Tuesday, February 13, 2018

मेरे हिस्सेका आसमान...




आज दुनिया वेलेंटाइन डे मना रही होगी।इस कि तैयारी पिछले कुछ दिनों से शुरू होती हैं।
 श्री गणपत पटेल 'सौम्य' की एक कविता हैं।
 
किनारे..
एक किनारे पुरुष खड़ा हैं,
 एक किनारे नारी,
बड़ा फांसला कैसे मिटता?
काम बहुत हैं भारी।
मनमानी आज़ादी ले एक  पंछी उड़ता ऊपर,
कटे पैरो से दूजा पंछी तड़प रहा हैं भू पर।
कदम कदम पर पाबंदी के पहरे लगे हुए हैं।

सदीयां बीती लेकिन,उनके चेहरे ढके हुए हैं।


कैसे मुमकिन होगा दो पीढ़ियों को साथ चलाना?
खत्म दूरी कर, दो साहिल का फिरसे हाथ मिलाना?


एक जीवन शक्ति को कुचलना; लाश बनाकर रखना,
बड़ा पाप है हरे भरे पौधे को जलाकर रखना।

लड़कियों की नयी पीढ़ी अब पूछ रही हैं हमसे,
आनेवाले दिनों में क्या मुक्ति हैं उस गम से?

पीते है अपमान सदा;
पर अब नहीं यह हो सकता,
अलग बना व्यक्तित्व नारी का,
अब यह नहीं खो सकता।


काम हमारा इस दूरी को खत्म किये देना है,
सदियों के इस कुरिवाज का अंत किये देना है।

एक चुनोती इसे समझकर कुछ प्रण लेना होगा,
जन्म लिया हैं मानव का यह ऋण चुकाना होगा।

बस,
भ्रूण से शुरू हो ने वाली एक जिंदगी।क्या फर्क हैं।क्या कुछ बदलाव आया हैं ओरत की जिंदगी में?पिछले कुछ सालों से कुछ दिन विशेष को खास तरीको से मनाने का चलन बढ़ा हैं।

आज कल हम कुछ ऐसे दिनों के बातें में सुनते हैं जो आप ने भी सुने ही होंगे।

जैसे...
रोज डे...
प्रपोज डे...
चॉकलेट डे...
टेडीबियर डे....
प्रोमिस डे...
किस डे...

ओर अंतिम जीसे हम अंतिम मानते हैं ओर वो हैं...

वेलेंटाइन डे...

संशोधको ने उस के बाद वाली सीरीज को भी खोज निकाला हैं।

जिस में...
स्लेप डे...
किक डे...
परफ्यूम डे...
फ्लर्टिंग डे...
कॉंफिसन डे...
मिसिंग डे...
ओर अंतमें...
ब्रेकप डे

कुछ देने से छोड़ ने तक के वो दिन कोई नहीं चाहता।कोई आए नहीं चाहता कि कोई उसे छोड़े।मगर ओरत, एक खिलौना समझने वाले लोगो ने जैसे कुछ फालतू स्टेप तय कर लिए,ओर हमने उसे मनाने का संकल्प ले रखा हैं।

स्व.शफदर हाज़मी ओर माल्या श्री हाज़मी का नाटक 'औरत' अगर जो कोई देख लेगा तो कभी ऐसे फालतू डे नहीं मनाएगा।क्या भद्दा मजाक हैं औरत के साथ।दिन विशेष की में ब्रेकप हैं।कोई ब्रेकअप नहीं होता हैं।जो होता हैं कुछ दिनों या सालो के लिए होता हैं।कुछ दिन बीत गए और कुछ बीतेंगे।आज जो हैं उसे देखो,कल जो होगा देखा जाएगा। कुछ समय के लिए।इस समझ से ही हमे सुख और दुख को देखना ओर समझना हैं।

श्री 'सौम्य' की कविता आज भी इतनी ही ताजा हैं जैसे पद्मावती फिल्म    में थी।आशा हैं अगले वेलेंटाइन तक हम ये बात सोचेंगे,समजेंगे ओर जीवन को समझ ने के लिए नए तरीके खोजेगे।


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पदमावत फ़िल्म के रिलीज होने का विवाद चलता हैं।मगर ओरत के स्वमान का क्या हो सकता हैं।


लिखा:टेडीबियर डे...
Thanks @ सौम्य...
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