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Thursday, October 25, 2018

प्यारे दिल



तू मेरे जिस्म का सबसे ख़ास हिस्सा है,
बात सच्ची है मेरी नहीं कोई किस्सा है।

मानता हूं! मैंने तुझे, कई बार तोड़ा है,
मगर तेरे लिए ही, बहुत कुछ छोड़ा है।

ए दिल मेरे! तू जब जब मुझसे हारा है,
तूने आज तो नहीं, मेरा कल सवांरा है।


सरकुम:
मेरा दिल मेरा नहीं रहा,
इस बात को मैने कहीं नहीं कहा।

Saturday, October 20, 2018

मेरा प्यार गणेशा...

मेरे पास प्यार हैं।
मेरे पास गणेश जी हैं।
मेरे पास गणेश जी का प्यार हैं। डीसा में एक गणेश मंदिर हैं। में कई सालों से में दर्शन करने जा रहा हूँ। आज भी गया।आज कुछ बिचार से गणेश जी के मंदिर में स्थित मूर्ति देख रहा था। आज बहोत देर तक देखने के बाद मुजे मालूम हुआ की, इसी मंदिर में गणेश जी के साथ रिद्धि ओर सिद्धि को भी स्थापित किया गया हैं।

2001 से गणेश जी ने मुजे आशीर्वाद दिए हैं। जहाँ भी रुका हूं, जहा भी टूटा हु बस, गणेश जी ने मुजे रास्ता दिखाया हैं। आज एक ऐसा काम लेके निकला हु, पहले कुछ लोग जुड़े थे। इन्हों ने मेरे पीछे कुछ ऐसा किया उन्हें छोड़ना पड़ा। आज भी अब वो मेरे साथ नहीं हैं कुछ लोग मानने को तैयार नहीं हैं। मगर गणेश जी केलिए मेने डीसा से एथॉर चलकर गया था। तब मुजे शांति मिली थी। जब में बेचेंन होता हूं गणेश जी पे छोड़ता हु। वो जो हुकुम करते हैं,वैसे आगे बढ़ता हु।

सरकुम:

जय गणेश

Thursday, October 11, 2018

सर सन्मान...आज मेरा कल आपका...


स्टेट इनोवेशन ऐंड रिसर्च फाउंडेशन, सोलापुर महाराष्ट्र के सर सन्मान में जाना हुआ। 2006 से ऐ फाउंडेशन महाराष्ट्र और देश के अन्य राज्यों के इनोवेशन को खोजने ओर प्रस्थापित करने में सक्रिय हैं। आईआईएम अमदावाद, सृष्टि इनोबेशन ओर हनी बी नेटवर्क से जुड़कर इस संस्थान ने अपना नाम राष्ट्रीय फलक पर फैलाने में सफलता हांसिल की हैं।
सोलापुर डिस्ट्रिक्ट के अक्कलकोट में नेशनल एज्युकेशन इनोबेशन कॉंफ़र्न्स का आयोजन हुआ। मुजे इस कॉंफ़र्न्स मे शामिल होने का अवसर प्राप्त हुआ।
सिद्धाराम जी मशाले और बाला साहब बाघ ओर राज्य के विविध जिल्ला आयोजको के द्वारा अक्कलकोट में भव्य कॉंफ़र्न्स संभव हुई।
मुजे सर सन्मान से सन्मानित किया गया। मेरे लिए गौरवपूर्ण बात हैं कि भारतमें सबसे पहला सर सन्मान मुजे प्राप्त हुआ हैं। आज से मुजे आप प्यार से सर भावेश पंड्या कह सकते हैं। इस यरे से सन्मान के लिए में सर फाउंडेशन का शुक्रिया अदा करता हूँ।


सरकुम:
2014 में डॉक्टर का सन्मान
2018 में आप के द्वारा सर सन्मान
2018 का सन्मान मेरे लिए महत्वपूर्ण हैं। मेरे समग्र देश में शिक्षा से जुड़े 'सरकार के शिक्षक' द्वारा किये गए नवाचार के प्रतिनिधि बनना महत्व पूर्ण हैं। में नव विचारक भले नहीं हूं, में सरकार का मुलाजिम हूं, ओर मुजे उस पर गर्व हैं।

Tuesday, October 9, 2018

काम का नशा


आज एक ट्वीट देखने मे आई।श्री अमिताभ बच्चन जी ने इसे ट्वीट किया था। कोन बनेगा करोड़पति के स्टूडियो से सेट के फोटो के साथ उन्होंने लेख था।

में नशे में हूँ।
काम के नशे के बारे में उन्होंने लिखा हैं।
में भी कुछ दिनों से काम के प्रति कुछ उलझ रहा था। कुछ न सोच सकता था, न कुछ समज सकता था। क्या करूँ,कहा से करू कैसे करू, अकेला आगे बढ़ने का आयोजन करू या किसी कप साथ जोडू। इन सबके बीच दो चीजें मेरे साथ रही। एक वॉर्नर बफेट की मैनेजमेंट की किताब ओर बच्चन सर की एक ट्वीट। काम रुक जाएगा तो सबकुछ रुक जाएगा। जो छूटना हैं, छूटेगा जो जुड़ना हैं वो जिद जाएगा। यकीन रखो अपने कार्य पर, अगर तुम रुके तो सब रुक जाएगा। जो तेरा हैं उसे पाने में जो हो रहा हैं उसे मत रोका करो।
भूत नाथ फ़िल्म का एक गाना हैं...
बच्चन सर की ट्वीट से भी उसे जोड़ा जा सकता हैं। बहोत साल तक ये मेरी कॉलर ट्यून थी। आज फिर से उसे चालू करवा रहा हु ।
चलो जाने दो...
अब छोड़ो भी....


Thanks बच्चन सर...

सरकुम:
शो मस्ट गो ओन...
हम न रहेंगे,तुम न रहोगे,फीरभी रहेगी निशानियां....
(ये गाना एक बार मनमें गालेना...)

Sunday, October 7, 2018

सोच कर सोच...


हम सभी मनुष्य हैं। मानव को मानव जाति की पेशकश करनी पड़ती हैं। कुछ अच्छा करने के लिए कुछ बुरा भी सहन करना पड़ता हैं। किसी भी व्यक्ति को कुछ सहकार देना महत्वपूर्ण हैं। किसी ने जो काम शुरू किया हैं,अगर आप उसका हिस्सा हैं तो सहकार देना आपकी जिम्मेदारी बनती हैं।
 भले ही आप स्वयं के बारे में सोचते हैं, वही तथ्य तब सच हैं कि आप दूसरों के बातें में भी सोचते हो। कोई सिर्फ अकेला अपने बारे में नहीं सोच सकता। आप उनके लिए जरूरी है, और उनसे जुड़कर कार्रवाई करने में आप उन्हें अपने स्वयं के विचारो पे परोए ओर नए पथ की खोजने में भी मदद करे,ऐसा करने से  एक अंतर भी बना रहेगा और साथ भी मिल पायेगा। 
दूसरों की बात करने में आसान हैं।
सामने बाले को समझना भी आवश्यक हैं।साथ में सोचने से आपको एक उद्देश्य मिल जाता है। हम सभी को होने के लिए, साथ रहने के लिए एक कारण की आवश्यकता है, और प्रसिद्धि और भाग्य आमतौर पर पर्याप्त नहीं है।एक व्यक्ति के बजाय दो का समूह भी सबसे छोटा मगर समूह में माना गया हैं। अच्छा ये हैं कि आप सजा देने के योग्य थे, ओर आप ने माफ कर दिया। आपको इससे विशेष प्रकार की ऊर्जा मिलती है, जो कि लोगों को खुद को और दुनिया को बदलने में सक्षम बनाता है।
आप जो कर रहे हैं उससे कुछ पाने के लिए भी ठीक है, और आप करेंगे अपने आप को स्वयं सुजाव देने से आपके जीवन में नए लोग आएंगे यदि आप अकेलापन महसूस करते हैं, तो यह एक बड़ा अंतर बना ने के लिए काफी हो सकता है।
यदि आप अपनी सकारात्मक ऊर्जा रखने के लिए एक जगह की तलाश कर रहे हैं, तो भीतर देखो और फिर अपने समुदाय में क्या हो रहा है यह देखने के लिए आगे देखो। एक विशाल परियोजना को लेने के लिए छोटे पैमाने पर शुरू करना बहुत आसान है जहां भी आप शुरू करते हैं ठीक है बस कर दो।
जैसा कि विनोदी और लेखक लियो रोस्तेन ने कहा, "मुझे विश्वास नहीं होता कि जीवन का उद्देश्य खुश होना है। मुझे लगता है कि जीवन का उद्देश्य उपयोगी होना, जिम्मेदार होना, दयालु होना है। यह सब से ऊपर है, बात करने के लिए, गिनती करने के लिए, कुछ के लिए खड़े होने के लिए, कुछ अंतर करने के लिए कि आप सभी से पर रहते हैं। " आप की सोच ही आप को बुलंदी तक पहुंचा सकती हैं।

सरकुम:
सोच
कैसी सोच।
मेरी ही सोच।
मेरी अपनी सोच।
अपने अहसास की सोच।
में सोचूंगा,क्यो की सोचना और खोजना मुजे पसंद हैं।
सिर्फ सोच तो हैं, जो सवाल करके जवाब भी दे सकती हैं।

Tuesday, October 2, 2018

मेरे ही बापू...बापू का हुकुम


गांधीजी ने हमारे देश को  पहचान दिलाई। दुनिया में कोई देश ऐसा न होगा जहां बापू के नाम का रास्ता या चौराहा न हो। हम हमारे देश के इस महापुरुष की 150 वी जन्म जयंती मना रहे हैं।
आज से कुछ साल पहले कोंन पैदा हुआ पर कोंन नहीं रहा वो हमें याद भी नहीं रहता हैं।
आज बापू की जयंती पर बहोत लोग बोलेंगे, लिखेंगे ओर चर्चा करेंगे। में कुछ भी लिखने के या बोलने के काबिल नहीं हूं। गांधीजी के बारे में कुछ कहने के लायक नहीं हु। लिखने की मेरी औकात नहीं हैं। मुजे आज ये बात कहते हुए खुशी होगी कि मैने आज तक जितनी किताबे पढ़ी हैं, उसमें सबसे ज्यादा एक किताब पढ़ी हैं। उस किताब का नाम हैं सत्यना प्रयोगों। बापू ने कहा हैं, मेट जीवन हीं मेरा संदेश हैं। मेने बापू के जीवन से दो बातें अपनाई हैं।

एक उनका स्लोगन Bee The Change ओर दूसरी चीज की जब हमारी गलती हो, हमने किसी का दिल दुखाया हो तो उपवास करें। इन दोनों बातों से मुजे सुकून मिलता हैं।
आज बापी के जन्म दिवस के उपलक्ष में विश्व में अपने देश की पहचान और बढ़े और सुवासित हो वैसी आशा के साथ।


सरकुम:

बापू
मेरे बापू
बापू से मुजे प्यार
बापू से मुजे दुलार
में मानुगा बापू को आजीवन,
जिनकी सोच ने दिया मुजे नव जीवन।

Monday, October 1, 2018

आज बापू के लिए...

गांधीजी ओर विश्व।
सबसे अधिक जिन्हें आदर्श माना गया हैं वैसे महारथी,वैश्विक नेता और विश्व विभूति।
पिछले कुछ दिनों से हम गांधी जीवन पर काम कर रहे हैं।कल दोपहर के समय कुछ काम चलता था तो मैने कहा 'बापू मुझसे सिर्फ 110 साल बड़े थे।' मेरो बात सुनकर मेरे एक दोस्त ने कहा 'जी 110 साल कोई बड़ा फांसला नहीं हैं। मजाक करते हुए हम पपेट शो की तैयारी देखने गए। श्री हितेश भ्रमभट्ट ओर उनके साथी इसके लिए काम कर रहे हैं।गांधीजी के जीवन के लिए एक कहानी को पसंद किया गया हैं और हम उसकी तैयारी देखने लगे।

आज विचार केंद्र का मा.मंत्रिश्री भूपेंद्रसिंहजी चुडासमा के कर कामलोसे विचार केंद्र का उद्घाटन होगा। आज से दो साल तक लगातार समूचे देश में 150 वी जन्म जयंती को मनाया जाएगा। आज का दिन नई पीढ़ी के लिए गांधीजी को समझने के लिए कुछ नए प्लान करके ऐसे विचारो को फैलाने का काम होगा।

मुजे खुशी हैं कि इस महत्वपूर्ण काम से में जुड़ा हु, ओर मुजे भी बापू को समझने के लिए एक अवसर मिला हैं।

सरकुम:

गांधी विचार फेलायेंगे,
बापू को ही अपनाएंगे।

जो होगा विश्व में आज के बाद,
उसे बापू के आशीर्वाद बतलायेंगे।

1 ऑक्टो.

Sunday, September 30, 2018

मेरी सोच और...


एक दोस्त। उन्होंने आखिरी बार उनके साथी से बात की।जब उनकी बात हुई उस के बाद वो संपर्क नहीं कर पाए हैं। अब जब बात होगी तो उनमे जागड़ा नहीं होगा,क्यो की जगड़े की बजह से उनसे बात नहीं होती थी।
अब कुछ दिनों बाद।
आज दोनो साथ हैं। दोनो दोस्त साथ बैठकर बात करते हैं।उस वख्त किस बात पे झगड़ा हुआ था? आज किसी को मालूम नहीं हैं,न पूरी कोई बात याद हैं। अक्सर दो  दोस्त, सहकर्मी या जीवन साथी के बीच ऐसी अनबन होती रहती हैं। ये भी जीवनका ओर कर्म का सिद्धांत हैं। जब खाना सामने होतो उसकी कदर नहीं होती,मगर जब जरूरत होती हैं तो हमे चावल भी पसंद आते हैं। ऐसी अनबन से काम और प्यार में बढ़ोतरी होती हैं। 
होगा ये की जब अनबन हुई हैं तो पहले बात कोन करेगा। मेरा मानना ये हैं कि पहले ओर दूसरे की कोई बात नहीं है। जब आप बात करने की कोशिश करेंगे, तो आपको एक खराब प्रतिक्रिया मिली होगी, ये परिवर्तन  सहज है, जो हो सकता है, इसलिए कृपया इसे रोकना नही है। मन के विचारों को रोकने से वो स्प्रिंग जैसे हो जाते हैं। जितना दबा के रखेंगे,उतनी तेजी से उछलेंगे। जब बहोत सारे विचार एक साथ इकठ्ठे होकर नकारात्मक रूप लेते हैं तब कुछ समस्याए खड़ी होती  नजर आती हैं।उन लोगों की कोई कमी नहीं है जो उन हाथों को काटते हैं जो उन्हें खिलाते हैं, लेकिन जब आप सही लोगों के साथ रहोगे तो गलत सोच वाले आप को परेशान करेंगे,क्यो की आप की सोचने की कमजोरी उन्हें मालूम हैं।
इसका एक ही रास्ता हैं।
अपनी सोच को मजबूत करो,ओर अपने इरादों को किसी के सामने बयां करो।क्या मालूम सही रास्ते को पहचान ने के लिए समस्याओं का सामना तो करना ही पड़ता हैं। किसी विचारक ने कहा हैं ' अगर आगे बढ़ते समय रास्ते में कोई दिक्कते नहीं आ रही हैं, उसका मतलब ये भी हैं कि शायद रास्ता गलत हैं। किसी ने इस बात को कहते हुए लिखा हैं कि रास्ता तो वही रहता हैं,उसके ऊपर चलने वाले आगे बढ़ते रहते हैं।

सरकुम:
एक खूबसूरत गाना हैं।
एक अकेला थक जाएगा,
मिलकर बोझ उठाना, मेरे साथी हाथ बढ़ाना।

Thursday, September 27, 2018

कुछ खास :3D



किसी भी समस्या को सुल्जा ने में दो पहलू होते है। रियल में कोई भी समस्या या सवाल 3 परिमानिय होती हैं। उस तीनो बातों को एक बार समजीए।देखिए...

1. जो हम जानते है।
2. जो हम नहीं जानते।
3. कोई तीसरा केंद्र भी हो सकता है।

अपने साथ में एक और दूसरा प्लान लेकर चलें ताकि आप सिर्फ किसी एक ही समाधान पर न अटके रह जाएँ। जैसे ही आपको सारे संभावित समाधान मिल जाएँ, मगर जो समाधान आप ने देखे या समजें है वो 3D का सिर्फ एक हिस्सा हैं। इन हर से मिलने वाले परिणामों के बारे में सोचना शुरू कर दें। 

हर एक संभावित परिणाम के बारे में विचार करें और किस तरह से ये आपको और आपके आसपास के लोगों को प्रभावित करेगा, सोचें। आपकी कल्पनाओं के लिए एक बेस्ट-केस सिनारियो और एक वर्स्ट केस-सिनारियो तैयार करें। ऐसा करने से हकीकत ओर भ्रम का फैंसला हो जाएगा। अगर कोई आप को उनका पासवर्ड देता है तो उसे मालूम है की वो कुछ छुपाने के इरादे से नहीं हैं।

सरकुम:


नहीं में अकेला,
मुजे यकीन है मेरे यकीन पर।
कुछ भी होगा तो मुजे नहीं कोई फिकर,
बस,  कुछ कहकर तो मुजे मुजे सजा  कर!

Monday, September 17, 2018

जहांगीर ओर बच्चे

मेरे दोस्त और मेरे साथी।
पिछले कुछ सालों से हम साथ में जुड़कर काम कर रहे हैं।
एक नव सर्जक ओर विचारक की पहचान बनाने वाले श्री जहांगीर शेख की पहचान बनी 3 इडियट्स पिक्चर से। वो रियल रेंचो हैं।उनके बनाये हुए इनोवेशन को इस फ़िल्म में दिखाया गया हैं।

निजी हालत ऐसी की हर नए विचार को फैलाने के लिए उन्हें रुकना पड़ता हैं। एक तरफ परिवार का खर्च ओर दूसरी तरफ काम का नशा। नई सोच बढ़ाने का काम और प्रोटोटाइप बनाने में इतना खर्च होता हैं कि उन्हें सदैव पैसों की जरूरत हैं।पिछले कुछ सालों से तो उन्हें मेरे फाउंडेशन से में सीधी मदद करता हु।
पिछले कुछ दिनों से वो गुजरात में हैं।उत्कर्ष विद्यालय ओर त्रिपदा इंटरनेशनल स्कूल में उन्होंने बच्चों से ओर अध्यापको से चर्चा की।आज वो गुजरात से गये हैं।आप उनके कार्यक्रम का आयोजन करना चाहते हैं तो अवश्य संपर्क करे।

@#@
जहांगीर की कार्यशाला में सारे देश से बच्चे आते हैं। आप भी आप की संस्था या बच्चो को जोड़ सकते हैं।

Saturday, September 8, 2018

कल्पनाशीलता ओर क्रिएशन

ભાવેશ પંડ્યા....ડો.ભાવેશ પંડ્યા...આઈiim....Innovation bhavesh pandya.indiabookofrekord..Asia book of record...Dr bhavesh pandya de bhavesh kaalam...Dr story world records

कल्पनाशील सोच-विचार को शायद एक दक्षता न माना जाता हो लेकिन यह अधिकतर कलात्मक दक्षताओं से भी अधिक आधारभूत है। छोटी कक्षाओं में यह सिखाना बहुत मुश्किल है। कला के संसार में अलग ही कल्पना की अलग ही उड़ान होती है और इस संसार में प्रवेश कर पाना आसान नहीं है। कला-शिक्षण के शुरुआत में सम्भव है कि किसी शिक्षक ने कोई आकृति बनाने या उसे रंगों से भरने या फिर सीधी लकीरें खींचने के लिए कहा हो। कभी-कभी बच्चे ऐसा करने में बोरियत महसूस करते हैं और कला की कक्षाओं में उनकी दिलचस्पी घटने लगती है। मैं आमतौर पर उन्हें कोई रंग-बिरंगा दृश्‍यचित्र बनाने को देता हूँ, या फिर जानवरों या किसी इन्सान की हल्की-फुलकी हंसी भरी तसवीर, तितलियाँ और चित्रकारी आदि। यदि यह उनका खुद का चुनाव होगा तो अधिक सम्भावना है कि वे इस पर मेहनत करेंगे। कभी-कभी वे शिल्प कार्य भी करते हैं। मैंने पाया है कि उन्हें इस गतिविधि में अमूमन अधिक मजा आता है।
आमतौर पर कक्षा 6 से कक्षा 8 तक के बच्चों को जो वे करना चाहते हैं उसके चुनाव की छूट दी जाती है। कुछ दिलचस्पी लेते हैं और कुछ नहीं। बेहतर है कि विद्यार्थियों को ऐसा काम न दिया जाए जिसके लिए वे तैयार न हों। मेरी कोशिश विभिन्न विषयों पर कुछ विचार उन तक पहुँचाने की रहती है जिन्हें वे अपनी स्केच-बुक में प्रयोग कर सकें। वे बहुत अच्छा प्रदर्शन न कर रहे हों तब भी मैं उन्हें प्रोत्साहित करता हूँ। विद्यार्थी विचारों को अपना लेते हैं तो कुछ करने की इच्छा और प्रेरणा सबसे सशक्त होते हैं। यानी किए गए महत्वपूर्ण चुनाव में उनका दखल होना चाहिए। चुनाव वे स्वयं करेंगे तो काम भी बेहतर करेंगे।
महत्वपूर्ण चरण तब आता है जब वे बड़ी कक्षाओं में पहुँचते हैं, जैसे कि कक्षा 12 में। इसी दौर में वे रेखाचित्र बनाने की दक्षताएँ, कला का ज्ञान और रंगों की समझ विकसित करते हैं। इन कक्षाओं में स्थिर जीवन (स्टिल लाइफ़), कल्पनाशील चित्रकला, पुस्तकों के आवरण चढ़ाना, पोस्टर-निर्माण और लिनो प्रिन्ट आदि विशेष विषय होते हैं। पाठ्यचर्या का यह हिस्सा उन्हें सामग्री से “खेल-खिलवाड़” करने का मौका देता है। उदाहरण के लिए, पानी के रंगों की पारदर्शी रचना पर पेस्टल रंगों से चित्रकारी करना। पाठ का यह हिस्सा कला नहीं बल्कि कला की दक्षता या शिल्प है जो शिक्षक द्वारा बहुत ही ध्यान से पेश किया जाता है। कुछ विद्यार्थी आवेग में काम करते हैं, काम के महत्वपूर्ण पक्षों पर पर्याप्त ध्यान दिए बिना उसे खत्म करने की जल्दी में रहते हैं। मैं उन्हें अपने काम में जटिलता का विकास करने के लिए प्रोत्साहित करता हूँ। खुले सवाल छोड़ता हूँ जिनसे ऐसे मुद्दे उठें जिन्हें वे अपने काम के लिए विचार में ला पाएँ। उनके लिए सबसे अधिक आवश्यकता सोच पाने के अभ्यास की है। मैं सुझाव माँगता हूँ तो पहले पूछता हूँ कि विद्यार्थी किस बारे में सोच रहा था। बहुत बार तो उसके पास पहले से ही कोई विचार होता है मगर उसे प्रयोग में लाने का आत्मविश्वास नहीं होता। मैं उन्हें यह कहकर प्रोत्साहित करता हूँ कि कुछ बातें अभ्यास से ही सीखी जा सकती हैं और अधिक अभ्यास बेहतर नतीजों की ओर ले जाता है।
पिछले कुछ सालों में मैंने जीवन में कला-शिक्षा के महत्व के बारे में अपनी सोच कुछ विद्यार्थियों तक पहुँचाई। पिछले ही साल कक्षा 12 के दो विद्यार्थी अपने डिग्री पाठ्यक्रम में फ़ैशन डिज़ाइनिंग करना चाहते थे। इसमें कोई शक नहीं कि बच्चे के व्यक्तित्व और दक्षताओं के विकास में कला-शिक्षा का महत्व है। कला से बच्चे की बुद्धि का विकास होता है। देखा गया है कि कला से सम्बद्ध गतिविधियों में शामिल बच्चे अन्य विषयों की भी बेहतर समझ विकसित कर पाते हैं फिर वह चाहे भाषा हो या भूगोल या फिर विज्ञान। अध्ययनों से सिद्ध हुआ है कि कला के सम्पर्क और परिचय में आने से मस्तिष्क की गतिविधि को बढ़ावा मिलता है। बच्चा समस्याओं के हल निकालना सीखता है। वह अपने विचार अलग-अलग तरह से दूसरों तक पहुँचाना भी सीखता है। कला बच्चे के समग्र व्यक्तित्व का विकास करती है, उसमें आत्म-सम्मान का निर्माण होता है और अनुशासन भी आता है। कला से सम्बद्ध होने की वजह से एक बच्चा अधिक रचनात्मक और नवाचारी बनता है तथा दूसरों के साथ सहयोग करना सीखता है। सारांश में, कला-गतिविधियाँ बच्चे के व्यक्तित्व-विकास, बौद्धिक प्रगति तथा अवलोकनात्मक दक्षताओं में बेहतरी लाने के लिए आवश्यक हैं।

Wednesday, August 29, 2018

स्टिकर ओर जीवन


मेरे आगे वाली कार कछुए की तरह चल रही थी और मेरे बार-बार हॉर्न देने पर भी रास्ता नहीं दे रही थी। मैं अपना आपा खो कर चिल्लाने ही वाला था कि मैंने कार के पीछे लगा एक छोटा सा स्टिकर देखा जिस पर लिखा था..

 शारीरिक विकलांग; कृपया धैर्य रखें"! और यह पढ़ते ही जैसे सब-कुछ बदल गया!!

मैं तुरंत ही शांत हो गया और कार को धीमा कर लिया। यहाँ तक की मैं उस कार और उसके ड्राईवर का विशेष खयाल रखते हुए चलने लगा कि कहीं उसे कोई तक़लीफ न हो। मैं ऑफिस कुछ मिनट देर से ज़रुर पहुँचा मगर मन में एक संतोष था।

इस घटना ने दिमाग को हिला दिया। क्या मुझे हर बार शांत करने और धैर्य रखने के लिए किसी स्टिकर की ही ज़रुरत पड़ेगी? हमें लोगों के साथ धैर्यपूर्वक व्यवहार करने के लिए हर बार किसी स्टिकर की ज़रुरत क्यों पड़ती है?

क्या हम लोगों से धैर्यपूर्वक अच्छा व्यवहार सिर्फ तब ही करेंगे जब वे अपने माथे पर कुछ ऐसे स्टिकर्स चिपकाए घूम रहे होंगे कि "मेरी नौकरी छूट गई है", "मैं कैंसर से संघर्ष कर रहा हूँ", "मेरी शादी टूट गई है", "मैं भावनात्मक रुप से टूट गया हूँ", "मुझे प्यार में धोखा मिला है", "मेरे प्यारे दोस्त की अचानक ही मौत हो गई", "लगता है इस दुनिया को मेरी ज़रुरत ही नहीं", "मुझे व्यापार में बहुत घाटा हो गया है"......आदि!

दोस्तों,हर इंसान अपनी ज़िंदगी में कोई न कोई ऐसी जंग लड़ रहा है जिसके बारे में हम कुछ नहीं जानते। बस हम यही कर सकते हैं कि लोगों से धैर्य और प्रेम से बात करें।

आइए हम इन अदृश्य स्टिकर्स को सम्मान दें!

Wednesday, August 22, 2018

दर्शनशास्त्र


दर्शनशास्त्र के अध्ययन, चिंतन तथा विश्लेषण (Analysis) की विषय वस्तु अत्यंत व्यापक होने के कारण, दर्शनशास्त्र का कोई सर्व स्वीकार्य परिभाषा निश्चित कर पाना अत्यंत कठिन  कार्य है। मूर्त (Abstract) तथा अमूर्त (Concrete)  विषयों के संबंध में मनुष्य की बुद्धि में उत्पन्न होने वाले विविध प्रश्नों तथा उनका युक्तियुक्त (Reasonable) समाधान या उत्तर प्राप्त करने का प्रयास दर्शन  कहा जा सकता है। इस तरह  से संपूर्ण ब्रम्हाण्ड ही दर्शन का विषय हो जाता है।

विवेकवान होने का मनुष्य का यह अदितीय गुण विश्व की प्रत्येक वस्तु  के स्वरूप को जानने के लिए मनुष्य को प्रेरित करता है। वस्तु के स्वरूप को पूर्णंता के साथ व्याख्या कर पाने के लिए, भावना अथवा विश्वास के आधार पर नहीं बल्कि ज्ञान के आधार पर इसे प्रकट किया जाता है। दर्शन, ज्ञान  की युक्तियुक्तता की कसौटी  होती है।

दर्शन के अधीन समस्त ब्रम्हाण्ड, जीवन, आत्मा, व्यक्ति, वस्तु प्रत्येक की उत्पत्ति, अस्तित्व, प्रयोजन स्वरूप, लक्ष्य, सीमाओं आदि से  संबंधित  प्रश्न जो मनुष्य के मस्तिष्क में उठते हैं, उनका युक्तियुक्त समाधान/उत्तर  देने का प्रयास किया जाता है। कुछ सामान्य प्रश्न जो प्रत्येक मनुष्य के मस्तिष्क में उठते हैं यथा - ब्रम्हाण्ड का स्वरूप  कैसा है ? इसकी उत्पत्ति क्यों और किस प्रकार हुई ? क्या ब्रम्हाण्ड की उत्पत्ति का कोई प्रयोजन है ? क्या ब्रम्हाण्ड में ईश्वर का अस्तित्व है ? आत्मा क्या है ? ज्ञान क्या है ? सत्य क्या है ? नैतिक-अनैतिक क्या है ? इत्यादि अनेक प्रश्नों के संबंध में प्रत्येक व्यक्ति के मस्तिष्क में विचार उत्पन्न होते हैं, जिनके  आधार पर एक धारणा का निर्माण  होता हैं। इन धारणाओं  के युक्तियुक्तता ही दर्शन का निर्माण करती है।

हक्सले ने कहा है कि ‘‘हम सब का विभाजन दार्शनिक और अदार्शनिक के रूप में नहीं बल्कि कुशल और अकुशल दार्शनिक के रूप में ही संभव है‘‘।

Philos, Prefix- in the sense of lover और Sophia  Wisdom ओर ज्ञान इन दोनों ग्रीक शब्दों से Philosophy शब्द बना है, जिसका शब्दिक अर्थ ज्ञान का अनुरागी होता है।

फिलॉसफी में वस्तु के चरम स्वरूप का ज्ञान प्राप्त किया जाता है।

सामान्य रूप से किसी वस्तु, तथ्य, अथवा व्यक्ति से अनुभव, प्रयोग, और  जानकारी के द्वारा परिचित हो जाना ज्ञान कहलाता है। ज्ञान वस्तुतः ज्ञानेन्द्रियों द्वारा प्राप्त बौद्धिक निष्कर्ष है। इन बौद्धिक निष्कर्षों से न्यायपूर्ण सत्य का निर्माण  होता है। ये न्यायपूर्णं सत्य ही दर्शन (फिलॉसफी) कहलाते हैं। फिलॉसफर शब्द का  प्रयोग पहली बार ग्रीक दार्शनिक पाइथागोरस ने  स्वयं के लिए किया था। 

 प्राचीन ग्रीक में दर्शन देवताओं के लिए  सुरक्षित विषय माना जाता था, तथा मनुष्यों को इस संबंध में विचार प्रस्तुत करना वर्जित था, तथापि प्लेटो, अरस्तु भी पाइथागोरस के  समान स्वयं को फिलॉसफर कहते थे। पाश्चात्य दर्शन में इसकी विषय वस्तु में व्यापक परिवर्तन तथा प्रसार हुआ है, तथा गूढ़ चिंतन की यह विद्या फिलॉसफी ही कहलाती है। भारत में गूढ़ चिंतन की यह विद्या दर्शन कहलाती है।

दर्शन शब्द की व्युत्पति संस्कृत की ‘दृश‘ धातु से हुआ है। शाब्दिक व्युत्पत्ति के आधार पर दर्शन का अर्थ है ‘‘दृश्यते अनेन इति दर्शनम्‘ अर्थात ‘‘जिसके द्वारा देखा जाये वह दर्शन है‘‘। ‘देखे जाने‘ से तात्पर्य बाह्य जगत की वस्तु  का भौतिक अवलोकन (Physical view) मात्र करना नहीं है, अपितु , वस्तु का तात्विक साक्षात्कार प्राप्त करना है।तात्विक साक्षात्कार में वस्तु से जुड़े समग्र सत्य से परिचय  प्राप्त किया जाता है, इसमें बौद्धिक युक्तियुक्तता के साथ साथ अनुभूतिजन्य सत्य  भी शामिल होता हैं।

सत्य से परिचय एवं साक्षात्कार के लिए तार्किक परीक्षण तथा अन्तर्ज्ञान  का भी प्रयोग होता है। भारतीय दर्शन में केन्द्रिक (Sensuous) तथा अनैन्द्रिक (Non- Senuous) दोनों  प्रकार की अनुभूतियों ओर सत्य से साक्षात्कार किया जाता है, परंतु अनैन्द्रिक अनुभूति जो अंतर्ज्ञान पर आधारित  तथा आध्यात्मिक है, अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है।


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अनूठा शास्त्र हैं जो भावी देख सकता हैं। और उस के आधार पर आगे बढ़ सकने के रास्ते इस शास्त्र से मिल सकते हैं।

Saturday, August 11, 2018

ताना समुदाय ओर देश भक्ति

गांधीजी ने स्वदेशी सामग्री का आग्रह रखा था। वो खाड़ी के वस्त्र    की बात करते थे।किसी को रोजी मिलती ओर किसीको सस्ता कपड़ा। आज के दिन 1947 को देश आज़ाद हुआ।  खादी के वस्त्र तो तब से जैसे कम होने लगे।आज जो खादी मिलती हैं वो महंगी हैं।अक्टूबर महीने में खादी थोड़ी सस्ती होती है तब जाके हमारे जैसे लोग एक कुर्ता या शर्ट खरीद लेते हैं।
आजनके दिनगर किसी ने खादी के वस्त्रों को सदैव के लिए अपनाएं हैं तो वो हैं, ताना भगत समुदाय के लोग।जो आज भी गांधी टोपी ओर खादी के वस्त्र पहनते हैं।
ताना भगत समुदाय के लोगो के बगैर हम हिंदुस्तान की आज़ादी का इतिहास नहीं लिख सकते हैं।अरे इस समुदाय के लोगो ने आज तक आए प्रथा संभाली हैं।सुबह में वो त्रिरंगे को सलामी देने के बाद ही अपना काम करते हैं।हाला की उनके तिरंगे में अशोक चक्र के बदले रेंटिया दिखता हैं।पहले बिहार और अब ज़ारखण्ड में ये समुदाय रहता हैं।उनका देश प्रेम किसी एक दिन के लिए नहीं मगर कायम के लिए रहता हैं।आज उनके बारे में बात करेंगे।

बात हैं एक महंत की।
उनका नाम जतरा भगत। वो आदिवासी को एक करके उन की सामाजिक और व्यक्तिगत बुराई को निकाल के उनको एक करना चाहते थे। उन्हों ने बली वहाडने का,मदिरणपण ओर सामाजिक अन्यं कुरिवाजो के सामने आवाज उठाई।सबको एक किया। उस जमाने में उन्होंने 26000 से अधिक लोगो का एक समुदाय बनाया। जतरा भगत के इस समुदाय में जुड़ने वालो को ताना भगत समुदाय के लोग कहे जाने लगे। उन्हों ने अंग्रेज सरकार को किसी भी बात का कर देने से इनकार किया। पूरे समुदाय ने इस बात को पकड़ा और कर न देनेका तय किया। ताना भगत समुदाय के लोग अंग्रेजो को दुश्मन लगने लगे। जतरा भगत ओर अन्य आंदोलन करने वालो को पकड़ा। अंग्रेजो को लगा कि ये ताना समुदाय की बाते उन्हें परेशान कर रही थी। उन्हें जेल में डालदिया गया। जेल से छूटते ही उनका आकस्मिक अवसान हुआ।उनके बाद वाले कार्यकरो ने उस मुहिम को आगे बढ़ाया। ये उस वख्त की बात हैं जब गांधीजी देश नेता के तौर पर उभर रहे थे। ताना भगत समुदाय सीधा बापु से जुड़ गए। उस जमाने में उन्हों ने बापु को 400 रुपये की सहाय राशि देश को आज़ाद करने के लिए इकट्ठा कीओर बापु तक पहुंचाई।आज चारसौ का महत्व नहीं हैं। में आजादी के पहले की बात करता हूँ। 1922 में गया स्थित कोंग्रेस अधिवेशन में बड़ी संख्या में ताना समुदाय के लोग आए।
इस समुदाय के लोगो के पास जमीन थी।देश की आजदिनके लिए वो जेल में गए।कुछ जमीन छूटने के लिए बेचनी पडी। कुछ जमीन अंग्रेजो ने लेली। 1948 में गांधीजी के आग्रह से भारत सरकार ने अंग्रेजो के द्वारा 725 ताना समुदाय के लोगो की  खालसा की हुई 4500 एकड जमीन वापस करने के लिए संसद में ताना भगत रैयत लेंड रेस्टोरेशन एक्ट पारित किया। गांधीजी ने उन्हें वचन दिया था कि आप को आपकी जमीन वापस मिल जाएगी।  गांधी बापु का अवसान हुआ।आज तक एक भी ताना समुदाय के लोगो को उनकी जमीन 72 साल के बाद भी नहीं मिल पाई हैं।और फिर भी वो रोज त्रिरंगे को वंदन करके ही अपना काम शुरू करते हैं।


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वैसे तो उस प्रदेश में  बिहार में 125 परिवारों को 1000 एकड़ जमीन वापस दी थी।कृष्णसिंह नाम के बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री को छोड़कर कोई आज बाकी की 3500 एकड़ जमीन के लिए कुछ नहीं बोला।

હું સારો...તમે ?


કોઈ પણ હોય.નક્કી છે કે એને હદ હોય. મારા એક મિત્ર કહે છે 'હદ થાય અથવા રદ થાય.' કોઈ પણ વસ્તુ ને કે તેના સારા પણા ને એટલી હદે ઉપયોગ ન કરવો કે જેને લીધે એ ખરાબ થવા મજબૂર થાય.મોટે ભાગે આવું બને છે. આપણા જીવનમાં હોય તેવી વસ્તુ કે વ્યક્તિ ને સાચવી લેવી જોઈએ.એમ અહમ,વહેમ કે ભ્રમ ન જ રખાય.આ પોસ્ટર આમ તો દરેક ને વાંચવું ગમે એવો સંદેશ આપે છે.હા,આપણે એને કેવા અર્થમાં લઈએ છીએ એ પણ જોવું જરૂરી છે.
કહેવાય છે કે સબંધ ને મજબૂત બનાવો મજબૂર નહીં.એમ જ અહીં કહેવાય કે વ્યક્તિમાં ખરાબી હિય તો તેને સુધારો, સુધારવા તક આપો.સુધારવામાં સહાય કરો. જીદ કે એવું વર્તન આખી વાત અને સાથોસાથ જિંદગી બદલી નાખે છે.

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કોઈ કોઈનો ફાયદો ઉઠાવી શકે એમ નથી.સૌ પોતાનો ફાયદો જોઈને જ બીજાને લાભ આપે છે.એવું માનનાર એ ભૂલી જાય છે કે ફાયદા કરતાં વાયદાને મહત્વ અપાયું હોય તો આવું ન થાય.

Tuesday, July 31, 2018

बापु ओर बी ध चेंज



जब कोई व्यक्ति बडा हो जाता हैं,वो कुछभी बदल सकता हैं।कहते हैं कि सेक्सपियर की अंग्रेजी में जोड़नी या ग्रामर अच्छी नहीं थी।वो बहोत सारे स्पेलीग गलत लिखते थे।मगर आज उनके लिखे हुए स्पेलिंग को सही माना गया हैं।वैसेही कुछ गांधीजी के बारे में कहा गया हैं।एक श्लोक हैं।
महाभारत का एक श्लोक अधूरा  पढा जाता है क्यों ?
शायद गांधीजी की वजह से..

"अहिंसा परमो धर्मः"

जबकि पूर्ण श्लोक इस तरह से है:-

"अहिंसा परमो धर्मः,
धर्म हिंसा तदैव च l

अर्थात - अहिंसा मनुष्य का परम धर्म है..
किन्तु धर्म की रक्षा के लिए हिंसा करना उससे भी श्रेष्ठ है.

गांधीजी ने सिर्फ इस श्लोक को ही नहीं बल्कि उसके अलावा  उन्होंने एक प्रसिद्ध भजन को भी बदल दिया... 

"रघुपति राघव राजा राम"


इस प्रसिद्ध-भजन का नाम है.
."राम-धुन" .
जो कि बेहद लोकप्रिय भजन था.. गाँधी ने इसमें परिवर्तन करते हुए "अल्लाह" शब्द जोड़ दिया..

गाँधीजी द्वारा किया गया परिवर्तन और असली भजन

गाँधीजी का भजन देखे तो...

रघुपति राघव राजाराम,
पतित पावन सीताराम
ईश्वर अल्लाह तेरो नाम,
सब को सन्मति दे भगवान...

जबकि असली राम धुन भजन...

"रघुपति राघव राजाराम
पतित पावन सीताराम
सुंदर विग्रह मेघाश्याम
गंगा तुलसी शालीग्राम
भद्रगिरीश्वर सीताराम
भगत-जनप्रिय सीताराम
जानकीरमणा सीताराम
जयजय राघव सीताराम"

बड़े-बड़े पंडित तथा वक्ता भी  इस भजन को गलत गाते हैं, यहां तक कि मंदिरो में भी  उन्हें रोके कौन?

 'श्रीराम को सुमिरन' करने के इस भजन को जिन्होंने बनाया था उनका नाम था "पंडित लक्ष्मणाचार्य जी"

ये भजन "श्री नमः रामनायनम" 
नामक हिन्दू-ग्रन्थ से लिया गया है। अगर आज कोई इस मुद्दे को उखड़ेगा तो बखेड़ा हो जाएगा।मगर जो हैं सो हैं।

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गांधीजी ने दुनिया बदली हैं।सो इनको भजन या ओर किसी चीज में बदलाव आवश्यक लगा होगा।बापु का कोई नेक इरादा ही होगा।मगर जो हमारी जानकारी में हो वो ही सदैव सही नहीं हो सकता।

Tuesday, July 24, 2018

વાહ રે શહીદ...


આપણો દેશ અનેક વિવિધતા ધરાવતો દેશ છે.આપના દેશમાં અનેક વ્યક્તિ એવી છે જેમના બલિદાન ને આપણે ભૂલી શકીએ એમ નથી.સમાજ સેવા,શિક્ષણ,સાહિત્ય અને શોર્ય માટે અનેક વ્યક્તિને આપણે યાદ કરી શકીએ છીએ.યાદ કરવા જ જોઈએ.આવા જ આપના માટે શહીદ થનાર કે બધું જ છોડનાર યોદ્ધાઓ માટે એક સરસ પુસ્તક લખાયું છે.આ પુસ્તકના લેખક હર્ષલ પુષ્કર્ણા છે. આ પુસ્તકનું પ્રકાશન  યુરેનસ બુક્સ દ્વારા કરવામાં આવ્યું છે.પુસ્તકની કિંમત લખવા કરતા આવા પુસ્તક માટે મૂલ્ય લખી શકાય.ચારસો પચાર રૂપિયાનું મૂલ્ય ધરાવતું આ પુસ્તક ખરેખર ખરીદવા જેવું છે.અરે કોઈને ભેટમાં પણ આપી શકાય એવું આ પુસ્તક છે.
પરમ વીર ચક્ર પ્રાપ્ત કરનાર વ્યક્તિઓ અંગે અહીં લખાયું છે. વીર હરીફને હરાવનાર અને પરમવીર એટલે આવા તમામ વીરોમાં સર્વશ્રેષ્ઠ શૌર્ય દાખવનાર સૈનિક. આજદિન સુધીનાં યુદ્ધોમાં ભારતીય લશ્કરી દળોનાં કોણ જાણે કેટલાય સૈનિકોએ રણભૂમિમાં અને સાહસ કરી દેખાડયા છે આમાંના થોડાક હજાર બહાદુર કહેવાયા સેંકડો  ભડવીરોને મહાવીરનું બિરુદ મળ્યું અત્યાર સુધીમાં એકવીસ વ્યક્તિઓ એટલે કે  સૈનિકો અથવા સૈન્ય અધિકારીઓ એવા છે, જેઓ એટલે કે પરમવીર નો સર્વોચ્ચ ખિતાબ પામ્યા છે. .
વિશ્વનું ટોચનું શિખર જે રીતે એવરેસ્ટ છે, વિશેષ સંશોધન કે પ્રદાન માટેનું સર્વોચ્ચ ઇનામ નોબેલ પ્રાઇઝ છે, તેમ વીરતાનું સૌથી શ્રેષ્ઠ સન્માન છે પરમવીરચક્ર. તેમાંના મોટાભાગનાને મરણોત્તર અપાયો છે, પરંતુ પરમવીર બાનાસિંહ, પરમવીર યોગેન્દ્રસિંહ યાદવ અને પરમવીર સંજયકુમારને પોતાનું આ સર્વોચ્ચ લશ્કરી સન્માન જાતે સ્વીકારવાનું સદભાગ્ય પ્રાપ્ત થયું છે. આ તમામ પરમવીર બ્રેવેસ્ટ ઓફ બ્રેવ, સિંહપુરુષોની વીરગાથાઓ આ પુસ્તકમાં વિસ્તારપૂર્વક રજૂ કરીને વિજ્ઞાનના લોકપ્રિય સામયિક સફારીના સંપાદક અને બહુશ્રુત લેખક હર્ષલ પુષ્કર્ણાએ પોતાના અગાઉના બેસ્ટસેલર પુસ્તક ‘આ છે સિયાચીન'ની માફક જાંબાઝ વીર જવાનોના શૌર્યને સાચી ગૌરવાંજલિ અર્પણ કરી છે. આ તમામ વીર યોદ્ધાઓ કોણ હતા? તેમણે કઇ રીતે કયા જંગમાં ઝંપલાવ્યું હતું અને ત્યાં કઇ રીતે તેઓ દુશ્મનની સામે ઝઝૂમ્યા હતા તેમજ એ કશ્મકશમાં કઇ રીતે તેઓ વીરગતિને પામ્યા હતા, તેની સમગ્ર કહાણીને પ્રત્યેક પરમવીર માટે અલાયદું સચિત્ર પ્રકરણ આલેખીને રસપ્રદ રીતે પુસ્તકમાં આપવામાં આવી છે. તેના સમગ્ર વર્ણનમાં યુદ્ધભૂમિ, હુમલાની પેટર્ન, શસ્ત્રો-દારૂગોળાના ઉપયોગની સ્ટાઇલ વગેરે આ વિષય પરત્વે લેખકનું ઊંડાણ દેખાઇ આવે છે. એટલું જ નહીં, પણ પ્રત્યેક પરમવીર પ્રત્યેના આદર સાથે સમગ્ર કહાણીને રજૂ કરીને લેખકે પુસ્તકના માધ્યમ દ્વારા આ શૂરવીરોને ભાવપૂર્ણ નિવાપાંજલિ અર્પણ કરી છે. .
એટલું જ નહીં પણ જે તે મેદાને જંગમાં આ યોદ્ધાઓએ શહાદત વહોરી કે શૌર્યગાથા અંકિત કરી, તે યુદ્ધની ભૌગોલિક અને સાંપ્રત સ્થિતિનું પણ લેખકે વર્ણન કરીને પૂરક જાણકારી આપવાની સાથે જે તે ઘટનાનું વધુ દસ્તાવેજીકરણ પણ કરી જાણ્યું છે, જેમાં ૧૯૪૭-૪૮, ૧૯૬૫ અને ૧૯૭૧ તેમજ ૧૯૯૯(કારગિલ)ના ભારત-પાકિસ્તાન યુદ્ધો ઉપરાંત ૧૯૬૦-૬૫ના કોંગો વિગ્રહ, ૧૯૮૪-૮૭નો સિયાચીન વિગ્રહ, ૧૯૮૭-૯૦ના શ્રીલંકાના આંતરવિગ્રહનો સમાવેશ થાય છે. કારગિલ યુદ્ધ માટે લેખકે ખાસ નોંધ્યું છે કે ઇતિહાસમાં યુદ્ધો તો ઘણા થયા અને દરેક યુધ્ધો ઇતિહાસ ને થોડો-ઘણો બદલી નાખ્યો છે એક રીતે જોતાં આ બધા જોડે હોય તો તે કારગીલ યુદ્ધ હતો કે પોતે નવો ઇતિહાસ સર્જ્યો વિગ્રહની તવારીખમાં વિક્રમ નોંધાવ્યો કારણકે પંદર-સત્તર હજાર ફીટ ઊંચા પહાડનું મેદાન પર તેના જેવો સાહસ અને સનસનાટીપૂર્ણ યુદ્ધ લડાયું નથી ક્યાંયને અને ક્યારેય નહીં કઠોળ કુદરતી સંજોગો વચ્ચે યુદ્ધનો પડકાર ઝીલવો એ ભારતીય જવાનો સિવાય બીજાનું કામ પણ નથી આ બાબતે દેશની જનતાએ આપણા લશ્કરી દળો પર માત્ર ગર્વ નહિ અભિમાન પણ રાખવું રહ્યું.આ પરમવીર ચક્ર જીતનારા કે અન્ય બહાદુર સૈનિકોએ ફરજપાલન ને બદલે પોતાની જિંદગીને મુઠ્ઠી ઊંચેરું સ્થાન આપ્યું હોત તો તેઓ વધુ જીવ્યા હતા પરંતુ એ જીવન કદાચ આટલું ગૌરવપૂર્ણ ન હોત. એક સાચા સિપાહી માટે કર્મ થી ચલિત થવું એ ધર્મના માર્ગેથી વિચલિત થવા બરાબર છે. સાચો સૈનિક યુદ્ધભૂમિમાં સામી છાતીએ લડીને શૂરવીરને છાજે એવું મોત સ્વીકારી લેવું વધુ પસંદ કરે છે. ભરજુવાનીમાં ફરજપાલન ખાતર દેશને ખાતર પોતાના પ્રાણની આહુતિ આપીને એમણે અમરત્વ પ્રાપ્ત કર્યું છે. આ બાહોશ લડવૈયાઓ પરમવીર ચક્ર ના સાચા હકદાર બનવાની સાથે આવનારી હજુ પેઢીઓને માટે શૌર્ય, સાહસ અને ફરજપાલનના અજોડ દ્રષ્ટાંત બન્યા છે. .
લેખકે આ પુસ્તકના અંતે સમાપન માં લખ્યું છે કે ભારતીય લશ્કરના શેરદિલ સપૂતોને શૌર્યગાથા અને બલિદાન ગાથા વાંચ્યા પછી નથી લાગતું કે દેશના સાચા હીરો આપણી સરહદોનું રખોપું  કરતા સિપાહીઓ છે નથી લાગતું કે એ વતન પરત નાય કોને ઓળખવામાં આપણે ઊણા ઉતર્યા છીએ આદર પ્રેમ સન્માન આપવામાં મોડા પડ્યા છે ફિલ્મ જગતના તેમજ ક્રિકેટ જગતના સિતારાઓને પોતાના રોલ મોડલ ગણપતિ નવી પેઢીના કેટલા છોકરા-છોકરીઓએ મેજર શૈતાનસિંહ પાર્ટીનું અરૂણ ખેતરપાલ આલ્બર્ટ કે પછી કેપ્ટન વિક્રમ નામ સાંભળ્યું હશે? આ બદલાવથી નવી પેઢી અજાણ રહી ગઈ હોય તો એમાં આપણે વ્યવસ્થાનો છે આપણી શિક્ષણપ્રણાલીનો છે જે બાબર જીવા પરદેશી આક્રમણખોરોના જીવન ચરિત્રોની પાઠ્યપુસ્તકોમાં શામેલ કરી શકે છે પણ દેશના પરમ વિરોધી સૌર્ય કથાનો અભ્યાસક્રમમાં સમાવેશ કરવાથી ચૂકે છે અતિ જરૂરી બને છે એવું કે સ્કૂલોમાં તૈયાર થતી નવી પેઢી દેશના સાચા સપૂતોને ઓળખ્યા વિના ભણતર પૂરું કરીને જીવનની નાસભાગમાં પરોવાઈ જાય છે જ્યાં તેનું ધ્યાન ભાગ્યે જ આવા હીરો પ્રત્યે કેન્દ્રીય થતું હોય છે માતા-પિતા હંમેશા ઇચ્છતા હોય છે કે તેમના સંતાનોને સારા સંસ્કાર મળે પ્રભાત વરસથી વગેરે પણ બધા સંસ્કારો જ છે જેને આગામી પેઢીમાં ટ્રાન્સફર કરવા એ આપણું દાયિત્વ છે .દેશના વીર અને વીરગતિ પામેલા સૈનિકોને અને આ પુસ્તકના લેખકને માન ભરી સલામ.સાથે આવું પુસ્તક લખનાર અને છાપનાર એવા પ્રકાશકોને પણ મારા વંદન.


પરમવીર ચક્ર વિજેતા વીર યોદ્ધાઓ
૧) મેજર સોમનાથ શર્મા,૨) નાયક જદુનાથસિંહ રાઠોડ,૩) સેકન્ડ લેફ્ટનન્ટ રામ રાઘોબા રાણે, ૪) કંપની હવાલદાર મેજર પીરુસિંહ શેખાવત, ૫) લાન્સનાયક કરમસિંહ, ૬) કેપ્ટન ગુરુબચનસિંહ સલારીયા, ૭) મેજર ધનસિંહ થાપા, ૮) સુબેદાર જોગીન્દરસિંહ સહનાન, ૯) મેજર શૈતાનસિંહ ભાટી, ૧૦) કંપની ક્વાર્ટરમાસ્ટર હવાલદાર અબ્દુલ હમીદ, ૧૧) લેફ્ટનન્ટ કર્નલ અરદેશર તારાપોર, ૧૨) લાન્સ નાયક આલ્બર્ટ એક્કા, ૧૩) ફ્લાઇંગ ઓફિસર નિર્મલજિત સેખોં, ૧૪) સેકન્ડ લેફ્ટનન્ટ અરૂણ ખેતરપાલ, ૧૫) મેજર હોંશિયારસિંહ દહીયા, ૧૬) નાયબ સુબેદાર બાના સિંહ મુલતાની, ૧૭) મેજર રામાસ્વામી પરમેશ્વરન, ૧૮) લેફ્ટનન્ટ મનોજકુમાર પાંડે, ૧૯) ગ્રેનેડિયર યોગેન્દ્ર સિંહ યાદવ, ૨૦) રાઇફલમેન સંજયકુમાર ઠાકુર, ૨૧) કેપ્ટન વિક્રમ.

Thursday, July 5, 2018

@मास्टर मनन


मास्टर मनन।
एक ऐसा मास्टर जो कहि भी चले।कॉम्प्यूटर हो,आईसीटी के इनोवेशन की बात हो या बात हो किताब लिखने की।आने काम के प्रति सदैव जागृत रहने वाले मनन मेरे दोस्त और मेरे सहकर्मी हैं।

मारी आसपास
अमारी आसपास
सौनी आसपास

याने पर्यावरण की किताब लिखने में हम साथ थे वर्ष 2011 से हम साथ काम कर रहे हैं।सेकंड लेंग्वेज के लिए कक्षा एक से आठ ओर गुजराती प्रथम लेंग्वेज के लिए भी प्राथमिक में आठ तक कि किताबे बनाने के काम में जुड़ना हुआ हैं।
पर्यावरण के साथ भाषा के पुस्तक के सृजन में अपनी पहचान बनाने वाले मनन ने मुजे मेरा फेसबुक एकाउंट बनाकर दिया था।आज मेरे 5000 से अधिक फेसबुक फ्रेंड हैं।और ये सभी मनन के कारण हैं।इसी लिए ये सिर्फ मनन नहीं मास्टर मनन हैं।फ़िल्म के रिव्यू लिखने में  उनकी एक अलग पहचान हैं।मुजे गर्व हैं कि मनन मेरे दोस्त हैं।


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मास्टर ओर डस्टर में ज्यादा फर्क नहीं होना चाहिए।मनन एक डस्टर हैं जो शिक्षा में से गलत प्रक्रिया को मिटा देते हैं।और मास्टर तो हैं ही।

Friday, June 29, 2018

भगवान की सरकार

एक पोस्टर।
जैसे दिमाग हिला गया हो।
एक बच्चा।जो कूड़ा इकठ्ठा करता हैं।किसी शो रूम के सामने खड़ा हैं।लिखा हैं।उसे समझ ने के लिए हमे कुछ नहीं चाहिए।हमे सिर्फ उसे समझ ने के साथ देखना और समझना हैं।इस बात को समजीए ओर इस बात को इर फैलाए।सबके साथ सब कुछ नहीं होता।किसी ने खूब कहा हैं।

किसको क्या मील इसका कोई हिसाब नहीं।
तेरे पास रूह नहीं,मेरे पास लिबास नहीं।'

ऐसा कई बार होता हैं।
जब मोबाइल में बैलेंस हैं,तो नेट नहीं।नेट हैं तो बैटरी नहीं।दो ने हैं तो सामने वाले को वख्त नहीं।उन्हें वख्त हैं तो अभी हमारा समय नहीं।सबकुछ ठीक हैं तो ओर कुछ काम हैं।
मोरारी बापू कहते हैं कि जो व्यक्ति 5 मन घेहु खरीद सकते हैं,वो उसे उठा नहीं सकते।अगर कोई उठाने की ताकत रखता हैं तो उसके पास खरीदने की ताकत नहीं होती हैं।
यही जीवन हैं।
हमे सोच समझकर इसे निभाना हैं।अगर कोई कुछ गलती करता हैं तो उसे सुधारनी हैं।भगवान ने तो हमे ये जीवन दिया हैं।सरकार हमे सुविधा देती हैं।हम इसमें अपने आपको आगे ले जाना हैं।आप भी अपनो के साथ जिंदगी को ऐसे ही स्वीकार करके आगे बढ़ाए।

मेरव एक दोस्त हैं।
भूतान में शिक्षाका काम और शोध करते हैं।उन्होंने कहा 'जिसे पढ़ना हैं,उसे सुविधा नहीं हैं।जिसके पास सुविधा हैं उसे पढ़ना नहीं हैं।मगर ये तो जिंदगी का तकाजा हैं।

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हाथोंकी तकदीर को मत देख।
वो भी जी लेते हैं,जिनके हाथ नहीं होते।आसमा सबके लिए समान हैं,वो भी शायद उडले जिनके पंख नहीं होते।

Sunday, May 13, 2018

ऐसा होमवर्क....


आज कल शिक्षा को लोग अपने तरीके से देखते हैं।कोई अच्छा होमवर्क देने वाली स्कुल हैं,कुछ अच्छा शिखने वाली स्कूल हैं।कोई स्कूल ऐसी हैं कि जहाँ एक बार खाना और ब्रेकफास्ट मिलता हैं।मगर आज हम एक ऐसी स्कुल के बातें में बात करेंगे जो चेन्नई में हैं।जहाँ अलग तरीके से होमवर्क दिया जाता हैं।

चेन्नई के एक स्कूल ने अपने बच्चों को छुट्टियों का जो एसाइनमेंट दिया वो पूरी दुनिया में वायरल हो रहा है. वजह बस इतनी कि उसे बेहद सोच समझकर बनाया गया है. इसे पढ़कर अहसास होता है कि हम वास्तव में कहां आ पहुंचे हैं और अपने बच्चों को क्या दे रहे हैं. अन्नाई वायलेट मैट्रीकुलेशन एंड हायर सेकेंडरी स्कूल ने बच्चों के लिए नहीं बल्कि पेरेंट्स के लिए होमवर्क दिया है, जिसे हर एक पेरेंट को पढ़ना चाहिए.

उन्होंने लिखा-
पिछले 10 महीने आपके बच्चों की देखभाल करने में हमें अच्छा लगा.आपने गौर किया होगा कि उन्हें स्कूल आना बहुत अच्छा लगता है. अगले दो महीने उनके प्राकृतिक संरक्षक यानी आप उनके साथ छुट्टियां बिताएंगे. हम आपको कुछ टिप्स दे रहे हैं जिससे ये समय उनके लिए उपयोगी और खुशनुमा साबित हो.

- अपने बच्चों के साथ कम से कम दो बार खाना जरूर खाएं. उन्हें किसानों के महत्व और उनके कठिन परिश्रम के बारे में बताएं. और उन्हें बताएं कि खाना बेकार न करें खाने के बाद उन्हें अपनी प्लेटें खुद धोने दें. इस तरह के कामों से बच्चे मेहनत की कीमत समझेंगे.

- उन्हें अपने साथ खाना बनाने में मदद करने दें. उन्हें उनके लिए सब्जी या फिर सलाद बनाने दें.

- तीन पड़ोसियों के घर जाएं. उनके बारे में और जानें और घनिष्ठता बढ़ाएं.

- दादा-दादी/ नाना-नानी  के घर जाएं और उन्हें बच्चों के साथ घुलने मिलने दें. उनका प्यार और भावनात्मक सहारा आपके बच्चों के लिए बहुत जरूरी है. उनके साथ तस्वीरें लें. उन्हें अपने काम करने की जगह पर लेकर जाएं जिससे वो समझ सकें कि आप परिवार के लिए कितनी मेहनत करते हैं. किसी भी स्थानीय त्योहार या स्थानीय बाजार को मिस न करें.

- अपने बच्चों को किचन गार्डन बनाने के लिए बीज बोने के लिए प्रेरित करें. पेड़ पौधों के बारे में जानकारी होना भी आपके बच्चे के विकास के लिए जरूरी है. अपने बचपन और अपने परिवार के इतिहास के बारे में बच्चों को बताएं. अपने बच्चों का बाहर जाकर खेलने दें, चोट लगने दें, गंदा होने दें. कभी कभार गिरना और दर्द सहना उनके लिए अच्छा है. सोफे के कुशन जैसी आराम की जिंदगी आपके बच्चों को आलसी बना देगी. उन्हें कोई पालतू जावनर जैसे कुत्ता, बिल्ली, चिड़िया या मछली पालने दें.

उन्हें कुछ लोक गीत सुनाएं.

अपने बच्चों के लिए रंग बिरंगी तस्वीरों वाली कुछ कहानी की किताबें लेकर आएं.

अपने बच्चों को टीवी, मोबाइल फोन, कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स से दूर रखें. इन सबके लिए तो उनका पूरा जीवन पड़ा है. उन्हें चॉकलेट्स, जैली, क्रीम केक, चिप्स, गैस वाले पेय पदार्थ और पफ्स जैसे बेकरी प्रोडक्ट्स और समोसे जैसे तले हुए खाद्य पदार्थ देने से बचें.

अपने बच्चों की आंखों में देखें और ईश्वर को धन्यवाद दें कि उन्होंने इतना अच्छा तोहफा आपको दिया. अब से आने वाले कुछ सालों में वो नई ऊंचाइयों पर होंगे. माता-पिता होने के नाते ये जरूरी है कि आप अपना समय बच्चों को दें.

मुजे ये जानकारी श्री रमेशभाई पटेल ने भेजी थी।श्री रमेशभाई पटेल सृष्टि के सेक्रेटरी हैं।सृष्टि समग्र देश और विदेश से नाव सर्जको को खोजने का काम करती हैं।उन्हों ने अपनी बात में जोड़ा हैं कि...अगर आप माता-पिता हैं तो इसे पढ़कर आपकी आंखें नम जरूर हुई होंगी. और आखें अगर नम हैं तो वजह साफ है कि आपके बच्चे वास्तव में इन सब चीजों से दूर हैं. इस एसाइनमेंट में लिखा एक-एक शब्द ये बता रहा है कि जब हम छोटे थे तो ये सब बातें हमारी जीवनशैली का हिस्सा थीं, जिसके साथ हम बड़े हुए हैं, लेकिन आज हमारे ही बच्चे इन सब चीजों से दूर हैं, जिसकी वजह हम खुद हैं।
अगर इनमें से कुछ थोड़ा भी आप करते हैं तो आप करीब होने का दावा कर पाएंगे।

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शिखने सिखाने के लिए होमवर्क होता हैं।इस नए होमवर्क से किसे फायदा होगा वो वख्त बताएगा।

ગંદો માણસ