Monday, August 20, 2018

समय को पहचानो....

क्या आप बहुत कोशिश करने के बाद भी समय पर अपना कार्य पूरा नहीं कर पा रहे हैं? हम समय के सही उपयोग या महत्व के विषय में बात करते हैं पर क्या हमें सही तरीके से पता भी है समय कहते किस चीज को हैं?
समय का महत्व जीवन में अन्य-अन्य पल में अलग-अलग होता है। कभी समय के जीवन के लिए बहुत ही अनमोल होता है तो कभी ना के बराबर।
एक छोटे बच्चे के लिए- समय ना के बराबर है। एक किशोर या young age के लिए- समय उत्साह, मज़ेदार,उमंग से भरा है।
एक वयस्क के लिए- समय कार्य से भरा हुआ है तथा बुजुर्गों के लिए- समय जरूरत से ज्यादा है।
आप सब ने एक कहावत तो सुना ही होगा ! धनुष से छुट हुआ तीर, मुह से निकला हुआ शब्द और बिता हुआ समय कभी वापस नहीं आता । अपने जीवन को सही तरीके से चलने में समय का बहुत ही ज्यादा महत्व है । इसके उपयोग के लिए सबसे जरूरी है अपने जीवन के मुख्य प्राथमिकताओं को समझना और उन्हें सही समय पर पूर्ण करना । समय के सदुपयोग या सही उपयोग से ही आप अपने जीवन के सभी क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकते हैं ।
सोचिये आपके कंपनी का कोई मुख्य कार्य जो आपको कुछ घंटों में पूर्ण करना है पर कार्य करते समय आपका कोई मित्र आपको फ़ोन करता है और आपको अपने घर खाने परु बुलाताहै ! तो ऐसे में आप क्या करेंगे ?
आपको इस सवाल का उत्तर देने से पहले यह निर्धारित करना पड़ेगा कि आप कौन से कार्य को ज्यादा प्राथमिकता देते हैं , अपने कंपनी के कार्य को या अपने अपने मित्र के निमंत्रण को ।
एक बात जरूर जानलें कि अपने जीवन के प्राथमिकताओं को आप जिस तरीके से पूर्ण करेंगे ! उसी प्रकार आपकी प्राथमिकतायें भी आपके सपनों को पूरा करने में देर नहीं करेंगी । अगर आप अपने सभी कार्यों को सही तरीके से पूरा करना चाहते हैं तो अपने समय के मूल्य को समझें और अपने कार्य को पहला प्राथमिकता देकर जल्द से जल्द पूरा करें । समय को सही तरीके से समझने के लिए हमें पहले यह जानना बहुत जरूरी है कि समय कहते किस चीज को हैं ? कुछ तो ऐसा हैं हमारे ओर हमारी प्राथमिकता के बीच मे, हम गा सकते हैं,

तेरे मेरे बीच मे...
कैसा हैं आए बंधन अंजाना...

एक खूबसूरत गाना।
जो आप ने सुना ही होगा।
में कुछ दूसरे अंदाज में उसे याद करता हूँ। मुजे मालूम नहीं कि क्या हैं मगर कुछ तो ऐसा हैं जो कुछ खास हैं।
कुछ ऐसे बंधन होते हैं जो हमे बंधन नहीं मुक्ति का अहसाह दिलाते हैं। एक बात ये भी समाज लेनी हैं कि जिस कहानी में हमे सिकंदर ओर पोरस की बात याद करनी हैं। ये बंधन सिकंदर ओर पोरस की कहानी भी उतनी ही महत्वनपूर्ण हैं। बस, ऐसा ही व्यवहार हम तब करे जब हम विजेता हो। कभी ऐसा होता हैं जिसमें हारजीत नहीं सफलता और विश्वास को देखना होता हैं।
ये अनजाना बंधन नहीं हैं। ऐसा जान पड़ता हैं कि अब जो हैं वो सब कुछ अनजान नहीं हैं। आगे क्या होगा, क्या समस्या या सवाल  आएंगे वो भी मालूम हैं।सो जो हैं उसे देखो, जो होगा उसे देख लेंगे।  कभी कभी ऐसा होता हैं कि हमे कुछ ध्यानमें नहीं आता।

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जब सोच हैं।
सो सोच हैं।अब उसे पूरा करने के लिए क्या करना हैं वो तय करें।

Friday, August 17, 2018

अटल जी को...


कोई सर्जक ऐसा नहीं जिसका सर्जन जो भी हो अच्छा हो। कोई बेस्टमेन ऐसा नहीं कि हर मैच में शतक लगाए। किसी सिंगर ऐसा नही जिस के सभी गाने हिट होते हो। मगर 'अटल'जी के लिए ऐसा न था। उनकी ज्यादातर कहिए कि सभी कविताए श्रेष्ठ थी। मगर मुजे जो पांच सबसे ज्यादा पसंद हैं वो आप के लिए...

1. गीत नहीं गाता हूँ

बेनकाब चेहरे हैं दाग बड़े गहरे है,
टूटता तिलस्म आज सच से भय खाता हूं,
गीत नहीं गाता हूं.

लगी कुछ ऐसी नज़र,
बिखरा शीशे सा शहर,
अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूं.
गीत नहीं गाता हूं.

पीठ में छुरी सा चांद,
राहु गया रेख फांद,
मुक्ति के क्षणों में बार बार बंध जाता हूं.
गीत नहीं गाता हूं.

2. क्या खोया, क्या पाया जग में

क्या खोया, क्या पाया जग में,
मिलते और बिछड़ते मग में,
मुझे किसी से नहीं शिकायत,
यद्यपि छला गया पग-पग में,
एक दृष्टि बीती पर डालें, यादों की पोटली टटोलें.

पृथ्वी लाखों वर्ष पुरानी,
जीवन एक अनन्त कहानी
पर तन की अपनी सीमाएं,
यद्यपि सौ शरदों की वाणी,
इतना काफी है अंतिम दस्तक पर खुद दरवाजा खोलें.

जन्म-मरण का अविरत फेरा,
जीवन बंजारों का डेरा,
आज यहां, कल कहां कूच है,
कौन जानता, किधर सवेरा,
अंधियारा आकाश असीमित, प्राणों के पंखों को तौलें.
अपने ही मन से कुछ बोलें.

अटल बिहारी वाजपेयी का निधन, जब लता मंगेशकर की इस बात पर खूब हंसे थे पूर्व PM

3. एक बरस बीत गया

एक बरस बीत गया,
झुलासाता जेठ मास.
शरद चांदनी उदास.
सिसकी भरते सावन का.
अंतर्घट रीत गया.
एक बरस बीत गया.

सीकचों मे सिमटा जग.
किंतु विकल प्राण विहग.
धरती से अम्बर तक.
गूंज मुक्ति गीत गया.
एक बरस बीत गया.

पथ निहारते नयन,
गिनते दिन पल छिन,
लौट कभी आएगा,
मन का जो मीत गया,
एक बरस बीत गया.

4. जीवन बीत चला

कल कल करते आज,
हाथ से निकले सारे,
भूत भविष्यत की चिंता में,
वर्तमान की बाजी हारे.

पहरा कोई काम न आया,
रसघट रीत चला,
जीवन बीत चला.

हानि लाभ के पलड़ों में,
तुलता जीवन व्यापार हो गया,
मोल लगा बिकने वाले का,
बिना बिका बेकार हो गया.

मुझे हाट में छोड़ अकेला,
एक एक कर मीत चला,
जीवन बीत चला,


5. सच्चाई यह है कि

सच्चाई यह है कि
केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती,
सबसे अलग-थलग,
परिवेश से पृथक,
अपनों से कटा-बँटा,
शून्य में अकेला खड़ा होना,
पहाड़ की महानता नहीं, ,मजबूरी है.

ऊँचाई और गहराई में
आकाश-पाताल की दूरी है.
जो जितना ऊँचा,
उतना एकाकी होता है,
हर भार को स्वयं ढोता है,
चेहरे पर मुस्कानें चिपका,
मन ही मन रोता है।

ऐसे व्यक्ति को खोकर भारत ने एक वैश्विक व्यक्ति को खोया हैं। एक वक्ता ओर एक व्यक्ति। वो जो बोलते थे उस पर वो चलते थे।उनकी दुनिया में जुठ न था। अगर देखा जाए तो उनके जन्म दिवस या मृत्यु तिथि को सहज साहित्य दिन के तौर पर याद रखवाना चाहिए। सरकार ही ते कर सकती हैं।

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मुजे बाजपाई पसंद हैं।
सुष्मा स्वराज के बजह से।
क्योकि तबमें छोटा था।
संसंद का सीधा प्रसारण हुआ था।  सुष्माजी प्रसार भारती मंत्रालय की मंत्री थी।भारती मंत्रालय में न होती। बाजपाई जी अविश्वास पर भाषण देते अगर मेने टी.वी. में लाइव नहीं देखे और सुने होते तो...

Sunday, August 12, 2018

सिकंदर कैसे मरा...


सिकंदर
सिर्फ नाम काफी हैं।
कहते हैं सिकंदर पूरी दुनिया जितने निकला था। वो आधे पहुंचा और कहीं पे उनका केम्प रुका था। यहाँ एक ज्योतिषी थे। बहोत मशहूर ज्योतिषी थे। वो हाथ देखकर सब कुछ ओर सच बता सकते थे।
सिकंदर ने उन्हें बुलाया। सन्मान के साथ उसे पूछा 'आप मुजे ये बताए कि मेरी मौत कब होगी।' उस ज्योतिषी ने देखा,सिकंदर का हाथ पकड़कर देखा। उसे सिकंदर कब और कैसे मरने वाले थे वो बता सकते थे। ज्योतिषी ने सोचा 'अगर मरने का समय और स्थान बताया तो सिकंदर उसे मार देता। ज्योतिषी ने उसे कहा ' आप की मोत तब होगी जब लोहे की धरती और सोने का आकाश होगा। ये सुनकर सिकंदर खुश हो गया। उस ने वजीर को कहा 'अब हम दुनिया जीत लेंगे। क्यो की धरती लोहे की ओर सूरज सूने का तो होगा नहीं।बस,क्या था सिकंदर ने अपने सैन्य को आगे बढ़ने के आदेश दिए। वो अपने काफिले के साथ फारस जा रहा था। उस वख्त के फारस को हम आज ईरान के नाम से पहचानते हैं। सिकंदर का काफल ईरान,अफगानिस्तान और बलोचिस्तान के रण को जोड़ने वाले विस्तार से आगे बढ़ रहे थे।रास्ते मे सिकंदर बीमार हुआ। उनके वैध भी उनके साथ थे। उनके वजीर भी सिकंदर की सेवा में थे। दिनबदिन सिकंदर की हालत बिगड़ती जा रही थी। सिकंदर को ठंडा बुखार याने मलेरिया हुआ था। अब सिकंदर घोड़े पे बैठ नहीं पाता था। वो अब पालखी में था। अब सिकंदर जैसे सिकुड़ गया था। उसने वजीर को कहा मुजे सीधा लेटना हैं। मुजे जमीन पे लेटाओ। वजीर के पास बिछाने के लिए कुछ नहीं था। उसने अपने सारे शस्त्र बिछाकर सिकंदर को लेटने के लिए जगा बनाई। सिकंदर उसपे लेता। कोई पेड़ तो था नहीं कि उनको छांव मिल पाए।बस,अब क्या था। सिकंदर के वजीर ने ढाल से उन के ऊपर सूरज की किरणें न आये वैसे पकड़ के रखा। सोने की ढाल को वजीर छाते की तरह पकड़ के रख था।
सिकंदर ने उनके वैध को कहा 'आप मुजे कुछ दिनों तक जिंदा रहने की औषध दिलवाए, में मेरी माँ के आंचल में मरना चाहता हु। वैध जी ने कहा 'में आप को एक भी सांस नहीं दे पाऊंगा। ये सुनकर वजीर रो रहा था। सिकंदर को वो आगाही याद आई जो ज्योतिषी ने कही थी। लोहे की जमीन और सोने का आकाश।सिकंदर को मालूम हो गया कि अब वो मरने वाला हैं। हमे ये तो मालूम हैं कि सिकंदर ने अपने हाथ खुल्ले रखने को कहा था। उन्हें दफनाते वख्त उनके हाथ खुल्ले छोड़े गए थे। सिकंदर ने कहा था कि मेरी दफन विधि में विश्व के सभी वैध ओर हकीमो को बुलाना जिससे सबको मालूम पड़े की सांस खरीदी नहीं जाती।
सिकंदर ने विश्व विजेता होने पर भी ऐसी हालत में मरता हैं, यही कुदरत का न्याय हैं।

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जब आया था सिकंदर,
होन्सले तो आली थे।
जब गया था दुनिया से दोनों हाथ खाली थे।



जय हो...

Saturday, August 11, 2018

ताना समुदाय ओर देश भक्ति

गांधीजी ने स्वदेशी सामग्री का आग्रह रखा था। वो खाड़ी के वस्त्र    की बात करते थे।किसी को रोजी मिलती ओर किसीको सस्ता कपड़ा। आज के दिन 1947 को देश आज़ाद हुआ।  खादी के वस्त्र तो तब से जैसे कम होने लगे।आज जो खादी मिलती हैं वो महंगी हैं।अक्टूबर महीने में खादी थोड़ी सस्ती होती है तब जाके हमारे जैसे लोग एक कुर्ता या शर्ट खरीद लेते हैं।
आजनके दिनगर किसी ने खादी के वस्त्रों को सदैव के लिए अपनाएं हैं तो वो हैं, ताना भगत समुदाय के लोग।जो आज भी गांधी टोपी ओर खादी के वस्त्र पहनते हैं।
ताना भगत समुदाय के लोगो के बगैर हम हिंदुस्तान की आज़ादी का इतिहास नहीं लिख सकते हैं।अरे इस समुदाय के लोगो ने आज तक आए प्रथा संभाली हैं।सुबह में वो त्रिरंगे को सलामी देने के बाद ही अपना काम करते हैं।हाला की उनके तिरंगे में अशोक चक्र के बदले रेंटिया दिखता हैं।पहले बिहार और अब ज़ारखण्ड में ये समुदाय रहता हैं।उनका देश प्रेम किसी एक दिन के लिए नहीं मगर कायम के लिए रहता हैं।आज उनके बारे में बात करेंगे।

बात हैं एक महंत की।
उनका नाम जतरा भगत। वो आदिवासी को एक करके उन की सामाजिक और व्यक्तिगत बुराई को निकाल के उनको एक करना चाहते थे। उन्हों ने बली वहाडने का,मदिरणपण ओर सामाजिक अन्यं कुरिवाजो के सामने आवाज उठाई।सबको एक किया। उस जमाने में उन्होंने 26000 से अधिक लोगो का एक समुदाय बनाया। जतरा भगत के इस समुदाय में जुड़ने वालो को ताना भगत समुदाय के लोग कहे जाने लगे। उन्हों ने अंग्रेज सरकार को किसी भी बात का कर देने से इनकार किया। पूरे समुदाय ने इस बात को पकड़ा और कर न देनेका तय किया। ताना भगत समुदाय के लोग अंग्रेजो को दुश्मन लगने लगे। जतरा भगत ओर अन्य आंदोलन करने वालो को पकड़ा। अंग्रेजो को लगा कि ये ताना समुदाय की बाते उन्हें परेशान कर रही थी। उन्हें जेल में डालदिया गया। जेल से छूटते ही उनका आकस्मिक अवसान हुआ।उनके बाद वाले कार्यकरो ने उस मुहिम को आगे बढ़ाया। ये उस वख्त की बात हैं जब गांधीजी देश नेता के तौर पर उभर रहे थे। ताना भगत समुदाय सीधा बापु से जुड़ गए। उस जमाने में उन्हों ने बापु को 400 रुपये की सहाय राशि देश को आज़ाद करने के लिए इकट्ठा कीओर बापु तक पहुंचाई।आज चारसौ का महत्व नहीं हैं। में आजादी के पहले की बात करता हूँ। 1922 में गया स्थित कोंग्रेस अधिवेशन में बड़ी संख्या में ताना समुदाय के लोग आए।
इस समुदाय के लोगो के पास जमीन थी।देश की आजदिनके लिए वो जेल में गए।कुछ जमीन छूटने के लिए बेचनी पडी। कुछ जमीन अंग्रेजो ने लेली। 1948 में गांधीजी के आग्रह से भारत सरकार ने अंग्रेजो के द्वारा 725 ताना समुदाय के लोगो की  खालसा की हुई 4500 एकड जमीन वापस करने के लिए संसद में ताना भगत रैयत लेंड रेस्टोरेशन एक्ट पारित किया। गांधीजी ने उन्हें वचन दिया था कि आप को आपकी जमीन वापस मिल जाएगी।  गांधी बापु का अवसान हुआ।आज तक एक भी ताना समुदाय के लोगो को उनकी जमीन 72 साल के बाद भी नहीं मिल पाई हैं।और फिर भी वो रोज त्रिरंगे को वंदन करके ही अपना काम शुरू करते हैं।


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वैसे तो उस प्रदेश में  बिहार में 125 परिवारों को 1000 एकड़ जमीन वापस दी थी।कृष्णसिंह नाम के बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री को छोड़कर कोई आज बाकी की 3500 एकड़ जमीन के लिए कुछ नहीं बोला।

वर्ल्ड लेफ्ट हेंडर्स डे...

नरेंद्र मोदी,सचिन तेंदुलकर और अमिताभ बच्चन में क्या समानता हैं।क्या मधर टेरेसा को इन तीनो से कुछ मेल खाता होगा? इसका जवाब हैं।ये चारो अपने लेफ्ट हेंड का उपयोग करते हैं।वर्ष 1976 से 13 ऑगस्ट को इंटर नेशनल लेफ्ट हेंडर्स डे के तौर पे मनाया जाता हैं।
विश्वमें 10% लोग ऐसे होते हैं जो उल्टे हाथ से लिखते हैं। ज्यादातर समाज में राइट हेंडर्स के लिए ही सारी सुविधा आए बनाई गई हैं। कैंची या राइटिंग पेड़ और कॉम्प्यूटर की बोर्ड के ऊपर  0 से 9 अंक भी की बोर्ड के राइट साइड में हैं। जो सीधा हाथ वाला हैं उनके लिए लेफ्ट साइड की जेब अच्छी होगी। एमजीआर जो लेफ्टि हैं उनके लिए लेफ्ट हाथमें से लेफ्ट साइड वाली शर्ट की जेब से कुछ निकालना मुश्किल हैं।हम जो घड़ी पहनते हैं उस की चाबी बहार रहती हैं। ऐसी घड़ी को लेफ्टि वॉच कहते हैं। हम घड़ी को लेफ्ट में इस लिए पहनते हैं की हमारा सीधा हाथ राइट हैं। अब सवाल ये हैं कि जो सभि काम लेफ्ट हाथ से करता हैं वो घड़ी राइट हाथ में पहनेंगे तो चाबी को अंदर रखना पड़ेगा।तो क्या लेफ्टि के लिए राइट हाथ में घड़ी पहने ओर चावी बाहर रहे जैसे हमारी लेफ्ट हेंड वॉच में होतो?
समजे...
ऐसी बहोत सारी चीजें हैं जो अब उपलब्ध हैं। खासकर हमे सरलता से कैंची लेफ्ट ओर राइट हेंड की मिलती हैं। मगर अब ऐसी सहेजे मिलना शुरू हुई हैं। इंडियन लेफ्ट हेंडर्स क्लब के सदस्यों ने ऐसी लेफ्टि चीजो का म्यूजियम बनाया हैं। यहां से ऐसी चीजें मिलती भी हैं।आप भी अगर लेफ्टि हैं या आप के कोई दोस्त या साथी लेफ्टि हैं तो आप इंडियन लाइफ हेंडर्स क्लब को सहयोग में ले सकते हैं।

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गांधीजी दोनो हाथो से लिखते थे।
उनके हस्ताक्षर खराब थे मगर वो जब उल्टे हाथो से लिखते तब तब उनके अक्षर अच्छे निकलते थे।

ત્રીજો ગધેડો

એક કુંભાર પાસે ત્રણ ગધેડા અને ફક્ત બે દોરડા હતાં. પોતાને નદીમાં ન્હાવા માટે જવું હતું એટલે તેણે ગધેડાઓને દોરડાથી બાંધવાનું વિચાર્યું પણ, દોરડા બે જ હતાં અને ગધેડા ત્રણ !
તેણે એક માણસની સલાહ લીધી. એ માણસે કહ્યું કે, "તું બે ગધેડાને, ત્રીજો ગધેડો જુએ તે રીતે બાંધ અને પછી ત્રીજા ગધેડાને બાંધવાનો ફક્ત અભિનય કર, નાટક કર..
કુંભારે એમ જ કર્યું !
નહાઈને, બહાર આવીને જોયું તો, જેને નહોતો બાંધ્યો, ફક્ત બાંધવાનું નાટક જ કર્યું હતું તે ગધેડો પણ જાણે બંધાયને ઉભો હોય એમ નો એમ ઉભો હતો. 
કુંભારે બે ગધેડાઓને છોડયાં અને ચાલવા માંડ્યો પણ, એનાં આશ્ચર્ય વચ્ચે ત્રીજો ગધેડો પોતાનાં સ્થાનેથી હલ્યો નહીં. ધક્કો માર્યો તો પણ નહીં. કુંભારે ફરી પેલા ડાહ્યા માણસને પૂછ્યું.પેલા માણસે કહ્યું કે, "શું તે એ ત્રીજા ગધેડાને છોડ્યો ?"
કુંભાર કહે કે, "મેં તેને બાંધ્યો જ નહોતો.''

પેલા માણસે કહ્યું કે, "એ તું જાણે છે કે ગધેડો બંધાયેલ નથી પણ, ગધેડો પોતાને બંધાયેલો જ સમજે છે.તું એને છોડવાનું નાટક કર. કુંભારે તેમ જ કર્યું, ને તેના આશ્ચર્ય વચ્ચે હવે ત્રીજો ગધેડો ટેસથી ચાલવા લાગ્યો.

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તું સાવ ગધેડા જેવો છે એમ નહિ હવે આપણે કહીશું 'તું સાવ ત્રીજા ગધેડા જેવો છે.

अपेक्षा ओर उपेक्षा



प्रसन्न रहने के लिए हम बहोत कुछ करते हैं। प्रसन्न रहना किसे पसंद नहीं हैं।मगर कुछ वख्त ऐसा होता हैं कि प्रसन्न ता के अवसर पर भी हम प्रसन्न नहीं रह पाते।
इस के लिए दो बातें ही तय हैं।
अपेक्षा ओर उपेक्षा।

खुशी के मौके पर अगर हम खुश नहीं रह पाते तो उसका मतलब हैं हमारी अपेक्षा अधिक हैं,या तो हमे उपेक्षित होने का अहसास हैं।जो भी हैं भगत इस से हमारी खुशी कम हो जाती हैं। खुशी और प्रसन्नता दो अलग बाते हैं।अगर कोई हमारी उपेक्षा नहीं कर रहा हैं और हमे ऐसा लगे तो इसका मतलब आप मानसिक रूप से थके हैं या आपको आराम की जरूरत हैं।कोई हमारी को उपेक्षा करे उसमें गलती हमारी हैं।सीधा मतलब ये हैं कि हो सकता हैं हमारी अपेक्षा ज्यादा हो।प्रसन्न रहने के लिए जब भी कोई सवाल या समस्या आये तो उसमें सही गलत क्या हैं वो नहीं मगर हम उस समस्या में होते तो क्या करते।बस,यही विचार आप को प्रसन्नता के करीब ले जाएगा।

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मुजे खुश रहना हैं।
मेरी खुशी सिर्फ मेरे हाथों में हैं।
मुजे खुश रहना है,क्यो की मेरे पीछे बहोत जिम्मेदारी हैं।

હું સારો...તમે ?


કોઈ પણ હોય.નક્કી છે કે એને હદ હોય. મારા એક મિત્ર કહે છે 'હદ થાય અથવા રદ થાય.' કોઈ પણ વસ્તુ ને કે તેના સારા પણા ને એટલી હદે ઉપયોગ ન કરવો કે જેને લીધે એ ખરાબ થવા મજબૂર થાય.મોટે ભાગે આવું બને છે. આપણા જીવનમાં હોય તેવી વસ્તુ કે વ્યક્તિ ને સાચવી લેવી જોઈએ.એમ અહમ,વહેમ કે ભ્રમ ન જ રખાય.આ પોસ્ટર આમ તો દરેક ને વાંચવું ગમે એવો સંદેશ આપે છે.હા,આપણે એને કેવા અર્થમાં લઈએ છીએ એ પણ જોવું જરૂરી છે.
કહેવાય છે કે સબંધ ને મજબૂત બનાવો મજબૂર નહીં.એમ જ અહીં કહેવાય કે વ્યક્તિમાં ખરાબી હિય તો તેને સુધારો, સુધારવા તક આપો.સુધારવામાં સહાય કરો. જીદ કે એવું વર્તન આખી વાત અને સાથોસાથ જિંદગી બદલી નાખે છે.

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કોઈ કોઈનો ફાયદો ઉઠાવી શકે એમ નથી.સૌ પોતાનો ફાયદો જોઈને જ બીજાને લાભ આપે છે.એવું માનનાર એ ભૂલી જાય છે કે ફાયદા કરતાં વાયદાને મહત્વ અપાયું હોય તો આવું ન થાય.

जरूरत ओर शोध


जरूरत शोध की जननी हैं।
आप को ये विधान सांजे ने के लिए ओर कुछ नहीं करना हैं।सिर्फ फोटो को देख कर समज़ लेना हैं।अगर देखा जाए तो आए तय हैं कि जब हम किसी की जरूरत होती हैं,हम उस सुविधा या व्यवस्था के लिए कुछ नया खोज लेते हैं।
कोई व्यक्ति अपने कद के कारण एक बेंच पे नहीं सो सकता था। अब करें भी तो क्या करें।उन्हों ने एक नया रास्ता निकाला जो में आपको शेर कर रहा हूँ।

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जीवन में सुविधा नही,साहस और समर्पण महत्वपूर्ण हैं।रास्ते तो बहोत निकलेंगे,अगर मनमे ठाना हैं तो कुछ तो होगा।

Friday, August 10, 2018

આવું કેવું...


આજકાલ સ્પા સેન્ટરનું મહત્વ વધતું જાય છે.થોડાક વર્ષો પહેલાં આ સુવિધા અમદાવાદ શહેરમાં જ જોવા મળતી હતી. આવું જ એક સ્પા સેન્ટર રાજકોટમાં હતું. હતું એટલા માટે કે ત્યાં થોડા દિવસ પહેલાં પોલીસે તપાસ કરી ને આ સેન્ટર બંધ કરાવવામાં આવ્યું. જાણવા મળેલ વિગત મુજબ સ્પા સેન્ટરની પકડાયેલ યુવતી કેટલીક મહિલાઓ ન હતી. જન્મથી પુરુષ અને લિંગ પરિવર્તન  ખરેખર લિંગ પરિવર્તન  કરાવેલા યુવકો હતા!
અગાઉ રાજકોટના યુવાઓ સ્પા તેમજ મસાજ માટે અમદાવાદ સુધી લાંબા થતા હતા, આ જ કારણે શહેરમાં બિલાડીના ટોપની જેમ સ્પા સેન્ટર્સ ફૂટી નીકળ્યા હતા.ન્યૂઝ 18 ગુજરાતીના એક અહેવાલ મુજબ રાજકોટના કેટલાક કહે છે કે સ્પા માં 
 'અમે તો ભારે છેતરાયા....' આવું જ કંઇક રાજકોટમાં બન્યું. થોડા મહિનાઓથી રાજકોટના યુવાઓને વિદેશ યુવતીઓ પાસે બોડી સમાજ કરાવવાનું ઘેલું લાગ્યું હતું. શહેરમાં વિવિધ સ્પા અને મસાજ પાર્લર પર પોલીસના દરોડા પડ્યા હતા. આ દરોડા દરમિયાન પોલીસે 45 જેટલી વિદેશી યુવતીઓની ધરપકડ કરી હતી.' તપાસ બાદ હવે માલુમ પડ્યું છે કે આ 45માંથી 7 યુવતી એવી છે જેણે સેક્સ ચેન્જ (લિંગ પરિવર્તન) કરાવ્યું હતું. તેનો જન્મ છોકરા તરીકે થયો હતો પરંતુ બાદમાં ઓપરેશન કરાવીને તે છોકરામાંથી છોકરીઓ બની હતી. આ સમાચાર મીડિયામાં આવતા જ બોડી મસાજનો લાભ લેનાર રાજકોટના અનેક યુવકો વિચારતા થઈ ગયા છે કે ક્યાંક મારી વાળી તો એ ન્હોતી ને...?  
 છેલ્લા એક બે વર્ષથી રાજકોટમાં સ્પાનું ચલણ ખૂબ વધ્યું હતું. અહીં બિલાડીની ટોપની જેમ સ્પાની હાટડીઓ ખુલી ગઈ હતી. પોલીસને એવું આશંકા હતી કે આ સ્પામાં કામ કરનારી વિદેશી યુવતીએ ગેરકાયદે ભારતમાં આવીને કામ કરી રહી છે. તેમજ સ્પામાં બીજા ગોરખધંધા પણ ચાલી રહ્યા છે. આને ધ્યાનમાં રાખીને જ રવિવારે એકસાથે આખા શહેરમાં સ્પા સેન્ટર્સ પર દરોડા કરવામાં આવ્યા હતા.  
 સ્પામાં કામ કરતી યુવતીઓની પોલીસે અટકાયત કરી હતી. તેમજ તેમના પાસપોર્ટ જપ્ત કરી લેવામાં આવ્યા હતા. તપાસ બાદ માલુમ પડ્યું હતું કે આ યુવતીએ ગેરકાયદે રીતે ભારતમાં રહીને સ્પા સેન્ટર્સમાં કામ કરતી હતી.  સ્પામાં કામ કરતી યુવતીઓની પોલીસે અટકાયત કરી હતી. તેમજ તેમના પાસપોર્ટ જપ્ત કરી લેવામાં આવ્યા હતા. તપાસ બાદ માલુમ પડ્યું હતું કે આ યુવતીએ ગેરકાયદે રીતે ભારતમાં રહીને   અમુક યુવકોએ નામ જાહેર ન કરવાની શરતે જણાવ્યું હતું કે આજથી બે-ત્રણ વર્ષ પહેલા રાજકોટના અસંખ્ય યુવકો સ્પા અને સમાજ પાર્લર માટે અમદાવાદ સુધી લાંબા થતા હતા. પરંતુ હવે ઘર આંગણે જ એટલે કે શહેરમાં જ વિદેશીઓ યુવતીઓ પાસે સ્પા અને મસાજનો આનંદ મળી રહે છે. આજ કારણે અહીં બિલાડીની ટોપની જેમ સ્પા ફૂટી નીકળ્યા હતા.
હવે સવાલ એ છે કે લોકો અનેક ખોટું કરી વિદેશમાં કમાવા જાય છે.જ્યારે વિદેશના લોકો હવે ખોટા પુરાવા આપી આપણાં દેશમાં કમાય છે.

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શાંતિથી વિચારજો.
સ્પા માં મસાજ કરવા માટે મહિલાઓ જ કેમ?

Thursday, August 9, 2018

अल्फाज नहीं:विचार


कुछ दोस्त ऐसे होते हैं।
कुछ दोस्त अलग ही होते हैं।
कुछ दोस्त खास होते हैं।पिछले चार दिनों से कुछ ऐसे दोस्तोंके साथ था जिनके साथ 10 साल से अधिक समय से काम कर रहा हूँ।साथ साथ काम करए हैं।मगर ये सिर्फ दोस्त नहीं मुजे नजदीक से पहचान ने वाले हैं, जो मुजे कभी थकने नहीं देते हैं। जब भी में थकता हु मुजसे मिलकर मुजे सहकार देते हैं। साथ देते हैं।
में कुछ लोगो से इसी लिए रिस्ते रखता हूं कि मुजे उनकीं जरूरत हैं।वो ऐसे खास होते हैं जो अपने अल्फाज से इलाज करते हैं।वो अल्फाज से इलाजी हैं।ऐसे कुछ मेरे दोस्त जिनके सहकार से जिनके सहयोग से आज में जो हु ओर जो बनुगा मेरे दोस्त और मेरी सरकार पर निर्भर हैं की मेरा भविष्य क्या होगा।में सिर्फ शिक्षा से जुड़े काम के अलावा कुछ और करना चाहता हूं।मेरे दोस्त और मेरी सरकार मुजे शिक्षा में ऐसा काम करने का मौका देती हैं। जो पसंद हैं। अब नया काम करना चाहूंगा।
मेरे ऐसे सभी दोस्त जो मेरे दुख में मेरे हिस्सेदार हैं,रहे है और रहेंगे उन सब के लिए आज का पोस्टर।
जिस में मेरे अल्फाज नहीं,मेरे विचार हैं।

ऐसा ही होता हैं....


बच्चे अनुकरण से सीखते हैं।
हम जैसा करेंगे बच्चे वैसा ही करेंगे।आज कल जब मम्मी पापा मोबाइल नहीं छोड़ रहे हैं तो बच्चे केसे किताब पढेंगे।
एक फोटोग्राफ जो मुजे किसी ने भेजा हैं।एक माँ अपने बच्चों के साथ प्रवासमें हैं।जहाँ बैठने की जगह नहीं हैं,वहाँ बच्चो के साथ बैठकर खुद भी किताब पढ़ती हैं।अगर मा के हाथों में मोबाइल होता तो बच्चा भी मोबाइल के लिए तैयार था।यहाँ माँ भी किताब पढ़ती हैं।बच्चा भी उन्हें देखकर वैसा ही काम करेगा जो उसकी मम्मी कर रही हैं।

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आज भी हम वोही करते हैं,जो हमने देखा हैं।हम वैसा ही करना चाहिए जो हमने न सुना न देखा हो।

Wednesday, August 8, 2018

शिक्षा और स्किल



शिक्षा को हम देखते हैं।उसे समझ ने का प्रयत्न करते हैं।हमारे आसपास कुछ ऐसे लोग ओर ऐसी घटनाएं होती हैं।इस कि हझ से हमे ओर भी चिंतन करने का मौका मिलता हैं।
आज कल शिक्षा में रटना ओर लिखवाना या कहिए पेपर देखकर उसको वोमिट करना एक सामान्य   रास्ता हैं।सिर्फ मेरिट केओ ध्यान में रखकर हमे भविष्य दिखाई पड़ता हैं।
सिर्फ रटलेने से हमारा भविष्य ओर सामने वाले कि समज को हम जान ने का दावा करते हैं।क्या हमारा वो दावा सही हैं?अगर है तो सभी जगह रटने से पास हुए लोग तो नजर नहीं आते हैं।ज्यादा तर रोजगारी प्राप्त करने वाले स्किल से ही आमदनी का रास्ता खोजते हैं।अगर स्किल से कामना है तो रटकर जीवन बर्बाद करना जरूरी नहीं हैं।
आज स्किल इंडिया की बात अभी शुरू हुई हैं।आगे स्किल से ही हम अपना ओर देश का विकास कर पाएंगे।


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स्किल वाला बेरोजगार नही होता।
रटने वाला स्किल वाला नहीं होता।