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Thursday, March 15, 2018

उल्टी यात्रा दांडी से साबरमती...


कुछ दिनों पहले की बात हैं।
उस दिन दांडी यात्रा को 88 साल खत्म हुए।गांधी बापू से जुड़ी संस्थाओ ने अपने अपने तरीको से उस दिन को याद किया।
मेरे एक दोस्त हैं। 
मयूरध्वजसिंहजी महाराउल।जो अंकलेश्वर के पास अंदाडा गांव में रहते हैं। व्यावसायिक तोर पे वो इजनेर हैं।उन्होंने इंजियरिंग की पदवी लकधरीसिंह इंजिनयरिंग कॉलेज,मोरबी से प्राप्त की हैं।पिछले दस सालो से वो पीडिलाइट कंपनी में हैं। वो आज कंपनी में  ऑफिसर के रूपमें पूरे दक्षिण गुजरात  जिम्मेदारी निभा रहे हैं।अच्छी तनख्वा से अच्छे विचार नहीं आते।कुछ दरियादिली भी चाहिए।अपने पिता को बचपन में ही खो चुके थे।अपनी 15 वर्ष की आयु में वो अपने पिता की छत्रछाया खो चुके थे।उनकी माता जी ने मयूरध्वज जी के साथ दोनों भाई बहनों को पाला,बड़ा किया। उनकी बहन तेजस्विनी जी आज युवकों से जुड़े संगठन से जुड़ी हैं।कार्यरत हैं।कुछ महीनों पहले की बात हैं।
मयूरध्वज जी को पेरमें चोट लगी थी।करीबन छे महीनों तक उन्हें आराम करना पड़ा।कहते हैं कि कुछ दिन ऐसे होते हैं,की उन दिनों में  किये गए संकल्प हमे चेन नहीं लेने देते।मयूरध्वज जी ने ऐसा ही संकल्प किया।जब वो चल नहीं पाते थे।उन्होंने दांडी के मार्ग पर चलने का सोचा। गांधीजी ने नमक के ऊपर अंग्रेजो ने लगाया हुआ शेष न भरने ओर अपने अधिकारों को समजाने के लिए दांडी यात्रा की थी।आज भी लोगो को ऐसा लगता हैं कि दांडी में नमक का उत्पादन होता होगा।मगर आज ओर पहले भी कभी दांडी में नमक का उत्पादन नहीं हुआ हैं।
अंग्रेजो को था कि गांधीजी यहां कहां से नमक लाएंगे।मगर उनके किसी सहयोगी ने थोडासा नमक का ढेर संभाल के रखा था।बापू ने उस ढेर से थोड़ा नमक लिया।इस घटना ने गांधी के प्रति विश्वास बढ़ा दिया।
उस विचार को ओर गांधी जीवन को आज भी बहोत लोग अपना रहे हैं।वैसे ही एक युवान मयूरध्वजसिंह जी ने एक संकल्प लिया हैं।वो दांडी यात्रा के सभी गाम में जाके सद्भाव की बात फैलाने का काम कर रहे हैं।इस रास्ते में जो भी गाँव आएंगे और जिस गाँव में समरस पंचायत है वहां के सरपंच ओर ग्राम जनों से मिलके वो गाँव के बारे में जानकारी लेंगे।
वैसे तो दांडी से निकल कर वापस साबरमती आने का रास्ता एकदम उल्टा हैं।मगर मयूर जी ने ये रास्ता इस लिए लिया क्योकि उन्होंने सोचा था कि जहाँ समरस पंचायत हो वहाँ जाएंगे।सभीको जानकर ये खुशी होगी कि दांडी गाँव में आजतक सरपंच का चुनाव नहीं हुआ हैं।और इसी किये सद्भाव ओर समरसता की बात के लिए उन्होंने वहां से ये काम किया। में चाहता हु की वो इस प्रवास को किताब के स्वरूप में तैयार करें।
आज भी उनके पैरों में दिक्कत हैं,आशा हैं वो सुखरूप अपना अध्याय खत्म करेंगे।


@#@
जो सोचते हैं।
वो सोचते हैं,जो जिम्मेदार हैं।
वो,सोचते भी हैं और करते भी हैं।
परिणाम सदैव सफलता के साथ नहीं आता।कभी हमे आगे की व्यवस्था के लिए असफलता भी सहायक होती हैं।

Sunday, March 4, 2018

Smile & स्माइल...

एक ऐसा शब्द हैं जिसका मतलब हमे मालूम ही हैं।हमारी वजह से कभी किसी को दुःख पहुंचता हैं।कभी हमारे कारण किसी को खुशिका अहसास होता हैं।
कुछ साल पहले सभी के चहरे पर स्माइल दिखे ऐसी सोच डॉ अनिल गुप्ता ने रखी।बात तो छोटी थी मगर उसे अमल करना मुश्किल था।
धीरे धीरे बात बढ़ती गई।अमदावाद म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ओर वाघबक़री चाय का सहयोग मिला।सहयोग मिला मगर अब काम क्या करना था वो भी तय करना था।
आईआईएम अमदावाद के सामने वाले ब्रिज के नीचे की जगह को कॉर्पोरेशन से लिया गया।सृष्टि ओर स्वयं अनिल गुप्ता के मार्गदर्शन में इसे स्कूल के योग्य बनाया गया।
यहाँ आइसोलेटेड विस्तार से बच्चे  आने लगे।चेतन,सागर,हिरल ओर अन्य साथियों ने इस के लिए काम किया।बच्चे आने लगे,बच्चे पढ़े इस लिए iim ओर अन्य विद्यार्थीओने जिम्मेदारी ली।को कब पढ़ाने आएगा,क्या पढ़ायेगा आए सारी तैयारी हो चुकी थी।डॉ अनिल गुप्ता चाहते थे कि यहां बच्चे आये और अपनी शिक्षा को अच्छे से प्राप्त करे।
बस,सारी टीम उसमें जुड़ी।हमने इस सेंटर के लिए बुक्स इकठ्ठा की।सारे गुजरात और बाहर से हमने किताबो को भेटमें लिया।करीब करीब 3 हजार किताबे जो बच्चे इस्तमाल कर पाए वैसी हमने इकठ्ठा की।
कुछ दिनों पहले मेरा स्माइल सेंटर में जाना हुआ।में ओर चेतन दोनों साथ थे।बच्चो से बात की,उनकी बातें सुनी।एक छोटा विचार आज आईआईएम के सामने खड़े होके अपना भविष्य बना रहे हैं।

Thanks

#AMC
#anil gupta
#वाघबक़री चा
#IIM के स्टूडेंट
#smile के वोलिएन्टर

Friday, October 6, 2017

हमारी सोच...








लाओ तुम्हारे बच्चे,इंसान बनादेगें।
लोग पूजेंगे ऐसे,भगवान बनादेंगे।
बच्चो को हम क्या सीखने के लिए भेजते हैं।अरे,आजकल की शिक्षा व्यवस्था को देखके लगता हैं, हम बच्चो को रट्टा मारने का सीखने के लिए भेजते हैं।हमे शिखना चाहिए सवाल करना।हमे सिखाना चाहिए सवाल को समझना।
कहते हैं कि सही शिक्षा व्यवस्था वो हैं जो ख़्वाब देखने का सिखाये।ये चित्र।छोटा बच्चा वाला चित्र दो व्यक्ति को दिखाया गया।एक्ने कहा,ये बच्चा ऐसी चीजको पकड़ने जा रहा हैं जो उसकी कभी उसकी न होगी।न कभी उसके साथ टिकेगी।इस चित्रको देखके किसी दूसरी व्यक्तिने बताया कि कोई भी बाहरी आक्रमण के सामने जितने की इच्छा ये बच्चा रखता हैं।वैसा बच्चा दिखता हैं।
जैसे चित्र एक मगर नजरिये के हिसाब से जवाब अलग अलग हैं,बस उसी तरह हमारी जिंदगी भी वैसी हैं।हम ये तय न करे कि क्या नहीं कर सकते।हमे ये तय करना होगा कि हम क्या कर सकते हैं।जो हम ठान ले तो सबकुछ हो सकता हैं।मगर आपको बस एक बार तय करना हैं।
मेरी जिंदगी,मेरी सोच...

Thursday, October 5, 2017

Bनोवेशन...


हमारे करीब।
हमारे आसपास।
हमारे लिए ओर हमारे सहयोग से,कुछ न कुछ नया होता हैं।कई चीजें ऐसी होती हैं जो कोई व्यक्ति से जुड़ी होती हैं।
ऐसी बातोंका अगर प्रचार प्रसार हो तो कई और भी इसके साथ जुड़ सकते हैं।ऐसा या उसमें भी कुछ नया कर सकते हैं।इसी बजह से एक डॉक्यूमेंट्री का निर्माण हुआ।इस काम में मुजे जुड़ने का मौका मिला।मुजे मेरे काम के बारे में बोलना था।मेने एक एक करके मेरे काम के बारे में बताया।
जब मेरे काम का रिकॉर्डिग खत्म हुआ तो मेरे केमरामेन ने मुजे बताया कि सर आप को इनोवेशन के लिए नही Bनोवेशन के लिए बोले हो ऐसा लगता हैं।आज से मेरे कुछ सहयोगी मेरे कई सारे विडियो को Bनोवेशन के नाम से शेर कर रहे हैं।
#Bनोवेट

Monday, September 18, 2017

तो...पगार कटेगा

आज पोस्टरमें लिखा हैं।आप पढ़ेंगे।अपने आपको सिर्फ हम खुद ही बचा सकते हैं।ये सुनने को ओर स्पिचमें कहने को अच्छा हैं।मगर ये भी हैं कि हम सामाजिक व्यवस्था से जुड़े हैं।कल मेने लिखा था,ऐसे देश के बारे में लिखा था जहाँ एक भी वृद्धाश्रम नहीं हैं।अपने देशमें भी नहीं होने चाहिए।समाज को साथ रखने की जिम्मेदारी सबकी हैं।
कुछ दिनों पहले आसाम के एक मंत्रीजी का निवेदन था।उसमें लिखा गया था की जो माता पिताको वृद्धाश्रम में छोड़ेगा उसकी तनख्वा काट ली जाएगी।दिव्यांग भाई बहन को साथमें न रखने वाले सरकारी कर्मचारी की तनख्वा 10% काटली जाएगी।आज नहीं तो कल...सभी सरकार ऐसा करेगी तो परिणाम अवश्य मिलेगा।
#अनाथ सरकार...

Sunday, September 10, 2017

गाँधी जी की मस्ती...


हम छोटे थे।
एक कहानी हमे कहि जाती थी।
बात ऐसी की एक बार भगवान और राक्षसों ने एक साथ भोजन लेनेका आयोजन किया।सबसे पहले राक्षशो की बारी थी।शर्त ये थी कि अपने हाथ को मोड़ना नहीं हैं।अब राक्षश खड़े होकर खाना उछालने लगे।बात ये बनी की कोई खा न पाया।दूसरे दिन भगवान को न्योता मिला।कई सारे भगवान थे।उनके लिए भी शर्त ये थी कि अपने हाथ नहीं मोड़ने हैं।भगवान एक दूसरे के सामने बैठे।उन्होंने हाथ मोड़े बिना भरपेट खाना खाया।
आज गांधीजी को मजाक बनाया जाता हैं!एक सवाल किसीने किया,किसी ओरने उसका मजाक बनाया!आज ऐ गुमता फिरता मुज तक पहुंचा!क्या आप मानते हैं की किसी बच्चे नें ऐसा जवाब दिया हो?ऐसे कई सवाल पैदा होते हैं!उसके जवाब भी ऐसे हम टी करते फेलाते हैं!गाँधी जी का जन्म कहा हुआ था?बच्चे लिखते हैं 'घर में...'मजाक के लिए ये सब ठीक हैं!मगर मजाक बनाने वालो को ऐसा नहीं करना चाहिए!क्या हया दिया गया पोस्टर और बच्चे के बारें में हम सहमत हैं की उसने ये जवाब दिया होगा?
जो भी हैं,ये गलत हैं!में ये मनाता हूँ की जो बच्चा सवाल पढ़ सकता हैं वो ऐसे तो नहीं लिख सकता!फिरभी आप सबके सामने में विचार आपसे शेर करता हूँ!आज ये गाँधी वाले पोस्टरको देखकर मुजे ये कहानी याद आई हैं।हम इस तरीके से काम करना चाहिए जिससे साथ जुड़ने वाले का ओर हमारा दोनोका भला हो।करेंगे भला,होगा भला।
#मेरा काम,मेरी सरकार

Thursday, August 3, 2017

नेह नेपाल

आज से कुछ साल पहले की बात हैं।हमारे पडोशी देश नेपाल की बात हैं।यहाँ भूचाल आया था।हमारी संस्कृति ऐसी हैं कि हम किसीको दुखी नहीं देख सकते।नेपाल तो हमारा अपना साथी हैं।
भारतमें से कई लोग यहां जाते हैं।मोस्ट फ़ेवरीट कंट्री का नेपाल को हमने स्थान दिया हैं।यहाँ जाने के लिए पासपोर्ट नहीं चाहिए।जब भूचाल आया तो कई भक्तो के गुजरात से भी कई लोग गए थे।sky ट्रांसपोर्ट के मालिक जो पिछले कई सालों से टूर ऑपरेट करते थे।उनसे ये देखा नहीं गया।उस दिन से आज तक वो सेवामें कार्यरत हैं।उन्होंने वहां स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए काम की शुरुआत की।जैसे जैसे समय बीतता गया।लोग जुड़ते गए।
विश्वग्राम,स्काय फाउंडेशन,सृस्टि इनोवेशन इर आईआईएम जैसी संस्थाए भी इस काम में जुड़े।जुड़ते गए।
मुजेभी उनसे जुड़के काम करनेका मौका मिला।नेपाल से चुनिंदा अध्यापक भारत और गुजरात आये।
आईआईएम अमदावाद ओर सृस्टि के सहयोग से हमारा मिलाप हुआ।उनकी समस्याओं के बारे में समज ने का प्रयत्न किया।उनसे बात करते हुए मुजे मालूम पड़ा कि उनकी स्कूलमें प्रार्थना सभा जैसा कुछ नहीं हैं।मेने जब इस विषय पे चर्चा की।मेने कहा, गुजरात मे 1500 से अधिक बच्चे एक साथ बैठे होते हैं।समूह में प्रार्थना करते हैं।वो ये बात मानने को तैयार नहीं थे।उनको ऐसी दो तीन स्कूल की विजिट भी करवाई।
गुजरातमें 'संजय तुला' ओर विश्वग्राम के सहयोग से sky फाउंडेशन के साथ ये काम हो रहा हैं।गुजरात से स्कूल क्रिएटिविटी के लिए एक्सपर्ट ओर पाठ्यपुस्तक निर्माण से जुड़े श्री जयेश पटेल और श्री प्रकाश सुथार भी उनके तालीम कार्य से जुड़े हैं।
कुछ हो रहा हैं।
जो होगा अच्छा होगा।
आप का सहयोग आवश्यक हैं।
सहयोग के संपर्क हेतु आप श्री कौशिक जी से संपर्क करें।

Wednesday, July 26, 2017

GPSC...UPSC & SEB

गुजरात कई तरीके से अदभूत हैं!पिछले कुछ सालोंसे शिक्षामें कुछ नवाचार अमली हुए हैं!आज हम वंदे गुजरात की 16 चेनल के लिए चर्चा करेंगे!राज्य परीक्षा बोर्ड जिसे अंग्रेजी में स्टेट एक्जामिनेशन बोर्ड(SEB) भी कहते हैं!
कक्षा 5 से 12 तक कि कुल आठ चेनल शिक्षा के लिए दी गई हैं!सभी कक्षा के लिए उपयोगी और महत्वपूर्ण जानकारी इस चैनल के माध्यम से दी जाती हैं!पाठ्यपुस्तक के लेखन से जुड़े हुए एक्सपर्ट के द्वारा यहाँ जानकारी दी जाती हैं!डायरेक्ट टू होम(DTH)पर निशुल्क उपलब्ध हैं!
5 से लेकर 8 नंबर की चेनल के साथ काम करनेका मुजे मौका मिला हैं!श्री प्रफुल जलु SEB के अध्यक्ष हैं!जिन्होंने जाहिर परीक्षा के लिए खास कार्यक्रम बनवाये थे!वो कार्यक्रम भी ऐसे की शिष्यवृत्ति की परीक्षा हो,GPSC या UPSC की परीक्षा हो!सभी के लिए यह कार्यक्रम उपयोगी हैं!
आशा रखता हूँ कि आप इस कार्यक्रम को देखते होंगे!इसमें कोई सुधार हैं तो आप मुझतक जानकारी भेजे!आप सीधे SEB से भी संपर्क कर सकते हैं!
शिक्षा के लिए 16 चेनल के साथ गुजरात एक मात्र ऐसा प्रान्त हैं जो इतने बड़े पैमाने पर शिक्षा के लिए चेनल चला रहा हो!
#Gret GoG
#Thanks SeB
#Specical thanks BISAG टीम

Sunday, July 9, 2017

ॐ गुरु ॐ


Today is the day of celebration.

Sit relax and reflect to the journey of life.
Lets pray gratitude to all the noble personalities who guided us towards the purpose of LIFE.
With his/her guidance we perceive the world of known & unknown.

To Learn,
To understand,
To Create,
To  Inspire,
To Introduce,
To Interpret,
To Question
To Explore
To facilitate,

And many more processes we have learnt from our GURUs...

'Pranam' (with my whole existence) to all GURUs of LIFE.

Saturday, June 24, 2017

સાચો પ્રેમ















કોઈને ન સમજાવી શકાય તેવી આ વિગત.શું ઉદાહરણ આપી શકાય તેની મુંજવણ.હું આ વાર્તા જેવીજ મારી એક બીજી વાર્તા કહું છું.
પેલી વાર્તામાં એમ છે કે...
હું નૃત્ય કરું એટલે વરસાદ આવે જ.
જ્યાં સુધી વરસાદ ન આવે ત્યાં સુધી નૃત્ય કરવાની મારી તૈયારી છે.

આ વાર્તા મને એક મિત્રએ મોકલાવી હતી.થોડાક ફેરફાર સાથે આ વાર્તા અહીં મુકું છું.આશા છે આપ આ વાર્તા વાંચશો.
એ મિત્રનો આભાર જેણે આ વાર્તા મોકલી.
સવારના નવ.
કદાચ તેટલા વાગ્યાની આસપાસનો સમયહતો!
પોતાના હાથના અંગૂઠા પર લીધેલા ટાંકા કઢાવવા માટે એક દાદા વેઇટિંગ રૂમમાં બેઠા હતા!
ડ્યુટી પરની નર્સ.નર્સ પોતાના કામમાં થોડી વ્યસ્ત હ્તી!

પોતે ઉતાવળમાં છે એવું દાદાએ નર્સને એકાદ વખત કહ્યું એટલે નર્સે એમનો કેસ હાથમાં લીધો!દાદાના અંગૂઠા પરનો ઘા જોયો, બધી વિગત જોઇ. નર્સે દાદાને ટેબલ પર સૂવડાવ્યા! પછી પૂછ્યું,’દાદા તમારી ઉતાવળનું કારણ હું પૂછી શકું? 

’‘બહેન! ફલાણા નર્સિંગહોમમાં મારી પત્નીને દાખલ કરેલી છે એની સાથે નાસ્તો કરવાનો સમય થઇ ગયો છે!

છેલ્લાં પાંચ વરસથી સવારે સાડા નવ વાગ્યે એની જોડે જ નાસ્તો કરવાનો મારો અતૂટ ક્રમ રહ્યો છે!
છેલ્લાં પાંચ વરસથી નર્સિંગ હોમમાં મારી પત્ની દાખલ થયેલી છે!
પાંચ વરસથી..?? શું થયું છે એમને? નર્સે પૂછ્યું!
સ્મૃતિભ્રંશ—અલ્ઝાઇમર્સનોરોગ થયેલો છે. દાદાએ જવાબ આપ્યો!

મોં પર સહાનુભૂતિના ભાવ સાથે નર્સે ટાંકા કાઢવાની શરૂઆત કરી!
એકાદ ટાંકાનો દોરો ખેંચતી વખતે દાદાથી સહેજ સિસકારો થઇ ગયો, 
એટલે એમનું ધ્યાન બીજે દોરવા નર્સે ફરીથી વાત શરૂ કરી!
‘દાદા’ તમે મોડા પડશો તો તમારી પત્ની ચિંતા કરશે ? 
દાદા બે ક્ષણ નર્સ સામે જોઇ રહ્યા.પછી બોલ્યા,’ના ! જરા પણ નહીં! કારણકે છેલ્લાં પાંચવરસથી એની યાદશક્તિ સંપૂર્ણપણે
ચાલી ગઇ છે.!
એ કોઇને ઓળખતી જ નથી!
હું કોણ છું એ પણ એને ખબર નથી!
નર્સને અત્યંત નવાઇ લાગી. એનાથી પુછાઇ
ગયું ! ‘દાદા ! જે વ્યક્તિ તમને ઓળખતી પણ નથી એના માટે તમે છેલ્લાં પાંચ વરસથી નિયમિત નર્સિંગ હોમમાં જાઓ છો?
તમે આટલી બધી કાળજી લો છો.!
પરંતુ એને તો ખબર જ નથી કે તમે કોણ છો?
દાદાએ નર્સનો હાથ
પોતાના હાથમાં લઇ
હળવેથી કહ્યું,’બેટા ! એને ખબર નથી કે હું કોણ છું, પરંતુ મને તો ખબર છેને કે એ કોણ છે?’

સાચો પ્રેમ...

સામી વ્યક્તિ જેમ છે, તેમ તેનો સંપૂર્ણ સ્વિકાર.
એના સમગ્રઅસ્તિત્વનો સ્વિકાર.હતું તેનો સ્વીકાર. જે છે તેનો સ્વીકાર.ભવિષ્યમાં જે હશે તેનો સ્વિકાર. અને જે કાંઇ નહીં હોય તેનો પણ સ્વિકાર.

ચાર્લી ચૅપ્લિનના એક ઇન્ટર્વ્યુમાંથી...

કેમ પણ મને ચાર્લી ચેપ્લિન ગમે છે.એ જે પરિસ્થિતિમાં હતા એ સ્થિતિમાં તો કોઈ હસવાનું તો દૂર રાજી થવાનું ન વિચારે.

બસ...એજ પ્રેરણા...
લખ્યા તારીખ:23 જૂન 2017


Sunday, April 2, 2017

बच्चो की कहानी...


कोई कहे सबसे ज्यादा मुश्किल काम क्या हैं!में कहूँगा कहानी कहना!वेसे तो मेरे नाम से रिकोर्ड हैं सबसे ज्यादा कहानी लिखनेका!मगर जब बात कहेने पर आती हैं तो मुझे भी कुछ कुछ होता हैं!थोड़े दिनों पहेले गांधीनगर GCERT में जाना हुआ!समग्र गुजरात से यहा अध्यापक आये थे!वो कहानी कहने वाले थे!मुझे साडी कहानिया सुन्नी थी!मेरे साथ श्रीमती कोमल व्यास,श्री सोनल चौहान,याह्या सपाट वाला और रचना पाठक थी!

हमने काम शुरू किया!GCERT के नियामक श्री डॉ.टी.एस.जोशी विशेष उपस्थित रहे थे!श्री रतिलाल बोरिसागर ने बछोकी कहानी और एनी रोचक जानकारियों के बारे में बताया था! बच्चो की कहानी के शास्त्र के बारे में गिजुभाई बधेका द्वारा लिखित पुस्तक ‘वर्तानु शाश्त्र’ अंगे श्री टी.एस.जोशी के माध्यम से कई उदाहरन के द्वारा समजाया गया!
में इस सिलेक्शन प्रोसेस से बहोत कुछ सिखा हूँ!ऐसे काम में मजा के साथ अनुभव भी मिलता हैं!

THANKS @GCERT 

Saturday, February 25, 2017

what we can...गरीब और भूख...


भूख की सूची में दुनिया के 88 देशों में भारत का क्रमांक 66 आया है। इसका अर्थ है कि समृद्धि के बेहद ऊंचे कीर्तिमान स्थापित करने के बावजूद भारत में 30 करोड़ से अधिक गरीब जनसंख्या सर्बिया, लिथुआनिया, सूरीनाम और मंगोलिया के गरीबों की तुलना में भी ज्यादा दुर्दशा की शिकार है। भूख और गरीबी के सूचकांकों की श्रेणी में भारत पाकिस्तान से बदतर है और बांग्लादेश से ही बेहतर है इस सूची में क्रमांक का निर्धारण बाल कुपोषण, बाल मृत्यु दर, कैलोरी की कमी से ग्रस्त जनसंख्या, सामान्य भोजन मात्रा, स्वास्थ्य एवं आरोग्य सेवाएं, स्वच्छ जल की उपलब्धता, शौैचालय और सफाई, स्त्रियों की शिक्षा, सरकार का प्रभाव, सामाजिक एवं राजनीतिक शांति और संघर्ष तथा एड्स जैसे रोगों की उपस्थिति का स्तर मापकर किया जाता है। जिहादी आतंकी, वोट बैंक राजनीति और सामाजिक तनावों के नित्य नए जातिगत समीकरणों में उलझा भारत कभी तेंदुलकर के विश्व कीर्तिमान में राहत और आशा ढूंढ़ता है तो कभी उन भारतीय अरबपतियों के लंदन और न्यूयार्क तक फैले ऐश्वर्य और भोग के अपार विस्तार की कथाओं से खुद को दिलासा देना चाहता है कि हम आगे बढ़ रहे हैं, पर सत्य यह है कि भारत की समृद्धि तीन सौ बड़े औद्योगिक और राजनीतिक घरानों तक सीमित रही है। शेष जनता किसी तरह स्ाघर्ष करते हुए जीवन बिताने पर विवश है। वास्तव में गरीबी दूर करने के लिए किसी की दिलचस्पी नहीं है। गरीब और अशिक्षित अच्छे वोट बैंक बनते हैं। विडंबना यह है कि हमारी सरकार के पास गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की पहचान हेतु अभी तक कोई निश्चित मापदंड तक नहीं है।

Thursday, February 23, 2017

मेरी मातृभाषा

एक प्रबंधन संस्थान में एक युवा प्रशिक्षणार्थी आत्महत्या कर लेता है। वह इसका कारण लिख कर छोड़ जाता है कि कमजोर अंग्रेजी के कारण उसे हास्यास्पद स्थितियों से गुजरना पड़ रहा था, जो असहनीय हो गया था। ऐसी ही एक अन्य घटना में विद्यार्थी इसी कारण से तीन महीने तक विद्यालय नहीं जाता है। घर पर सब अनभिज्ञ हैं और जानकारी तब होती है जब वह गायब हो जाता है। ऐसी खबरें अगले दिन सामान्यत: भुला दी जाती हैं। इस प्रकार का चिंतन-विश्लेषण कहीं पर भी सुनाई नहीं पड़ता है कि आज भी अंग्रेजी भाषा का दबाव किस कदर भारत की नई पीढ़ी को प्रताडि़त कर रहा है। सच तो यह है कि आजादी के बाद मातृभाषा हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के उत्थान का जो सपना देखा गया था अब वह सपना दस्तावेजों, कार्यक्रमों तथा संस्थाओं में दबकर रह गया है। कुछ दु:खांत घटनाएं संचार माध्यमों में जगह पा जाती हैं। समस्या का स्वरूप अनेक प्रकार से चिंताग्रस्त करने वाला है।
देश में लाखों ऐसे स्कूल हैं जहां केवल एक मानदेय प्राप्त अध्यापक कक्षा एक से पांच तक के सारे विषय पढ़ाता है। क्या ये बच्चे कभी उनके साथ प्रतिस्पर्धा में बराबरी से खड़े हो पाएंगे जो देश के प्रतिष्ठित स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई कर रहे हैं? आज उपलब्धियों के बड़े आंकड़े सामने आते हैं कि 21 करोड़ बच्चे स्कूल जा रहे हैं, 15 करोड़ मध्याह्न भोजन व्यवस्था से लाभान्वित हो रहे हैं, स्कूलों की उपलब्धता लगभग 98 प्रतिशत के लिए एक किलोमीटर के दायरे में उपलब्ध है आदि। यही नहीं, अधिकांश राज्य सरकारें अंग्रेजी पढ़ाने की व्यवस्था कक्षा एक या दो से कर चुकी हैं और इसे बड़ी उपलब्धि के रूप में गिनाती भी हैं। आज अगर भारत के युवाओं से पूछें तो वे भी यही कहेंगे- अगर उनकी अंग्रेजी अच्छी होती या फिर वे किसी कान्वेंट या पब्लिक स्कूल में पढ़े होते तो जीवन सफल हो जाता। आजादी के बाद के पहले दो दशकों में पूरी आशा थी कि अंग्रेजी का वर्चस्व कम होगा। हिंदी के विरोध के कारण सरकारें सशंकित हुई जिसका खामियाजा दूसरी भारतीय भाषाओं को भुगतना पड़ रहा है। तीन-चार दशक तो इसी में बीते कि अंग्रेजी ेमें प्रति वर्ष करोड़ों बच्चे हाईस्कूल परीक्षा में फेल होते रहे।
प्रतिवर्ष जब शिक्षा का नया सत्र प्रारंभ होता है तब दिल्ली के पब्लिक स्कूलों में प्लेस्कूल, नर्सरी तथा केजी में प्रवेश को लेकर राष्ट्रव्यापी चर्चा होती है, लेकिन दिल्ली के भवनविहीन, शौचालय विहीन, पानी-बिजली विहीन स्कूलों पर कभी चर्चा नहीं होती। प्रवेश के समय जिन पब्लिक स्कूलों की चर्चा उस समय सुर्खियों में रहती है उसका सबसे महत्वपूर्ण कारक एक ही होता है-वहां अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा दी जाती है। और जहां अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दी जाएगी, श्रेष्ठता तो वहींनिवास करेगी। अंग्रेज, अंग्रेजी तथा अंग्रेजियत के समक्ष अपने को नीचा देखने की हमारी प्रवृत्तिसदियों पुरानी है, लेकिन व्यवस्था ने अभी भी उसे बनाए रखा है। बीसवींशताब्दी के उत्तारार्ध में अनेक देश स्वतंत्र हुए थे तथा इनमें से अनेक ने अभूतपूर्व प्रगति की है। उसके पहले के सोवियत संघ, चीन और जापान के उदाहरण हैं। जिस भी देश ने अपनी भाषा को महत्व दिया वह अंग्रेजी के कारण पीछे नहीं रहा। रूस ने जब अपना पहला अंतरिक्ष यान स्पुतनिक अंतरिक्ष में भेजा था तब अमेरिका में तहलका मच गया था। उस समय रूस में विज्ञान और तकनीक के जर्नल केवल रूसी भाषा में प्रकाशित होते थे। पश्चिमी देशों को स्वयं उनके अनुवाद तथा प्रकाशन का उत्तारदायित्व लेना पड़ा। चीन की वैज्ञानिक प्रगति अंग्रेजी भाषा पर निर्भर नहीं रही।
आज अक्सर यह उदाहरण दिया जाता है कि चीन में हर जगह लोग अंग्रेजी बोलना सीख रहे हैं और इसके लिए विशेष रूप से बजट आवंटित किया गया है, लेकिन यहां पर यह उल्लेख नहीं किया जाता है कि चीन ने समान स्कूल व्यवस्था भी लागू कर ली है। वहां कुछ विशिष्ट स्कूलों में प्रवेश के लिए उठा-पटक नहीं करनी पड़ती। चीन ने यह शैक्षिक अवधारणा भी पूरी तरह मान ली है कि प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में ही दी जानी चाहिए और ऐसा न करना बच्चों के साथ मानसिक क्रूरता है। मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा ग्रहण करते हुए बच्चे अन्य भाषा आनंदपूर्वक सीखें तो यह संर्वथा न्यायसंगत तथा उचित होगा। साठ साल से अधिक के अनुभव के बाद भी हमारी शिक्षा व्यवस्था में अनेक कमियां बनी हुई हैं, जिनका निराकरण केवल दृढ़ इच्छाशक्ति से ही संभव है। प्रसिद्ध समाज वैज्ञानिक श्यामाचरण दुबे ने कहा था कि शिक्षा का एक प्रमुख उद्देश्य परंपरा की धरोहर को एक पीढ़ी से दूसरी तक पहुंचाना है। इस प्रक्रिया में परंपरा का सृजनात्मक मूल्यांकन भी शामिल होता है, लेकिन क्या हमारी शिक्षा संस्थाएं भारतीय परंपरा की तलाश कर रही हैं? क्या वे भारतीय परंपरा की पोषक हैं? वर्तमान शिक्षा प्रणाली आज पीढ़ी और परंपरा में अलगाव पैदा कर रही है। जनसाधारण से उसकी दूरी बढ़ती जा रही है।
आधुनिकीकरण की भ्रमपूर्ण व्याख्याओं के कारण हमारी नई पीढ़ी में धुरीहीनता आ रही है। वह न तो परंपरा से पोषण पा रही है और न ही उसमें पश्चिम की सांस्कृतिक विशेषताएं नजर आ रही हैं। मातृभाषा में शिक्षण के साथ अनेक अन्य आवश्यकताएं भी हैं जो हर भारतीय को भारत से जोड़ने और विश्व को समझने में सक्षम होने के लिए आवश्यक हैं। मातृभाषा का इसमें अप्रतिम महत्व है, इससे इनकार बेमानी होगा। ऐसे में शिक्षा में राजनीतिक लाभ को ध्यान में रखकर बदलाव करने के स्थान पर शैक्षणिक दृष्टिकोण से आवश्यक बदलाव लाना आज की परिस्थिति में सबसे सराहनीय कदम होगा। भविष्य को ऐसे ही प्रभावशाली प्रयासों की आवश्यकता है।

Tuesday, February 21, 2017

मातृभाषा...




प्राकृत-उद्गमित, सम्प्रेषणा-युक्त, जन-तन्द्रा-अन्तक, भावपूर्ण मातृभाषा है-हिंदी । “भारत दुर्दशा” जैसे निबंध लिखकर इस देश को जगाने वाले महान साहित्यकार भारतेंदु हरिश्चंद्र ने मातृभाषा का महत्व कुछ इस प्रकार से बताया है-निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल ।बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को शूल ।।अंग्रेजी पढिके जदपि, सब गुन होत प्रबीन ।पै निज भाषा ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन ।।विविध कला, शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार ।सब देसन से लै करहु, निज भाषा माँहि प्रचार ।।हिंदी- वैसे तो यह इस देश की राजभाषा और हम सबकी मातृभाषा है परन्तु आज यह भाषा आज अपनी ही बुनियाद की रक्षा में लगी है। 

ये वही भाषा है जिसने इस सोते हुए राष्ट्र को दासता की नींद से जगाया। इसी भाषा ने भारत को स्वतंत्रता का अर्थ समझाया। यही वह भाषा है जो ऐतिहासिक स्वातंत्र्य-संघर्ष की साक्षी बनी। महात्मा गाँधी के अविस्मरणीय विचारों की माध्यम बनकर इसी भाषा ने देश में परिवर्तन की नींव रखी। यही वो भाषा है जिसने विभिन्न जाति-धर्म-समुदायों में बिखरे इस देश में प्रथम बार राष्ट्रवाद की स्थापना की। शुक्ल, द्विवेदी और प्रसाद ने इसका परिष्कार किया। प्रेमचंद, गुप्त और दिनकर ने इसमें भावनाएं भरी। और अंततः यह भाषा भारत में अभिव्यक्ति का पर्याय बनी। इस देश की संसदीय परंपरा को इसी भाषा ने जन्म दिया। न-जाने कितनी ही बोलियों की माता यह भाषा अनगिनत पत्रों-पुस्तकों-पत्रिकाओं के माध्यम से घर-घर पंहुचती रही। आज भी सिनेमा, टीवी और रेडियो के ज़रिये यही भाषा हमारा मनोरंजन कर रही है। 

एक माता के रूप में हिंदी तो अपने समस्त कर्त्तव्य समुचित रूप से निभाती रही, परन्तु हम कृतघ्न इस माँ के उपकारों को भूल कर अंग्रेजी(आंटी) की गोद में जा बैठे।मेरा उद्देश्य यहाँ हिंदी पर अंध प्रेम प्रदर्शित करते हुए अंग्रेजी का अतार्किक विरोध करना नहीं है, ऐसे कई मौलिक कारण है जो मातृभाषा के किसी भी राष्ट्र की सफलता के पीछे छुपे महत्व को प्रदर्शित करते हैं।कई लोगों का यह मत है की हिंदी देश के सभी लोग नहीं बोलते इसी कारण से हमें एक व्यापक अंतर्राष्ट्रीय भाषा को अपना लेना चाहिए। इसी कारण सर्वप्रथम हम लोगों की यह विचारधारा कि- हिंदी भारत की सर्वव्यापी भाषा नहीं है, का खंडन करना चाहेंगें। यह एक संपूर्ण भारत में मिले शिलालेखों एवं ताम्रपत्रों के माध्यम से प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य है कि 8 वीं शताब्दी ई.पू. तक संस्कृत आर्यों की सामान्य बोलचाल की भाषा होने के साथ ही साहित्य की परिनिष्ठित भाषा थी। कालांतर में(2री शताब्दी ई.पू.) यह भाषा देश में “पाली” भाषा तथा विदेशों में “अरबी” एवं “फारसी” में परिवर्तित हो गयी। भगवान भुद्ध ने अपने उपदेश पाली भाषा में ही दिए थे। 3री शताब्दी ई. तक आते-आते पाली भाषा से एक अपभ्रंश भाषा “प्राकृत” का जन्म हुआ। हिंदी साहित्य का प्रारम्भ इसी प्राकृत भाषा से हुआ है। प्राकृत भाषा सिंधु नदी से उस पार फारस में “हिंदवी” के नाम से जानी जाने लगी । 

वस्तुतः “हिंदवी”” शब्द की उत्पत्ति “सिंधी” से ही हुयी है, चूँकि फारसी लोग “स” को “ह” उच्चारित करते थे।  यही “हिन्दवी” शब्द बाद में हिंदी हो गया। अमीर खुसरो ने इसी भाषा में साहित्य की रचना की। इस प्रकार से यह स्पष्ट है की प्राकृत ही हिंदी भाषा थी। बाद में यह प्राकृत भाषा(अथवा फारसियों में हिंदी के नाम से जानी जाने वाली भाषा) विखंडित होकर पैशाची, मागधी, ब्राचड, महाराष्ट्री, अर्धमागधी, शौरसेनी आदि भाषाओं में बदल गयी। आजकल की भाषाओं पंजाबी, बिहारी, असमिया, मलयाली, सिंहली, उड़िया, मराठी और गुजराती आदि का जन्म इन्ही भाषाओं से हुआ। शेष क्षेत्रों में प्राकृत(अथवा मूल हिंदी) ही प्रचलन में रही। १२ वी शताब्दी ई. में फारस आक्रमणकारियों की भारत विजय के पश्चात भारतवर्ष “हिन्दुस्तान” एवं प्राकृत “हिंदी” के रूप में प्रचलित हो गयी। समय के साथ हिंदी में ब्रिज, अवधी, बुन्देली आदि बोलियां विकसित हो गयी, जिनमें साहित्य परिष्कार भी हुआ। इस प्रकार यह स्पष्ट है की आधुनिक भारत की समस्त भाषाओं का जन्म “प्राकृत” अथवा “हिंदवी” से ही हुआ है। यही कारण है की हिंदी में सभी दक्षिण एशियाई भाषाओं के शब्द चाहे वो विदेशी अरबी एवं फारसी हों या मूल संस्कृत के तत्सम शब्द हों बहुतायत में मिलते हैं। यही भाषा अखंड भारत में कैलाश मानसरोवर से लेकर सिंहल द्वीप तक प्रचलित थी, जो बाद में अपभ्रंश होकर नवीन भाषाओं के रूप में विकसित हो गयी। इस प्रकार से उपरोक्त तथ्यों के आधार पर संस्कृत की मौलिक प्रथम उत्तराधिकारी भाषा हिंदी ही है जो की प्राकृत के रूप में देश की समस्त आधुनिक भाषाओं की जननी है एवं इसी कारण से हम इसे भारत की सर्वव्यापी भाषा का दर्जा देते हैं। साथ ही साथ यह कोई नयी जानने योग्य बात नहीं है की हिंदी विश्व की तीसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है।  

 भारत एक विविधताओं से परिपूर्ण राष्ट्र होते हुए भी अपनी एकल-सांस्कृतिक-चेतना के लिए विश्वविख्यात है। हमारी संस्कृति किसी धर्म या जाति की नहीं, अपितु हमारे भारतीय होने की द्योतक है। किसी भी संस्कृति के चार स्तंभ- राष्ट्रवाद, भाषा, आचार-विचार एवं परम्पराएं; एक रथ के चार पहियों की तरह होते हैं।  हिन्दी और इसकी बोलियाँ उत्तर एवँ मध्य भारत के विविध राज्यों में बोली जाती हैं । भारत और अन्य देशों में में ६० करोड़ से अधिक लोग हिन्दी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं। फ़िजी, मॉरिशस, गयाना, सूरीनाम की अधिकतर और नेपाल की कुछ जनता हिन्दी बोलती है।हिन्दी राष्ट्रभाषा, राजभाषा, सम्पर्क भाषा, जनभाषा के सोपानों को पार कर विश्वभाषा बनने की ओर अग्रसर है।

(मेरी मटरू भाषा गुजराती हैं!मगर ज्यादा लीग पढ़ पाए इस लिए हिंदी में लिखा हैं!)

Saturday, January 28, 2017

गाँव छोटा... No...

कोन कहता हैं!
में नही कर पाउँगा!
इन्हें देखे,एक छोटेसे गाँव की महिला हैं।जो एक नॅशनल कोन्फ्रंस को रेकॉर्ड कर रही हैं।हमे ऐ नहीं सोचना चाहिए की हम कहाँ हैं।कहाँ पैदा हुए हैं।हमे ऐ सोचना चाहिए की हम क्या कर सकते हैं।
मेरे एक दोस्त ने मुझे ऐ फोटॉ भेजा।मुझे पसंद आया।में उसके बारेमे ज्यादा नहीं जानता!जो जानकारी मेरे पास थी वो आपको शेर कर रहा हूं।

मेने कई ओरतो को काम करते देखा हैं!दुःख इस बातका हैं की आज भी ओरत को अपना पसंदीदा काम करने हेतु परमिशन लेनी पड़ती हैं!ऐसी फोटो को हम शेर करते हैं!मगर हमसे जुडी हुई महिला को क्या हम प्रोत्साहित करते हैं?

ज्यादातर हमारा समय किसी को प्रभावित करनेमे जाता हैं!प्रोत्साहन की तो हम सिर्फ बात करतें हैं!अगर मेरी खाहिश हैं की मेरी बहन या बेटी से सदी करने वाला उसे समजे!अगर में मनाता हु की मेरे दामाद को मेरी बेटी को समजना चाहिए तो क्या मेरे ससुर एइसा नहीं मानते होंगे?हमारी टीम श्रीमती मोल्लाम्मा को ढूंढने में लगी हैं!सिर्फ राजकीय कुछ सन्मान या सिर्फ पंचायतोमे कुछ प्रधान बना देनेसे महिलाए आगे नहीं आएँगी!

महिलाए जिस क्षेत्रमे काम कराती हैं उसमे अगर पुरूष चला जाये तो कहेंगे कुछ नया करेंगे...!ऐसा ही कुछ 'नया करेंगी 'बोला तो जाता हैं मगर अविश्वास के स्थान पे!मेरा व्यक्तिगत मानना हैं की महिलाओ को सिर्फ बातचीत या कविता में ही नहीं व्यावहारिक जीवनमे भी बढ़ावा देना चाहिए!सिर्फ महिला दिन से कुछ नहीं होगा!