Friday, August 17, 2018

अटल जी को...


कोई सर्जक ऐसा नहीं जिसका सर्जन जो भी हो अच्छा हो। कोई बेस्टमेन ऐसा नहीं कि हर मैच में शतक लगाए। किसी सिंगर ऐसा नही जिस के सभी गाने हिट होते हो। मगर 'अटल'जी के लिए ऐसा न था। उनकी ज्यादातर कहिए कि सभी कविताए श्रेष्ठ थी। मगर मुजे जो पांच सबसे ज्यादा पसंद हैं वो आप के लिए...

1. गीत नहीं गाता हूँ

बेनकाब चेहरे हैं दाग बड़े गहरे है,
टूटता तिलस्म आज सच से भय खाता हूं,
गीत नहीं गाता हूं.

लगी कुछ ऐसी नज़र,
बिखरा शीशे सा शहर,
अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूं.
गीत नहीं गाता हूं.

पीठ में छुरी सा चांद,
राहु गया रेख फांद,
मुक्ति के क्षणों में बार बार बंध जाता हूं.
गीत नहीं गाता हूं.

2. क्या खोया, क्या पाया जग में

क्या खोया, क्या पाया जग में,
मिलते और बिछड़ते मग में,
मुझे किसी से नहीं शिकायत,
यद्यपि छला गया पग-पग में,
एक दृष्टि बीती पर डालें, यादों की पोटली टटोलें.

पृथ्वी लाखों वर्ष पुरानी,
जीवन एक अनन्त कहानी
पर तन की अपनी सीमाएं,
यद्यपि सौ शरदों की वाणी,
इतना काफी है अंतिम दस्तक पर खुद दरवाजा खोलें.

जन्म-मरण का अविरत फेरा,
जीवन बंजारों का डेरा,
आज यहां, कल कहां कूच है,
कौन जानता, किधर सवेरा,
अंधियारा आकाश असीमित, प्राणों के पंखों को तौलें.
अपने ही मन से कुछ बोलें.

अटल बिहारी वाजपेयी का निधन, जब लता मंगेशकर की इस बात पर खूब हंसे थे पूर्व PM

3. एक बरस बीत गया

एक बरस बीत गया,
झुलासाता जेठ मास.
शरद चांदनी उदास.
सिसकी भरते सावन का.
अंतर्घट रीत गया.
एक बरस बीत गया.

सीकचों मे सिमटा जग.
किंतु विकल प्राण विहग.
धरती से अम्बर तक.
गूंज मुक्ति गीत गया.
एक बरस बीत गया.

पथ निहारते नयन,
गिनते दिन पल छिन,
लौट कभी आएगा,
मन का जो मीत गया,
एक बरस बीत गया.

4. जीवन बीत चला

कल कल करते आज,
हाथ से निकले सारे,
भूत भविष्यत की चिंता में,
वर्तमान की बाजी हारे.

पहरा कोई काम न आया,
रसघट रीत चला,
जीवन बीत चला.

हानि लाभ के पलड़ों में,
तुलता जीवन व्यापार हो गया,
मोल लगा बिकने वाले का,
बिना बिका बेकार हो गया.

मुझे हाट में छोड़ अकेला,
एक एक कर मीत चला,
जीवन बीत चला,


5. सच्चाई यह है कि

सच्चाई यह है कि
केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती,
सबसे अलग-थलग,
परिवेश से पृथक,
अपनों से कटा-बँटा,
शून्य में अकेला खड़ा होना,
पहाड़ की महानता नहीं, ,मजबूरी है.

ऊँचाई और गहराई में
आकाश-पाताल की दूरी है.
जो जितना ऊँचा,
उतना एकाकी होता है,
हर भार को स्वयं ढोता है,
चेहरे पर मुस्कानें चिपका,
मन ही मन रोता है।

ऐसे व्यक्ति को खोकर भारत ने एक वैश्विक व्यक्ति को खोया हैं। एक वक्ता ओर एक व्यक्ति। वो जो बोलते थे उस पर वो चलते थे।उनकी दुनिया में जुठ न था। अगर देखा जाए तो उनके जन्म दिवस या मृत्यु तिथि को सहज साहित्य दिन के तौर पर याद रखवाना चाहिए। सरकार ही ते कर सकती हैं।

@#@
मुजे बाजपाई पसंद हैं।
सुष्मा स्वराज के बजह से।
क्योकि तबमें छोटा था।
संसंद का सीधा प्रसारण हुआ था।  सुष्माजी प्रसार भारती मंत्रालय की मंत्री थी।भारती मंत्रालय में न होती। बाजपाई जी अविश्वास पर भाषण देते अगर मेने टी.वी. में लाइव नहीं देखे और सुने होते तो...
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