Wednesday, September 19, 2018

स्किल ओर खोज


हरेक के पास स्किल का होना असंभव हैं। स्किल के लिए महेनत ओर लग्न से शुरू करते हुए उसके पीछे आयोजन पूर्वक श्रम करना पड़ता हैं।

कुछ दिनों पहले की बात हैं। त्रिपदा इंटरनेशनल स्कूल में मुजे जाना था। जैसे गाड़ी पार्क कर के मुजे गेट से एंटर होना था। एक व्यक्ति ने हमे रोका। उन्होंने मेरा नाम और किसे मिलना हैं,जैसे सवाल किए। मुझसे बात करते समय वो अपने हाथ में कुछ कर रहे थे।
मेने भी उनसे बात की।
वो चोक से गणेश जी की मूर्ति बना रहे थे।बहोत कम समय में वो एक मूर्ति बना लेते हैं। त्रिपदा स्कूल के सिक्योरिटी जवान जो करते थे। में देखता रह गया। जैसे में स्कूल में जाने को था,की जैसे मुजे गणेश जी ने दर्शन दिए। में खुश हुआ। आप उनकी बनाई मूर्तिया देख सकते हैं।

संपर्क:
जितेंद्र राजपूत
जवाहर चोक, साबरमती।
अमदावाद:5
Phone no: 
9824598650


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स्किल को खोजने में नजर चाहिए।
नजर में कुछ और आता हैं तो स्किल नजर नहीं आएगी।
आप को नजर ओर नजरिया दोनो बदलने पड़ेंगे तो ही आगे सफलता मिलेगी।

Tuesday, September 18, 2018

સમય તો જાશેજ...


30મી જૂલાઈ 1947 ના રોજ ઓસ્ટ્રિયામાં જન્મેલા વિખ્યાત બોડી બિલ્ડર, અભિનેતા અને બે વખત કેલિફોર્નિયાના ગવર્નર રહી ચૂકેલા આર્નોલ્ડ શ્વાર્ઝેનેગરે પોતાની જ પ્રસિદ્ધ કાંસ્ય પ્રતિમાની નીચે પોતે શેરીમાં સૂતેલા હોવાનો એક ફોટો પોસ્ટ કરી એની નીચે લખ્યું, "સમય કેટલો બદલાઈ ગયો છે !!!"
             તેમણે જે વાક્ય લખ્યું તેનું કારણ એ હતું કે જ્યારે તેઓ કેલિફોર્નિયાના ગવર્નર હતા ત્યારે તેમણે તેમની પ્રતિમા સાથેની એક હોટલનું ઉદ્ઘાટન કર્યું હતું. તે સમયે, હોટેલ માલિક અને સ્ટાફ આર્નોલ્ડની આસપાસ ફરતાં રહેતાં અને કહેતાં, "કોઈપણ સમયે તમે આ હોટલમાં આવીને રહી શકો છો. તમારા માટે અહીં એક રુમ કાયમને માટે અનામત રાખવામાં આવશે." જ્યારે આર્નોલ્ડે ગવર્નર તરીકેનું પદ છોડ્યું અને હોટેલમાં ગયા ત્યારે, વહીવટીતંત્રે એવી દલીલ કરી દીધી કે તેમણે રુમ લેવો હોય તો તેના માટે ચૂકવણી કરવી જોઇએ, કારણ કે આ હોટલની ડીમાન્ડ બહુ વધી ગઈ છે..
          આર્નોલ્ડ સ્લીપિંગ બેગ લાવ્યાં અને પ્રતિમાની નીચે જ સૂઈ ગયાં. તેઓ આમજનતાને એવો મેસેજ આપવા માંગતા હતા, " જ્યારે હું એક મહત્વના પદ પર હતો ત્યારે તેઓ હંમેશા મારા વખાણ કર્યા કરતાં અને જ્યારે મેં એ પદ ગુમાવ્યું  ત્યારે તેઓ મારા વિશે બધું જ ભૂલી ગયા અને તેમનું વચન પણ યાદ ન રાખ્યું."
          દોસ્તો, આપણાં પદ પર અથવા આપણાં નાણાંની રકમ પર વિશ્વાસ કરવા જેવો નથી. આપણી શક્તિ, કે આપણી બુદ્ધિ પણ કાયમી નથી. આપણું પદ કે પ્રતિષ્ઠા મહત્વનું હોય ત્યારે દરેક વ્યક્તિ આપણી મિત્ર હોય છે. પરંતુ, એ જ પદ, પ્રતિષ્ઠા કે પૈસા ન રહે ત્યારે કોઈ આપણી પાસે ફરકતું પણ નથી. એટલે, "મારી પાસે આજે જે કંઈ છે એ બધું જ કાયમી છે એવું માનવાની ભૂલ કદી ન કરવી !!!"


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જ્યારે સમય ફેવર કરે ત્યારે બધું ગોઠવેલ હોય તો ખરાબ સમયે એ જ કામ આવે.
#એક ચીની કહેવત...

જ્યારે સમય બરબાદ કરનાર સમયનો હિસાબ માગે ત્યારે સમય વધારે બરબાદ થાય છે.
#રતન ટાટા...

दो खिड़कियां


कुछ दिनों पहले की बात हैं।
किसी दोस्त ने एक पोस्टर भेजा।
खिड़की में से जो दिखाई देती हैं, वो हकीकत के सामने बच्चे को जो चाहिए वैसा उसने बनाया हैं।

प्रत्येक व्यक्ति की चाहत होती हैं,चाहत सहज हैं कि उसे शांति मील पाए,सहयोग मील सके। होता हैं ये की अपनी पसंद की खोड़की बनाने के बजाय हम जो दिखता हैं उसे स्वीकार कर लेते हैं। जो भी हैं,ठीक है। हमे हमारे इरादों को कमजोर नहीं करना हैं। अगर खिड़की में जो दिखता हैं उसे स्वीकार करने की हिम्मत नहीं हैं तो अपनी सोच वाली खिड़की बनाने में कोई हर्ज नहीं हैं। सवाल ये होता हैं कि खिड़की को सी चुनते हैं।

क्या हुआ कुछ नहीं।
कैसे हुआ मालूम नहीं।
कैसे ये होगा, तय नहीं।
कुछ बुरा होना संभव नहीं।


जी पेश करने का तरीका गलत हैं।सवाल सही नहीं तो जवाब कैसे गलत नहीं आएगा। जो भी होता हैं पसंद या ना पसंद वाला उसमें 3 रीजन हैं...

1. फरज निभाने में...
2. जिम्मेदारी के कारण...
3. किसी के अनुचित उद्देश्य से...

इन तीन बजह से ये काम हमे करने पड़ते हैं। मगर फिरभी खिड़की तय करने का काम हमारा हैं।हम हमारी आँखे खोलकर ही खिड़की को पसंद करने हैं।


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बेशुमार होता हैं अकेले सोचने का दर्द,
जब सोचकर जब दर्द ही सामने आता हैं।

कैसे होगा जीवन में किसी सोच को पकड़ना,
यहाँ तो बात पकड़ने में  महीनों गुजर जाते हैं।

Monday, September 17, 2018

जहांगीर ओर बच्चे

मेरे दोस्त और मेरे साथी।
पिछले कुछ सालों से हम साथ में जुड़कर काम कर रहे हैं।
एक नव सर्जक ओर विचारक की पहचान बनाने वाले श्री जहांगीर शेख की पहचान बनी 3 इडियट्स पिक्चर से। वो रियल रेंचो हैं।उनके बनाये हुए इनोवेशन को इस फ़िल्म में दिखाया गया हैं।

निजी हालत ऐसी की हर नए विचार को फैलाने के लिए उन्हें रुकना पड़ता हैं। एक तरफ परिवार का खर्च ओर दूसरी तरफ काम का नशा। नई सोच बढ़ाने का काम और प्रोटोटाइप बनाने में इतना खर्च होता हैं कि उन्हें सदैव पैसों की जरूरत हैं।पिछले कुछ सालों से तो उन्हें मेरे फाउंडेशन से में सीधी मदद करता हु।
पिछले कुछ दिनों से वो गुजरात में हैं।उत्कर्ष विद्यालय ओर त्रिपदा इंटरनेशनल स्कूल में उन्होंने बच्चों से ओर अध्यापको से चर्चा की।आज वो गुजरात से गये हैं।आप उनके कार्यक्रम का आयोजन करना चाहते हैं तो अवश्य संपर्क करे।

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जहांगीर की कार्यशाला में सारे देश से बच्चे आते हैं। आप भी आप की संस्था या बच्चो को जोड़ सकते हैं।

Sunday, September 16, 2018

मेरे गणेशा...



आजे गणेश विसर्जन किया।
पिछले कई सालो से हम गणेश जी की स्थापना करते हैं। इस वर्ष भी किया। कुछ ऐसा हुआ कि श्यामको स्थापन करने के आयोजन में में रहा, मगर दो पहर को स्थापित करने पड़े। कुछ कम सामग्री से उनको स्थापित किया। शायद घर के सभी सदस्य भी इस बार न थे। मगर प्यारसे उन्हें स्थापित किया। पूजा अर्चन के साथ हम आज आत्म की पवित्र तिथि पर उनका विसर्जन करते हैं। आज उनको मेने विसर्जित किया। मेरे दुःख दर्द जैसे उनके विसर्जन के बाद विसर्जित हो जाएंगे।

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मेरे गणेश जी...
सिर्फ मेरे गणेश जी...
जी गणेश जी की सरकार....
अबकी बार ओर अधिक इंतजार...

Saturday, September 15, 2018

समर्थ ओर सेतु...



आईआईएम अमदावाद।
GCERT गांधीनगर के संयुक्त उपक्रम से एक कॉन्फ्रेंस का समापन हुआ। वर्ष 2014 के MOU के तहत बहोत सारे ऐसे काम जो नवाचार को बढ़ावा दे रहे हैं। कुछ ऐसे काम जो शिक्षकों को पहचान दे रहे हैं। वैसा ही एक काम और वो काम याने मोबाइल मंच। आधुनिक समय में मोबाइल के माध्यम से जो हो पाया हमने उसे देखा।
उद्घाटन समारंभ में सर्व शिक्षा अभियान के एडीपीसी पी.भारती मेडम विशेष उपस्थित रही। पद्मश्री अनिल गुप्ता ,आईआईएम के प्रो. विजया शेरीचंद के अलावा कमिश्नर ऑफ स्कूल के डॉ. संजय त्रिवेदी उपस्थित थे। श्री मनजीभाई प्रजापति,श्री मोतिभाई नायक ओर श्रीमती ज़ोहराबेन ढोलिया विशेष उपस्थित थे। 
दो पहर के समारोह में GCERT के नियामक डॉ. टी.एस.जोशी खास उपस्थित रहे और सभी को प्रेरक उद्बोधन भी किया। NCERT के प्रोफेसर परासर ओर  प्रो. दिनेश कुमार भी दोपहर के सैशन में उपस्थित रहे।
10000 सदस्य वाले इस ग्रुप के 500 से अधिक पॉइंट प्राप्त करने वाले शिक्षक,सीआरसी ओर बीआरसी को.कॉर्डिनेटर यहां निमंत्रित किये गए थे। मोबाइल मंच को अगर माध्यम के रूप में देखा जाय तो यहाँ 3 किताबो का विमोचन किया गया। जिन्हें दो अलग अलग सेशन में विमोचित किया गया। प्रेजेन्टेशन के समय GCERT के सचिव श्री बी सी सोलंकी विशेष रुचि के साथ उपस्थित रहे।
सारे गुजरात के सभी शिक्षकों के सामने ये सारी बाते रखी गई। इस डेटा को ओपन सोर्स करके ज्यादा से ज्यादा लोगो तक पहुंचाने का संकल्प सुनाई पड़ता था।  गुजरात ने बहोत कुछ अलग किया हैं। सबसे बड़ा इनोबेटिव टीचर्स नेटवर्क गुजरात के पास हैं। ऑन लाइन ट्रेनिग में सेतु ओ4 समर्थ से 25000 से अधिक टीचर तालीम ले रहे हैं। उनके फीडबैक भी हैं जो आगे का प्लान बनाने में सहयोग करेगा।

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नवाचार के लिए एक शब्द सदैव रहेगा। वो शब्द हैं 'असम्भव' होने से पहले ओर होने के बाद भी...

Friday, September 14, 2018

सर्जिकल स्ट्राइक ओर ...

कुछ बाते खास होती हैं।
हमारे लिए ऐसी एक न्यूज का मतलब हैं 'सर्जिकल स्ट्राइक'। कोई इसे पोलिटिकल रूप से बताता हैं, देखता या समजता हैं।ऐसी एक जानकारी जो सर्जिकल स्ट्राइक से जुड़ा हैं।
एक तरफ हमारे सिपाही सर्जिकल स्ट्राइक के लिए तैयार थे।सबसे बड़ा सवाल ये था कि लाइन ऑफ कंट्रोल को क्रॉस करके कैसे गुसा जाय।ये सवाल इसी लिएभी महत्वपूर्ण था कि वहाँ रात का समय लेना था। क्योंकि दिनभर तो सिपाही की चहल पहल से सबको मालूम पड़ सकता था। होना क्या था... एक अभिनव रास्ता खोजा गया।

इस बात की जानकारी देते हुए लेफ्ट. कर्नल श्री राजेन्द्र निम्भोरकर ने बताया कि उस वख्त रात को गुसने में कुत्तो का डर था। अगर गुसते समय वो भौकना शुरू करते तो पकड़े जाते। अब कुट्टक5 को कैसे दूर किया जाये। राजेन्द्र ओर उनकी टीम ने जंगल का कानून याद किया। कुत्तो को खाने में तेंदुआ( चित्ता) पसंद हैं। कुत्ते शेर से ज्यादा तेंदुओं से डरते हैं। अब कुत्तो कोंकेसे जानकारी मिलेगी की आसपास में तेंदुआ हैं? और  अगर ऐसा कुत्तो को मालूम पड़ जायेगा तो होगा ये की कुत्ते न बोलेंगे,न भोकेंगे न बहार आएंगे। इस विचार को हमारे सिपाहियो ने एक नए तरीके से अमलीकृत किया। उन्होंने अपने कपड़ों में तेंदुए का पिशाब लगा कर रात को लाइन ऑफ कंट्रोल में गुसना शुरू किया।

अब आप समजय होंगे।
इस के कारण वहां पहुंचने तक कोई कुत्ता हमारी सेना के सामने नहीं आया। ओर हमारे देश की फतह हुई।

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देश हमारा हैं।
हमे देश ने बहोत दिया हैं।
हम देश को क्या देना हैं और कब वो हमे ही तय करना हैं।

Wednesday, September 12, 2018

प्रकृति के नियम​



खाना जो हम खाते हैं, २४ घण्टे के अंदर शरीर से बाहर निकल जाना चाहिए, वरना हम बीमार हो जायेंगे।​​पानी जो हम पीते हैं, 0४ घण्टे के अंदर शरीर से बाहर निकल जाना चाहिए, वरना हम बीमार हो जायेंगे।​​हवा जो हम सांस लेते हैं, कुछ सेकंड में ही वापस बाहर निकल जानी चाहिए, वरना हम मर ही जायेंगे ।​
​लेकिन नकारात्मक बातें, जैसे कि घृणा, गुस्सा, ईर्षा, असुरक्षा आदि आदि, जिनको हम अपने अंदर दिन, महीने और सालों तक रखे रहते हैं ।​यदि इन नकारात्मक विचारों को समय-समय पर अपने अंदर से नहीं निकालेंगे तो एक दिन निश्चित ही हम मानसिक रोगी बन जायेंगे ।​ निर्णय आपका ​क्योंकि शरीर भी आपका है।​

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सामने वाले जो तय करके पूछते हैं।
वो सहज हो सकते हैं। जो हमने कहा होगा बो भी गलत न होगा। मगर फिरभी मानसिक तौर पे देखा जाय तो सभी को समज कर ही मन में कुछ भरना या रखना चाहिए।






GRFR ओर 7रंगी स्किल..

जब कुछ शुरू करते हैं। उस वख्त लगता हैं ये कैसे होगा। मगर नेकी ओर लगन से कुछ काम करने शुरू होते हैं तो आजही बढ़ते होते हैं।
पिछले कुछ सालों से में बच्चों के कीर्तिमान के लिए में कुछ करने के बारे में सोच रहा था।काम भी किया। सारे काम खत्म किये आज से 2008 से मेरे दोस्त और मुजे एशिया इर गिनिस रिकार्ड तक पहुंचाने वाले मनमोहन जी का जैसे मुजे सहकार मिला।उनके साथ अब हम नेशनल किड्स रिकॉर्ड के लिए जुड़ेंगे।
कुछ दिनों से हम आपसमें बात कर रहे थे।कल पूरे दिन उस काम से जुड़े रहने के बाद उनसे मेरी वार्ता हुई।
अब 7रंगी स्किल के GRF से जुड़कर ग्लोबली स्किल्ड बच्चो को खोजने का काम करेंगे। कुछ दिनों में इस बात को हम ओन पेपर ले रहे हैं। दोनो कंपनियों के  करार करके हम आगे बढ़ेंगे। यहां तक पहुंचने में अभी चार महीने लगेंगे। मगर बगैर लिखे हम इस काम को 2008 से श्री मनमोहन जी के मार्गदर्शन में सिखाते आये हैं।अब उनसे जुड़कर आगे बढ़ेंगे।

आशा हैं।
आप समजेंगे।
करने वाले बहोत हैं।
दौड़ने वाला में अकेला।
कुछ कमियां होगी हमारी सोच में, इरादे कोई कमजोर नहीं हैं।सो आप दुनिया में कही से भी कुछ भी सजेश करेंगे तो हम उसे अवश्य मानेंगे।


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मेरी सोच हैं कि
स्किल वाले बच्चे स्किल से कमाए,ओर शिक्षा के माध्यम से रोजगारी के बजाय स्किल से रोजगार प्राप्त करें...

@आमीन

Tuesday, September 11, 2018

સત્ય ઘટના...


ઇટાલીના સરમુખત્યાર મુસોલિનીની આત્મકથામાં પડેલો આ પ્રસંગ વાંચીને દરેક ભારતવાસી પોતાની પ્રાચીન સંસ્કૃતિ માટે ગૌરવનો અનુભવ કરી શકે તેમ છે. ભારતના મહાન સંગીતકાર ઓમકારનાથ ઠાકુર એ દિવસોમાં ઇટાલીના પ્રવાસે ગયેલા. ભારતના એ મહાન સંગીતજ્ઞના માનમાં મુસોલિનીએ એક ભોજન સમારંભનું આયોજન કરેલ.

આ રાજકીય ભોજન સમારંભમાં ઓમકારનાથ ઠાકુરની સાથે ઇટાલીમાં વસેલા ઘણા અગ્રગણ્ય ભારતીયો તથા ભારતના દૂતાવાસના સભ્યોને પણ ઉપસ્થિત હતા.સમારંભમાં મુસોલિનીએ ભારતની પાંચ હજાર જૂની સંસ્કૃતિની મજાક કરતા બધા મહેમાનોની વચ્ચે ઓમકારનાથ ઠાકુરને કહ્યું કે, 'મી. ઠાકુર મેં સાંભળ્યું છે કે તમારા દેશમાં કૃષ્ણ જ્યારે વાંસળી વગાડતા ત્યારે આજુબાજુના વિસ્તારની બધી ગાયો નાચવા લાગતી, મોર કળા કરવા લાગતા, ગોપીઓ સૂધબૂધ ખોઈને કૃષ્ણ જ્યાં વાંસળી વગાડતા હોય ત્યાં દોડી આવતી,શું તમે આ વાતને માનો છો?'

ઇટાલીના સરમુખત્યારને ભારતના એ સપૂતે ભોજન સમારંભમાં બધાની વચ્ચે જે કરી બતાવ્યું તે જાણીને પ્રત્યેક ભારતીયનું મસ્તક ગૌરવથી ઊંચું થઈ જશે. ઠાકુરે કહ્યું, 'કૃષ્ણ જેટલું તો મારું સાર્મથ્ય નથી કે નથી સંગીતની બાબતમાં મારી તેમના જેટલી સમજણ. સાચું તો એ છે કે સંગીત સંબંધે આ પૃથ્વી ઉપર આજ સુધીમાં કૃષ્ણ જેટલી સમજણવાળો કોઈ બીજો પેદા થયો હોવાનું પણ જાણવા મળતું નથી.

પરંતુ, સંગીતનું જે થોડું ઘણુ જ્ઞાન મને છે, તે તમે કહો તો તમને કહું અથવા કરી બતાવું. મુસોલિનીએ મજાકમાં જ કહ્યું કે, 'જો કે સંગીતના કોઈ સાધનો અહીં ઉપલબ્ધ નથી છતાં પણ જો શક્ય હોય તો કંઈક કરી બતાવો તો અહીં ઉપસ્થિત મહાનુભાવોને પણ ભારતીય સંસ્કૃતિનો પરિચય મળે.'

ઓમકારનાથ ઠાકુરે ડાઈનીંગ ટેબલ ઉપર પડેલા કાચના જુદા જુદા પ્યાલામાં ઓછું વધારે પાણી ભરીને તેના ઉપર છરી કાંટાથી જલતરંગની જેમ વગાડવું શરૂ કર્યું. બે મિનિટમાં તો ભોજન સમારંભની હવા ફરી ગઈ. વાતાવરણમાં એક પ્રકારની ઠંડક વર્તાવા લાગી. પાંચ મિનિટ, સાત મિનિટ અને મુસોલિનીની આંખો ઘેરાવા લાગી. વાતાવરણમાં એક પ્રકારનો નશો છવાવા લાગ્યો.

મદારી બીન વગાડે અને અવસ થઈને જેમ સાપ ડોલવા લાગે તેમ મુસોલીની ડોલવા લાગ્યો અને તેનું માથું જોરથી ટેબલ સાથે અથડાયું.બંધ કરો... બંધ કરો... મુસોલિની બૂમ પાડી ઉઠ્યો. સમારંભમાં સન્નાટો છવાઈ ગયો. બધા લોકોએ જોયું તો મુસોલિનીના કપાળમાં ફૂટ પડી હતી અને તેમાંથી લોહી વહેતું હતું. મુસોલિનીએ આત્મકથામાં લખાવ્યું છે કે ભારતની સંસ્કૃતિ માટે મેં કરેલ મજાક માટે હું ભારતની જનતાની માફી માંગું છું. ફક્ત છરીકાંટા વડે પાણી ભરેલા કાચના વાસણોમાંથી ઉદભવેલા એ અદભૂત સંગીતથી જો આ સભ્ય સમાજનો મારા જેવો મજબૂત મનનો માનવી પણ ડોલવા લાગે તો હું જરૂર માનું છું કે એ જમાનામાં કૃષ્ણની વાંસળી સાંભળીને જંગલના જાનવરો પણ શાંત થઈ જતાં હશે અને માનવીઓ પણ સૂધબૂધ ખોઈને ભેળા થઈ જતાં હશે.

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ભારતના ઋષિઓએ હજારો વર્ષ પૂર્વે ધ્વનિશાસ્ત્ર - નાદબ્રહ્મની સાધના કરી અને મંત્રયોગ દ્વારા માનવીના ચિત્તના તરંગોને અનેક પ્રકારે રૂપાંતરિત કરવાની પ્રક્રિયાઓ શોધેલ.

Monday, September 10, 2018

गणेश जी और 5 मुखी गणेश

वयार करते हैं हम तुम्हे इतना,
दो आंखे तो क्या,
दो जहां में समजाये इतना।

खूब सूरत गाना हैं।
मुजे पसंद हैं।कुछ बात श्रद्धा से जुड़ी हैं। मेरी आस्था गणेश जी हैं।उनकी करवा से आज तक मे जताता ओर बचता आया हु। मेरे कुछ काम मे उनके सीधे आशीर्वाद हैं। आज तो जो हु उनके पावन आशीर्वाद से हु। बहोत बार ऐसा हुआ कि मुजे जैसे गणेश जी ने रास्ता दिखाया। रास्ता किया। आज सुबह दर्शन करने का तय किया था। नहीं हो पाए एमजीआर श्याम को एथॉर के दर्शन किये।
मेरी श्रद्धा के प्रतीक हैं एथॉर।

शायद आप को गलत लगें...
में कई सालों से गणेश जिनको सदैव साथ रखता हूँ। मेरे किसी शुभ चिंतक ने मुजे पांच मुख वाले गणेश जी 'संकट चौथ' के दिन ग्राम भारती में दिए थे। तब से रोज ये गणेश जी मेरे साथ रखता हूँ। पहले एक गणेश यंत्र रखता था। अब मूर्ति रखता हूं। अमेरिकन पूर्वप्रमुख ओबामा हनुमानजी की मूर्ति रखते है। जब वो सत्ता में थे तब भी रखते हैं।कहिए की पहले से रखते हैं। मगर हुआ ये की रक्षा बंधन के दिन हमारे 'मातृछाया' के घर मंदिर में पूजा के साथ उस 5 मुखी गणेश जी को रखे थे। वहां से निकल ने में शायद गलती कर बैठा। ओर हुआ ये की, 5 मुखी गणेश जी आये। उनको छोड़ के जैसे मेरा जी गभर रहा था। उन के बिना जैसे बैचेनी लगती थी। मेरे थे,ओर मुजे रखने थे। महर रोज दिमाग ये सोचता कैसे मुझतक पहुंचे। नहर से चाची मा बीमार थे,मुजे याद किया गया। में वहां पहुंचा। उन्हें मिला, गणेश जी जैसे हाथ मे लिए मेने तय किया अब कोई दिक्कत नहीं हैं। अब जो होगा अच्छा होगा। शायद छ बजे होंगे और एक जगह से कॉल आया कि किराया आधा करेंगे। बस, तय हो गया कि गणेश जी ने अब मेरा सुनना शुरू किया हैं। और सब संभल ने लगा।
आज पूरा दिन उन के साथ जैसे सभी काम मे सहयोग मिला।मेरे बहोत से काम एकदम शुरू हुए,तेज हुए या आगे बढ़े। ऐसा कल रात से शुरू हो गया।मुजे संकेत मिले तो मैने पूरा दिन काम को जोडने में लगाया। सुबह से निकला तो बहोत अच्छा हुआ। मेरे निकल ने के बाद जो कुछ हुआ।अच्छा हुआ। दो दिन तीन रात जागने के बाद भी सुबह से गाड़ी चलाई। अच्छे से रुके हुए काम को जैसे मेरी फेवर में बुनता रहा ।एक तरफ जैसे सब सेटल होने के साथ बाते भी चलती रहती थी। नकन्द भी न आये काम भी निपटे। रास्ते में मोबाइल की बैटरी बन्ध। न गाड़ी का चार्जर काम करें न 10000 MAH का पावर सेवर भी खत्म हो गया था। एक दोस्त को कॉल किया। उनका नाम पंकज पटेल वो अपना पावर सेवर लेकर आये। मेरा खाली पावर सेवर लेकर आये।मेने फोन चालू किये। थोड़ी देर में काम आगे बढ़ा और आज रात तक तो जैसे सब कुछ साफ हो गया।आज काम भी बहोत किया। 15 नवम्बर को होने वाली कॉंफ़र्न्स के काम मे सारा दिन निकल गया।
जिस की उम्मीद थी। सारा दिन अच्छा और सही हुआ।क्योकी गणेश की फिर से मेरे साथ आगये थे। मेरी सरकार गणेशजी के सरोकार। बस... जैसे जैसे गणेश हुकुम देते थे,देते हैं,दिए हैं वो सब अमल हो पाए वैसा किया। मेरे कुछ डॉक्यूमेंट जो महत्वपूर्ण थे वो मेने खोजे ओर से उसके सही स्थान पर पहुंचाए।अब निश्चित हु। #थैंक्स चेतन भाई...(राजकोट)

अब...
एक नया काम भी शुरू हुआ।
जब भी हो संपर्क करे।जब भी गणेश जी को हाथ में पकड़कर पूछ लगे। जैसे हुकुम क्या होगा,हुकुम क्या होता, हुकुम कैसे करते सब मालूम पड़ने लगा। फीस से श्याम को गणेशजी ओर मेरे खास सहयोगी ड़ी. धवल राजकुम से आगे के काम को समज ने ओर फैलाने पे अच्छा काम और दिशा निर्देश हुआ।
ऐठोर गणेश जी,8.15pm9.9.18
क्यो...
शायद आज से गणेश जी का महीना हैं। शायद मेरे गणेश जी मेरे पास हैं।
ओर हा, आज एठोर भी गए। उनके शांति से दर्शन किये।मन शांत हुआ,कल से तय किया था कि ये लिखूंगा। 
कुछ बातों में मैने गणेश जी से माफी मांगी और फिरसे यहाँ तक चलने का संकल्प किया ।

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गणेश गणेश गणेश।
5 मुखी गणेश मेरे गणेश।
में तो उन के सामने बांध काला हरा धागा भी नहीं कजोड़ सकता।उनके आदेश या हुकुम को कैसे न मानु....
@सभी को जय गणेश...

Sunday, September 9, 2018

जिन्दजी के मोड़

जिन्दजी जिन्दजी है।
आशा और निराशा के साथ चलती हैं। कभी हमे लगता हैं, जो हम चाहेंगे वो होगा। ऐसा न होनेपर हम मायूस रहने लगते हैं।हमारी गलती ये हैं कि हम पहले सोच लेते हैं,बाद में ऐसा न होने पर या कुछ कम होता हैं,तब जाके हम मायूस होते हैं। अब ऐसा होता हैं तब हमें लगता हैं कि हमारी जिन्दगी जैसे अच्छे से बुरे मोडमें अचानक आ गई शायद इसी तरह, जिन्दगी  फिरसे अचानक मोड़ ले लेती हैं। इस के लिए हमे हमारी आशा जीवन्त रखनी चाहिए। कुछ ऐसा होता हैं। जिसनके लिए हम अधिक चिंतित होते हैं। जब उसको फिक्र बढ़ जाती हैं, ओर एक आसान से  तरीके से हमे कुछ ऐसा मिलता हैं तो हमारेके लिए अच्छा नहीं बहोत अच्छा हो जाता हैं।

आज कुछ ऐसी घटनाएं बनी जो मुजे फिरसे मजबूत कर गई।
मुजे जिस डॉक्यूमेंट की ज्यादा फिक्र थी वो जैसे आसान हो गए। जो सवाल की वो कहा हैं,उसका भी सटीक जवाब ओर कुछ आसार आते हैं तो फिर से जीवन में शांति का अनुभव होता हैं।


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जिन्दजी जिंदा रहने वालों की हैं।
मरने के बाद तो सारी दुनिया कुछ दिनों में भूल जाती हैं।
इस लिए जिंदा रहना हैं, उससे महत्व पूर्ण हैं की अच्छे से ओर शांति से जीवन पसार हो। व्यतीत होना और व्यवस्थित होना,इस दोनो में फर्क हैं। कुछ दिनों में उसके ऊपर हम लिखेंगे।


Saturday, September 8, 2018

कल्पनाशीलता ओर क्रिएशन

ભાવેશ પંડ્યા....ડો.ભાવેશ પંડ્યા...આઈiim....Innovation bhavesh pandya.indiabookofrekord..Asia book of record...Dr bhavesh pandya de bhavesh kaalam...Dr story world records

कल्पनाशील सोच-विचार को शायद एक दक्षता न माना जाता हो लेकिन यह अधिकतर कलात्मक दक्षताओं से भी अधिक आधारभूत है। छोटी कक्षाओं में यह सिखाना बहुत मुश्किल है। कला के संसार में अलग ही कल्पना की अलग ही उड़ान होती है और इस संसार में प्रवेश कर पाना आसान नहीं है। कला-शिक्षण के शुरुआत में सम्भव है कि किसी शिक्षक ने कोई आकृति बनाने या उसे रंगों से भरने या फिर सीधी लकीरें खींचने के लिए कहा हो। कभी-कभी बच्चे ऐसा करने में बोरियत महसूस करते हैं और कला की कक्षाओं में उनकी दिलचस्पी घटने लगती है। मैं आमतौर पर उन्हें कोई रंग-बिरंगा दृश्‍यचित्र बनाने को देता हूँ, या फिर जानवरों या किसी इन्सान की हल्की-फुलकी हंसी भरी तसवीर, तितलियाँ और चित्रकारी आदि। यदि यह उनका खुद का चुनाव होगा तो अधिक सम्भावना है कि वे इस पर मेहनत करेंगे। कभी-कभी वे शिल्प कार्य भी करते हैं। मैंने पाया है कि उन्हें इस गतिविधि में अमूमन अधिक मजा आता है।
आमतौर पर कक्षा 6 से कक्षा 8 तक के बच्चों को जो वे करना चाहते हैं उसके चुनाव की छूट दी जाती है। कुछ दिलचस्पी लेते हैं और कुछ नहीं। बेहतर है कि विद्यार्थियों को ऐसा काम न दिया जाए जिसके लिए वे तैयार न हों। मेरी कोशिश विभिन्न विषयों पर कुछ विचार उन तक पहुँचाने की रहती है जिन्हें वे अपनी स्केच-बुक में प्रयोग कर सकें। वे बहुत अच्छा प्रदर्शन न कर रहे हों तब भी मैं उन्हें प्रोत्साहित करता हूँ। विद्यार्थी विचारों को अपना लेते हैं तो कुछ करने की इच्छा और प्रेरणा सबसे सशक्त होते हैं। यानी किए गए महत्वपूर्ण चुनाव में उनका दखल होना चाहिए। चुनाव वे स्वयं करेंगे तो काम भी बेहतर करेंगे।
महत्वपूर्ण चरण तब आता है जब वे बड़ी कक्षाओं में पहुँचते हैं, जैसे कि कक्षा 12 में। इसी दौर में वे रेखाचित्र बनाने की दक्षताएँ, कला का ज्ञान और रंगों की समझ विकसित करते हैं। इन कक्षाओं में स्थिर जीवन (स्टिल लाइफ़), कल्पनाशील चित्रकला, पुस्तकों के आवरण चढ़ाना, पोस्टर-निर्माण और लिनो प्रिन्ट आदि विशेष विषय होते हैं। पाठ्यचर्या का यह हिस्सा उन्हें सामग्री से “खेल-खिलवाड़” करने का मौका देता है। उदाहरण के लिए, पानी के रंगों की पारदर्शी रचना पर पेस्टल रंगों से चित्रकारी करना। पाठ का यह हिस्सा कला नहीं बल्कि कला की दक्षता या शिल्प है जो शिक्षक द्वारा बहुत ही ध्यान से पेश किया जाता है। कुछ विद्यार्थी आवेग में काम करते हैं, काम के महत्वपूर्ण पक्षों पर पर्याप्त ध्यान दिए बिना उसे खत्म करने की जल्दी में रहते हैं। मैं उन्हें अपने काम में जटिलता का विकास करने के लिए प्रोत्साहित करता हूँ। खुले सवाल छोड़ता हूँ जिनसे ऐसे मुद्दे उठें जिन्हें वे अपने काम के लिए विचार में ला पाएँ। उनके लिए सबसे अधिक आवश्यकता सोच पाने के अभ्यास की है। मैं सुझाव माँगता हूँ तो पहले पूछता हूँ कि विद्यार्थी किस बारे में सोच रहा था। बहुत बार तो उसके पास पहले से ही कोई विचार होता है मगर उसे प्रयोग में लाने का आत्मविश्वास नहीं होता। मैं उन्हें यह कहकर प्रोत्साहित करता हूँ कि कुछ बातें अभ्यास से ही सीखी जा सकती हैं और अधिक अभ्यास बेहतर नतीजों की ओर ले जाता है।
पिछले कुछ सालों में मैंने जीवन में कला-शिक्षा के महत्व के बारे में अपनी सोच कुछ विद्यार्थियों तक पहुँचाई। पिछले ही साल कक्षा 12 के दो विद्यार्थी अपने डिग्री पाठ्यक्रम में फ़ैशन डिज़ाइनिंग करना चाहते थे। इसमें कोई शक नहीं कि बच्चे के व्यक्तित्व और दक्षताओं के विकास में कला-शिक्षा का महत्व है। कला से बच्चे की बुद्धि का विकास होता है। देखा गया है कि कला से सम्बद्ध गतिविधियों में शामिल बच्चे अन्य विषयों की भी बेहतर समझ विकसित कर पाते हैं फिर वह चाहे भाषा हो या भूगोल या फिर विज्ञान। अध्ययनों से सिद्ध हुआ है कि कला के सम्पर्क और परिचय में आने से मस्तिष्क की गतिविधि को बढ़ावा मिलता है। बच्चा समस्याओं के हल निकालना सीखता है। वह अपने विचार अलग-अलग तरह से दूसरों तक पहुँचाना भी सीखता है। कला बच्चे के समग्र व्यक्तित्व का विकास करती है, उसमें आत्म-सम्मान का निर्माण होता है और अनुशासन भी आता है। कला से सम्बद्ध होने की वजह से एक बच्चा अधिक रचनात्मक और नवाचारी बनता है तथा दूसरों के साथ सहयोग करना सीखता है। सारांश में, कला-गतिविधियाँ बच्चे के व्यक्तित्व-विकास, बौद्धिक प्रगति तथा अवलोकनात्मक दक्षताओं में बेहतरी लाने के लिए आवश्यक हैं।