Monday, February 4, 2019

માર્ગ ઉપર પટ્ટાની વિગતો: મજા મજા


પરિવહન એ આધુનિક માનવ જીવનનું અભિન્ન અંગ બની ચુક્યું છે. નોકરી પર જવા માટે, લેણદેણ માટે, પ્રાસંગિક તહેવારો માટે ઇત્યાદિ અનેક પ્રસંગે પરિવહન જરૂરી છે. પરિવહન ખોરવાય એટલે માનવ જીવનની વ્યવસ્થા પણ ખોરંભે ચડે એમ કહેવું યર્થાથ યોગ્ય ભાસે છે. પ્રતિદિન આપણે કોઇ એકને એક સડક પરથી ઘણીવાર ગુજરતા હોઇએ છીએ.

શું તમે ક્યારેય પસાર થતી વખતે સડકને ધ્યાનથી નીરખીને જોઇ છે? જો એમ કર્યું હશે તો તમને ખ્યાલ પણ હશે કે, સડકની બંને તરફ અને સડકની વચ્ચે કંઇક પીળી અને સફેદ કલરની લાઇનો હોય છે, અમુક મધ્યે-મધ્યે કટકા થતી તો અમુક સળંગ ચાલી જતી. હાં, હવે સ્મરણ થઈ આવ્યું હશે. તમને ખબર છે આ લાઇનો શું દર્શાવવા માંગે છે? તમે જાણો છો આ પીળી-ધોળી લીટીઓ શા માટે હોય છે? કદાચ તમે આ બાબતે કદી વિચાર્યું જ નહી હોય! તો ચાલો આજે જાણી લઈએ આ લાઇનોનો સાચો મતલબ કે જે જાણીને તમે ચોક્કસ હેરતજનક ચહેરો બનાવી જશો.

આપણા દેશમાં લોકોને માત્ર ટ્રાફિક સિગ્નલોની જ ખબર હોય છે. (ઘણાંને એ સિગ્નલો પણ લબક-લબક થતાં આગિયાં જેવા તુચ્છ ભાસે છે એ બહુ દુ:ખની વાત છે.) પણ આપણે જાણતા નથી હોતા કે, સિગ્નલો ઉપરાંત રોડ પર તાણવામાં આવેલી લાઇનો પણ ટ્રાફિક સિગ્નલો જ છે! એ પણ ટ્રાફિકને લગતાં નિયમો જ દર્શાવે છે. અલગ-અલગ રંગાકારમાં રહેલી આ રેખાઓ રોડના સિગ્નલને દર્શાવે છે. ચાલો જાણીએ અલગ-અલગ પ્રકારે તાણવામાં આવેલી આ લાઇનોનો મતલબ.

મોટેભાગે આ લાઇનનો મતલબ થાય છે કે, જે રોડ પર આ લાઇન છે ત્યાં તમે આસાનીથી ઓવરટેક કરી શકો છો. સામાન્ય રીતે આ મતલબ થતો હોવા છતાં રાજ્ય પ્રમાણે લાઇનના નિયમ પણ અલગ હોય છે. તેલંગાણામાં આ લાઇનનો મતલબ છે કે, તમે વાહન ઓવરેટક કરાવી શકશો નહી.

બે લાંબી પીળી લાઇન જે સડક પર હોય તેનો મતલબ એવો કે, આ સડક પર તમારે તમારી લેનમાં(હદમાં!) જ ચાલવાનું છે. હદ વટોળશો નહી, નાહકના ઓવરટેક કરશો નહી.

ત્રુટક પીળી લાઇનનો મતલબ થાય છે કે, તમે તમારી આગળ પાછળ આવતાં વાહનો પર નજર રાખીને ઓવરટેક કરી શકો છો. અથવા તો, તમારી સ્પીડ વધારી શકો છો.


લાંબી સફેદ લાઇનનો મતલબ થાય છે કે, તમે તમારી લેનને બદલીને બીજે ઠેકડો મારી શકશો નહી. તમારે તમારી લેનમાં જ એટલે કે હદમાં જ રહેવાનું છે.

આનો મતલબ છે કે, તમે પુરી સાવધાની વર્તીને, આગળ-પાછળ જોઇને ઓવરટેક કરી શકો છો. પણ કોઇને હેરાન કરીને નહી.

સરકુમ:
સડક ક્યાંય ન જાય.
એની ઉપર મુસાફરી કરનાર આગળ વધે. આપ મારી સડક છો.આપ થકી જ આગળ વધશે.

Sunday, February 3, 2019

शिक्षा क्या हैं...!


शिक्षा में ज्ञान, उचित आचरण और तकनीकी दक्षता, शिक्षण  और विद्या प्राप्ति आदि समाविष्ट हैं। इस प्रकार यह कौशलों  (skills), व्यापारों या व्यवसायों एवं मानसिक, नैतिक और सौन्दर्यविषयक के उत्कर्ष पर केंद्रित है।

शिक्षा, समाज की एक पीढ़ी द्वारा अपने से निचली पीढ़ी को अपने ज्ञान के हस्तांतरण का प्रयास है। इस विचार से शिक्षा एक संस्था के रूप में काम करती है, जो व्यक्ति विशेष को समाज से जोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है तथा समाज की संस्कृति की निरंतरता को बनाए रखती है। बच्चा शिक्षा द्वारा समाज के आधारभूत नियमों, व्यवस्थाओं, समाज के प्रतिमानों एवं मूल्यों को सीखता है। बच्चा समाज से तभी जुड़ पाता है जब वह उस समाज विशेष के इतिहास से अभिमुख होता है।

शिक्षा व्यक्ति की अंतर्निहित क्षमता तथा उसके व्यक्तित्त्व का विकसित करने वाली प्रक्रिया है। यही प्रक्रिया उसे समाज में एक वयस्क की भूमिका निभाने के लिए समाजीकृत करती है तथा समाज के सदस्य एवं एक जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए व्यक्ति को आवश्यक ज्ञान तथा कौशल उपलब्ध कराती है। शिक्षा शब्द संस्कृत भाषा की ‘शिक्ष्’ धातु में ‘अ’ प्रत्यय  लगाने से बना है। ‘शिक्ष्’ का अर्थ है सीखना और सिखाना। ‘शिक्षा’ शब्द का अर्थ हुआ सीखने-सिखाने की क्रिया।

जब हम शिक्षा शब्द के प्रयोग को देखते हैं तो मोटे तौर पर यह दो रूपों में प्रयोग में लाया जाता है, व्यापक रूप में तथा संकुचित रूप में। व्यापक अर्थ में शिक्षा किसी समाज में सदैव चलने वाली सोद्देश्य सामाजिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा मनुष्य की जन्मजात शक्तियों का विकास, उसके ज्ञान एवं कौशल में वृद्धि एवं व्यवहार में परिवर्तन किया जाता है और इस प्रकार उसे सभ्य, सुसंस्कृत एवं योग्य नागरिक बनाया जाता है। मनुष्य क्षण-प्रतिक्षण नए-नए अनुभव प्राप्त करता है व करवाता है, जिससे उसका दिन-प्रतिदन का व्यवहार प्रभावित होता है। उसका यह सीखना-सिखाना विभिन्न समूहों, उत्सवों, पत्र-पत्रिकाओं, दूरदर्शन आदि से अनौपचारिक रूप से होता है। यही सीखना-सिखाना शिक्षा के व्यापक तथा विस्तृत रूप में आते हैं। संकुचित अर्थ में शिक्षा किसी समाज में एक निश्चित समय तथा निश्चित स्थानों (विद्यालय, महाविद्यालय) में सुनियोजित ढंग से चलने वाली एक सोद्देश्य सामाजिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा छात्र निश्चित पाठ्यक्रम को पढ़कर अनेक परीक्षाओं को उत्तीर्ण करना सीखता है।

औपचारिक शिक्षा संपादित करें वह शिक्षा जो विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में चलती हैं, औपचारिक शिक्षा कही जाती है। इस शिक्षा के उद्देश्य, पाठ्यचर्या और शिक्षण विधियाँ, सभी निश्चित होते हैं। यह योजनाबद्ध होती है और इसकी योजना बड़ी कठोर होती है। इसमें सीखने वालों को विद्यालय, महाविद्यालय अथवा विश्वविद्यालय की समय सारणी के अनुसार कार्य करना होता है। इसमें परीक्षा लेने और प्रमाण पत्र प्रदान करने की व्यवस्था होती है। इस शिक्षा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह व्यक्ति, समाज और राष्ट्र की आवश्यकताओं की पूर्ति करती है। यह व्यक्ति में ज्ञान और कौशल का विकास करती है और उसे किसी व्यवसाय अथवा उद्योग के लिए योग्य बनाती है। परन्तु यह शिक्षा बड़ी व्यय-साध्य होती है। इससे धन, समय व ऊर्जा सभी अधिक व्यय करने पड़ते हैं।

निरौपचारिक शिक्षा संपादित करें वह शिक्षा जो औपचारिक शिक्षा की भाँति विद्यालय, महाविद्यालय, और विश्वविद्यालयों की सीमा में नहीं बाँधी जाती है। परन्तु औपचारिक शिक्षा की तरह इसके उद्देश्य व पाठ्यचर्या निश्चित होती है, फर्क केवल उसकी योजना में होता है जो बहुत लचीली होती है। इसका मुख्य उद्देश्य सामान्य शिक्षा का प्रसार और शिक्षा की व्यवस्था करना होता है। इसकी पाठ्यचर्या सीखने वालों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर निश्चित की गई है। शिक्षणविधियों व सीखने के स्थानों व समय आदि सीखने वालों की सुविधानानुसार निश्चित होता है। प्रौढ़ शिक्षा, सतत् शिक्षा, खुली शिक्षा और दूरस्थ शिक्षा, ये सब निरौपचारिक शिक्षा के ही विभिन्न रूप हैं।

इस शिक्षा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके द्वारा उन बच्चों/व्यक्तियों को शिक्षित किया जाता है जो औपचारिक शिक्षा का लाभ नहीं उठा पाए जैसे - 

वे लोग जो विद्यालयी शिक्षा नहीं पा सके (या पूरी नहीं कर पाए), प्रौढ़ व्यक्ति जो पढ़ना चाहते हैं,
कामकाजी महिलाएँ, जो लोग औपचारिक शिक्षा में ज्यादा व्यय (धन समय या ऊर्जा किसी स्तर पर खर्च) नहीं कर सकते। 
सरकुम:
शिक्षा कोई उम्र या संस्थान पे आधारित नहीं हैं।
सरोकार ओर विश्वास भी ऐसी चीजें हैं जो सिर्फ व्यक्ति पे निर्भर हैं। जैसे बड़ी संस्थान ओर मूर्ख विद्यार्थी। वैसे ही व्यक्ति खुद ओर  अपने वर्तन से ही अपनी स्थिरता को प्रमाणित कर पातें हैं।

Monday, January 28, 2019

मोगली की सच्ची कहानी...



 इन दिनों भारत मे नेटफ्लिक्स पर हिंदी रिलीज होने वाली फिल्म 'मोगली लेजेंड ऑफ द जंगल' की चर्चा जोरों पर है। हर कोई इसी बारे में बात करता नजर आ रहा है, सोशल मीडिया पर भी इस फ़िल्म की काफी हाइप बनी हुई है। और लोगों की उत्सुकता मोगली के बारे में जानने की काफी बढ़ चुकी है। और दोस्तो आज हम आपको बताएंगे कि असल में मोगली कौन था और कैसा दिखता था।

ये 1872 की बात है, कुछ शिकारी जंगल में शिकार करने गए हुए थे। वहां उन शिकारियों को भेड़ियों के एक झुंड के बीच इंसान जैसी एक आकृति दिखी। तो उन शिकारियों ने उन भेड़ियों की झुंड का पीछा किया और उनके गुफा में आग लगा दी और भेड़ियों को मार दिया और उस बच्चों को पकड़ लिया।

इसके बाद वो शिकारी उस बच्चे को एक अनाथालय ले गए, उस बच्चे का नाम दीना था। लेकिन वहां के लोगों ने उस बच्चे का नाम शनिचर रखा। उन्होंने उस बच्चे को इंसानो जैसी भासा सिखाने की बहुत कोशिश की लेकिन वो नही बोल पाया। और अगर कोई उससे बात करता तो वो हमेशा जानवरों जैसी ही आवाज़े निकालता था। ऐसा भी कहा जाता था कि वो बच्चा कई कार्यो में अविश्वसनीय ढंग से बल दिखता था।

वो बच्चा कई दशकों तक इंसानो के बीच रहा लेकिन वो कभी भी इंसानो की तरह बन नही पाया। उसे खाने में कच्चा मांस ही पसंद था, और वो शर्ट पैंट भी पसंद नही आता था। कहा जाता है कि इस बच्चे की ही कहानी से प्रेरित होकर ही रुडयार्ड किपलिंग ने मोगली की कहानी लिखी थी।


सरकुम:
एक सच्ची कहानी को हम सब ने देखा हैं।
अकेले होनेका दर्द न दिखाते हुए मोगली ने मनोरंजन किया हैं। हमे भी अपने गम छुपाकर खुश दिखाना ओर रहना हैं। वरना लोग खुश होंगे।

Saturday, January 19, 2019

बॉलीवुड के सक्सेस 8 मेकअप..


सिनेमा जगत में मेकअप का हमेशा से ही एक अहम रोल रहा है। पहले के जमाने में किसी जवान एक्टर को बूढ़े के किरदार में दिखाने के लिए उसकी दाढ़ी मूंछों और बालों पर सफेदी लगा दी जाती थी। लेकिन समय के साथ सिनेमा में भी बदलवा आने लगे। जिसके बाद पर्दे पर दिखाए जाने वाले किरदार और सीन पहले से ज्यादा वास्तविक लगने लगे। आज भारतीय सिनेमा भी काफी तरक्की कर चुका है। आज फिल्मों में बूढ़े स्टार्स को जवान और जवान स्टार्स को बूढ़े के किरदार में कुछ ऐसे तैयार किया जाता है, की कोई उन्हें पहचान भी नहीं पाता है। मेकअप आर्टिस्ट घंटों मेहनत करके इन स्टार्स के किरदारों को वास्तविकता बनाने की कोशिश करते है। पहले मेकअप करना और फिर मेकअप उतारना इसके लिए काफी मेहनत लगती है। लेकिन बॉलीवुड में कई बार ऐसा हुआ है जब इन स्टार्स के मेकअप को देखकर पहली नजर में हर कोई धोखा खा गया।

आज के पैकेज में जानिए वो 8 मौके, जब मेकअप आर्टिस्ट ने बॉलीवुड स्टार्स पर किया ऐसा जादू कि सभी देखते रह गए।



राजकुमार राव

राजकुमार राव न्यूटन और स्त्री जैसी फिल्मों से बॉलीवुड को अपने अभिनय का लोहा मनवा चुके है। राजकुमार ने फिल्म राब्ता में 324 साल की उम्र वाले व्यक्ति का किरदार निभाया था। लेकिन फिल्म में उनके किरदार को देखकर उन्हें कोई पहचान नहीं सकता। फिल्म में राजकुमार के मेकअप के लिए विशेष रूप से लॉस एंजेलिस से मेकअप आर्टिस्ट बुलाये गए थे। इन मेकअप आर्टिस्ट ने प्रोस्थेटिक मेकअप से राजकुमार को ऐसा लुक दिया की हर कोई इन्हें देखकर हैरान रह गया था।


अक्षय कुमार

रजनीकांत और अक्षय कुमार स्टारर इस फिम 2.0 का दर्शकों को बेसब्री से इन्तजार है। इस फिल्म में अक्षय विलेन के किरदार में नजर आ रहे है। फिल्म का टीजर रिलीज हो चुका है। जिसमें अक्षय का लुक लोगो को काफी पसंद आ रहा है। अक्षय के किरदार को वास्तविक बनाने के लिए विशेष रूप से न्यूजीलैंड के मेकउप आर्टिस्ट सीन फुट को बुलाया गया है। सीन हॉलीवुड फिल्म अवतार की स्टारकास्ट का मेकअप भी कर चुके है।


कमल हासन

कमल हासन को हर तरह के किरदार निभाने में महारत हासिल है। इन्होंने चाची 420 दशावतारम और इंडियन जैसी फिल्मों में निभाए किरदारों से अपने फैंस को सरप्राइज दिया है। साल 1996 में आई फिल्म इंडियन में उन्होंने एक बूढ़े का किरदार निभाया था। मेकअप के जरिए उनका लुक कुछ ऐसे बदल दिया गया था की फिल्म में दर्शक उन्हीं पहचान भी नहीं पा रहे थे।


अमिताभ बच्चन

फिल्म पा में अमिताभ बच्चन ने प्रोजेरिया पीड़ित लड़के औरो का किरदार निभाया था। जो कम उम्र में भी बूढा दिखाई देता है। इस किरदार के लिए अमिताभ को नेशनल अवार्ड भी मिला था। फिल्म में अमिताभ का मेकअप हॉलीवुड मेकअप आर्टिस्ट क्रिस्चियन टिंस्ले और डोमिनी टिल ने किया था। इन दोनों ने अमिताभ की काया कुछ ऐसे बदल दी थी की दर्शक बिग बी को देख हैरान रह गए।


ऋषि कपूर

ऋषि ने फिल्म कपूर एंड संस में 90 साल के क्यूट दादाजी का किरदार निभाया था। फिल्म के लिए ऋषि को बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर के फिल्मफेयर अवार्ड से भी सम्मानित किया गया था। फिल्म में ऋषि के किरदार को वास्तविक बनाने के लिए अमेरिका के मेकअप आर्टिस्ट ग्रेग केनोम की मदद ली गई थी। केनोम ने फिल्म के लिए 2 करोड़ रुपए चार्ज किए थे।


ऋतिक रोशन

ऋतिक ने फिल्म धूम 2 में एक बेहद कूल विलेन का किरदार निभाया था। फिल्म में ऋतिक कई तरह के गेटअप में नजर आए थे। फिल्म की एक सीन में जब ऋतिक एक बूढी महिला की किरदार में देखकर पहली नजर में हर कोई हैरान रह गया था। सबसे दिलचस्प बात ये है की फिल्म में ऋतिक का मेकउप इंडियन मेकअप आर्टिस्ट नहुष पिश ने किया था।



शाहरुख़ खान

शाहरुख़ खान ने फिल्म फैन में डबल रोल किया था। इस फिल्म को देखकर कई लोगों को तो इस बात पर यकीन भी नहीं हुआ था की फिल्म में उनके फैन गौरव का किरदार भी शाहरुख़ ने ही निभाया था। फिल्म के लिए शाहरुख़ खान का मेकअप भी ग्रेग केनोम ने ही किया था।



आमिर खान

3 इडियट्स के प्रमोशन के दौरान आमिर कुछ गेटअप में सौरव गांगुली के घर पहुंचे थे। सौरव के गार्ड्स आमिर को पहचान नहीं पाए थे। इसलिए उन्होंने आमिर को सौरव के घर में एंटर होने दिया। लेकिन बाद में पता चला की ये आमिर का प्रैंक था और सौरव ने उन्हें अपने घर डिनर पर बुलाया था।


सरकुम:

मेकप से रूप बदलता हैं, समज नहीं।
मेकप वाली जिंदगी से कुछ लोग खेल खेलते हैं।
जो सच हैं जो दिखाते नहीं, सच नहीं हैं उसे दिखाते रहते हैं।
प्यार सच हैं, दिखाई नहीं देता, हा सच्चे प्यार से भरोसा बढ़ाता जा रहा हैं।

मुजे मेकप पसंद नहीं हैं।
मेने जो सच हैं, देखा हैं सिर्फ सच को देखता हूँ।
में प्यार करता हु, ओर निभातभी हूं। मेरे जीवन मे कोई मेकप नहीं हैं।

25.1

Tuesday, January 15, 2019

बच्चो में आंखों का कैंसर...


अमेरिका में एक मां ने नया मोबाइल खरीदा जिससे उसने अपने बच्चे की फोटो खींची तो उसके सामने एेसा भयानक सच सामने आया कि वो हैरान रह गई । मामला टेक्सास का है जहां रहने वाली टीना ट्रेडवेल ने ...

न्यूयार्कः अमेरिका में एक मां ने नया मोबाइल खरीदा जिससे उसने अपने बच्चे की फोटो खींची तो उसके सामने एेसा भयानक सच सामने आया कि वो हैरान रह गई । मामला टेक्सास का है जहां रहने वाली टीना ट्रेडवेल ने एक नया मोबाइल खरीदा था जिससे वो अपने बेटे की फोटो खींच रही थी। टीना ने कई फोटो अपनी बहन को दिखाए, जिसमें उसकी दाहिनी आंख जानवरों की तरह चमक रही थी।
टीना को लगा कि ये मोबाइल के फ्लैश की वजह से हो रहा है, लेकिन उसे अनजाना डर सता रहा था। इसके बाद उसने एक डॉक्टर से इस बारे में बात की। जल्द ही उसकी आंख चमकने का खौफनाक कारण सामने आ गया। टीना जब बच्चे को डॉक्टर के पास ले गई तो उसका शक सही निकला। बच्चे की आंख फ्लैश की वजह से नहीं चमक रही थी, बल्कि उसे कैंसर था। डॉक्टर ने बताया कि उसे आंख का कैंसर है, जो छोटे बच्चों को होता है और बेहद रेयर होता है।
डॉक्टर्स ने कहा कि अच्छा हुआ कि बच्चे की मां ने फोटो के जरिए इस चीज की पहचान कर ली। कैंसर शुरुआती स्टेज में था और इसे रोका जा सकता था। हालांकि, डॉक्टर्स ने बताया कि ट्रीटमेंट में बच्चे की एक आंख खराब भी हो सकती है। इसके बाद बच्चे का ट्रीटमेंट शुरु कर दिया गया। - अमेरिकन कैंसर सोसायटी की रिपोर्ट के मुताबिक रेटीनोब्लास्टोमा नाम का ये कैंसर आसानी से डिटेक्ट किया जा सकता है। डॉक्टर्स ने कहा कि फ्लैश वाले मोबाइल कैमरे या फ्लैश लाइट से इसे देखा जा सकता है। ऐसे में अगर कैमरे में किसी बच्ची की आंख अजीब तरह से चमके, तो उसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

सरकुम:

आप एक ओर से देखते हैं।
हमने क्या खोया हमने बताया नहीं। आप खोने से पहले कोर्डन करना चाहती हैं। सवाल मेरे ओर आप के समान हैं, शायद आप को अभी जरूरत नहीं लगती की हमे जानकारी प्राप्त हो।

आप को जल्दी नहीं, मुजे भी देर नहीं हो रही हैं। सवाल ये हैं कि दोनों को जरूरत हैं या कोई एक आगे का सोचता हैं।

सोचिए...

आप की सोच सही हैं।
क्या लोग पागल होने का अभिनय कर सकते हैं?!

Friday, January 11, 2019

मिस थाईलैंड: सफाई कामदार की बेटी


मा सदैव मा होती हैं।
आप जो तस्वीर देख रहे हैं, वो थाईलैंड की हैं। बात हैं वर्ष 2015 की। वहाँ मिस थाईलैंड की प्रतियोगिता थी। विजेता गोशित किये गए। जिस लड़की को मिस थाईलैंड का खिताब मिला वो साधारण परिवार से तालुक रखती हैं।

उसकी माँ ने उसे पालपोसकर बड़ा किया हैं। उस के पापा नहीं हैं, उसकी मम्मी सफाई कामदार के तौर पे कूड़ा उठानेका काम करती हैं। अपनी ट्रॉफी ओर स्कार्फ लेके जब मिस थाईलैंड आपीने घर को निकली तब उसके पीछे स्थानीय मीडिया का जमावड़ा था। घर जाने से पहले रास्ते में उसने एक औरत के पैरों में अपनी ट्रॉफी रखकर उनका चरण स्पर्श किया, ये औरत उसकी माँ थी।

अपनी पहचान बनाने के लिए जिस ने उन्हें पाला उनके आगे नतमस्तक होना एक आदर्श विचार और व्यक्तित्व की पहचान हैं। आप के पास भी ऐसे फोटो हैं, तो कृपया हम तक पहुंचाए।

सरकुम:

मां...
सिर्फ शब्द काफी हैं।

बा...
सिर्फ विचार काफी हैं।

Tuesday, January 1, 2019

ऐसे विचार...कभी नहीं...



कुछ ऐसा जो सिर्फ सुनना हैं।
कुछ सवाल ओर कुछ निर्णय हमे सुनने होते हैं। कुछ को समज सकते हैं, मगर कुछ को समजना शायद संभव न हो।

जब किसी से अपेक्षा होती हैं, सीधा मतलब ये होगा की उपेक्षा भी अवश्य होगी। आप की किसी से अपेक्षा हैं तो आप को उपेक्षा भी सहनी होगी। हम आशा रख सकते हैं। उसे कभी छोड़ना नहीं चाहिए, क्यो की चमत्कार होते ही रहते है। जिस में हमे यकीन करना हैं। 

मेरे दोस्त...

दोस्त, मित्र के नाम से साथ रहने वाले, जो अपने गिरेबान को नहीं देखते हैं। ऐसे लोगो के साथ क्या करना चाहिए जो अपने आप को अलग मानकर किसी को अलग करनेपे तुले होते हैं। ऐसे लोगो को..... अलग से न्याय देना जरूरी हैं। जब तक उन्हें उनके कर्म की बजह से हम कुछ नहीं कहेंगे, वो चमत्कार करते रहेंगे। ऐसे समय हमें आशा रखनी हैं कि उनके चमत्कारों को हम अच्छे से चमकाए।


सरकुम:
यह वख्त भी गुजर जाएगा...!
मित्रो की सजा का एलान होगा...!
तभी गब्बर को खुद होश आएगा...।