अपनी अपनी पसंद का खाना  आर्डर किया और खाना आने का इंतजार करने लगे। उसी समय मांडेला की सीट के सामने वाली सीट पर एक व्यक्ति अपने खाने का इंतजार कर रहा था। मांडेला ने अपने सुरक्षा कर्मी से कहा कि उसे भी अपनी टेबल पर बुला लो। ऐसा ही हुआ। खाना आने के बाद सभी खाने लगे, वो आदमी भी अपना खाना खाने लगा, पर उसके हाथ खाते हुए कांप रहे थे।


खाना खत्म कर वो आदमी सिर झुका कर रेस्तरां से बाहर निकल गया। उस आदमी के जाने के बाद मंडेला के सुरक्षा अधिकारी ने मंडेला से कहा कि वो व्यक्ति शायद बहुत बीमार था, खाते वख़्त उसके हाथ लगातार कांप रहे थे और वह ख़ुद भी कांप रहा था। मांडेला ने कहा नहीं ऐसा नहीं है। वह उस जेल का जेलर था, जिसमें मुझे कैद रखा गया था। जब कभी मुझे यातनाएं दी जाती थीं  और मै कराहते हुए पानी मांगता था तो ये मेरे ऊपर पेशाब करता था।

मांडेला ने कहा मै अब राष्ट्रपति बन गया हूं, उसने समझा कि मै भी उसके साथ शायद वैसा ही व्यवहार करूंगा। पर मेरा चरित्र ऐसा नहीं है। मुझे लगता है बदले की भावना से काम करना विनाश की ओर ले जाता है। वहीं धैर्य और सहिष्णुता की मानसिकता हमें विकास की ओर ले जाती है।

Saturday, September 21, 2019

नया प्रकल्प


बहोत दिनों के बाद आज कुछ ऐसा हुआ। कई सालों बाद फिर से एकबार बालगीत रिकॉर्डिंग करने का अवसर मिला कक्षा 1 ऐ 8 की कविता एवं गाने रिकॉर्ड करने की आज से शुरुआत की। कमांड ऐंड कंट्रोल फॉर स्कुल की तरफ से हमने BISAG में कक्षा 1 के गाने रिकॉर्ड किए।कुछ काम बाकी है जो सोमवार से हाथ पर लेंगे।

आज सिर्फ गाना हुआ।

आगे और पीछे बोलना और गाने के बारे में उद्गोशना करना अब बाद में होगा।

ये छोटा दिखने वाला काम बहोत बड़ा है। इस के पीछे कमांड ऐंड कंट्रोल सेल से श्री धर्मेश रामानुज श्री प्रकाश भट्टी और मेरे साथ श्री राजेश लिम्बचिया(लाखनी), श्री महेशभाई सोलंकी(पालनपुर) श्रीमती गायत्री सोनी(धोलका)श्रीमती आरती शर्मा( देत्रोज) बाल कलाकार सुमित सोलंकी के साथ रेकॉर्डिंग किया गया। कुछ साथी जो आज हमारे साथ नहीं जुड़ पाए इस में श्रीमती भावना जोशी (कोठारी स्कुल) धीरेनभाई पटेल(अमदावाद)श्रीमती नीलमबा चावड़ा (साणंद) बाल कलाकार श्री आलोक सोलंकी अब के बाद वाले आयोजन में जुड़ेंगे।

अगर आप भी गाना बजाना जानते है,जो जुड़ना चाहते है,कृपया वो संपर्क करें।

एक बात....

जो कुछ नहीं कर सकते वो बहाने अच्छे कर लेते हैं।

Sunday, September 15, 2019

स्किल है तो क्या करे?




15 ऑक्टोबर
भारत रत्न अब्दुल कलाम जी का जन्म दिवस। पिछले 9 सालों से हम उसे बच्चो के साथ मना रहे हैं। इस बार 15 ऑक्टोबर 2019 को हम फिरसे नॅशनल कोन्फ्रंफ बच्चो के लिए करेंगे। 7स्किल फाउंडेशन के चेरमेंन श्री प्रवीणजी माली नॅशनल के लिए बड़े उत्साहित हैं।जो हमे प्रेरणा एवं सहयोग के साथ मार्गदर्शन दे रहे हैं। इस बार आयोजन कुछ बड़ा हैं।हम गुजरात में चार प्रांतीय और एक स्टेट लेवल की क्रिएटिविटी की कार्यशाला करेंगे। इन पांच में से हम पचास बच्चो को सन्मानित करेंगे। अन्य स्तर या स्किल के साथी भी निराश न हो। हमारी तय की गई 7 स्किल जैसे...

1.खुद करना

🥇
खुद करे...

जैसे सबसे तेज लिखना
ड्राइंग बनाना
तबले बजाना
उलटे पैर चलाना
खाना खाना
खुद जो कर पाए जैसे...

चित्र बनाना
रंगोलो बनाना
Act...

2.निखार लाना

🥇🥇
निखार करे...


सर्जनात्मक
सुशोभन
ब्युटिटिप्स
हेर डिजाइन
सेल्फ क्रिएशन(कविता,शायरी,वार्ता,गीत)

Act...

3.वाद संवाद

🥇🥇🥇
लींन रहे

जैसे
योगा
कराठे
कोई भी खेल
ध्यान
योग
सिद्धि
विशेष सिद्धि

4.लींन रहना

🥇🥇🥇🥇
लींन रहना

जिस में 3 और चार दोने के  प्रकार समाये जा सके हैं।

5.पहचानना

🥇🥇🥇🥇🥇

पहचानना
संग्रहित करना
नाव सर्जन कर के नया बनाना
पहचान पाना(सभी देशों के पाट नगर)पुरानी चीजो में नई टेक्निक या विचार जोड़ना।

6.नाटक नाटक

🥇🥇🥇🥇🥇🥇

नाटक नाटक से सीधा मतलब हैं।

जय से

माइम
अभिनय
एकपात्र
विषभूषा
स्टेज शो

Act...

7.राग रागिनी

🥇🥇🥇🥇🥇🥇🥇

राग रागिनी

जिसमे संगीत गायन और वाद्य के साथ विशेष कौशल्य प्राप्त करने वालो के लिए यह विभाग हैं।
उसमें भी हर स्किल के 3 व्यक्तिको यानी 21 लोगो को नॅशनल लेवल पे सन्मानित करेंगे।

नए विचार खोजने हेतु इसे पढ़े...


ज्यादा समझ के लिए यहां एक लेख हैं। आप क्लिक करें और जानकारी प्राप्त करें।

आप इस फॉर्म को भरे।

आप की स्किल एवं नवाचार की जानकारी यहाँ क्लिक करके भरे।

Saturday, May 25, 2019

“छत्तीसगढ़ में आठवीं के बच्चे ऐसे क्यो?

इस दौर में हम ज्ञान द्वारा सत्य की सुंदरता और सहजीवन को सींचने के बदले आत्ममुग्धता में डूब रहे हैं। इन परिस्थितियों के लिए शिक्षा भी उत्तरदायी है। वह विकास की अनुगामी बन चुकी है। शिक्षा जिस विकास की अनुगामी है उसका अर्थ बढ़ोत्तरी है। इस बढ़ोत्तरी को धन या संपत्ति के रूप में संग्रहित कर सकते हैं। इसके आधार पर कम या ज़्यादा का निर्णय कर सकते हैं। ऐसे सामाजिक विभाजन कर सकते हैं जिसमें एक समूह के पास विकास का परिणाम होगा और दूसरे के पास इसका अभाव होगा। इस पृष्ठभूमि में स्थापित कर दिया गया है कि शिक्षा जैसे औजार इस विकास में सहयोग करेंगे।

भारतीय परंपरा में आर्थिक और सामाजिक पर्यावरणीय विकास एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। हम विचार और वस्तु में दोहन का संबंध देखने के बदले सृजन और सहअस्तित्व का रिश्ता बनाते हैं। ऐसी शिक्षा के लिए केवल औपचारिक प्रयासों पर निर्भर नहीं रहा जा सकता है। हमारे घर, समुदाय और सांस्कृतिक गतिविधियां भी शिक्षित करने का माध्यम हैं। हमें इन माध्यमों और अपनी भूमिकाओं पर विचार करने की ज़रूरत है।

हमें सोचना होगा कि खुद शिक्षित होने के बाद अपने बच्चों को शिक्षित करने के दौरान हम शिक्षा की प्रक्रियाओं से जुड़ने और उसमें योगदान करने का कितना प्रयास करते हैं।

हमें स्कूल जो बता देता है, उसे हम मान लेते हैं। हम मन लेते हैं कि स्कूल जो भी करता है हमारे बच्चों की भलाई के लिए करता है लेकिन इस ‘भलाई’ के कार्य में आपके योगदान का क्या? हमारी भूमिका ‘सामान’ खरीदने वाले ग्राहक की तरह होती जा रही है जो केवल सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास करता है।

हिन्दुस्तान में स्कूलों को इस बात से कोई मतलब ही नहीं है कि बाहर उनके स्कूल के बच्चे क्या कर रहे हैं। यही हाल अभिभावकों का भी है, जिन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि स्कूल में उनके बच्चे क्या कर रहे हैं। अभिभावक और स्कूल के बीच संवाद बहुत कम होता जा रहा है।

विचार कीजिए कि आप पढ़ने-पढ़ाने के अलावा बच्चे के संसार के बारे में जानने की कितनी कोशिश करते हैं। हमारी दिनचर्या में बच्चों से बात करने का कितना हिस्सा है? कब हम उनके मीठे व कड़वे अनुभव से खुद को जोड़ते हैं? कब उनसे दुनियादारी की बातें करते हैं? कब स्कूल से हम उसकी गतिविधियों के बारे में सवाल करते हैं? स्कूल कब बच्चे के अनुभवों के बारे में अभिभावक को बताता है? कब अभिभावक और शिक्षक बैठकर बच्चे की कमज़ोरी और मज़बूती पर चर्चा करते हैं? इन सारे सवालों को हम केवल स्कूल के भरोसे नहीं छोड़ सकते हैं।

ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था के दौर में ज्ञान केवल उत्पादन का साधन नहीं है, बल्कि उत्पादन के अन्य संसाधनों को डिक्टेट करने वाला निवेश है। अर्थ प्रधान दुनिया में शिक्षा एक वस्तु के समान बन चुकी है जो आर्थिक लाभों के उद्देश्य से उपयोग में लाई जा रही है।  हमारा ध्यान केवल उन्हीं दक्षताओं पर है जो उत्पादन व्यवस्था के लिए उपयोगी है। इसी व्यवस्था का प्रमाण है कि औपचारिक शिक्षा व्यवस्था हर क्षेत्र के लिए विशेषज्ञता का प्रमाणपत्र बांट रही है।

#Bno...

छत्तीसगढ़ से में अवगत हु।
2010 ओर 11 के बीच वहाँ काम किया हैं।
ये समस्या का समाधान भी वहां के एक अधिकारी ने किया था। उनके बारे में फिर कभी।

Monday, May 20, 2019

सवाल का जवाब...



को ज्यादा पगार क्यो होता है ?
और क्यो होना चाहिये..? इस बात को जानने के लिए आप इस प्रसंग को पढ़े।

पिकासो (Picasso) स्पेन में जन्मे एक अति प्रसिद्ध चित्रकार थे। उनकी पेंटिंग्स दुनिया भर में करोड़ों और अरबों रुपयों में बिका करती थीं...!!

एक दिन रास्ते से गुजरते समय एक महिला की नजर पिकासो पर पड़ी और संयोग से उस महिला ने उन्हें पहचान लिया। वह दौड़ी हुई उनके पास आयी और बोली, 'सर, मैं आपकी बहुत बड़ी फैन हूँ। आपकी पेंटिंग्स मुझे बहुत ज्यादा पसंद हैं। क्या आप मेरे लिए भी एक पेंटिंग बनायेंगे...!!?'

पिकासो हँसते हुए बोले, 'मैं यहाँ खाली हाथ हूँ। मेरे पास कुछ भी नहीं है। मैं फिर कभी आपके लिए एक पेंटिंग बना दूंगा..!!'

लेकिन उस महिला ने भी जिद पकड़ ली, 'मुझे अभी एक पेंटिंग बना दीजिये, बाद में पता नहीं मैं आपसे मिल पाऊँगी या नहीं।'

पिकासो ने जेब से एक छोटा सा कागज निकाला और अपने पेन से उसपर कुछ बनाने लगे। करीब 10 मिनट के अंदर पिकासो ने पेंटिंग बनायीं और कहा, 'यह लो, यह मिलियन डॉलर की पेंटिंग है।'

महिला को बड़ा अजीब लगा कि पिकासो ने बस 10 मिनट में जल्दी से एक काम चलाऊ पेंटिंग बना दी है और बोल रहे हैं कि मिलियन डॉलर की पेंटिग है। उसने वह पेंटिंग ली और बिना कुछ बोले अपने घर आ गयी..!!

उसे लगा पिकासो उसको पागल बना रहा है। वह बाजार गयी और उस पेंटिंग की कीमत पता की। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि वह पेंटिंग वास्तव में मिलियन डॉलर की थी...!!

वह भागी-भागी एक बार फिर पिकासो के पास आयी और बोली, 'सर आपने बिलकुल सही कहा था। यह तो मिलियन डॉलर की ही पेंटिंग है।'

पिकासो ने हँसते हुए कहा,'मैंने तो आपसे पहले ही कहा था।'

वह महिला बोली, 'सर, आप मुझे अपनी स्टूडेंट बना लीजिये और मुझे भी पेंटिंग बनानी सिखा दीजिये। जैसे आपने 10 मिनट में मिलियन डॉलर की पेंटिंग बना दी, वैसे ही मैं भी 10 मिनट में न सही, 10 घंटे में ही अच्छी पेंटिंग बना सकूँ, मुझे ऐसा बना दीजिये।'

_पिकासो ने हँसते हुए कहा, _'यह पेंटिंग, जो मैंने 10 मिनट में बनायी है_ ...


इसे सीखने में मुझे 30 साल का समय लगा है...

मैंने अपने जीवन के 30 साल सीखने में दिए हैं ...

तुम भी दो, सीख जाओगी..!!

वह महिला अवाक् और निःशब्द होकर पिकासो को देखती रह गयी...!!

एक  अध्यापक को 40 मिनट के लेक्चर की जो तनख्वाह दी जाती है । वो इस कहानी को बयां करती है। एक अध्यापक के एक वाक्य के पीछे उसकी सालों की मेहनत होती है । समाज समझता है कि बस बोलना ही तो होता है अध्यापक को मुफ्त की नौकरी है!!!


"ये मत भूलिए कि आज विश्व मे जितने भी सम्मानित पदों पर लोग आसीन हैं, उनमें से अधिकांश किसी न किसी अध्यापक की वजह से ही पहुँचे हैं."


"और हाँ, अगर आप भी अध्यापक की तनख्वाह को मुफ़्त की ही समझते हैं तो एक बार 40 मिनट का प्रभावशाली और अर्थपूर्ण लेक्चर देकर दिखा दीजीये, आपको अपनी क्षमता का एहसास हो जाएगा."

#Bno...

शिक्षक को पगार ज्यादा देना चाहिए। क्यो की अगर भविष्य वर्गखंड में पल रहा हैं तो शिक्षक उस भविष्य का निर्माता हैं। निर्माण करने में बहोत समस्याए आती हैं। सदैव सच बोलने का दावा करने वाले शिक्षक भी कभी कभी ऐसा गलत कर देते हैं कि उन्हें ओर बाद में कइयों को भुगतना पड़ता हैं।


Friday, May 17, 2019

शिक्षा के ग्राहक

शिक्षा के मामले में हमारी भूमिका सामान खरीदने वाले ग्राहक की तरह हो गई है” शिक्षा के बारे में ख्याल आते ही कई सारी चीज़ें ज़हन में आने लगती हैं। विद्यालय भवन, शिक्षक, बच्चे और किताबों के बारे में हम सोचने लगते हैं। ये छवि वर्तमान की तुलना में भविष्य का सुंदर चित्र उकेरती है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि शिक्षा हमारे सुरक्षित भविष्य को सुनिश्चित करने वाला साधन है। इसका प्रमाण आप ‘बड़े आदमी’ के मिथक के रूप में देख सकते हैं जिसके लिए शिक्षित होना एक ज़रूरी शर्त है।

वर्तमान समय में इसी सुरक्षित भविष्य की उम्मीद में हम शिक्षा के लिए हर संकट उठाने को तैयार रहते हैं। क्या आपने कभी शिक्षा के भविष्य के बारे में सोचा है? बदलते समय में शिक्षा की परिकल्पना और बदलावों को समझना आवश्यक है। शिक्षा के भविष्य पर बात करने से पहले इसके अतीत और वर्तमान का उल्लेख करना भी ज़रूरी है। यहां शिक्षा का मकसद व्यक्ति को जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के कौशल सीखाना था। धीरे-धीरे शिक्षा सामाजिकता के विकास का माध्यम बन गई। मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ नागरिकता के गुणों के विकास को भी शिक्षा के लक्ष्यों से जोड़ दिया गया।

औद्योगिक क्रांति के बाद तो शिक्षा की भूमिका में आमूलचूल परिवर्तन देखने को मिली। यह मानव संसाधन तैयार करने वाले साधन के रूप में स्वीकार की जाने लगी। लिखने, पढ़ने और गिनने की दक्षताएं, उत्पादन की कुशलताएं और प्रभावपूर्ण तरीके से मानसिक और शारीरिक श्रम की आदत का विकास हमारे शिक्षा व्यवस्था का एकमात्र लक्ष्य बन गया। शिक्षा के व्यापक प्रसार, शिक्षित होने की लालसा और शिक्षितों के समाज में इसी लक्ष्य का साकार रूप देखा जा सकता है।

पिछले कुछ दशकों में हमारे समाज और संस्कृति में महत्वपूर्ण बदलाव आ चुके हैं। एक दौर में शिक्षा के कंधों पर विकास की ज़िम्मेदारी थी लेकिन आजकल यही शिक्षा विकास और वैश्वीकरण के पीछे चल रही है। शिक्षा की तीनों संकल्पनाओं जैसे, सत्य की खोज, मानव की दशाओं में सुधार और बौद्धिक व शारीरिक श्रम के उत्पादन में से हमारी शिक्षा व्यवस्था बाद के दो उद्देश्यों को ढो रही है। विडंबना देखिए हम अपने व्यवहार, विश्वास और रिश्तों में व्यक्तिनिष्ठ होते जा रहे हैं। इसका प्रभाव केवल बाहरी स्तर तक नहीं है, बल्कि हमारी चेतना की सांस्कृतिक जड़े कमज़ोर हो रही हैं। शिक्षा जैसी व्यवस्था भी इसकी जड़ को नहीं संभाल पा रही हैं।

#Bno...

में शिक्षा से जुड़ा हु।
मगर में ग्राहक पैदा करने के खिलाफ हु।
मुजे कुछ ऐसा करना हैं कि जिससे ग्राहक न बढ़े और न बने।

Wednesday, May 15, 2019

भ्रम ओर श्रद्धा

एक छोटा गाँव।
यहाँ पे बारिश नहीं हो रही थी। लोग परेशान थे।आसपास के गाँव की भी बारिश न होने के कारण बुरा हाल था। सभी ने तय किया कि बारिश के लिए हम प्रभु से प्रार्थना करेंगे। गाँव के सभी लोग एक मैदान में एकत्र होने वाले थे। आसपास के गाँव के लोग भी आये थे। एक छोटी सी बच्ची भी आई थी। मगर उस के हाथमें छाता था।
इसे कहते हैं,यकीन। यकीन ओर विश्वास समान हैं।कुछ लोग यकीन के साथ जिंदा रहते हैं।कुछ लोग भ्रम के साथ, भ्रम फैलाने के लिए भ्रम के लिए ही जिंदा होते हैं।

#Bno...
कुछ लोग आगे का देख लेते हैं।
कुछ लोग नींद में सुन पाते होते हैं।
जो आगे का देख लेते हैं, वो परेशान होते हैं।
मगर,विश्वास और भ्रम में जो फर्क हैं,वो समज ने की सबकी ताकत नहीं होती।

Tuesday, May 14, 2019

अकेला था...अकेला हु ओर...



आज से पांच साल पहले की बात हैं।
तब मैं बेंगलोर में था,वर्ल्ड रिकॉर्ड का कनफोरमेशन मुजे तब मिला था। मेने ये जानकारी सब को बताई। मेरे एक दोस्त ने किसी स्थानिय news chenal में मेरा इन्टरव्यू रखा गया। अब बात ये बनी की मुजे प्रोग्राम एडिटर को ' जोडाक्षर ओर कहानियां ' के बारे में समजाना पड़ा। दो घंटे तक चली हमारी 
चर्चा के बाद उन्होंने कहा 'अरे यार, गुजराती में इतना किया थोड़ा अंग्रेजी भी कर लेते... आज आसान हो जाता।' मेने कहा: 'अंग्रेजी का करने रहता तो ये भी न हो पाता' बस, वो इस जवाब से शायद खुश हो गया था। किसी भी एक विचार को पकड़ कर उस पर सिर्फ काम करो, समय आनेपर सफलता अवश्य मिलती हैं।

#Bno...
अपने आप मे विश्वास रखो।
कुछ लोग आप को सदैव जूठा साबित करना चाहेंगे, यहां तक कि उन के पास कोई जवाब न होने पर भी वो आप से सवाल करेंगे। कितनी बार तुम सच्चे हो फिरभी तुम्हे गलत कहा जायेगा। गलत कहने वाले सही होने की वार्ता के साथ गुमते रहेंगे। यकीन रखो, अपने आप में विश्वास रखो। यह वख्त भी गुजर जाएगा।




Saturday, April 27, 2019

उत्तराखंड LBSANa ओर सोनियाजी


labasana#lAbAsAnAiAsiasIASINNOVATION BHAVESH PANDYA BHAVESHPANDYA16@BHAVESHPANDYA
 उत्तराखंड कुदरती संसाधन वाला राज्य। भौगोलिक रूप से देखा जाए तो दिक्कतों के साथ लोग खुशी से जी रहे हैं। आज भी यहाँ लोग पहाड़ो पे रहते हैं।

मसुरी स्थित लालबहादुर शात्री नेशनल एकेडमी ऑफ एडमिनिस्ट्रेटर में 3 दिन के लिए आना हुआ। भारतके नव नियुक्त IAS ऑफिसर के साथ यहाँ संवाद और गोष्टी करने का अवसर प्राप्त हुआ।
How is The josh....

labasana#lAbAsAnAiAsiasIASINNOVATION BHAVESH PANDYA BHAVESHPANDYA16@BHAVESHPANDYA

हमारे नावचार के बारे में सुना और अपने विचार रखे। 26 अप्रैल को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्री त्रिबेन्द्रसिंह रावत को मिलनेका मौका मिला। हमे था कि सिर्फ मुख्यमंत्री महोदय मिलेंगे। मगर वहाँ तो शिक्षा विभाग के सभी अधिकारी उपस्थित थे। उन्हों ने अपनी बातें ओर समस्या रखी। बहोत अच्छा लगा जब एक मुख्यमंत्री 2 घंटे तक अपने राज्यो के भिन्न भिन्न सवाल ओर समस्या के लिए इनोवेटर से चर्चा विमर्श कर रहे हैं।
डॉ. अनिल गुप्ता जी की अगुवाई में हमे उनके साथ बात करने की ओर मेरे भाषा शिक्षा के नवाचार को प्रस्तुत करनेका मौका मिला। सोनिया सूर्यवंशी जो कि एक शक्ति हैं। कुछ खास हैं।हम ने IIM में साथ काम किया हैं। आज उन्हें यहां काम करते देखा। वाह सोनिया जी....भाषा या शिक्षा से जुड़े उत्तराखंड के किसी भी काम में सहयोग करने को मैने सहमती दिखाई हैं।

शिक्षा में सबसे बड़ा सवाल हैं MGML ।हम जहाँ रुके थे इस कि बगल में एक सरकारी स्कूल हैं।यहाँ 2 महिला शिक्षक ओर 40 बच्चो के साथ 5 तक कि स्कूल हैं। मेने पूछा आप का कोई एक सवाल जो आप को सताता हो। उन्हों ने कहा सर कोई ऐसी व्यवस्था हो जो एक साथ पढ़ा पाए। 
में मन में इंटिग्रेड मल्टीग्रेड की सोच के साथ बच्चों ने मेरे साथ वहाँ एक गेम खेलने को अपनी मेडमे से कहा। हम खेले ओर थोड़ी देर में केला खाके निकल लिए।

जय हिंद:

अगर कुछ हो सके तो इतना होना चाहिए। उत्तराखंड में 1 से 5 अपने स्टेट के अलग किताब होने चाहिए। NCERT की किताब ओर उत्तराखंड की स्थानीय परिस्थिति के आधार पर ये होना चाहिए। कुछ सालों बाद परिणाम सामने से दिखेगा।

Thursday, April 18, 2019

अनूठा प्यार...कुंवारी माता...


महाराष्ट्र के अहमदनगर से हाल ही में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसके बारे में जानकर आप हैरान हो जाएंगे. दरअसल यहां रहने वाली एक महिला की शादी को पांच साल से भी ज्यादा वक्त हो गया है लेकिन महिला ने इन पांच सालों में कभी भी अपने पति से शारीरिक संबंध नहीं बनाए हैं. हैरानी वाली बात तो यह है कि बिना सम्बन्ध बनाए ही ये महिला गर्भवती हुई. जी हां… महिला ने पिछले महीने ही एक बेटी को जन्म भी दिया है.
सूत्रों की माने तो महिला की उम्र 30 वर्ष है और उनका नाम रेवती है. बता दें रेवती की शादी साल 2013 में हुई थी. उनके पति चिन्मय से उनकी मुलाकात ऑनलाइन हुई थी, और उस समय वह अमेरिका में थे. शादी करने के बाद दोनों ही भारत से अमेरिका रहने चले गए थे. वहां शादी की पहली रात ही रेवती ने अपने पति को अपनी स्थिति के बारे में बता दिया. रेवती के पति को भी इससे कोई परेशानी नहीं थी. आपको बता दें रेवती वैजिनिज्म्स नाम की एक मेडिकल कंडीशन से जूझ रही हैं. इस कंडीशन में अपने पति के साथ शारीरिक संबंध बना पाना उनके लिए लगभग नामुमकिन है.

शादी के बाद रेवती ने डॉक्टरों को दिखाया और फिर उन्हें इस बारे में पता चला कि वो वैजिनिज्म्स से जूझ रही हैं. इस वजह से वह आज तक ‘वर्जिन’ ही हैं. हालांकि आईवीएफ के जरिए वो गर्भवती होने में कामयाब रहीं और पिछले महीने 9 फरवरी को उन्होंने नॉर्मल डिलीवरी से एक स्वस्थ बच्ची को जन्म दिया. इस बारे में रेवती का कहना है कि, ‘उनकी शादी को पांच साल से ज्यादा समय बीत चुका है, लेकिन उन्होंने आज तक अपने पति से संबंध नहीं बनाए हैं, लेकिन बच्चे के जन्म के बाद उन्हें ऐसा लगता है कि वो पहली बार अब अपने पति से संबंध बना पाएंगी.’ बात जो भी हैं, मगर विज्ञान आगे बढ़ गया हैं।

जय हिंद:

आज से पहले कुछ साल पहले मेने रेखाबा सरवैया के बारे में लिखा था। वो गुजरात की पहली और भारत की तीसरी कुँवारी माता बनी थी। उन के बारे में जानने के लिए रेखाबा सरवैया क्लिक करें।


Sunday, April 14, 2019

आज मेने खुद से बात की...

आज मेने दोपहर खुद से बात की। मेने माना कि खुद को बढ़ती उम्र के साथ स्वीकारना मुजे  तनावमुक्त जीवन देता है। आप के काम के लिए आप को लोग याद करेंगे,आप की उम्र के लिए या ख़ूबसूरति के लिए नहीं। अगर आप खुद अकेले इतना सब कर पाए हो तो जो बाकी हैं, तुम खुद ही कर लोगे। किसी के ऊपर निर्भर न रहो। आप में बहोत लोग विश्वास कर चुके हैं, तुम खुद पे यकीन रखो।

मेने खुदसे कहा उम्र एक अलग तरह की खूबसूरती लेकर आती है, उसका आनंद लेने के बजाय दूसरी अड़चन को मुजे नहीं छूना हैं।

बच्चों की तरह अब में खिलखिलाउंगा, अच्छा माहौल रखूंगा। थोड़ी देर, शायद पांच मिनिट में शीशे में दिखते हुए अपने अस्तित्व को स्वीकारते हुए बोला 'अब मेरा भी कुछ करूँ'। 

कोई भी क्रीम मुजे गोरा नहीं बनाती, कोई शैम्पू बाल झड़ने से नहीं रोकता, मेरे बाल नहीं जड़ते हैं मगर मुजे मालूम हैं कि कोई तेल बाल नहीं उगाता,  कोई साबुन आपको बच्चों जैसी स्किन नहीं देता। जो हैं वो वैसेही रहेगा,मुजे भी बदलना जरूरी नहीं हैं।

जय गणेश...
जो होता हैं।
ये सब कुदरती होता है। 
आज जो हुआ अच्छा हुआ।
मेने नई सोचके साथ मेरे नए घर में प्रवेश किया। जो जनम से खुद के पास हैं वैसी पुरानी मशीन को maintain करके बढ़िया चला तो सकते हैं, पर उसे हम नई नहीं कर सकते। कोई बदलाव चाहे तो तुम खुद बदलो... क्यो? हर कोई सच्चा बदलाव लाने को समर्थ नहीं, न हमे किसी के लिए ऐसी आस रखके अपना खुदका यूनिक छोड़ना चाहिए। जो तुम्हे बदलाव के साथ स्वीकारने को तैयार हैं, वो सौदागर होता हैं।

कोई बात नहीं अगर आपकी नाक मोटी है तो, कोई बात नही आपकी आंखें छोटी हैं तो, कोई बात नहीं अगर आप गोरे नही हैं।मेरी सुंदरता मेरा जीवन होना चाहिए। मेने कितनो के जीवन मे खुशी फैलाई हैं। भले कुछ खाता हूं, किसी के जीवन के हर खुशी के मौकों को नहीं में नहीं चबाता।भले सामने वाले कि होंठों की shape perfect हैं और आप के नहीं हैं, कोई बात नहीं। हमे हमारे जीबन से परफेक्ट बन के दिखाना हैं। जो भी आज मेरे आसपास हैं, ज्यादातर अपने काम को निपटा के भूलने वाले ज्यादा हैं। कदर शायद कम करेंगे, मगर जब जब उन की सिद्धियों की बात चलेगी, न चाहते हुए हमारी बात होगी। में ऐसा नहीं कि कोई भी हमे जड़ से उखाड़ पाए। गब्बर का बाप 'खुद गब्बर' हूं।
दूसरों से मुजे वाहवाही लूटने के लिए सुंदर दिखने से ज्यादा ज़रूरी है, मेरे काम और सन्मान को बनाये रखकर खुद की सुंदरता को महसूस करना ओर समय को उत्तम तरीके से खर्च करना।

हर बच्चा सुंदर इसलिये दिखता है क्योंकि वो छल कपट से परे मासूम होता है। बडे़ होने पर जब हम छल व कपट से जीवन जीने लगते है तो वो मासूमियत खो देते हैं, बहोत दिनों पहले जब में ओर मेरी बेटी ऋचा हम एठोर गणेशजी के दर्शन करने गए तो मैने उसे कहा 'बेटे, मासूमियत से हमे जीना हैं।' बस, मुजे मेरी मासूमियत ओर मेरे इरादों पर भरोसा हैं। खुद पे भरोसा रखो। जहाँ तुम्हे जरूरत हैं, वहाँ अविश्वास आएगा। आप के ऊपर निर्भर आप पे विश्वास करने खड़े हैं,मगर आप कही और खोए हैं। आप की बच्ची बीमार हैं,आप बाहर है तो आप की फिकर कम करने के लिए वो नहीं बताते। अगर आप किसी को कहेंगे कि ऐसा हुआ। परिवार ने नहीं बताया।तब वो डॉक्टर का रिपोर्ट,फोटो मांगेंगे तो मतलब ये होता हैं कि आप आज तक गलत सोच पाले हुए हैं।जो आप के हैं, आप के पीछे हैं। जो साथ या सामने हैं, वो आप को पिछड़ा सकते हैं। 

मुजे आज क्यो...
ऐसे बहोत विचार आये...

अरे...

ये खाओ, वो मत खाओ 
ठंडा खाओ , गर्म पीयो, 
ये पीओ, ये नहीं पियकरों...
कपाल भाती करो,
सलून में जाओ, 
सवेरे नीम्बू पीयो ,
रात को दूध पीयो,
ज़ोर से सांस लो, 
लंबी सांस लो 
दाहिने से सोइये ,
बायें से उठिये,
हरी सब्जी खाओ, 
दाल में प्रोटीन है,
दाल से क्रिएटिनिन बढ़ जाएगा।

जो कुछ नहीं मानते,वो बहोत कुछ मनवाने का आग्रह रखते हैं। हम मानेगे तो भी साले यकीन नहीं करेंगे। हर नुकसान के लिए आप को ही जिम्मेदार ठहराएंगे।

अरे! अपन मरने के लिये जन्म लेते हैं, कभी ना कभी तो मरना है ही, अभी तक बाज़ार में अमृत बिकना शुरू नहीं हुआ। बस, हर चीज़ सही मात्रा में खाइये, हर वो चीज़ थोड़ी-थोड़ी जो आपको अच्छी लगती है। जो अच्छा न लगे उस से दूर रहें।

अब से में...

टहलने जा पाऊंगा, 
लाइट कसरत करूँगा।  
मेरे ही काम में व्यस्त रहूंगा।,  
खुश रहूंगा ,ओर खिशियो को फैलाने की कोशिश करूंगा। शायद में भूल रहा हूँ। मुजे मेरे ख्वाब पूरे करने हैं, कुछ लोगो के साथ रहने से मालूम पड़ता हैं कि उनके ख्वाब बदलते हैं। जैसे मेरी ऋचा... मेरा ख्वाब आज तक नहीं बदला। में कोशिश करता  रहूँगा मेरी जिंदगी जीने की।

फरकडी:

साहिल मेरी छत हैं, परवेज मेरा आकाश। साहिल लुधियानवी की बीबी ओर परवेज जी की माशूका अमृता प्रीतम ने ये किसी पत्रकार को सवाल के जवाब में ऐसा कहा था। मेंने पहले भी इस वाकये के बारेमें, अमृता प्रीतम के बारे में...  लिखा हैं।