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Saturday, May 25, 2019

“छत्तीसगढ़ में आठवीं के बच्चे ऐसे क्यो?

इस दौर में हम ज्ञान द्वारा सत्य की सुंदरता और सहजीवन को सींचने के बदले आत्ममुग्धता में डूब रहे हैं। इन परिस्थितियों के लिए शिक्षा भी उत्तरदायी है। वह विकास की अनुगामी बन चुकी है। शिक्षा जिस विकास की अनुगामी है उसका अर्थ बढ़ोत्तरी है। इस बढ़ोत्तरी को धन या संपत्ति के रूप में संग्रहित कर सकते हैं। इसके आधार पर कम या ज़्यादा का निर्णय कर सकते हैं। ऐसे सामाजिक विभाजन कर सकते हैं जिसमें एक समूह के पास विकास का परिणाम होगा और दूसरे के पास इसका अभाव होगा। इस पृष्ठभूमि में स्थापित कर दिया गया है कि शिक्षा जैसे औजार इस विकास में सहयोग करेंगे।

भारतीय परंपरा में आर्थिक और सामाजिक पर्यावरणीय विकास एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। हम विचार और वस्तु में दोहन का संबंध देखने के बदले सृजन और सहअस्तित्व का रिश्ता बनाते हैं। ऐसी शिक्षा के लिए केवल औपचारिक प्रयासों पर निर्भर नहीं रहा जा सकता है। हमारे घर, समुदाय और सांस्कृतिक गतिविधियां भी शिक्षित करने का माध्यम हैं। हमें इन माध्यमों और अपनी भूमिकाओं पर विचार करने की ज़रूरत है।

हमें सोचना होगा कि खुद शिक्षित होने के बाद अपने बच्चों को शिक्षित करने के दौरान हम शिक्षा की प्रक्रियाओं से जुड़ने और उसमें योगदान करने का कितना प्रयास करते हैं।

हमें स्कूल जो बता देता है, उसे हम मान लेते हैं। हम मन लेते हैं कि स्कूल जो भी करता है हमारे बच्चों की भलाई के लिए करता है लेकिन इस ‘भलाई’ के कार्य में आपके योगदान का क्या? हमारी भूमिका ‘सामान’ खरीदने वाले ग्राहक की तरह होती जा रही है जो केवल सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास करता है।

हिन्दुस्तान में स्कूलों को इस बात से कोई मतलब ही नहीं है कि बाहर उनके स्कूल के बच्चे क्या कर रहे हैं। यही हाल अभिभावकों का भी है, जिन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि स्कूल में उनके बच्चे क्या कर रहे हैं। अभिभावक और स्कूल के बीच संवाद बहुत कम होता जा रहा है।

विचार कीजिए कि आप पढ़ने-पढ़ाने के अलावा बच्चे के संसार के बारे में जानने की कितनी कोशिश करते हैं। हमारी दिनचर्या में बच्चों से बात करने का कितना हिस्सा है? कब हम उनके मीठे व कड़वे अनुभव से खुद को जोड़ते हैं? कब उनसे दुनियादारी की बातें करते हैं? कब स्कूल से हम उसकी गतिविधियों के बारे में सवाल करते हैं? स्कूल कब बच्चे के अनुभवों के बारे में अभिभावक को बताता है? कब अभिभावक और शिक्षक बैठकर बच्चे की कमज़ोरी और मज़बूती पर चर्चा करते हैं? इन सारे सवालों को हम केवल स्कूल के भरोसे नहीं छोड़ सकते हैं।

ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था के दौर में ज्ञान केवल उत्पादन का साधन नहीं है, बल्कि उत्पादन के अन्य संसाधनों को डिक्टेट करने वाला निवेश है। अर्थ प्रधान दुनिया में शिक्षा एक वस्तु के समान बन चुकी है जो आर्थिक लाभों के उद्देश्य से उपयोग में लाई जा रही है।  हमारा ध्यान केवल उन्हीं दक्षताओं पर है जो उत्पादन व्यवस्था के लिए उपयोगी है। इसी व्यवस्था का प्रमाण है कि औपचारिक शिक्षा व्यवस्था हर क्षेत्र के लिए विशेषज्ञता का प्रमाणपत्र बांट रही है।

#Bno...

छत्तीसगढ़ से में अवगत हु।
2010 ओर 11 के बीच वहाँ काम किया हैं।
ये समस्या का समाधान भी वहां के एक अधिकारी ने किया था। उनके बारे में फिर कभी।

Monday, May 20, 2019

सवाल का जवाब...



को ज्यादा पगार क्यो होता है ?
और क्यो होना चाहिये..? इस बात को जानने के लिए आप इस प्रसंग को पढ़े।

पिकासो (Picasso) स्पेन में जन्मे एक अति प्रसिद्ध चित्रकार थे। उनकी पेंटिंग्स दुनिया भर में करोड़ों और अरबों रुपयों में बिका करती थीं...!!

एक दिन रास्ते से गुजरते समय एक महिला की नजर पिकासो पर पड़ी और संयोग से उस महिला ने उन्हें पहचान लिया। वह दौड़ी हुई उनके पास आयी और बोली, 'सर, मैं आपकी बहुत बड़ी फैन हूँ। आपकी पेंटिंग्स मुझे बहुत ज्यादा पसंद हैं। क्या आप मेरे लिए भी एक पेंटिंग बनायेंगे...!!?'

पिकासो हँसते हुए बोले, 'मैं यहाँ खाली हाथ हूँ। मेरे पास कुछ भी नहीं है। मैं फिर कभी आपके लिए एक पेंटिंग बना दूंगा..!!'

लेकिन उस महिला ने भी जिद पकड़ ली, 'मुझे अभी एक पेंटिंग बना दीजिये, बाद में पता नहीं मैं आपसे मिल पाऊँगी या नहीं।'

पिकासो ने जेब से एक छोटा सा कागज निकाला और अपने पेन से उसपर कुछ बनाने लगे। करीब 10 मिनट के अंदर पिकासो ने पेंटिंग बनायीं और कहा, 'यह लो, यह मिलियन डॉलर की पेंटिंग है।'

महिला को बड़ा अजीब लगा कि पिकासो ने बस 10 मिनट में जल्दी से एक काम चलाऊ पेंटिंग बना दी है और बोल रहे हैं कि मिलियन डॉलर की पेंटिग है। उसने वह पेंटिंग ली और बिना कुछ बोले अपने घर आ गयी..!!

उसे लगा पिकासो उसको पागल बना रहा है। वह बाजार गयी और उस पेंटिंग की कीमत पता की। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि वह पेंटिंग वास्तव में मिलियन डॉलर की थी...!!

वह भागी-भागी एक बार फिर पिकासो के पास आयी और बोली, 'सर आपने बिलकुल सही कहा था। यह तो मिलियन डॉलर की ही पेंटिंग है।'

पिकासो ने हँसते हुए कहा,'मैंने तो आपसे पहले ही कहा था।'

वह महिला बोली, 'सर, आप मुझे अपनी स्टूडेंट बना लीजिये और मुझे भी पेंटिंग बनानी सिखा दीजिये। जैसे आपने 10 मिनट में मिलियन डॉलर की पेंटिंग बना दी, वैसे ही मैं भी 10 मिनट में न सही, 10 घंटे में ही अच्छी पेंटिंग बना सकूँ, मुझे ऐसा बना दीजिये।'

_पिकासो ने हँसते हुए कहा, _'यह पेंटिंग, जो मैंने 10 मिनट में बनायी है_ ...


इसे सीखने में मुझे 30 साल का समय लगा है...

मैंने अपने जीवन के 30 साल सीखने में दिए हैं ...

तुम भी दो, सीख जाओगी..!!

वह महिला अवाक् और निःशब्द होकर पिकासो को देखती रह गयी...!!

एक  अध्यापक को 40 मिनट के लेक्चर की जो तनख्वाह दी जाती है । वो इस कहानी को बयां करती है। एक अध्यापक के एक वाक्य के पीछे उसकी सालों की मेहनत होती है । समाज समझता है कि बस बोलना ही तो होता है अध्यापक को मुफ्त की नौकरी है!!!


"ये मत भूलिए कि आज विश्व मे जितने भी सम्मानित पदों पर लोग आसीन हैं, उनमें से अधिकांश किसी न किसी अध्यापक की वजह से ही पहुँचे हैं."


"और हाँ, अगर आप भी अध्यापक की तनख्वाह को मुफ़्त की ही समझते हैं तो एक बार 40 मिनट का प्रभावशाली और अर्थपूर्ण लेक्चर देकर दिखा दीजीये, आपको अपनी क्षमता का एहसास हो जाएगा."

#Bno...

शिक्षक को पगार ज्यादा देना चाहिए। क्यो की अगर भविष्य वर्गखंड में पल रहा हैं तो शिक्षक उस भविष्य का निर्माता हैं। निर्माण करने में बहोत समस्याए आती हैं। सदैव सच बोलने का दावा करने वाले शिक्षक भी कभी कभी ऐसा गलत कर देते हैं कि उन्हें ओर बाद में कइयों को भुगतना पड़ता हैं।


Friday, May 17, 2019

शिक्षा के ग्राहक

शिक्षा के मामले में हमारी भूमिका सामान खरीदने वाले ग्राहक की तरह हो गई है” शिक्षा के बारे में ख्याल आते ही कई सारी चीज़ें ज़हन में आने लगती हैं। विद्यालय भवन, शिक्षक, बच्चे और किताबों के बारे में हम सोचने लगते हैं। ये छवि वर्तमान की तुलना में भविष्य का सुंदर चित्र उकेरती है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि शिक्षा हमारे सुरक्षित भविष्य को सुनिश्चित करने वाला साधन है। इसका प्रमाण आप ‘बड़े आदमी’ के मिथक के रूप में देख सकते हैं जिसके लिए शिक्षित होना एक ज़रूरी शर्त है।

वर्तमान समय में इसी सुरक्षित भविष्य की उम्मीद में हम शिक्षा के लिए हर संकट उठाने को तैयार रहते हैं। क्या आपने कभी शिक्षा के भविष्य के बारे में सोचा है? बदलते समय में शिक्षा की परिकल्पना और बदलावों को समझना आवश्यक है। शिक्षा के भविष्य पर बात करने से पहले इसके अतीत और वर्तमान का उल्लेख करना भी ज़रूरी है। यहां शिक्षा का मकसद व्यक्ति को जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के कौशल सीखाना था। धीरे-धीरे शिक्षा सामाजिकता के विकास का माध्यम बन गई। मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ नागरिकता के गुणों के विकास को भी शिक्षा के लक्ष्यों से जोड़ दिया गया।

औद्योगिक क्रांति के बाद तो शिक्षा की भूमिका में आमूलचूल परिवर्तन देखने को मिली। यह मानव संसाधन तैयार करने वाले साधन के रूप में स्वीकार की जाने लगी। लिखने, पढ़ने और गिनने की दक्षताएं, उत्पादन की कुशलताएं और प्रभावपूर्ण तरीके से मानसिक और शारीरिक श्रम की आदत का विकास हमारे शिक्षा व्यवस्था का एकमात्र लक्ष्य बन गया। शिक्षा के व्यापक प्रसार, शिक्षित होने की लालसा और शिक्षितों के समाज में इसी लक्ष्य का साकार रूप देखा जा सकता है।

पिछले कुछ दशकों में हमारे समाज और संस्कृति में महत्वपूर्ण बदलाव आ चुके हैं। एक दौर में शिक्षा के कंधों पर विकास की ज़िम्मेदारी थी लेकिन आजकल यही शिक्षा विकास और वैश्वीकरण के पीछे चल रही है। शिक्षा की तीनों संकल्पनाओं जैसे, सत्य की खोज, मानव की दशाओं में सुधार और बौद्धिक व शारीरिक श्रम के उत्पादन में से हमारी शिक्षा व्यवस्था बाद के दो उद्देश्यों को ढो रही है। विडंबना देखिए हम अपने व्यवहार, विश्वास और रिश्तों में व्यक्तिनिष्ठ होते जा रहे हैं। इसका प्रभाव केवल बाहरी स्तर तक नहीं है, बल्कि हमारी चेतना की सांस्कृतिक जड़े कमज़ोर हो रही हैं। शिक्षा जैसी व्यवस्था भी इसकी जड़ को नहीं संभाल पा रही हैं।

#Bno...

में शिक्षा से जुड़ा हु।
मगर में ग्राहक पैदा करने के खिलाफ हु।
मुजे कुछ ऐसा करना हैं कि जिससे ग्राहक न बढ़े और न बने।

Wednesday, May 15, 2019

भ्रम ओर श्रद्धा

एक छोटा गाँव।
यहाँ पे बारिश नहीं हो रही थी। लोग परेशान थे।आसपास के गाँव की भी बारिश न होने के कारण बुरा हाल था। सभी ने तय किया कि बारिश के लिए हम प्रभु से प्रार्थना करेंगे। गाँव के सभी लोग एक मैदान में एकत्र होने वाले थे। आसपास के गाँव के लोग भी आये थे। एक छोटी सी बच्ची भी आई थी। मगर उस के हाथमें छाता था।
इसे कहते हैं,यकीन। यकीन ओर विश्वास समान हैं।कुछ लोग यकीन के साथ जिंदा रहते हैं।कुछ लोग भ्रम के साथ, भ्रम फैलाने के लिए भ्रम के लिए ही जिंदा होते हैं।

#Bno...
कुछ लोग आगे का देख लेते हैं।
कुछ लोग नींद में सुन पाते होते हैं।
जो आगे का देख लेते हैं, वो परेशान होते हैं।
मगर,विश्वास और भ्रम में जो फर्क हैं,वो समज ने की सबकी ताकत नहीं होती।

Tuesday, May 14, 2019

अकेला था...अकेला हु ओर...



आज से पांच साल पहले की बात हैं।
तब मैं बेंगलोर में था,वर्ल्ड रिकॉर्ड का कनफोरमेशन मुजे तब मिला था। मेने ये जानकारी सब को बताई। मेरे एक दोस्त ने किसी स्थानिय news chenal में मेरा इन्टरव्यू रखा गया। अब बात ये बनी की मुजे प्रोग्राम एडिटर को ' जोडाक्षर ओर कहानियां ' के बारे में समजाना पड़ा। दो घंटे तक चली हमारी 
चर्चा के बाद उन्होंने कहा 'अरे यार, गुजराती में इतना किया थोड़ा अंग्रेजी भी कर लेते... आज आसान हो जाता।' मेने कहा: 'अंग्रेजी का करने रहता तो ये भी न हो पाता' बस, वो इस जवाब से शायद खुश हो गया था। किसी भी एक विचार को पकड़ कर उस पर सिर्फ काम करो, समय आनेपर सफलता अवश्य मिलती हैं।

#Bno...
अपने आप मे विश्वास रखो।
कुछ लोग आप को सदैव जूठा साबित करना चाहेंगे, यहां तक कि उन के पास कोई जवाब न होने पर भी वो आप से सवाल करेंगे। कितनी बार तुम सच्चे हो फिरभी तुम्हे गलत कहा जायेगा। गलत कहने वाले सही होने की वार्ता के साथ गुमते रहेंगे। यकीन रखो, अपने आप में विश्वास रखो। यह वख्त भी गुजर जाएगा।




Saturday, April 27, 2019

उत्तराखंड LBSANa ओर सोनियाजी


labasana#lAbAsAnAiAsiasIASINNOVATION BHAVESH PANDYA BHAVESHPANDYA16@BHAVESHPANDYA
 उत्तराखंड कुदरती संसाधन वाला राज्य। भौगोलिक रूप से देखा जाए तो दिक्कतों के साथ लोग खुशी से जी रहे हैं। आज भी यहाँ लोग पहाड़ो पे रहते हैं।

मसुरी स्थित लालबहादुर शात्री नेशनल एकेडमी ऑफ एडमिनिस्ट्रेटर में 3 दिन के लिए आना हुआ। भारतके नव नियुक्त IAS ऑफिसर के साथ यहाँ संवाद और गोष्टी करने का अवसर प्राप्त हुआ।
How is The josh....

labasana#lAbAsAnAiAsiasIASINNOVATION BHAVESH PANDYA BHAVESHPANDYA16@BHAVESHPANDYA

हमारे नावचार के बारे में सुना और अपने विचार रखे। 26 अप्रैल को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्री त्रिबेन्द्रसिंह रावत को मिलनेका मौका मिला। हमे था कि सिर्फ मुख्यमंत्री महोदय मिलेंगे। मगर वहाँ तो शिक्षा विभाग के सभी अधिकारी उपस्थित थे। उन्हों ने अपनी बातें ओर समस्या रखी। बहोत अच्छा लगा जब एक मुख्यमंत्री 2 घंटे तक अपने राज्यो के भिन्न भिन्न सवाल ओर समस्या के लिए इनोवेटर से चर्चा विमर्श कर रहे हैं।
डॉ. अनिल गुप्ता जी की अगुवाई में हमे उनके साथ बात करने की ओर मेरे भाषा शिक्षा के नवाचार को प्रस्तुत करनेका मौका मिला। सोनिया सूर्यवंशी जो कि एक शक्ति हैं। कुछ खास हैं।हम ने IIM में साथ काम किया हैं। आज उन्हें यहां काम करते देखा। वाह सोनिया जी....भाषा या शिक्षा से जुड़े उत्तराखंड के किसी भी काम में सहयोग करने को मैने सहमती दिखाई हैं।

शिक्षा में सबसे बड़ा सवाल हैं MGML ।हम जहाँ रुके थे इस कि बगल में एक सरकारी स्कूल हैं।यहाँ 2 महिला शिक्षक ओर 40 बच्चो के साथ 5 तक कि स्कूल हैं। मेने पूछा आप का कोई एक सवाल जो आप को सताता हो। उन्हों ने कहा सर कोई ऐसी व्यवस्था हो जो एक साथ पढ़ा पाए। 
में मन में इंटिग्रेड मल्टीग्रेड की सोच के साथ बच्चों ने मेरे साथ वहाँ एक गेम खेलने को अपनी मेडमे से कहा। हम खेले ओर थोड़ी देर में केला खाके निकल लिए।

जय हिंद:

अगर कुछ हो सके तो इतना होना चाहिए। उत्तराखंड में 1 से 5 अपने स्टेट के अलग किताब होने चाहिए। NCERT की किताब ओर उत्तराखंड की स्थानीय परिस्थिति के आधार पर ये होना चाहिए। कुछ सालों बाद परिणाम सामने से दिखेगा।

Thursday, April 18, 2019

अनूठा प्यार...कुंवारी माता...


महाराष्ट्र के अहमदनगर से हाल ही में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसके बारे में जानकर आप हैरान हो जाएंगे. दरअसल यहां रहने वाली एक महिला की शादी को पांच साल से भी ज्यादा वक्त हो गया है लेकिन महिला ने इन पांच सालों में कभी भी अपने पति से शारीरिक संबंध नहीं बनाए हैं. हैरानी वाली बात तो यह है कि बिना सम्बन्ध बनाए ही ये महिला गर्भवती हुई. जी हां… महिला ने पिछले महीने ही एक बेटी को जन्म भी दिया है.
सूत्रों की माने तो महिला की उम्र 30 वर्ष है और उनका नाम रेवती है. बता दें रेवती की शादी साल 2013 में हुई थी. उनके पति चिन्मय से उनकी मुलाकात ऑनलाइन हुई थी, और उस समय वह अमेरिका में थे. शादी करने के बाद दोनों ही भारत से अमेरिका रहने चले गए थे. वहां शादी की पहली रात ही रेवती ने अपने पति को अपनी स्थिति के बारे में बता दिया. रेवती के पति को भी इससे कोई परेशानी नहीं थी. आपको बता दें रेवती वैजिनिज्म्स नाम की एक मेडिकल कंडीशन से जूझ रही हैं. इस कंडीशन में अपने पति के साथ शारीरिक संबंध बना पाना उनके लिए लगभग नामुमकिन है.

शादी के बाद रेवती ने डॉक्टरों को दिखाया और फिर उन्हें इस बारे में पता चला कि वो वैजिनिज्म्स से जूझ रही हैं. इस वजह से वह आज तक ‘वर्जिन’ ही हैं. हालांकि आईवीएफ के जरिए वो गर्भवती होने में कामयाब रहीं और पिछले महीने 9 फरवरी को उन्होंने नॉर्मल डिलीवरी से एक स्वस्थ बच्ची को जन्म दिया. इस बारे में रेवती का कहना है कि, ‘उनकी शादी को पांच साल से ज्यादा समय बीत चुका है, लेकिन उन्होंने आज तक अपने पति से संबंध नहीं बनाए हैं, लेकिन बच्चे के जन्म के बाद उन्हें ऐसा लगता है कि वो पहली बार अब अपने पति से संबंध बना पाएंगी.’ बात जो भी हैं, मगर विज्ञान आगे बढ़ गया हैं।

जय हिंद:

आज से पहले कुछ साल पहले मेने रेखाबा सरवैया के बारे में लिखा था। वो गुजरात की पहली और भारत की तीसरी कुँवारी माता बनी थी। उन के बारे में जानने के लिए रेखाबा सरवैया क्लिक करें।


Sunday, April 14, 2019

आज मेने खुद से बात की...

आज मेने दोपहर खुद से बात की। मेने माना कि खुद को बढ़ती उम्र के साथ स्वीकारना मुजे  तनावमुक्त जीवन देता है। आप के काम के लिए आप को लोग याद करेंगे,आप की उम्र के लिए या ख़ूबसूरति के लिए नहीं। अगर आप खुद अकेले इतना सब कर पाए हो तो जो बाकी हैं, तुम खुद ही कर लोगे। किसी के ऊपर निर्भर न रहो। आप में बहोत लोग विश्वास कर चुके हैं, तुम खुद पे यकीन रखो।

मेने खुदसे कहा उम्र एक अलग तरह की खूबसूरती लेकर आती है, उसका आनंद लेने के बजाय दूसरी अड़चन को मुजे नहीं छूना हैं।

बच्चों की तरह अब में खिलखिलाउंगा, अच्छा माहौल रखूंगा। थोड़ी देर, शायद पांच मिनिट में शीशे में दिखते हुए अपने अस्तित्व को स्वीकारते हुए बोला 'अब मेरा भी कुछ करूँ'। 

कोई भी क्रीम मुजे गोरा नहीं बनाती, कोई शैम्पू बाल झड़ने से नहीं रोकता, मेरे बाल नहीं जड़ते हैं मगर मुजे मालूम हैं कि कोई तेल बाल नहीं उगाता,  कोई साबुन आपको बच्चों जैसी स्किन नहीं देता। जो हैं वो वैसेही रहेगा,मुजे भी बदलना जरूरी नहीं हैं।

जय गणेश...
जो होता हैं।
ये सब कुदरती होता है। 
आज जो हुआ अच्छा हुआ।
मेने नई सोचके साथ मेरे नए घर में प्रवेश किया। जो जनम से खुद के पास हैं वैसी पुरानी मशीन को maintain करके बढ़िया चला तो सकते हैं, पर उसे हम नई नहीं कर सकते। कोई बदलाव चाहे तो तुम खुद बदलो... क्यो? हर कोई सच्चा बदलाव लाने को समर्थ नहीं, न हमे किसी के लिए ऐसी आस रखके अपना खुदका यूनिक छोड़ना चाहिए। जो तुम्हे बदलाव के साथ स्वीकारने को तैयार हैं, वो सौदागर होता हैं।

कोई बात नहीं अगर आपकी नाक मोटी है तो, कोई बात नही आपकी आंखें छोटी हैं तो, कोई बात नहीं अगर आप गोरे नही हैं।मेरी सुंदरता मेरा जीवन होना चाहिए। मेने कितनो के जीवन मे खुशी फैलाई हैं। भले कुछ खाता हूं, किसी के जीवन के हर खुशी के मौकों को नहीं में नहीं चबाता।भले सामने वाले कि होंठों की shape perfect हैं और आप के नहीं हैं, कोई बात नहीं। हमे हमारे जीबन से परफेक्ट बन के दिखाना हैं। जो भी आज मेरे आसपास हैं, ज्यादातर अपने काम को निपटा के भूलने वाले ज्यादा हैं। कदर शायद कम करेंगे, मगर जब जब उन की सिद्धियों की बात चलेगी, न चाहते हुए हमारी बात होगी। में ऐसा नहीं कि कोई भी हमे जड़ से उखाड़ पाए। गब्बर का बाप 'खुद गब्बर' हूं।
दूसरों से मुजे वाहवाही लूटने के लिए सुंदर दिखने से ज्यादा ज़रूरी है, मेरे काम और सन्मान को बनाये रखकर खुद की सुंदरता को महसूस करना ओर समय को उत्तम तरीके से खर्च करना।

हर बच्चा सुंदर इसलिये दिखता है क्योंकि वो छल कपट से परे मासूम होता है। बडे़ होने पर जब हम छल व कपट से जीवन जीने लगते है तो वो मासूमियत खो देते हैं, बहोत दिनों पहले जब में ओर मेरी बेटी ऋचा हम एठोर गणेशजी के दर्शन करने गए तो मैने उसे कहा 'बेटे, मासूमियत से हमे जीना हैं।' बस, मुजे मेरी मासूमियत ओर मेरे इरादों पर भरोसा हैं। खुद पे भरोसा रखो। जहाँ तुम्हे जरूरत हैं, वहाँ अविश्वास आएगा। आप के ऊपर निर्भर आप पे विश्वास करने खड़े हैं,मगर आप कही और खोए हैं। आप की बच्ची बीमार हैं,आप बाहर है तो आप की फिकर कम करने के लिए वो नहीं बताते। अगर आप किसी को कहेंगे कि ऐसा हुआ। परिवार ने नहीं बताया।तब वो डॉक्टर का रिपोर्ट,फोटो मांगेंगे तो मतलब ये होता हैं कि आप आज तक गलत सोच पाले हुए हैं।जो आप के हैं, आप के पीछे हैं। जो साथ या सामने हैं, वो आप को पिछड़ा सकते हैं। 

मुजे आज क्यो...
ऐसे बहोत विचार आये...

अरे...

ये खाओ, वो मत खाओ 
ठंडा खाओ , गर्म पीयो, 
ये पीओ, ये नहीं पियकरों...
कपाल भाती करो,
सलून में जाओ, 
सवेरे नीम्बू पीयो ,
रात को दूध पीयो,
ज़ोर से सांस लो, 
लंबी सांस लो 
दाहिने से सोइये ,
बायें से उठिये,
हरी सब्जी खाओ, 
दाल में प्रोटीन है,
दाल से क्रिएटिनिन बढ़ जाएगा।

जो कुछ नहीं मानते,वो बहोत कुछ मनवाने का आग्रह रखते हैं। हम मानेगे तो भी साले यकीन नहीं करेंगे। हर नुकसान के लिए आप को ही जिम्मेदार ठहराएंगे।

अरे! अपन मरने के लिये जन्म लेते हैं, कभी ना कभी तो मरना है ही, अभी तक बाज़ार में अमृत बिकना शुरू नहीं हुआ। बस, हर चीज़ सही मात्रा में खाइये, हर वो चीज़ थोड़ी-थोड़ी जो आपको अच्छी लगती है। जो अच्छा न लगे उस से दूर रहें।

अब से में...

टहलने जा पाऊंगा, 
लाइट कसरत करूँगा।  
मेरे ही काम में व्यस्त रहूंगा।,  
खुश रहूंगा ,ओर खिशियो को फैलाने की कोशिश करूंगा। शायद में भूल रहा हूँ। मुजे मेरे ख्वाब पूरे करने हैं, कुछ लोगो के साथ रहने से मालूम पड़ता हैं कि उनके ख्वाब बदलते हैं। जैसे मेरी ऋचा... मेरा ख्वाब आज तक नहीं बदला। में कोशिश करता  रहूँगा मेरी जिंदगी जीने की।

फरकडी:

साहिल मेरी छत हैं, परवेज मेरा आकाश। साहिल लुधियानवी की बीबी ओर परवेज जी की माशूका अमृता प्रीतम ने ये किसी पत्रकार को सवाल के जवाब में ऐसा कहा था। मेंने पहले भी इस वाकये के बारेमें, अमृता प्रीतम के बारे में...  लिखा हैं।

Wednesday, March 20, 2019

ચકલી દિવસ...



20 માર્ચ 2010 નો દિવસ કાંઈક ખાસ દિવસ હતો. આ દિવસ વિશ્વભરની ‘ચકલીઓ’ ને અર્પણ કરાયો હતો આ 20 માર્ચ ને સહુ પ્રથમ વખત વિશ્વ ચકલી દિન (World Sparrow Day) તરીકે ઉજવવામાં આવી. ત્યાર્થી શહેરી વિસ્તારોમાં ચકલીઓ ચિંતાજનક પ્રમાણમાં ઘટી રહી છે. વિશ્વભરમાં ૨૦૧૦ ની સાલથી “ચકલી બચાવ અભિયાન” શરૂ થયું છે. દર વર્ષે ૨૦ માર્ચે “World Sparrow Day” વિશ્વભરમાં ઘર ચકલી અને અન્ય પક્ષીઓ જે આપણા પર્યાવરણના મહત્વ ના અંગ છે. તે અંગે જન-જાગૃતિ સ્વરૂપે ઉજવાય છે.

આપણને એમ થાય કે ભલા ચકલાના તે કાંય દિવસ ઉજવવાના હોય ? ચકલીમાં તે વળી નવું શું છે ? નાનપણમાં કદાચ સૌથી પહેલાં જોયેલું, ઓળખેલું એકદમ જાણીતું પંખી એટલે ચકલી. હજુ બરબર બોલવાનું પણ ન શીખેલા બાળકને પૂછીએ કે ‘ચકી કેમ બોલે?’ તો તરત કહેશે-‘ચીં…ચીં..’. ચકલાં, ચકલી, ચકીબેન કે ‘હાઉસ સ્પેરો’ એ ફક્ત આપણાં દેશનું જ નહીં પણ વિશ્વભરમાં સૌથી વધુ જોવા મળતું અને માનવ વસ્તી સાથે હળી-ભળી ગયેલું સૌથી સામાન્ય પક્ષી. એક સમયે વિશ્વનું સૌથી સામાન્ય અને ટોળાબંધ જોવા મળતું આ નાનકડું પંખી આજે જીવન સંઘર્ષ માટે ઝઝુમી રહ્યું છે અને કમનસીબે હારી રહ્યું છે ! વિશ્વભરમાં અને ખાસ કરીને ભારતમાં પણ ચકલીઓની સંખ્યા ખૂબ ઝડપથી ઘટી રહી છે. જો તેમેને બચાવવા માટે આપણે કંઈ નહીં કરીએ તો આ ચકલીઓ ખૂબ ઝડપથી સદાને માટે લુપ્ત થઈ જશે !
માનવામાં નથી આવતું? જરા વિચારો, આજથી 5-6 વર્ષ પહેલાં આપણા ઘરની આસપાસ જેટલી ચકલીઓ જોવાં મળતી તેટલી ચકલીઓ આજે જોવા મળે છે ખરી ? જી ના. નથી મળતી. આ ટચૂકડી ચકલીઓ આપણા પર્યાવરણ અને ‘ઈકોસીસ્ટમ’નો ખૂબ અગત્યનો ભાગ છે. તેમને લુપ્ત થવા દેવી એ આપણા પર્યાવરણને પોસાય તેમ નથી. ઝીણાં અવાજે ચીં….ચીં… કરી પોતાને બચાવી લેવાની અપીલ કરતી ચકલીઓનો અવાજ દરેકે-દરેક લોકોના કાન સુધી પહોંચતો કરવા માટે ‘નેચર ફોરેવર’ સોસાયટી નામની સંસ્થા મેદાને પડી છે. ‘ચકલી’ બચાવ અભિયાન’ ને લોકો સુધી પહોંચતું કરવા આ સંસ્થા દ્વારા 20 માર્ચ 2010 ના ‘વર્લ્ડ હાઉસ સ્પેરો ડે’ ઉજવાઈ ગયો. અને આ વર્ષ 2010 માટે ‘હેલ્પ હાઉસ સ્પેરો’ની થીમ પસંદ કરાઈ. નેચર ફોરેવરની સાથે BNHS (બોમ્બે નેચરલ હેસ્ટરી સોસાયટી), ઈકોસીસ ફાઉંડેશન (ફ્રાંસ), કોર્નેલ લેબ ઓફ ઓર્નીથોલોજી (USA), એવોન વાઈલ્ડ લાઈફ ટ્રસ્ટ (UK) જેવી સંસ્થાઓ અને સંગઠનો સહયોગી છે.
ચકલી કદમાં ભલે નાનકડું પંખી હોય પણ તેની વિશેષતાઓ ઘણી મોટી છે. ચકલી વિશ્વમાં સૌથી વધુ ફેલાયેલું પંખી અને સૌથી સામાન્ય-વિપુલ રીતે જોવા મળતાં પંખીનો ખિતાબ ધરાવે છે. પ્રાણીઓમાં કૂતરાની જેમ જ પંખીઓમાં ચકલીઓએ માનવીનો વિશ્વના દરેક પ્રદેશોમાં સદા માટે સાથ નિભાવ્યો છે. ચકલીઓને આપણી સાથે એટલું ગોઠી ગયું છે કે માનવવસ્તી થી દૂર રહેવું- જીવવું તેમના માટે શક્ય જ નથી. માંડ 10-20 સેન્ટીમીટરની લંબાઈ ધરાવતા આ પંખીએ વિશ્વના નકશા પરનાં લગભગ બધા દેશોમાં વસવાટ કર્યો છે. એશિયા, આફ્રિકા, ઓસ્ટ્રેલિયા, યુરોપ, તથા અમેરિકા. આમ પૃથ્વીનાં મોટા ભાગનાં ખંડોને ચકીબેને પોતાનું ઘર બનાવ્યું છે. ખૂબ ગીચ જંગલો, રેગીસ્તાન અને વર્ષનો મોટો ભાગ બરફથી છવાયેલા રહેતા પ્રદેશોને બાદ કરતાં જ્યાં પણ મનુષ્યો વસ્યાં છે ત્યાં ચકીબેન પણ જઈને વસ્યાં છે. તો પછી અચાનક એવું તે શું થઈ ગયું કે ચકલાંઓની સંખ્યા એકાએક ખતરનાક રીતે ઘટવા માંડી ? માનવવસ્તીની ખૂબ નજીક રહેવાંની અને તેમનાં પર વધુ આધારીત રહેતી ચકલીઓનાં વિનાશ માટેનાં કારણો તો ઘણાં છે પણ આ બધાં કારણો પાછળ જવાબદાર કોઈ હોય તો તે એક જ છે – મનુષ્ય ! ચકલીઓનાં અસ્તિત્વને મરણતોલ ફટકો આપવા માટે જો કોઈએ આરોપીનાં પીંજરામાં ઉભા રહેવું પડે તો તે આપણે પોતે જ છીએ !

આજે આપણે જે મોર્ડન લાઈફ સ્ટાઈલ જીવી રહ્યાં છીએ તેણે વાસ્તવમાં આપણને પ્રકૃતિથી વેગળાં કરી નાખ્યાં છે. આની વરવી અસરો ફક્ત આપણને જ નહીં આપણી સાથે જોડાયેલાં પશુ, પક્ષી અને કુદરતનાં અન્ય તત્વો પર પણ પડી રહી છે. ચકલીની બાબતમાં પણ આવું જ થયું છે. હદ બહારનાં વાયુપ્રદુષણ, ધ્વનિપ્રદુષણ, મોબાઈલ ટાવરોનાં સૂક્ષ્મતરંગો, મકાનોની બદલાયેલી રચના, બિલાડાં જેવાં રાની પશુઓની વધેલી સંખ્યા, રાસાયણિક ખાતરો અને જંતુનાશકો તથા દેશી વૃક્ષો-ફૂલ-છોડની જગ્યાએ શોભાના ગાંઠીયા જેવાં નકામાં વૃક્ષોનું મોટા પાયે થતું વાવેતર – આ બધાં જ મસ મોટાં જોખમો નાનકડાં ચકલાં માટે જીવન ટકાવવું દુષ્કર બનાવી રહ્યાં છે. બીજાં પક્ષીઓની જેમ ચકલાં વૃક્ષો પર માળા ન બાંધતાં માનવ વસાહતની આસપાસ ની જગ્યામાં જ માળા બાંધે છે. આથી જ ચકલાંઓનું અંગ્રેજી નામ ‘હાઉસ સ્પેરો’ – ‘ઘર ચકલી’ છે. માળો બાંધવા માટે તે મકાનો અને દીવાલનાં બાકોરાં, કૂવાની દિવાલો, ઘરની અંદરની અભેરાઈઓ, નળીયાં કે છાપરાં નીચેનાં પોલાણો, ટ્યુબલાઈટની પટ્ટીઓ, લેમ્પ-શેડ, ફોટોફ્રેમની પાછળની જગ્યાઓ વધુ પસંદ કરે છે. ચકલાંનો માળો મુખ્યત્વે ઘાસ, તણખલાં, રૂ, સાવરણીની સળીઓ, દોરાં વગેરેનો બનેલો હોય છે. આમ તો ચકલાનાં ખોરાકમાં અનાજનાં દાણાં, ઘાસનાં બીજ, વૃક્ષોનાં ટેટાં જેવાં ફળો, ઈયળ, કીટકો, ફૂદાં ઉપરાંત આપણો રોજ-બરોજનો લગભગ બધો જ ખોરાક તે એંઠવાડમાંથી મેળવીને ખાઈ લે છે. પરંતુ, જ્યારે બચ્ચાં નાનાં હોય છે ત્યારે તે મુખ્યત્વે કીટકો, ઈયળ, ફૂદાં જેવો ખોરાક ખવડાવે છે. બચ્ચાં મોટાં થઈને જાતે ખાતાં શીખે ત્યારે તે બધા પ્રકારનો ખોરાક લેતાં થઈ જાય છે. આપણી ઝડપથી બદલાતી જતી લાઈફ સ્ટાઈલને લીધે ચકલાંઓને તેમના જીવનનાં દરેક તબક્કે આહાર, આશ્રય અને સલામતી મળવાનું ખૂબ ઓછું થઈ ગયું છે અને તેના અસ્તિત્વ પર ખતરો ઉભો થયો છે.

આજે ચકલાં માટે સૌથી મોટો પ્રશ્ન છે માળો બાંધવા માટેની સલામત જગ્યાનો. આપણી નવી બાંધણીનાં મકાનોમાં ગોખલાં, અભરાઈઓ, નળીયાં કે છાપરાં હોતાં જ નથી. હવે જો ચકલાં માળો જ ન બાંધી શકે તો તેમની વંશવૃધ્ધી જ ક્યાંથી થાય ? ચકલાંઓને સલામત રહેઠાણ આપવાં પૂઠાં, થર્મોકોલ, પ્લાસ્ટીક, લાકડાં કે માટલાંના બનેલાં બોક્સ કે જે ‘નેસ્ટ હાઉસ’ તરીકે ઓળખાય છે તે ઉત્તમ વિકલ્પ છે. આ પ્રકારનાં ‘નેસ્ટ હાઉસ’ ચકલાં ઉપરાંત બીજા અનેક પંખીઓ માટે સરસ મજાનાં ઘરની ગરજ સારે છે. આપણે વાત કરી તેમ ચકલાંના બચ્ચાંનો મુખ્ય ખોરાક નાના જીવડાં, કીટકો વગેરે છે. પરંતુ, આજે હદ ઉપરાંતનાં જંતુનાશકો અને રાસાયણીક ખાતરોના વપરાશ ને લીધે આવાં નાનાં-નાનાં અનેક કીટકો મરી પરવાર્યાં છે અથવા તો તેમની સંખ્યાંમાં ભારે ઘટાડો નોંધાયો છે. આમાં ઘણાં તો ખેતી માટે બિનહાનીકારક કે ઉપયોગી કીટકોનો પણ સમાવેશ થાય છે. વાહનોમાં વપરાતું ‘અનલીડેડ’ પેટ્રોલ પણ ચકલાંના ખોરાક એવાં કીટકોનાં નાશ માટે જવાબદાર છે. ‘અનલીડેડ’ પેટ્રોલના દહનથી વાતાવરણમાં ભળતું ‘મીથાઈલ નાઈટ્રાઈટ’ એ અત્યંત ઝેરી સંયોજન છે. ‘મીથાઈલ નાઈટ્રાઈટ’ કીટકોનો સોથ વાળી દે છે. તેથી ચકલાંનાં નાનાં બચ્ચાંને પૂરતો અને પોષણક્ષમ આહાર મળતો નથી અને ઘણાં બચ્ચાં નાનપણમાં જ મૃત્યુ પામે છે. આથી ચકલાંની નવી પેઢી તૈયાર થવાનું જ ઘટી ગયું છે !

હજુ થોડાં વર્ષો પહેલાં આપણાં ઘર, ખેતર, વંડા, બગીચા ફરતે મોટા ભાગે મેંદી, થોર, બોરડી, બાવળ જેવા છોડ અને વેલાંઓની બનેલી કુદરતી વાડ કરવામાં આવતી હતી. ચકલાં માટે આ કુદરતી વાડ ખુબ જ આશીર્વાદ રૂપ છે. કુદરતી વાડમાંથી ચકલાંને કીટકો, ઈયળો, પતંગીયાં, ફળો જેવા ખોરાકનો પુરતો જથ્થો મળી રહે છે. ઉપરાંત આવી વાડ અને ઝાડી ચકલાંને આરામ કરવાની, રાતવાસો કરવાની અને દુશ્મનોથી બચવા-છુપાવાની આદર્શ જગ્યા છે. આજકાલ આપણે કુદરતી વાડને બદલે ઈંટની દીવાલ કે લોખંડના તારની વાડ બનાવીએ છીએ. જે પંખીઓ માટે ન તો આશ્રય પુરો પાડે છે ન તો ખોરાક. આથી જ ચકલાંનાં બચ્ચાં મોટાં થાય ત્યારે યોગ્ય આશ્રયના અભાવે કાગડાં, સમડી, બિલાડાં જેવાં શિકારી પશુ-પક્ષીઓની ઝપટે ચઢી જાવાની શક્યતા ઘણી વધુ રહે છે. એક અંદાજ મુજબ ચકલાંનાં બચ્ચાંમાંથી માંડ 25% જેટલાં બચ્ચાં જ પુખ્ત બને છે. બાકીનાં 75% તો મોટાં થતાં પહેલાં જ મૃત્યુ પામે છે અને અત્યારની પ્રતિકૂળ પરિસ્થિતિમાં તો ચકલાંનો મૃત્યુ દર ઘણો ઊંચો હોવાનું મનાય છે. જ્યાં સુધી આપણને આધુનિકતા અને વૈશ્વિકરણની હવા સ્પર્શી નહોતી ત્યાં સુધી આપણે કુદરતની ઘણી નજીક જીવતાં હતાં. સવાર પડે ને પંખીને ચણ નાખવા ચબૂતરે જવું ત્યારે એટલું સાહજીક હતું જેટલું આજે ‘મોર્નીંગ વોક’ છે ! પરંતુ દિવસે-દિવસે આપણે સ્વકેન્દ્રી બનતાં જઈએ છીએ. મોટા શહેરોમાંથી તો ચબૂતરાં જ અદ્રશ્ય થઈ ગયાં છે ! વેકેશનમાં ગામડે જાઈએ ત્યારે બાળકોને ખાસ ચબૂતરાં શું છે તે દેખાડવામાં આવતાં હોય તેવી પરિસ્થિતિમાં બાળકોનો પણ પેઢીઓથી ચાલી આવતો પંખીઓ સાથેનો વિશેષ નાતો જ તૂટી ગયો છે.

શહેરની ગીચ વસ્તીમાં ચકલાં જેવાં પક્ષીઓ માટે ચણવાનાં દાણાં અને સલામત જગ્યાની પણ તંગી વર્તાઈ રહી છે. અરે ! પંખીઓ પ્રત્યે જોવાની આપણી દ્રષ્ટી જ સમૂળગી બદલાય ગઈ છે. પહેલાં હોંશથી આપણે ગાતાં કે ‘ચકીબેન ચકીબેન મારી ઘરે રમવા આવશો કે નહીં?’ ચકલાં માળાં બનાવે તો તેનું જતન થતું; માળો ફેંકી દેવાથી પાપ લાગશે તેમ મનાતું. જ્યારે હવે તો ‘ચકલાં આવશે અને ઘર બગાડશે’ એવું માની આપણે કહેવાતાં ચોખલીયાં અને એજ્યુકેટેડ લોકો ચકલાંઓને બેરહેમીથી ઉડાડી મૂકીએ છીએ ! અરે, સદીઓથી જે ચકલાં આપણી સાથે જ આપણાં જ ઘરમાં રહ્યાં છે તે હવે એકાએક જાય તો જાય પણ ક્યાં ? ‘ઈન્ટીરીયર ડેકોરેશન’નાં બણગાં ફૂંકનારા આપણે લોકો ઘર અને હૃદય બંનેનાં ઈન્ટીરીયરમાં આપણાં સદાના સાથી એવાં ચકલાંને સ્થાન નથી આપી શકતાં એ કેટલું વિચિત્ર ગણાય ?! ઘરની આધુનિક ડીઝાઈનમાં પણ ક્યાંય પ્રકૃતિ અને પંખીને ગોઠવાવાની જગ્યા જ નથી મળતી ત્યારે ખૂબ સરસ ઘર બનાવી આપતાં આર્કીટેક પણ જાણે સાચુકલાં ‘ઈકો ફ્રેંડલી’ ઘરનો વિચાર જ ભૂલી ગયાં હોય એવું લાગે છે !

ચકલાંમાં નર અને માદા વચ્ચે જે વાતચીત થાય છે તે ધીમા ચીં….ચીં… અવાજ વડે જ થાય છે. સંવવનઋતુમાં નર માદાને આકર્ષવા ગીતો ગાય છે જે સાંભળી માદા નરને પસંદ કરે છે અને ટોળાં વચ્ચે પણ જોડલું એકબીજાંને ઓળખી કાઢે છે. પરંતુ આજનાં ઘરોમાં તો જોર-શોરથી વાગતાં ઘોંઘાટીયાં સંગીતમાં બિચારાં ચકલાંનું ચીં..ચીં.. ક્યાંય દબાઈ જાય છે અને ચકલાં વચ્ચેની વાતચીતની આખી પદ્ધતિ ખોરવાઈ જાય છે; જેની ખૂબ ખરાબ અસર તેમના પ્રજનન પર પણ પડે છે. ઉપરાંત મોબાઈલનાં માઈક્રોવેવ તરંગો પણ ચકલાં માટે ખૂબ ત્રાસદાયક નીવડે છે. આ પણ એક વજનદાર કારણ છે જેને લીધે મોટાં શહેરોમાંથી ચકલાં અદ્રશ્ય થઈ રહ્યાં છે.

Tuesday, March 12, 2019

दांडी यात्रा का दिन...



दांडी मार्च जिसे नमक मार्चदांडी सत्याग्रह के रूप में भी जाना जाता है जो इसवीसन 1930 में महात्मा गांधी के द्वारा अंग्रेज सरकार के नमक के ऊपर कर लगाने के कानून के विरुद्ध किया गया सविनय कानून भंग कार्यक्रम था। ये ऐतिहासिक सत्याग्रह कार्यक्रम गाँधीजी समेत ७८ लोगों के द्वारा अहमदाबाद साबरमती आश्रम से समुद्रतटीय गाँव दांडी तक पैदल यात्रा करके १२ मार्च १९३० को नमक हाथ में लेकर नमक विरोधी कानून का भंग किया गया था। भारत में अंग्रेजों के शाशनकाल के समय नमक उत्पादन और विक्रय के ऊपर बड़ी मात्रा में कर लगा दिया था और नमक जीवन जरूरी चीज होने के कारण भारतवासियों को इस कानून से मुक्त करने और अपना अधिकार दिलवाने हेतु ये सविनय अवज्ञा का कार्यक्रम आयोजित किया गया था। कानून भंग करने के बाद सत्याग्रहियों ने अंग्रेजों की लाठियाँ खाई थी परंतु पीछे नहीं मुड़े थे।
==पूर्व भूमिका==सबको लाठी पड़ती थी एक गांधी को छोड़कर क्योंकि की जवाहर लाल नेहरू उस वक़्त के केजरीवाल थे अगर गांधी को कुछ हो जाता तो उनका पीएम का सपना चकनाचूर हो जाता 1930 को गाँधी जी ने इस आंदोलन का चालू किया। इस आंदोलन में लोगें ने गाँधी के साथ पैदल यात्रा की और जो नमक पर कर लगाया था। उसका विरोध किया । इस आंदोलन में कई नेताओं को गिरफ्तार कर लिया जैसे-राजगोपालचारी,नहेरू, आदि। ये आंदोलन पूरे एक साल चला और 1931 को गांधी-इर्विन समझौते से खत्म हो गया।

सरकुम:
गांधी विचार में एक बात ये भी हैं कि सत्य को ही समजो,सत्य को अपनाओ ओर सत्य को ही कहा करो। जो में कर रहा हूँ।मेने सच को पकड़ा हैं, तब से में शांत हो पा रहा हूँ।
मेरा सत्य मेरी सरकार के लिए हैं। 

Tuesday, January 1, 2019

2019 की भविष्यवाणियां... नास्त्रेदमस



फ्रांसीसी माइकल दि नास्त्रेदमस ने आने वाले कई सालों के लिए भविष्यवाणियां कर दी थीं. पूरी दुनिया में लोग नास्त्रेदमस की भविष्यवाणियों पर यकीन करते हैं. इसकी वजह ये है कि उनकी भविष्यवाणियां पहले भी सच साबित हो चुकी हैं.


नास्त्रेदमस ने 2019 के लिए जो भविष्यवाणियां की हैं, उसमें मानवता के लिए अच्छी खबर नहीं है. कई दूसरे भविष्यवेत्ताओं ने भी 2019 में विनाश के ही संकेत दिए हैं. नास्त्रेदमस की भविष्यवाणी में 2019 में दुनिया खत्म होने के संकेत भी छिपे हैं.
नास्त्रेदमस ने तृतीय विश्व युद्ध, पश्चिमी दुनिया के पतन और एस्टरॉयड के बारे में भविष्यवाणियां की हैं. उनकी भविष्यवाणियों के व्याख्याकारों का कहना है कि 2019 में ये भविष्यवाणियां सच साबित हो सकती हैं.


आइए जानते हैं 2019 के लिए नास्त्रेदमस ने क्या भविष्यवाणियां की हैं-
तृतीय विश्व युद्ध का आगाज-

नास्त्रेदमस ने 1555 में अपनी कविताओं में किसी बड़े वैश्विक संघर्ष का इशारा कर दिया था. नास्त्रेदमस ने लिखा था-

“In the city of God, there will be a great thunder
Two brothers torn apart by Chaos while the fortress endures
The great leader will succumb
The third big war will begin when the big city is burning”


स्कॉलर्स का मानना है कि इन पंक्तियों में यूएस और नॉर्थ कोरिया, यूएस और रूस के बीच तीसरे विश्व युद्ध का संकेत छिपा हुआ है. कई लोगों ने अनुमान लगाया है कि तीसरे विश्व युद्ध के साथ इस सदी की सबसे बड़ा आर्थिक संकट भी आएगा.
नास्त्रेदमस की भविष्यवाणी के मुताबिक, तीसरा विश्व युद्ध दो सुपरपावर के बीच होगा और यह युद्ध 27 वर्षों तक चलेगा.


एस्टरॉयड से मानवता पर होगा प्रहार-नास्त्रेदमस के मुताबिक, एक सूर्य ग्रहण के दौरान गर्मी की सबसे अंधेरी रात होगी. जब सूर्य पर पूरी तरह से ग्रहण लग जाएगा तब एक आकाशीय पिंड गिरेगा. इस राक्षस को दिन के उजाले में भी देखा जा सकेगा. इन पंक्तियों की व्याख्या करने वाले स्कॉलर्स का कहना है कि धरती पर आकाश से कोई पिंड गिरेगा जिससे विनाश होगा.


नास्त्रेदमस ने भविष्यवाणी की है कि 2019 में मानवता को किसी एस्टरॉयड के प्रभाव को झेलना पड़ेगा. इसके साथ-साथ न्यूक्लियर वार और प्राकृतिक आपदाओं की भी आशंका रहेगी.


नास्त्रेदमस की कविताओं की व्याख्या करने वाले एक वीडियो में बताया गया है कि आसमान में एक धूमकेतु दिखने की घटना के साथ भयंकर हिंसा की घटनाएं भी होंगी. न्यूक्लियर आतंकवाद और प्राकृतिक आपदाएं हमारी धरती का विनाश कर देंगे.


जलवायु परिवर्तन से बदल जाएगी पृथ्वी की सतह-

धरती का बढ़ता तापमान, गलते ग्लेशियर और बड़े हरिकेन की वजह से 2019 में धरती पर हलचल मचती रहेगी.

नास्त्रेदमस ने जलवायु परिवर्तन के खतरनाक असर के बारे में भविष्यवाणी करते हुए लिखा था- हम जल के बढ़ते स्तर और पृथ्वी को इसके नीचे बहते हुए देंखेंगे.


जलवायु परिवर्तन से कई बड़े युद्ध और संघर्ष छिड़ेंगे और लोगों के बीच संसाधनों और मास माइग्रेशन को लेकर विवाद बढ़ते जाएंगे.


लोग जानवरों से बात करना शुरू कर देंगे-
यूट्यूब चैनल अनएक्सप्लेन्ड मिस्ट्रीज के मुताबिक, नास्त्रेदमस ने भविष्यवाणी की है कि जानवर और मानव के बीच भविष्य में एक अविश्वसनीय संबंध कायम हो जाएगा. लोग जानवरों के ज्यादा नजदीक होते जाएंगे और शायद उनसे बातचीत भी कर सकेंगे.


चैनल की व्याख्या के अनुसार, मानव एक-दूसरे की अपेक्षा जानवरों के ज्यादा करीब होंगे. "The pigs will become brothers to man” कुछ लोगों का कहना है कि इसका अर्थ है कि मानव जानवरों की बलि देना बंद कर देंगे जबकि कुछ लोग इसकी व्याख्या करते हैं कि तकनीक की मदद से लोग जानवरों से भी संवाद करने में कामयाब होंगे.


नास्त्रेदमस की भविष्यवाणी के मुताबिक, 2019 में कुछ यूरोपीय देश खतरनाक बाढ़ की चपेट में आएंगे. इसके अलावा जो देश बाढ़ की त्रासदी से परेशान होंगे, उसमें हंगरी, इटली, चेक गणराज्य और ब्रिटेन का नाम शामिल है. यूरोपीय देश और यूएस ना केवल इमिग्रेशन की समस्या को लेकर जूझेंगे बल्कि इन पर कई आतंकी हमले होने की भी आशंका है.


अमेरिका के अलग-अलग हिस्सों में हरिकेन आएगा जो भयंकर तबाही मचाएगा. ग्लोबल वॉर्मिंग से कई सशस्त्र संघर्ष होंगे. यूएसए के लोगों को बड़े भूकंप के लिए तैयार रहना होगा. यह भूकंप काफी तबाही मचाने वाला होगा. अपनी रणनीति से चीन दुनिया का नया नेता बन जाएगा.


नास्त्रेदमस की भविष्यवाणी के मुताबिक, मध्यपूर्व देशों और दुनिया के कुछ अन्य हिस्सों में भी धार्मिक अतिवाद बढ़ेगा जिसकी परिणति अशांति और गृहयुद्ध के तौर पर होगी. कई लोगों को अपना देश छोड़कर दूसरे देशों में शरण लेने को मजबूर होना पड़ेगा।

सरकुम:
2019 सरकार मेरी होगी।
2019 जनसंख्या बढ़ेगी।
में ऐसा ही रहूँगा ओर मेरी फरियाद न होगी।

#2018 जैसा भी गया हो,2019 आप चाहेंगे वैसा ही रहेगा।
Love you

Sunday, December 23, 2018

एक बच्चे की बात...


आपने हंसमुख लोग तो बहुत देखे होंगे। बात-बात पर हंसने वाले लोग भी देखे होंगे, लेकिन अगर आपके सामने कोई लगातार बस हंसता ही रहे तो? यकीनन आप उसे पागल बोलेंगे। लेकिन आज जो बात हम आपको बता रहे हैं, ये वाकया बहुत अलग है। इंग्लैंड की खबर ने सबके होश उड़ा दिए हैं। यहां एक 2 साल के बच्चे को आ रहा दौरा हर किसी के दिमाग को सन्न कर रहा है। चलिए आपको बताते हैं क्या है पूरा मामला। 

इंग्लैंड के सोमरसेट में एक बेहद ही हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है। यहां 2 साल के बच्चे के साथ कुछ ऐसा हुआ जिसने हर किसी को हैरान कर दिया। यहां बच्चे के लगातार हंसने का मामला सामने आया है। बच्चे की हंसी पिछले 17 घंटे से नहीं रूक रही थी। बच्चे को 17 घंटे तक लगातार हंसता हुआ देख माता-पिता डर गए। उन्होंने बच्चे को डॉक्टर के पास ले जाना जरूरी समझा।

माता-पिता जब बच्चे को डॉक्टर के पास लेकर गए तो सामने आई वजह चौंकाने वाली थी। दरअसल, डॉक्टर ने बच्चे का सिटी स्कैन किया, सिटी स्कैन से पता चला कि वह ब्रेन ट्यूमर का शिकार है। ब्रेन में ट्यूमर होने की वजह से उसके दिमाग में लगातार हलचल पैदा हो रही थी। इसी वजह से बच्चा पिछले 17 घंटे से लगातार हंसते ही जा रहा था।
डॉक्टर का कहना है कि ऐसे केस बहुत कम देखने को मिलते हैं। इससे जान जाने का भी खतरा होता है। अगर इस ट्यूमर को जल्द से जल्द नहीं हटाया गया तो बच्चे की जान को भी खतरा हो सकता है। हालांकि बच्चे का ट्यूमर शुरूआती स्टेज में था इसलिए ऑपरेशन के जरिए इसे बाहर निकाल लिया गया। अब बच्चा पूरी तरह से सुरक्षित है और उसे हंसने के दौरे नहीं आते हैं।

सरकुम:
कुछ दर्द ऐसे जिसे निभाना पड़ता हैं।
कुछ दर्द ऐसे जिसे निभाने में ही खुशी होती हैं।

Friday, December 21, 2018

सुंदरता या...



नमस्कार दोस्तों आप सभी का एक बार फिर से मेरे लेख में स्वागत है, तो दोस्तों जैसे की आप सभी तो जानते ही है की इस दुनिया में कितने प्रकार के लोग रहते है और हर एक प्रकार के लोग जो है उनका रहन सेहन और सभी कुछ अलग अलग होता है. तो आज जो तस्वीरें में आप सभी के सामने ले कर आया हुं उन्हें देखकर आप सभी की समझ में भी आ जायेगा की जैसे आज के जमाने में महिलाये मेकअप करती है और अपने आप को सुंदर सोचती है तो वैसे ही दुनिया में कई ऐसी प्रथाएं है जिन्हें अगर कोई देख ले तो हैरान ही रह जाए ये देखकर की महिलाओ को सुंदर दिखने के लिए क्या क्या करना पड़ता है. चलिए दोस्तों तो शुरू करते है और दिखाते है आपको कुछ ऐसी ही तस्वीरें.


दोस्तों अापने लोगों को देखा होगा जो की ऐसी लड़की ढूंढते है जो की सुंदर हो और सुंदर से उनका अभीपराये होता है की गोरी हो और सुंदर हो देखने में. पर हर जगह ऐसा नहीं होता है, इंडोनेशिया में एक ऐसी जगह है जहाँ पर आज भी महिलाओ की सुंदरता को उनके दाँतो के हिसाब से आँका जाता है. जिस महिला के दाँत जितना नोकीले होंगे वो महिला उतनी ही सुंदर. और अपने दाँतो को ऐसे करवाने के लिए महिलाओ को गांव में ही किसी ऐसे आदमी के पास जाना पड़ता है जो की ये काम करता हो. और इस काम को किसी डॉक्टर द्वारा ढंग से नहीं बल्कि एक तेज़ धार हथियार और हथोड़े से किया जाता है. अभी आप खुद ही अंदाजा लगा लो की इसमें कितनी ज्यादा तकलीफ़ होती होगी.

आज भी पतली कमर की औरतों को ज्यादा सुंदर माना जाता है मतलब की औरत की सुंदरता का आकलन जिस आधार पर किया जाता है ये उसका एक हम हिसा माना जाता है. पर क्या आप में से कोई ये जानता है की पहले के समय में औरतों को पतली कमर पाने के लिए क्या क्या करना पड़ता था. कुछ महिलाये तो ऐसी थी जिन्होंने एक ऐसे कपड़े को हमेशा पहन कर रखा होता था जिससे की उनकी कमर उस जैसी हो जाए और जैसी शेप वो अपनी कमर को देना चाहती है वैसी हो जाए. में तो ये सोच भी नहीं सकता हुं की महिला को अपना जीवन जीने में ऐसे में कितनी ज्यादा दिक्कत आती होगी. सास भी लेना मुश्किल हो जाता होगा ऐसे में महिला का.

दोस्तों सबसे ज्यादा दर्दनाक जो है वो यही है, चीन में एक ऐसा समय था जब ऐसी महिलाओ को सुंदर का दर्जा दिया जाता था जिनके पैर छोटे हो और ऐसे आगे से बिलकुल ही पतले. और इसे चायनीज़ फुट बाइंडिंग कहाँ जाता था. और आप कभी अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते हो की ऐसे जूते पहन पहन कर महिलाओ के पैरो का हाल क्या हो जाता था. अगर आप इंटरनेट के ऊपर सर्च करोगे और देखोगे, तो आपको समझ आएगा की ऐसे जूते पहनने के चक्कर में महिलाओ के पैर ऐसे हो जाते थे जिसका कोई हिसाब ही नहीं है. मुझे तो देखकर ही डर लग गया है था जब मैंने इनके पैर देखे थे. में तो ये सोच रहा था की जिस महिला के साथ ऐसा हुंआ होगा उसका हाल क्या हुंआ होगा.


हर लड़की का एक सपना होता है की उसका राजकुमार आएगा और उसे ब्याह कर अपने घर ले जायेगा. पर अगर लड़की सुंदर ना हुयी तो फिर उसे अच्छा लड़का कभी भी नहीं मिलता है. तो ऐसे में जो होता है वो तो आप सभी के सामने ही है, म्यांमार में एक ऐसा स्थान है जहाँ पर लड़कियों की सुंदरता का आकलन उनकी गर्दन की लम्बाई देखकर लगाया जाता है. जितनी लम्बी गर्दन होगी उतनी ही लड़की सुंदर होगी. और अपनी गर्दन को लम्बी करने के लिए यहाँ पर महिलाये हर समय अपनी गर्दन में ऐसे स्प्रिंग डाल कर रखती है ताकि उनकी गर्दन लम्बी हो जाए. और मर्दों की इस इच्छा को पूरी करने के लिए ये महिलाये अपने आप को हर दिन इतना कष्ट में रखती है. मुझे तो देखकर ही बुरा लग रहा है तो जिसके साथ होता होगा ऐसा उसका हाल क्या होता होगा.

दोस्तों दुनिया में भी कैसे कैसे लोग रहते है ये तो सोचने की बात है, पर कुछ लोग तो ऐसे है जिनकी ये प्रथाएं तो बिलकुल ही अलग है. जैसे की अफ्रीका में एक ऐसी जगह है जहाँ पर ऐसे लोग रहते है जो की अपने होठ के आकार से आकलन करते है की वो कितने सुंदर है. जैसे की आप देख रहे है इस महिला को, इस महिला की शादी जब होगी तो इसके होंठ के बीच में ये जो बड़ा सा गोला लटका रखा है इसी के आधार पर होगी की उसके होंठ में कितना बड़ा गेप है. अभी आप बताओ दोस्तों की आपके साथ ऐसा हो तो आपको कैसा फील होगा. ये तो अच्छा है हम भारत में पैदा हुंए हुंए है नहीं तो ऐसी चीज़े तो हम लोग झेल ही नहीं सकते है.

सरकुम:

प्यार विचारो से ओर उद्देश्य के साथ हो तो प्यार हैं।अगर शारीरिक सुंदरता का मोह हैं तो कभी आप विश्वास को नहीं जीत सकते।

Sunday, December 2, 2018

प्लास्टिक सर्जरी...

डॉक्टर डेविड मैट्लॉक का नाम अमेरिका के जाने माने प्लास्टिक सर्जनों में शुमार है. लॉस एंजेलिस में इनका बड़ा सा क्लिनिक है. इनका स्पेशलाइजेशन लेज़र वजाइनल रिजुवनेशन है और सिर्फ अमेरिका ही नहीं, बल्कि डेविड ने दुनिया के 70 से ज़्यादा देशों से पेशंट्स देखे हैं. हॉलीवुड के कई मशहूर सितारे भी इनके पेशंट रहे हैं.
डॉ. डेविड मैटलॉक
डेविड अपनी सर्जरी की तकनीकें खुद ही डिज़ाइन करते हैं. यही तकनीकें उन्होंने आज़माई अपनी पत्नी वेरॉनिका पर. उन्हें अपने सपनों जैसी सुंदर बनाने के लिए.
वेरॉनिका और डेविड की पहली मुलाकात डेविड के क्लिनिक में हुई. बेटी इसाबेला को पैदा करने के बाद वेरॉनिका वजाइनल रिजुवनेशन करवाने आई थीं. डेविड ने उनसे पूछा कि क्या वह एक ‘वंडर वुमन मेकओवर’ भी करवाना चाहेंगी? जिसमें शरीर के अलग हिस्सों का लाइपोसक्शन (चर्बी निकालना) होता है. डेविड कहते हैं, ‘मैं जो कुछ करना चाहता था, वह उन सबके लिए तैयार थी. यहां तक की शादी भी.’ पहली डेट पर ही डेविड ने वेरॉनिका को शादी के लिए पूछ लिया.
पहले ऐसी दिखती थींं वेरॉनिका
डेविड खुद अपने लुक्स और बॉडी का खास ध्यान रखते हैं. उन्होंने कई बार अपनी सर्जरी खुद की है. इसके अलावा वह रोज़ एक्सरसाइज़ करते हैं, और हेल्दी खाना खाते हैं. पति-पत्नी ने एकसाथ कई बॉडी-बिल्डिंग कॉम्पिटिशन में हिस्सा भी लिया है. वेरॉनिका कहती हैं, ‘डेविड का यह जुनून ही मुझे मोटिवेट करता है. मुझे ध्यान रखना पड़ता है कि कहीं वह मुझसे सुंदर न दिखें.’ वह यह भी कहती हैं कि वह खुद को डेविड की काबिलियत का चलता-फिरता प्रमोशन समझती हैं.
अब पति के साथ बॉडी बिल्डिंग कॉन्टेस्ट में भाग लेती हैं
वेरॉनिका की बेटी इसाबेला 9 साल की हो गई है. लेकिन अपने पैरेंट्स की तरह उसे इन चीज़ों की बिल्कुल परवाह नहीं है. उसका कहना है, ‘मैं कभी सर्जरी नहीं कराऊंगी. मुझे यह सब बहुत फर्ज़ी लगता है. मैं जैसी हूं वैसी ही रहना चाहूंगी.’
बेटी इसाबेला
Btv के एक इंटरव्यू में जब वेरॉनिका से सवाल किया गया कि क्या डेविड को उनसे ज़्यादा उनके लुक्स की परवाह है? वह कहती हैं नहीं. ‘जब मैं पहली बार डेविड के पास आई थी तो मेरा वज़न कुछ दस किलो ज़्यादा था. लेकिन उसे मुझे देखते ही मुझसे प्यार हो गया था. वह मेरे लुक्स से ज़्यादा मुझे चाहता है.’ इस पर डेविड कहते हैं कि वे मरते दम तक वेरॉनिका के साथ रहना चाहते हैं। ओर इसी लिए वो सबसे सुंदर और ड्रीम के साथ हिने का अहसास पाने के लिए वो मेरे लुक को निखारते रहते हैं। आज तक सबसे अधिक प्लास्टिक सर्जरी करने के रिकॉर्ड ओर सबसे अधिक प्लास्टिक सर्जरी करवाने का रिकॉर्ड अर्क ही परिवार में हैं।

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दिखावे से प्यार नहीं होता।
प्यार समर्पण और भाव से होता हैं।
जिसका समर्पण अधिक हैं, उसे अधिक प्यार देना सत्य हैं। सत्य यह भी हैं कि किसी भी हालत में समान समर्पण उपासना से कम नहीं हैं। जो आपमें हैं।

Thursday, October 25, 2018

प्यारे दिल



तू मेरे जिस्म का सबसे ख़ास हिस्सा है,
बात सच्ची है मेरी नहीं कोई किस्सा है।

मानता हूं! मैंने तुझे, कई बार तोड़ा है,
मगर तेरे लिए ही, बहुत कुछ छोड़ा है।

ए दिल मेरे! तू जब जब मुझसे हारा है,
तूने आज तो नहीं, मेरा कल सवांरा है।


सरकुम:
मेरा दिल मेरा नहीं रहा,
इस बात को मैने कहीं नहीं कहा।

Saturday, October 20, 2018

मेरा प्यार गणेशा...

मेरे पास प्यार हैं।
मेरे पास गणेश जी हैं।
मेरे पास गणेश जी का प्यार हैं। डीसा में एक गणेश मंदिर हैं। में कई सालों से में दर्शन करने जा रहा हूँ। आज भी गया।आज कुछ बिचार से गणेश जी के मंदिर में स्थित मूर्ति देख रहा था। आज बहोत देर तक देखने के बाद मुजे मालूम हुआ की, इसी मंदिर में गणेश जी के साथ रिद्धि ओर सिद्धि को भी स्थापित किया गया हैं।

2001 से गणेश जी ने मुजे आशीर्वाद दिए हैं। जहाँ भी रुका हूं, जहा भी टूटा हु बस, गणेश जी ने मुजे रास्ता दिखाया हैं। आज एक ऐसा काम लेके निकला हु, पहले कुछ लोग जुड़े थे। इन्हों ने मेरे पीछे कुछ ऐसा किया उन्हें छोड़ना पड़ा। आज भी अब वो मेरे साथ नहीं हैं कुछ लोग मानने को तैयार नहीं हैं। मगर गणेश जी केलिए मेने डीसा से एथॉर चलकर गया था। तब मुजे शांति मिली थी। जब में बेचेंन होता हूं गणेश जी पे छोड़ता हु। वो जो हुकुम करते हैं,वैसे आगे बढ़ता हु।

सरकुम:

जय गणेश

Thursday, October 11, 2018

सर सन्मान...आज मेरा कल आपका...


स्टेट इनोवेशन ऐंड रिसर्च फाउंडेशन, सोलापुर महाराष्ट्र के सर सन्मान में जाना हुआ। 2006 से ऐ फाउंडेशन महाराष्ट्र और देश के अन्य राज्यों के इनोवेशन को खोजने ओर प्रस्थापित करने में सक्रिय हैं। आईआईएम अमदावाद, सृष्टि इनोबेशन ओर हनी बी नेटवर्क से जुड़कर इस संस्थान ने अपना नाम राष्ट्रीय फलक पर फैलाने में सफलता हांसिल की हैं।
सोलापुर डिस्ट्रिक्ट के अक्कलकोट में नेशनल एज्युकेशन इनोबेशन कॉंफ़र्न्स का आयोजन हुआ। मुजे इस कॉंफ़र्न्स मे शामिल होने का अवसर प्राप्त हुआ।
सिद्धाराम जी मशाले और बाला साहब बाघ ओर राज्य के विविध जिल्ला आयोजको के द्वारा अक्कलकोट में भव्य कॉंफ़र्न्स संभव हुई।
मुजे सर सन्मान से सन्मानित किया गया। मेरे लिए गौरवपूर्ण बात हैं कि भारतमें सबसे पहला सर सन्मान मुजे प्राप्त हुआ हैं। आज से मुजे आप प्यार से सर भावेश पंड्या कह सकते हैं। इस यरे से सन्मान के लिए में सर फाउंडेशन का शुक्रिया अदा करता हूँ।


सरकुम:
2014 में डॉक्टर का सन्मान
2018 में आप के द्वारा सर सन्मान
2018 का सन्मान मेरे लिए महत्वपूर्ण हैं। मेरे समग्र देश में शिक्षा से जुड़े 'सरकार के शिक्षक' द्वारा किये गए नवाचार के प्रतिनिधि बनना महत्व पूर्ण हैं। में नव विचारक भले नहीं हूं, में सरकार का मुलाजिम हूं, ओर मुजे उस पर गर्व हैं।

Tuesday, October 9, 2018

काम का नशा


आज एक ट्वीट देखने मे आई।श्री अमिताभ बच्चन जी ने इसे ट्वीट किया था। कोन बनेगा करोड़पति के स्टूडियो से सेट के फोटो के साथ उन्होंने लेख था।

में नशे में हूँ।
काम के नशे के बारे में उन्होंने लिखा हैं।
में भी कुछ दिनों से काम के प्रति कुछ उलझ रहा था। कुछ न सोच सकता था, न कुछ समज सकता था। क्या करूँ,कहा से करू कैसे करू, अकेला आगे बढ़ने का आयोजन करू या किसी कप साथ जोडू। इन सबके बीच दो चीजें मेरे साथ रही। एक वॉर्नर बफेट की मैनेजमेंट की किताब ओर बच्चन सर की एक ट्वीट। काम रुक जाएगा तो सबकुछ रुक जाएगा। जो छूटना हैं, छूटेगा जो जुड़ना हैं वो जिद जाएगा। यकीन रखो अपने कार्य पर, अगर तुम रुके तो सब रुक जाएगा। जो तेरा हैं उसे पाने में जो हो रहा हैं उसे मत रोका करो।
भूत नाथ फ़िल्म का एक गाना हैं...
बच्चन सर की ट्वीट से भी उसे जोड़ा जा सकता हैं। बहोत साल तक ये मेरी कॉलर ट्यून थी। आज फिर से उसे चालू करवा रहा हु ।
चलो जाने दो...
अब छोड़ो भी....


Thanks बच्चन सर...

सरकुम:
शो मस्ट गो ओन...
हम न रहेंगे,तुम न रहोगे,फीरभी रहेगी निशानियां....
(ये गाना एक बार मनमें गालेना...)

Sunday, October 7, 2018

सोच कर सोच...


हम सभी मनुष्य हैं। मानव को मानव जाति की पेशकश करनी पड़ती हैं। कुछ अच्छा करने के लिए कुछ बुरा भी सहन करना पड़ता हैं। किसी भी व्यक्ति को कुछ सहकार देना महत्वपूर्ण हैं। किसी ने जो काम शुरू किया हैं,अगर आप उसका हिस्सा हैं तो सहकार देना आपकी जिम्मेदारी बनती हैं।
 भले ही आप स्वयं के बारे में सोचते हैं, वही तथ्य तब सच हैं कि आप दूसरों के बातें में भी सोचते हो। कोई सिर्फ अकेला अपने बारे में नहीं सोच सकता। आप उनके लिए जरूरी है, और उनसे जुड़कर कार्रवाई करने में आप उन्हें अपने स्वयं के विचारो पे परोए ओर नए पथ की खोजने में भी मदद करे,ऐसा करने से  एक अंतर भी बना रहेगा और साथ भी मिल पायेगा। 
दूसरों की बात करने में आसान हैं।
सामने बाले को समझना भी आवश्यक हैं।साथ में सोचने से आपको एक उद्देश्य मिल जाता है। हम सभी को होने के लिए, साथ रहने के लिए एक कारण की आवश्यकता है, और प्रसिद्धि और भाग्य आमतौर पर पर्याप्त नहीं है।एक व्यक्ति के बजाय दो का समूह भी सबसे छोटा मगर समूह में माना गया हैं। अच्छा ये हैं कि आप सजा देने के योग्य थे, ओर आप ने माफ कर दिया। आपको इससे विशेष प्रकार की ऊर्जा मिलती है, जो कि लोगों को खुद को और दुनिया को बदलने में सक्षम बनाता है।
आप जो कर रहे हैं उससे कुछ पाने के लिए भी ठीक है, और आप करेंगे अपने आप को स्वयं सुजाव देने से आपके जीवन में नए लोग आएंगे यदि आप अकेलापन महसूस करते हैं, तो यह एक बड़ा अंतर बना ने के लिए काफी हो सकता है।
यदि आप अपनी सकारात्मक ऊर्जा रखने के लिए एक जगह की तलाश कर रहे हैं, तो भीतर देखो और फिर अपने समुदाय में क्या हो रहा है यह देखने के लिए आगे देखो। एक विशाल परियोजना को लेने के लिए छोटे पैमाने पर शुरू करना बहुत आसान है जहां भी आप शुरू करते हैं ठीक है बस कर दो।
जैसा कि विनोदी और लेखक लियो रोस्तेन ने कहा, "मुझे विश्वास नहीं होता कि जीवन का उद्देश्य खुश होना है। मुझे लगता है कि जीवन का उद्देश्य उपयोगी होना, जिम्मेदार होना, दयालु होना है। यह सब से ऊपर है, बात करने के लिए, गिनती करने के लिए, कुछ के लिए खड़े होने के लिए, कुछ अंतर करने के लिए कि आप सभी से पर रहते हैं। " आप की सोच ही आप को बुलंदी तक पहुंचा सकती हैं।

सरकुम:
सोच
कैसी सोच।
मेरी ही सोच।
मेरी अपनी सोच।
अपने अहसास की सोच।
में सोचूंगा,क्यो की सोचना और खोजना मुजे पसंद हैं।
सिर्फ सोच तो हैं, जो सवाल करके जवाब भी दे सकती हैं।