Wednesday, December 5, 2018

21वीं सदी में भारत

21वीं सदी में भारत की प्राथमिक शिक्षा नीतिगत बदलाव के दौर से गुजर रही है. इस नीतिगत बदलाव की कहानी को आगे बढ़ाने के लिए अनेक कार्यक्रम बनाए जा रहे हैं. कार्यक्रमों को सफल बनाने के लिए रणनीतियों की शृंखला बनाई जा रही है. इस सभी का उद्देश्य एक है कि शिक्षा के क्षेत्र में सीखने के संकट (लर्निंग क्राइसिस) का समाधान कैसे खोजा जाए? शिक्षा का अधिकार कानून 2009 लागू होने के बाद से स्कूलों में बच्चों का नामांकन बढ़ा है. स्कूलों में बच्चों का ठहराव सुनिश्चित करने और बच्चों का प्रदर्शन बेहतर करने की रणनीतियों पर अमल की कोशिशें हो रही हैं. शिक्षा को आनंददायक बनाने के प्रयासों को प्रोत्साहित किया जा रहा है.
स्कूलों में भयमुक्त वातावरण बनाने की रणनीतियों पर विमर्श हो रहा है. स्कूल और समुदाय के बीच संवाद शुरू करने के लिए विद्यालय प्रबंधन समिति को सक्रिय बनाने. बच्चों के माता-पिता और अभिभावकों को स्कूल में बुलाने और बच्चों की शैक्षिक प्रगति से उनको अवगत कराने की बात हो रही है. शिक्षा को बच्चों के मौलिक अधिकार के रूप में देखने की कोशिश हो रहा है ताकि कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे. हर बच्चे को मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा के दायरे में लाने के लिए सरकारी और ग़ैर-सरकारी संगठनों के तरफ़ से काफ़ी प्रयास हो रहे हैं. सभी बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करना शिक्षा के क्षेत्र में संचालित होने वाले तमाम कार्यक्रमों का प्रमुख उद्देश्य है.
इसे हासिल करने के लिए शिक्षाविद्, शैक्षिक प्रशासन से जुड़े अधिकारी, शिक्षक और शिक्षक प्रशिक्षक अपने-अपने स्तर पर काम कर रहे हैं. बच्चों का मूल्यांकन करने पर जोर दिया जा रहा है ताकि बच्चों के शैक्षिक प्रदर्शन में होने वाले बदलाव की सैद्धांतिक व्याख्या हो सके. बदलाव को आँकड़ों में प्रस्तुत किया जा सके. लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव की कोई भी योजना अल्पकाल में शैक्षिक स्तर बढ़ाने जैसे लक्ष्य को हासिल करने के लिए सही रणनीति, बेहतर समझ और ज़्यादा समन्वय के साथ काम करने की जरूरत को महत्व देती है. आज बात बच्चों में सीखने की समस्याओं के समाधान में उठाए जा सकने वाले संभावित क़दमों की….
शिक्षकों की संख्याः विद्यालयों में सीखने का माहौल बनाने और बच्चों को प्रेरित करने में शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. अगर सरल शब्दों में कहें तो स्कूल एक ऐसी जगह है जहाँ छात्र-शिक्षक आपस में विभिन्न शैक्षणिक सामग्री का उपयोग करके संवाद और बातचीत के माध्यम से सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में शामिल होते हैं. अध्यापक अपने अनुभवों को समृद्ध करता है. बच्चे पुराने अनुभवों के ज़मीन पर नए अनुभवों को जोड़ते हुए ज्ञान निर्माण की प्रक्रिया से अवगत होता है. यहाँ वह पढ़ना-लिखना, खुद को अभिव्यक्त करना, बाकी बच्चों के साथ समायोजन करना, खेल और अन्य सामूहिक गतिविधियों में शामिल होने का कौशल विकसित करता है. अगर किसी स्कूल में छात्र-शिक्षक अनुपात संतुलित नहीं है तो बच्चों के सीखने की प्रक्रिया बाधित होती है.
भारत में एकल शिक्षक स्कूलों की स्थिति बताती है कि आने वाले दस-बीस सालों में भी यथास्थिति का यह माहौल टूटने वाला नहीं है. नई नियुक्तियों के लिए सरकार तैयार नहीं है. तमाम पद खाली पड़े हैं. 12वीं पास लोगों को पढ़ाने की जिम्मेदारी दी जा रही है, इससे स्थिति ढाक के तीन पात वाली ही बनी रहती है. इसलिए शिक्षा के क्षेत्र में सुधार की दीर्घकालीन रणनीति में छात्र-शिक्षक अनुपात को बेहतर व संतुलित बनाने की दिशा में सरकारी प्रयासों की गति देने की जरूरत है. इसके अभाव में तमाम रणनीति और कार्यक्रम आधे-अधूरे उद्देश्यों की प्राप्ति में ही सफल होंगे. हम यह कह सकते हैं कि अगर सभी बच्चों को शिक्षित करने का उद्देश्य सामने है तो संभव है कि यह उद्देश्य साक्षरता के दायरे से थोड़ा ही आगे बढ़ पाए. देश के लिए मानव संसाधन की गुणवत्ता और भविष्य में वैश्विक स्तर पर चुनौतियों के समाधान की दिशा में इसे बेहतर रणनीति नहीं माना जा सकता है. इस क्षेत्र में पर्याप्त सुधार की गुंजाइश है.

सरकुम:
देश के लिए मानव संसाधन की गुणवत्ता और भविष्य में वैश्विक स्तर पर चुनौतियों के समाधान की दिशा में इसे बेहतर रणनीति नहीं माना जा सकता है. इस क्षेत्र में पर्याप्त सुधार की गुंजाइश है.
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