Tuesday, May 28, 2019

घर में वाहन हैं...अवश्य पढ़ें...

आजकल के समय में लोग पब्लिक ट्रांसपोर्ट में यात्रा करना पसंद बेहद कम करते हैं। क्योंकि आजकल के समय में लोग अपना वाहन खरीदने में ज्यादा ठीक समझते हैं. लेकिन अब दोपहिया वाहनों के लिए कल से पूरे देश में 2 नियम लागू होंगे तो, इस खबर को आखिर तक जरूर पढ़े. आज के शीर्षक के मुताबिक जिनके घर में है बाइक और स्कूटी उनके लिए बुरी खबर पूरे देश में लागू होंगे तो नियम है।

तो चलिए जानते हैं उन दो बड़े नियमों के बारे में

सबसे पहले हम आपको बताते हैं कि, अगर आप भी बाइक और स्कूटी या किसी भी प्रकार का अन्य दो पहिया वाहन चलाते हैं तो, आपको यह खबर आखिर तक जरूर पढ़नी चाहिए तो, चलिए हम आपको सबसे पहले नियम के बारे में बताते हैं जो, कल से लागू हो जाएगा। दरअसल दोपहिया वाहनों पर व्यक्तिगत बीमा कवर ₹200000 की क्लेम राशि हुआ करती थी लेकिन अब इस को बढ़ाकर ₹1500000 कर दिया गया है।

दूसरा बड़ा फैसला भी जान लीजिए...

अब आपको दूसरे बड़े फैसले के बारे में बताते हैं। दरअसल अब आपको दो पहिया वाहन खरीदने के लिए 5 साल का थर्ड पार्टी इंश्योरेंस लेना अनिवार्य हो जाएगा। आपकी जानकारी के लिए बता देते हैं कि हमने इस विषय के बारे में बुरी खबर इसलिए बताइ। क्योंकि अब आपको इन दोनों चीजों के लिए ज्यादा पैसे देने पड़ेंगे।

Saturday, May 25, 2019

“छत्तीसगढ़ में आठवीं के बच्चे ऐसे क्यो?

इस दौर में हम ज्ञान द्वारा सत्य की सुंदरता और सहजीवन को सींचने के बदले आत्ममुग्धता में डूब रहे हैं। इन परिस्थितियों के लिए शिक्षा भी उत्तरदायी है। वह विकास की अनुगामी बन चुकी है। शिक्षा जिस विकास की अनुगामी है उसका अर्थ बढ़ोत्तरी है। इस बढ़ोत्तरी को धन या संपत्ति के रूप में संग्रहित कर सकते हैं। इसके आधार पर कम या ज़्यादा का निर्णय कर सकते हैं। ऐसे सामाजिक विभाजन कर सकते हैं जिसमें एक समूह के पास विकास का परिणाम होगा और दूसरे के पास इसका अभाव होगा। इस पृष्ठभूमि में स्थापित कर दिया गया है कि शिक्षा जैसे औजार इस विकास में सहयोग करेंगे।

भारतीय परंपरा में आर्थिक और सामाजिक पर्यावरणीय विकास एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। हम विचार और वस्तु में दोहन का संबंध देखने के बदले सृजन और सहअस्तित्व का रिश्ता बनाते हैं। ऐसी शिक्षा के लिए केवल औपचारिक प्रयासों पर निर्भर नहीं रहा जा सकता है। हमारे घर, समुदाय और सांस्कृतिक गतिविधियां भी शिक्षित करने का माध्यम हैं। हमें इन माध्यमों और अपनी भूमिकाओं पर विचार करने की ज़रूरत है।

हमें सोचना होगा कि खुद शिक्षित होने के बाद अपने बच्चों को शिक्षित करने के दौरान हम शिक्षा की प्रक्रियाओं से जुड़ने और उसमें योगदान करने का कितना प्रयास करते हैं।

हमें स्कूल जो बता देता है, उसे हम मान लेते हैं। हम मन लेते हैं कि स्कूल जो भी करता है हमारे बच्चों की भलाई के लिए करता है लेकिन इस ‘भलाई’ के कार्य में आपके योगदान का क्या? हमारी भूमिका ‘सामान’ खरीदने वाले ग्राहक की तरह होती जा रही है जो केवल सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास करता है।

हिन्दुस्तान में स्कूलों को इस बात से कोई मतलब ही नहीं है कि बाहर उनके स्कूल के बच्चे क्या कर रहे हैं। यही हाल अभिभावकों का भी है, जिन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि स्कूल में उनके बच्चे क्या कर रहे हैं। अभिभावक और स्कूल के बीच संवाद बहुत कम होता जा रहा है।

विचार कीजिए कि आप पढ़ने-पढ़ाने के अलावा बच्चे के संसार के बारे में जानने की कितनी कोशिश करते हैं। हमारी दिनचर्या में बच्चों से बात करने का कितना हिस्सा है? कब हम उनके मीठे व कड़वे अनुभव से खुद को जोड़ते हैं? कब उनसे दुनियादारी की बातें करते हैं? कब स्कूल से हम उसकी गतिविधियों के बारे में सवाल करते हैं? स्कूल कब बच्चे के अनुभवों के बारे में अभिभावक को बताता है? कब अभिभावक और शिक्षक बैठकर बच्चे की कमज़ोरी और मज़बूती पर चर्चा करते हैं? इन सारे सवालों को हम केवल स्कूल के भरोसे नहीं छोड़ सकते हैं।

ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था के दौर में ज्ञान केवल उत्पादन का साधन नहीं है, बल्कि उत्पादन के अन्य संसाधनों को डिक्टेट करने वाला निवेश है। अर्थ प्रधान दुनिया में शिक्षा एक वस्तु के समान बन चुकी है जो आर्थिक लाभों के उद्देश्य से उपयोग में लाई जा रही है।  हमारा ध्यान केवल उन्हीं दक्षताओं पर है जो उत्पादन व्यवस्था के लिए उपयोगी है। इसी व्यवस्था का प्रमाण है कि औपचारिक शिक्षा व्यवस्था हर क्षेत्र के लिए विशेषज्ञता का प्रमाणपत्र बांट रही है।

#Bno...

छत्तीसगढ़ से में अवगत हु।
2010 ओर 11 के बीच वहाँ काम किया हैं।
ये समस्या का समाधान भी वहां के एक अधिकारी ने किया था। उनके बारे में फिर कभी।

Friday, May 24, 2019

विजया मुले


जो दूरदर्शन को नजदीक से फॉलो करते रहे हैं, उन्हें टीवी का मशहूर ऐनिमेटेड गाना ‘एक चिड़िया अनेक चिड़िया’ बेशक याद होगा। 80 दशक के अंत और 90 की शुरूआत में यह गाना घर-घर पॉपुलर हुआ था। गाने को रोजाना दूरदर्शन पर प्रसारित किया जाता था। इस फेमस गाने का निर्देशन कर मशहूर हुईं फिल्ममेकर विजया मुले का 98 साल की उम्र में रविवार को उनके दिल्ली स्थित आवास पर निधन हो गया।

विजया मुले इस 7 मिनट की फिल्म के कारण ही लोगों के दिलों में जगह नहीं बनाई थी बल्कि वह अपने अन्य कामों के लिए भी मशहूर हैं। मुले को बेस्ट सिनेमा राइटिंग के लिए नेशनल अवॉर्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है। यह केवल फिल्ममेकर नहीं बल्कि फिल्म हिस्टोरियन भी थीं।

मुले ने डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकिंग में भी हाथ अजमा चुकी हैं।। कहा जा जाता है कि विजया मुले पूर्व दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की करीबी दोस्त भी थीं। मुले पटना फिल्म सोसायटी की फाउंडर मेंबर भी रह चुकी हैं। इसके अलावा उन्होंने दिल्ली फिल्म सोसायटी में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। फिल्मों के अलावा मुले ने शिक्षा क्षेत्र में भी काम किया था।

Wednesday, May 22, 2019

સમજે કોણ...



પ્રેમનો પણ કેવો અનોખો છે. પ્રેમ એટલે લાગણી અને આત્મિયતા.દરેક વ્યક્તિ જેને  પોતાના સમજતો હોય તેવા સૌને પ્રેમ કરે છે. પરંતુ જીવનના સંબંધમાં એક સંબંધ એવો પણ હોય છે. જેમાં લોહીનો સંબંધ ન હોવા છતા અન્ય સંબંધ કરતા વિશેષ હોય છે. આ સંબંધમાં ક્યારેક નોક-જોખ, મજાક-મસ્તી ચાલતું જ હોય છે અને આમ જ જીવનની ગાડી ચાલ્યા કરે છે.

લાઇફ પાટર્નર સાથેના સંબંધમાં ક્યારેક કોઇ વાતને લઇને મતભેદ સર્જાતા હોય છે. પાર્ટનરમાંથી કોઇને જો ગુસ્સો આવે ત્યારે તેમના વડે કંઇક બોલાઇ જાય છે.

ઘણી વખત તમારા પાર્ટનરને ખરાબ પણ લાગી શકે છે. તો આવી પરિસ્થિતીમાં થોડા સમય બાદ ભૂલ કરનારે પોતાની ભૂલ સ્વીકારીને માફી માંગી લેવી જોઇએ. 

કેટલીક વ્યક્તિ માને છે, અમે એકબીજાને પ્રેમ કરીએ છીએ તેથી એકબીજાના સ્વભાવને પણ ઓળખીએ છીએ. તેથી ક્યારેય અમને ખોટું નથી લાગતું. ઘણી વ્યક્તિ એમ પણ કહે છે કે પોતાની વ્યક્તિ પાસે થોડી માફી મંગાય. કેટલીક વ્યક્તિ ને એમ જ હોય છે કે આ વખતેય મારી જ જીત થશે. તો આવા વ્યક્તિને કહેવું છે કે બિલકુલ માફી માંગવી જ જોઇએ. શક્ય છે કે સામે વાળાએ જ્યારે જ્યારે sori કીધું હોય ત્યારે તેને સબંધ ને મહત્વ આપ્યું હોઈ શકે.

સામાન્ય રીતે કોઇ વ્યક્તિ સામે છીંક ખાઇએ, કે કોઈને રસ્તામાં ભટકાઇ જઇએ તો એક શિષ્ટાચારના ભાગરૂપે આપણે સોરી શબ્દ કહીએ છીએ. તો સાવ અજાણી કે જાણીતી વ્યક્તિને પણ તમે સોરી કહીને દિલગીરી વ્યક્ત કરી શકતા હોઇએ તો તમારે તમારી ભૂલ માટે જે વ્યક્તિને પ્રેમ કરો છો તેની આગળ તો પોતાની દિલગીરી વ્યક્તિ કરવી જ જોઇએ.

ઘણી વખત મનથી આપણે દિલગીર હોઇએ, અને આશા રાખીએ પાર્ટનર તેને સમજે તો એ શક્ય ન પણ બને. મનમાં વિચારવા કરતાં, થોડા સમય અબોલા રહે, અને સંબંધમાં દૂરી વધે તે પહેલા જ પોતાની ભૂલનો સ્વીકાર કરી લેવો જોઇએ. પછી એમ કહેવાય કે મને ડર હતો કે હું આ વિગત કેવી રીતે જણાવું. તમે એ ન સાંભળી શકો.એ માટે તમને એ વાત ન કરી.

 માફી માંગવાથી કોઇ વ્યક્તિ નાની કે મોટી નથી થઇ જતી, પરંતુ પોતાની ભૂલનો સ્વીકાર કરવાથી સંબંધમાં વિશ્વાસ, પ્રેમ વધુ ગાઢ બને છે. તે સાથે લાઇફ પાર્ટનરના મનમાં તમારા માટે માન વધશે. તેથી જ્યારે પણ ભૂલ સમજાય ત્યારે માફી માંગી લેવી જોઇએ. કોઈએ એક વખત પાર્ટનરે કીધું હોય કે તું જે છે મારા લીધે જ છે. મારા વડે,મારા ઉપયોગ થકી આપ આટલે છો. જો સત્ય હોય તો સ્વીકારવું જ પડે. આપના પાર્ટનરે આવું આપને ગુસ્સામાં કહ્યું હોય. અહીં વિચાર એ કરવો કે પાર્ટનર ને આટલો ગુસ્સો આવ્યો કેમ?

જ્યારે જીવનનો હિસ્સો એવો પાર્ટનર કોઈ ભૂલ સ્વીકારી લે અને તમે એને એ જ ભૂલ માટે સતત વાગોવો કે વારંવાર કહી સંભળાવો ત્યારે સામેની વ્યક્તિ ગમેતે બોલવા માંડે. ઘર કે ગાડીમાંથી ગેટ આઉટ કહ્યું હોય તે વાત મિત્ર ભૂલી જાય અને તમે સતત એ મિત્રને દરેક વાતે ખોટા સાબિત કરો ત્યારે ભૂલ થયા કરતાં તેના સ્વીકાર ને ન માનનાર અભિમાની હોઈ શકે.

Monday, May 20, 2019

सवाल का जवाब...



को ज्यादा पगार क्यो होता है ?
और क्यो होना चाहिये..? इस बात को जानने के लिए आप इस प्रसंग को पढ़े।

पिकासो (Picasso) स्पेन में जन्मे एक अति प्रसिद्ध चित्रकार थे। उनकी पेंटिंग्स दुनिया भर में करोड़ों और अरबों रुपयों में बिका करती थीं...!!

एक दिन रास्ते से गुजरते समय एक महिला की नजर पिकासो पर पड़ी और संयोग से उस महिला ने उन्हें पहचान लिया। वह दौड़ी हुई उनके पास आयी और बोली, 'सर, मैं आपकी बहुत बड़ी फैन हूँ। आपकी पेंटिंग्स मुझे बहुत ज्यादा पसंद हैं। क्या आप मेरे लिए भी एक पेंटिंग बनायेंगे...!!?'

पिकासो हँसते हुए बोले, 'मैं यहाँ खाली हाथ हूँ। मेरे पास कुछ भी नहीं है। मैं फिर कभी आपके लिए एक पेंटिंग बना दूंगा..!!'

लेकिन उस महिला ने भी जिद पकड़ ली, 'मुझे अभी एक पेंटिंग बना दीजिये, बाद में पता नहीं मैं आपसे मिल पाऊँगी या नहीं।'

पिकासो ने जेब से एक छोटा सा कागज निकाला और अपने पेन से उसपर कुछ बनाने लगे। करीब 10 मिनट के अंदर पिकासो ने पेंटिंग बनायीं और कहा, 'यह लो, यह मिलियन डॉलर की पेंटिंग है।'

महिला को बड़ा अजीब लगा कि पिकासो ने बस 10 मिनट में जल्दी से एक काम चलाऊ पेंटिंग बना दी है और बोल रहे हैं कि मिलियन डॉलर की पेंटिग है। उसने वह पेंटिंग ली और बिना कुछ बोले अपने घर आ गयी..!!

उसे लगा पिकासो उसको पागल बना रहा है। वह बाजार गयी और उस पेंटिंग की कीमत पता की। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि वह पेंटिंग वास्तव में मिलियन डॉलर की थी...!!

वह भागी-भागी एक बार फिर पिकासो के पास आयी और बोली, 'सर आपने बिलकुल सही कहा था। यह तो मिलियन डॉलर की ही पेंटिंग है।'

पिकासो ने हँसते हुए कहा,'मैंने तो आपसे पहले ही कहा था।'

वह महिला बोली, 'सर, आप मुझे अपनी स्टूडेंट बना लीजिये और मुझे भी पेंटिंग बनानी सिखा दीजिये। जैसे आपने 10 मिनट में मिलियन डॉलर की पेंटिंग बना दी, वैसे ही मैं भी 10 मिनट में न सही, 10 घंटे में ही अच्छी पेंटिंग बना सकूँ, मुझे ऐसा बना दीजिये।'

_पिकासो ने हँसते हुए कहा, _'यह पेंटिंग, जो मैंने 10 मिनट में बनायी है_ ...


इसे सीखने में मुझे 30 साल का समय लगा है...

मैंने अपने जीवन के 30 साल सीखने में दिए हैं ...

तुम भी दो, सीख जाओगी..!!

वह महिला अवाक् और निःशब्द होकर पिकासो को देखती रह गयी...!!

एक  अध्यापक को 40 मिनट के लेक्चर की जो तनख्वाह दी जाती है । वो इस कहानी को बयां करती है। एक अध्यापक के एक वाक्य के पीछे उसकी सालों की मेहनत होती है । समाज समझता है कि बस बोलना ही तो होता है अध्यापक को मुफ्त की नौकरी है!!!


"ये मत भूलिए कि आज विश्व मे जितने भी सम्मानित पदों पर लोग आसीन हैं, उनमें से अधिकांश किसी न किसी अध्यापक की वजह से ही पहुँचे हैं."


"और हाँ, अगर आप भी अध्यापक की तनख्वाह को मुफ़्त की ही समझते हैं तो एक बार 40 मिनट का प्रभावशाली और अर्थपूर्ण लेक्चर देकर दिखा दीजीये, आपको अपनी क्षमता का एहसास हो जाएगा."

#Bno...

शिक्षक को पगार ज्यादा देना चाहिए। क्यो की अगर भविष्य वर्गखंड में पल रहा हैं तो शिक्षक उस भविष्य का निर्माता हैं। निर्माण करने में बहोत समस्याए आती हैं। सदैव सच बोलने का दावा करने वाले शिक्षक भी कभी कभी ऐसा गलत कर देते हैं कि उन्हें ओर बाद में कइयों को भुगतना पड़ता हैं।


Friday, May 17, 2019

છોકરીને ચંપલ...


થોડાક દશકથી સૂર્યનારાયણની ગરમી વધી છે,ધરતીમાતા વ્યાકુળ બની છે,પવનદેવ ફુગર્યા છે,જાફરાબાદ ના દરિયાકિનારાના પાણી તપ્યા છે.કાળઝાળ ગરમીમાં જેને પગ અને પાંખો છે તે પોતીકો મારગ શોધી લે. ત્યાં અમારું શું...?
  
    
   એક એવી છોકરી જેના શરીર પર હાડ મેલ જામી ગયેલો.માથાના વાળ શાહુડીનાં પીંછા જેવા થઈ ગયેલા.પાણીની વ્યવસ્થા માટે ભરવાનું પાત્ર ક્યાં ..? માટે નાહવાનો લાભ જ ક્યાં.
    શાળાએ આવતા જતા ઘણીવાર એ મને સામે ભટકાઈ જતી.એનાથી બે ફૂટ દૂર હોઈએ તોય નાક દુર્ગધથી ભરાઈ જતું.મને બાળકો ગમતા.દયાભાવ પણ ખરો,પણ અસ્વચ્છતાથી ભારે સૂગ.ઘણીવાર એને સમજાવું પણ પથ્થર ઉપર પાણી.

        મારા વર્ગમાં અભ્યાસ કરતી દેવી પૂજક ની જ્ઞાતિમાંથી આવતી ધોરણ :-૨ ની વિદ્યાર્થીની ચુડાસમા શારદા બાળપણથી જ માતા ગુમાવી પિતા અને મોટી બહેનને ટીબી નામના રોગે ભરડો લીધો પથારી વશ કરી દીધા.દાદીમા જોડે રહીને આખો દિવસ પોતાના પિતા અને તેમના પેટનો ખાડો પુરવા ભીખ માંગીને બટકું-બટકું  ભેગું કરે.પોતાના શરીર ને ઢાંકવા માટે છ મહિનાથી બે જોડી જ કપડા હતા. તેમાં એક તો શાળાનો યુનિફ્રોમ.

      જેમના ઘરે રાંધવા માટે તેલનું ટીપું  ના હોય તે પોતાના માથામાં તેલ નાખીને શાળાએ કેવી રીતે આવે..? જેમના મકાનની ઉપરની છત ના હોય તે પોતાની પગની છત કેવી રીતે ઢાંકે...? અવારનવાર વાલી સંપર્ક કરવાનો થાય ત્યારે આ દ્રશ્ય કઈક અલગ જ તરી આવતું. આજે આશા એ જાગી કે આ ચપલ આ દીકરી ને  પહેરાવવાનો મને વિચાર સ્ફુર્યો છે. ખૂબ આનંદ થયો.
   
શ્રી મિતિયાળા પ્રા.શાળા
તા.જાફરાબાદ જિ. અમરેલી

રઘુ રમકડું...


#Bno...

मुजे कोई कुछ भेजता हैं,अगर वो बात मुजे अच्छी लगी तो शेर करता हु। आप को पसंद आये तो आप भी शेर करें।

शिक्षा के ग्राहक

शिक्षा के मामले में हमारी भूमिका सामान खरीदने वाले ग्राहक की तरह हो गई है” शिक्षा के बारे में ख्याल आते ही कई सारी चीज़ें ज़हन में आने लगती हैं। विद्यालय भवन, शिक्षक, बच्चे और किताबों के बारे में हम सोचने लगते हैं। ये छवि वर्तमान की तुलना में भविष्य का सुंदर चित्र उकेरती है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि शिक्षा हमारे सुरक्षित भविष्य को सुनिश्चित करने वाला साधन है। इसका प्रमाण आप ‘बड़े आदमी’ के मिथक के रूप में देख सकते हैं जिसके लिए शिक्षित होना एक ज़रूरी शर्त है।

वर्तमान समय में इसी सुरक्षित भविष्य की उम्मीद में हम शिक्षा के लिए हर संकट उठाने को तैयार रहते हैं। क्या आपने कभी शिक्षा के भविष्य के बारे में सोचा है? बदलते समय में शिक्षा की परिकल्पना और बदलावों को समझना आवश्यक है। शिक्षा के भविष्य पर बात करने से पहले इसके अतीत और वर्तमान का उल्लेख करना भी ज़रूरी है। यहां शिक्षा का मकसद व्यक्ति को जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के कौशल सीखाना था। धीरे-धीरे शिक्षा सामाजिकता के विकास का माध्यम बन गई। मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ नागरिकता के गुणों के विकास को भी शिक्षा के लक्ष्यों से जोड़ दिया गया।

औद्योगिक क्रांति के बाद तो शिक्षा की भूमिका में आमूलचूल परिवर्तन देखने को मिली। यह मानव संसाधन तैयार करने वाले साधन के रूप में स्वीकार की जाने लगी। लिखने, पढ़ने और गिनने की दक्षताएं, उत्पादन की कुशलताएं और प्रभावपूर्ण तरीके से मानसिक और शारीरिक श्रम की आदत का विकास हमारे शिक्षा व्यवस्था का एकमात्र लक्ष्य बन गया। शिक्षा के व्यापक प्रसार, शिक्षित होने की लालसा और शिक्षितों के समाज में इसी लक्ष्य का साकार रूप देखा जा सकता है।

पिछले कुछ दशकों में हमारे समाज और संस्कृति में महत्वपूर्ण बदलाव आ चुके हैं। एक दौर में शिक्षा के कंधों पर विकास की ज़िम्मेदारी थी लेकिन आजकल यही शिक्षा विकास और वैश्वीकरण के पीछे चल रही है। शिक्षा की तीनों संकल्पनाओं जैसे, सत्य की खोज, मानव की दशाओं में सुधार और बौद्धिक व शारीरिक श्रम के उत्पादन में से हमारी शिक्षा व्यवस्था बाद के दो उद्देश्यों को ढो रही है। विडंबना देखिए हम अपने व्यवहार, विश्वास और रिश्तों में व्यक्तिनिष्ठ होते जा रहे हैं। इसका प्रभाव केवल बाहरी स्तर तक नहीं है, बल्कि हमारी चेतना की सांस्कृतिक जड़े कमज़ोर हो रही हैं। शिक्षा जैसी व्यवस्था भी इसकी जड़ को नहीं संभाल पा रही हैं।

#Bno...

में शिक्षा से जुड़ा हु।
मगर में ग्राहक पैदा करने के खिलाफ हु।
मुजे कुछ ऐसा करना हैं कि जिससे ग्राहक न बढ़े और न बने।